सुनहरी चाभी, या बुरातिनो के कारनामे
अलेक्सी तलस्तोय
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास
1.
एक बार बढ़ई जोसेफ़ को रास्ते में लकड़ी का एक ठूंठ
मिला, जो मनुष्य की आवाज़ में चिल्ला रहा था.
बहुत पहले भूमध्य सागर के किनारे एक छोटे से गाँव
में एक बूढ़ा बढ़ई जोसेफ़ रहता था, जिसका उपनाम ‘भूरी
नाक’ था. एक बार उसे एक ठूंठ पड़ा मिला. साधारण ठूंठ,
जो सर्दियों में भट्टी में जलाया जाता है.
‘बुरी चीज़ नहीं है,’
जोसेफ़ ने अपने आप से कहा, ‘इससे मेज़ की
टांगों जैसी कोई चीज़ बनाई जा सकती है...’
जोसेफ़ ने चश्मा पहना,
जिस पर डोरी बंधी हुई थी, - क्योंकि चश्मा भी पुराना था, -
ठूंठ को हाथ में लेकर घुमाया और कुल्हाड़ी
से उसे काटने लगा.
मगर जैसे ही उसने काटना शुरू किया, किसी की असाधारण रूप से पतली आवाज़ चिरचिराई:
“ओय-ओय, धीरे, मेहेरबानी करके!”
जोसेफ ने चश्मा नाक के सिरे पर सरकाया, अपने वर्कशॉप में इधर उधर देखने लगा, -
कोई नहीं था...
उसने अपनी
बेंच के नीचे झांककर देखा, - कोई नहीं था...
उसने लकड़ी की छीलन वाली टोकरी में देखा – कोई नहीं
था...
उसने दरवाज़े के बाहर सिर निकाला, - रास्ते पर भी कोई नहीं था...
‘कहीं मुझे सपना तो नहीं
आया?’ जोसेफ ने सोचा. –‘कौन चिरचिरा सकता है?...’
उसने फिर से कुल्हाड़ी हाथ
में ली और फिर से – जैसे ही ठूंठ पर मारी...
“ओय, दर्द होता है, कह तो रहा हूँ!”- पतली आवाज़ ज़ोर से चीखी.
इस बार जोसेफ़ सचमुच में डर
गया, उसके चश्मे पर भी पसीना छलकने लगा...उसने कमरे
के सभी कोनों को देख लिया, फरनेस के ऊपर चढ़ गया और, सिर घुमाकर बड़ी देर तक चिमनी
में घूरता रहा.
“नहीं है कोई...”
“हो सकता है, मैंने कोई गलत चीज़ पी ली हो और मेरे कानों में सीटियाँ
बज रही हों?” जोसेफ़ मन ही मन सोचता रहा...
“नहीं, मैंने आज कोई गलत चीज़ नहीं पी...कुछ शांत होने के बाद
जोसेफ़ ने रन्दा उठाया, उसके पिछले भाग पर हथोड़े से टक-टक किया, ताकि ब्लेड उतनी ही बाहर निकले जितनी ज़रुरत हो, न कम, न ज़्यादा – चाकू बाहर निकले – लकड़ी के टुकड़े को
बेंच पर रखा और उसे छीलने ही लगा था...
“ओय, ओय, ओय, ओय, सुनिए, आप चिकोटी क्यों काट रहे हैं?”- पतली आवाज़ बदहवासी से चिरचिराई...जोसेफ़ ने रन्दा गिरा दिया, वह पीछे झुका, झुका, और सीधे फर्श पर बैठ गया: उसने अंदाज़ लगाया, कि पतली आवाज़ लकड़ी के टुकड़े के भीतर से आ रही थी.
इसी समय जोसेफ के पास
उसका पुराना दोस्त, स्ट्रीट सिंगर, कार्लो आया. जोसेफ़ ने बोलने वाला टुकड़ा अपने
दोस्त कार्लो को दे दिया.
एक समय था, जब कार्लो चौड़ी हैट पहने, अपना ख़ूबसूरत बाजा लिए
शहर-शहर घूमता था और गाने-और संगीत से अपनी रोज़ी रोटी कमाता था.
अब कार्लो बूढ़ा हो गया था, बीमार भी रहता था, और उसका बाजा भी काफ़ी पहले टूट गया था.
“नमस्ते, जोसेफ,” उसने कार्यशाला में आते
हुए कहा, “ये तुम फर्श पर क्यों बैठे हो?”
“अरे, देखो, मैंने एक छोटा सा पेच खो
दिया है...ओह, चलो जाने दो!” जोसेफ़ ने जवाब दिया और लकड़ी के
तुकडे पर तिरछी नज़र डाली. “और तुम्हारा क्या हाल है, बुढऊ?”
“बुरा हाल है,” कार्लो ने जवाब दिया, “ बस, सोचता रहता हूँ, कि रोज़ी रोटी कैसे कमाऊँ...तुम कुछ मदद ही कर देते, कुछ सलाह देते...”
“इससे आसान बात और क्या
हो सकती है,” जोसेफ़ ने ख़ुशी से कहा, और मन में सोचा: ‘अब मैं इस नासपीटे ठूंठ से छुटकारा पाता हूँ,’ – “बहुत आसान है: देख रहे हो – मेज़ पर बढ़िया लकड़ी का
टुकड़ा पडा है, तू इस ठूंठ को ले ले, कार्लो, और घर ले जा...”
“इ-हे-हे,” कार्लो ने अनमनेपन से जवाब दिया,- “फिर इसके बाद क्या? मैं इस ठूंठ को घर ले जाऊंगा, मगर मेरी कोठरी में
भट्टी भी नहीं है.”
“मैं तुझे मतलब की बात
बता रहा हूँ, कार्लो... चाकू उठा, इस ठूंठ से छीलकर एक
गुडिया बना ले, उसे हर तरह के मजाकिया शब्द सिखा, गाना और नाचना सिखा, और घर-घर ले जा. रोटी और वाईन के लिए पैसा कमा लेगा.”
इसी समय बेंच से, जहां ठूंठ पड़ा था, खुशीभरी आवाज़ चिरचिराई:
“शाबाश, बहुत बढ़िया बात
सोची है, भूरी नाक!”
जोसेफ़ फिर भय से थरथराया,
और कार्लो ने सिर्फ अचरज से चारों ओर देखा, - “ये आवाज़ कहाँ से आई?”
“खैर, शुक्रिया, जोसेफ़, इस सलाह के लिए.
ला, अपना ठूंठ मुझे दे.”
तब जोसेफ़ ने ठूंठ उठाया
और उसे दोस्त के हाथ में दे दिया. मगर या तो उसने भद्दे तरीके से दिया था, या फिर वह खुद ही उछला और कार्लो के सिर से टकराया.
“आह, तो, ये है तेरा उपहार!” कार्लो अपमान से चीखा.
“माफ़ करना, प्यारे दोस्त,” हो सकता है खुद ठूंठ ही
तुझसे टकरा गया हो.”
“झूठ बोलते हो, तूने ही मारा है...”
“नहीं, मैंने नहीं...”
“मुझे मालूम था कि तू
शराबी है, भूरी नाक,” कार्लो ने कहा, “और ऊपर से तू झूठा भी है.”
“आह, तू गाली देता है!” जोसेफ़ चीखा, “ठीक है, नज़दीक आ!”
“तू खुद ही नज़दीक आ जा, मैं तुझे नाक से पकडूँगा!”.....
दोनों बूढ़े चिल्लाए और एक
दूसरे पर झपटने लगे. कार्लो ने जोसेफ़ को भूरी नाक से पकड़ लिया. जोसेफ़ ने कार्लो के
कानों के पास वाले सफ़ेद बाल पकड़ लिए.
इसके बाद वे एक दूसरे की
पसलियों के नीचे वार करने लगे. बेंच पर एक तीखी आवाज़ चिर चिर कर रही थी और उनका
उत्साह बढ़ा रही थी:
“मार, मार, अच्छे से मार!”
आखिरकार बूढ़े थक गए और हांफने
लगे. जोसेफ़ ने कहा:
“चल, समझौता करते हैं, ठीक है ना...”
कार्लो ने जवाब दिया:
“ठीक है, चल समझौता करते हैं...”
बूढों ने एक दूसरे को
चूमा. कार्लो ने ठूंठ को बगल में दबाया और घर चला गया.
कार्लो सीढ़ियों के नीचे
एक छोटी से कोठरी में रहता था, जहां उसके पास कुछ भी
नहीं था, सिवाय एक ख़ूबसूरत चिमनी के – दरवाज़े के सामने
वाली दीवार पर.
मगर ख़ूबसूरत चिमनी, और चिमनी में जल रही आग, और केतली, जो इस चिमनी पर उबल रही थी, असली नहीं थी – पुराने कैनवास के टुकड़े पर चित्रित थी.
कार्लो अपनी कोठरी में
आया, बिना पैरों वाली मेज़ के पास पड़ी इकलौती कुर्सी
पर बैठा और, ठूंठ को इधर-उधर मोड़कर उसे छीलकर एक गुडिया
बनाने लगा.
‘मैं इसका नाम क्या रखूँ?’ कार्लो सोचने लगा. ‘मैं उसे ‘बुरातिनो’ कहूंगा. यह नाम मेरे लिए सुख लाएगा. मैं एक परिवार को
जानता हूँ – उन सबका नाम बुरातिनो था: पापा – बुरातिनो. मम्मा – बुरातिनो, बच्चे भी -बुरातिनो...वे सब खुशी से और बेफिक्र होकर
रहते थे...’
सबसे पहले उसने ठूंठ पर
बाल बनाए, फिर – माथा, फिर – आंखें...
अचानक आंखें अपने आप खुल
गईं और उसकी ओर एकटक देखने लगीं...
कार्लो ने बिल्कुल नहीं
दिखाया कि वह डर गया है, उसने सिर्फ प्यार से पूछा:
“लकड़ी की आंखों, तुम इतनी अजीब तरह से मुझे क्यों घूर रही हो?”
मगर गुडिया चुप रही, - हो सकता, इसलिए, की अभी उसके पास मुंह नहीं था. कार्लो ने गाल बनाए, फिर नाक – जैसी आम तौर पर होती है...
अचानक नाक लम्बी खिंचने
लगी, बढ़ने लगी, और लम्बी, तीखी नाक में बदल गयी, कि कार्लो चिल्ला पडा:
“अच्छी नहीं है, बहुत लम्बी है...”
और वह नाक की नोक काटने
लगा. मगर बात ये नहीं थी!
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