बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

बुरातिनो के कारनामे (सम्पूर्ण)

 

सुनहरी चाबी

या

बुरातिनो के कारनामे

अलेक्सी तल्स्तोय  

 

हिन्दी अनुवाद

 

आ. चारुमति रामदास

 

 

 

 

 

 

 

 

1.

एक बार बढ़ई जोसेफ़ को रास्ते में लकड़ी का एक ठूंठ मिला, जो मनुष्य की आवाज़ में चिल्ला रहा था.

बहुत पहले भूमध्य सागर के किनारे एक छोटे से गाँव में एक बूढ़ा बढ़ई जोसेफ़ रहता था, जिसका उपनाम ‘भूरी नाक था. एक बार उसे एक ठूंठ पड़ा मिला. साधारण ठूंठ, जो सर्दियों में भट्टी में जलाया जाता है.   

‘बुरी चीज़ नहीं है,’ जोसेफ़ ने अपने आप से कहा, ‘इससे मेज़ की टांगों जैसी कोई चीज़ बनाई जा सकती है...’

जोसेफ़ ने चश्मा पहना, जिस पर डोरी बंधी हुई थी, - क्योंकि चश्मा भी पुराना था, - ठूंठ को हाथ में लेकर  घुमाया और कुल्हाड़ी से उसे काटने लगा.

मगर जैसे ही उसने काटना शुरू किया, किसी की असाधारण रूप से पतली आवाज़ चिरचिराई:

“ओय-ओय, धीरे, मेहेरबानी करके!”

जोसेफ ने चश्मा नाक के सिरे पर सरकाया, अपने वर्कशॉप में इधर उधर देखने लगा, - कोई नहीं था...  

 उसने अपनी बेंच के नीचे झांककर देखा, - कोई नहीं था...

उसने लकड़ी की छीलन वाली टोकरी में देखा – कोई नहीं था...

उसने दरवाज़े के बाहर सिर निकाला, - रास्ते पर भी कोई नहीं था...

‘कहीं मुझे सपना तो नहीं आया?’ जोसेफ ने सोचा. –‘कौन चिरचिरा सकता है?...’

उसने फिर से कुल्हाड़ी हाथ में ली और फिर से – जैसे ही ठूंठ पर मारी...

“ओय, दर्द होता है, कह तो रहा हूँ!”- पतली आवाज़ ज़ोर से चीखी.

इस बार जोसेफ़ सचमुच में डर गया, उसके चश्मे पर भी पसीना छलकने लगा...उसने कमरे के सभी कोनों को देख लिया, फरनेस के ऊपर चढ़ गया और, सिर घुमाकर बड़ी देर तक चिमनी में घूरता रहा.

“नहीं है कोई...”

“हो सकता है, मैंने कोई गलत चीज़ पी ली हो और मेरे कानों में सीटियाँ बज रही हों?” जोसेफ़ मन ही मन सोचता रहा...

“नहीं, मैंने आज कोई गलत चीज़ नहीं पी...कुछ शांत होने के बाद जोसेफ़ ने रन्दा उठाया, उसके पिछले भाग पर हथोड़े से टक-टक किया, ताकि ब्लेड उतनी ही बाहर निकले जितनी ज़रुरत हो, न कम, न ज़्यादा – चाकू बाहर निकले – लकड़ी के टुकड़े को बेंच पर रखा और उसे छीलने ही लगा था...

“ओय, ओय, ओय, ओय, सुनिए, आप चिकोटी क्यों काट रहे हैं?”- पतली आवाज़ बदहवासी से चिरचिराई...जोसेफ़ ने रन्दा गिरा दिया, वह पीछे झुका, झुका, और सीधे फर्श पर बैठ गया: उसने अंदाज़ लगाया, कि पतली आवाज़ लकड़ी के टुकड़े के भीतर से आ रही थी.   

इसी समय जोसेफ के पास उसका पुराना दोस्त, स्ट्रीट सिंगर, कार्लो आया. जोसेफ़ ने बोलने वाला टुकड़ा अपने दोस्त कार्लो को दे दिया.

एक समय था, जब कार्लो चौड़ी हैट पहने, अपना ख़ूबसूरत बाजा लिए शहर-शहर घूमता था और गाने-और संगीत से अपनी रोज़ी रोटी कमाता था.

अब कार्लो बूढ़ा हो गया था, बीमार भी रहता था, और उसका बाजा भी काफ़ी पहले टूट गया था.

“नमस्ते, जोसेफ,” उसने कार्यशाला में आते हुए कहा, “ये तुम फर्श पर क्यों बैठे हो?

“अरे, देखो, मैंने एक छोटा सा पेच खो दिया है...ओह, चलो जाने दो!” जोसेफ़ ने जवाब दिया और लकड़ी के तुकडे पर तिरछी नज़र डाली. “और तुम्हारा क्या हाल है, बुढऊ?”

“बुरा हाल है,” कार्लो ने जवाब दिया, “ बस, सोचता रहता हूँ, कि रोज़ी रोटी कैसे कमाऊँ...तुम कुछ मदद ही कर देते, कुछ सलाह देते...”    

“इससे आसान बात और क्या हो सकती है,” जोसेफ़ ने ख़ुशी से कहा, और मन में सोचा: ‘अब मैं इस नासपीटे ठूंठ से छुटकारा पाता हूँ,’ – “बहुत आसान है: देख रहे हो – मेज़ पर बढ़िया लकड़ी का टुकड़ा पडा है, तू इस ठूंठ को ले ले, कार्लो, और घर ले जा...”

“इ-हे-हे,” कार्लो ने अनमनेपन से जवाब दिया,- “फिर इसके बाद क्या? मैं इस ठूंठ को घर ले जाऊंगा, मगर मेरी कोठरी में भट्टी भी नहीं है.”

“मैं तुझे मतलब की बात बता रहा हूँ, कार्लो... चाकू उठा, इस ठूंठ से छीलकर एक गुडिया बना ले, उसे हर तरह के मजाकिया शब्द सिखा, गाना और नाचना सिखा, और घर-घर ले जा. रोटी और वाईन के लिए पैसा कमा लेगा.”

इसी समय बेंच से, जहां ठूंठ पड़ा था, खुशीभरी आवाज़ चिरचिराई:

“शाबाश, बहुत बढ़िया बात सोची है, भूरी नाक!”

जोसेफ़ फिर भय से थरथराया, और कार्लो ने सिर्फ अचरज से चारों ओर देखा, - “ये आवाज़ कहाँ से आई?

“खैर, शुक्रिया, जोसेफ़, इस सलाह के लिए. ला, अपना ठूंठ मुझे दे.”

तब जोसेफ़ ने ठूंठ उठाया और उसे दोस्त के हाथ में दे दिया. मगर या तो उसने  भद्दे तरीके से दिया था, या फिर वह खुद ही उछला और कार्लो के सिर से टकराया.

“आह, तो, ये है तेरा उपहार!” कार्लो अपमान से चीखा.

“माफ़ करना, प्यारे दोस्त,” हो सकता है खुद ठूंठ ही तुझसे टकरा गया हो.”

“झूठ बोलते हो, तूने ही मारा है...”

“नहीं, मैंने नहीं...”

“मुझे मालूम था कि तू शराबी है, भूरी नाक,” कार्लो ने कहा, “और ऊपर से तू झूठा भी है.”

“आह, तू गाली देता है!” जोसेफ़ चीखा, “ठीक है, नज़दीक आ!”

“तू खुद ही नज़दीक आ जा, मैं तुझे नाक से पकडूँगा!”.....

दोनों बूढ़े चिल्लाए और एक दूसरे पर झपटने लगे. कार्लो ने जोसेफ़ को भूरी नाक से पकड़ लिया. जोसेफ़ ने कार्लो के कानों के पास वाले सफ़ेद बाल पकड़ लिए.

इसके बाद वे एक दूसरे की पसलियों के नीचे वार करने लगे. बेंच पर एक तीखी आवाज़ चिर चिर कर रही थी और उनका उत्साह बढ़ा रही थी:

“मार, मार, अच्छे से मार!”

आखिरकार बूढ़े थक गए और हांफने लगे. जोसेफ़ ने कहा:

“चल, समझौता करते हैं, ठीक है ना...”

कार्लो ने जवाब दिया:

“ठीक है, चल समझौता करते हैं...”

बूढों ने एक दूसरे को चूमा. कार्लो ने ठूंठ को बगल में दबाया और घर चला गया.

कार्लो सीढ़ियों के नीचे एक छोटी से कोठरी में रहता था, जहां उसके पास कुछ भी नहीं था, सिवाय एक ख़ूबसूरत चिमनी के – दरवाज़े के सामने वाली दीवार पर. 

मगर ख़ूबसूरत चिमनी, और चिमनी में जल रही आग, और केतली, जो इस चिमनी पर उबल रही थी, असली नहीं थी – पुराने कैनवास के टुकड़े पर चित्रित थी.

कार्लो अपनी कोठरी में आया, बिना पैरों वाली मेज़ के पास पड़ी इकलौती कुर्सी पर बैठा और, ठूंठ को इधर-उधर मोड़कर उसे छीलकर एक गुडिया बनाने लगा.

‘मैं इसका नाम क्या रखूँ?’ कार्लो सोचने लगा. ‘मैं उसे ‘बुरातिनो कहूंगा. यह नाम मेरे लिए सुख लाएगा. मैं एक परिवार को जानता हूँ – उन सबका नाम बुरातिनो था: पापा – बुरातिनो. मम्मा – बुरातिनो, बच्चे भी -बुरातिनो...वे सब खुशी से और बेफिक्र होकर रहते थे...’

सबसे पहले उसने ठूंठ पर बाल बनाए, फिर – माथा, फिर – आंखें...

अचानक आंखें अपने आप खुल गईं और उसकी ओर एकटक देखने लगीं...

कार्लो ने बिल्कुल नहीं दिखाया कि वह डर गया है, उसने सिर्फ प्यार से पूछा:

“लकड़ी की आंखों, तुम इतनी अजीब तरह से मुझे क्यों घूर रही हो?

मगर गुडिया चुप रही, - हो सकता, इसलिए, की अभी उसके पास मुंह नहीं था. कार्लो ने गाल बनाए, फिर नाक – जैसी आम तौर पर होती है...

अचानक नाक लम्बी खिंचने लगी, बढ़ने लगी, और लम्बी, तीखी नाक में बदल गई , कि कार्लो चिल्ला पडा:

 “अच्छी नहीं है, बहुत लम्बी है...”

और वह नाक की नोक काटने लगा. मगर बात ये नहीं थी!

 


2

नाक घूम रही थी, पूरी तरह घूम गई और वैसी ही रह गई – लम्बी-लम्बी, जिज्ञासु, तीखी नाक.

कार्लो मुंह बनाने लगा. मगर वह सिर्फ होंठ ही बना पाया था, - मुंह अचानक खुल गया:

“ही-ही-ही, हा-हा-हा!”

और उसमें से, चिढाती हुई, छोटी सी लाल नाक.  

इन शरारतों की ओर ध्यान दिए बिना कार्लो, छीलता रहा, लकड़ी से तराशकर अवयव बनाता रहा. उसने गुडिया की ठोढी, गर्दन, कंधे, धड़, हाथ बना दिए...

मगर जैसे ही उसने अंतिम उंगली तराशी, बुरातिनो अपनी मुट्ठियों से कार्लो के गंजे सिर पर मारने लगा, उंगलियां चुभाने लगा, गुदगुदी करने लगा.

“सुन,” कार्लो ने सख्ती से कहा, “अभी तो मैंने तुम्हें पूरा बनाया भी नहीं है, और तुम अभी से शरारत करने लगे हो...आगे क्या होगा...आं?

और उसने सख्ती से बुरातिनो की तरफ़ देखा. और बुरातिनो ने, अपनी गोल गोल, चूहे जैसी आंखों से, पापा कार्लो को देखा.

कार्लो ने छिपटियों से उसकी बड़े बड़े तलवों वाली लम्बी टांगें बनाईँ. इसके बाद काम ख़त्म करके उसने लकड़ी के बच्चे को फर्श पर रखा, ताकि उसे चलना सिखा सके.

बुरातिनो अपने पतले पैरों पर लड़खड़ाया, लड़खड़ाया, उसने एक कदम बढाया, दूसरा कदम बढाया, उछला, उछला, - सीधा दरवाज़े की ओर, देहलीज़ से होकर और – सड़क पर.

कार्लो, परेशान होकर, उसके पीछे गया:

“ऐ, बदमाश के बच्चे, वापस आ!...”

मगर कहाँ! बुरातिनो रास्ते पर भाग रहा था, हिरन की तरह, सिर्फ उसके लकड़ी के तलवे – टुकी-टुक, टुकी-टुक – पत्थरों पर टकटक कर रहे थे...

“उसे पकड़ो!” कार्लो चिल्लाया.

आने जाने वाले उँगलियों से भागते हुए बुरातिनो की तरफ़ इशारा करते हुए हंस रहे थे. चौराहे पर भारी-भरकम पुलिसवाला खड़ा था ताव देती मूंछों और तिकोनी टोपी में.

भागते हुए लकड़ी के आदमी को देखकर उसने अपने पैर चौड़े फैला लिए, और पूरे रास्ते को रोक दिया. बुरातिनो ने उसकी पैरों के बीच से कूदकर जाना चाहा, मगर पुलिसवाले ने उसे नाक से पकड़ लिया और तब तक पकड़े रखा जब तक पापा कार्लो वहां नहीं पहुँच गया...

“अच्छा, थोड़ा रुक जा, मैं अभी तुझसे निपटता हूँ,” धक्का देते हुए कार्लो ने कहा, और बुरातिनो को अपने जैकेट की जेब में रखने लगा...

बुरातिनो को ऐसे खुशनुमा दिन, सबके सामने जैकेट की जेब से पैर ऊपर उठाए रखना अच्छा नहीं लग रहा था, - वह बड़ी होशियारी से मुडा, रास्ते पर गिर गया और ऐसा नाटक किया, मानो मर गया हो...

“आय, आय,” पुलिसवाले ने कहा, “बात खतरनाक है!”

आने जाने वाले लोग इकट्ठा होने लगे. सड़क पर पड़े हुए बुरातिनो को देखकर सिर हिलाने लगे.

“बेचारा,” वे कह रहे थे, “हो सकता है, भूख से...”

“कार्लो उसे मरते दम तक मारता रहा,” कुछ और लोग कह रहे थे, “ये बूढा बाजे वाला सिर्फ दिखाता है, कि अच्छा आदमी है, वह बुरा आदमी है, दुष्ट है...”

 

यह सब सुनकर मुच्छड़ पुलिसवाले ने अभागे कार्लो को कॉलर से पकड़ लिया और घसीटते हुए पुलिस थाने ले गया.

कार्लो जूतों की धूल झाड़ रहा था, और ज़ोर ज़ोर से कराह रहा था:

“ओह, ओह, इस लकड़ी के छोकरे को बनाकर मैंने अपने आप मुसीबत मोल ली है!”

जब सड़क खाली हो गई , तो बुरातिनो ने नाक ऊपर उठाई, चारों ओर देखा और छलांग मारकर घर भाग गया...

बोलने वाले झींगुर ने बुरातिनो को एक काम की सलाह दी.

सीढ़ियों के नीचे वाली कोठरी में आने के बाद, बुरातिनो मेज़ की टांग के पास फर्श पर धम्म से बैठ गया.

“और क्या सोचना चाहिए?

ये नहीं भूलना चाहिए, कि बुरातिनो अपने जन्म के बाद पहली बार चला था. उसके विचार छोटे-छोटे थे, संक्षिप्त-संक्षिप्त, मामूली-मामूली थे.

इसी समय एक आवाज़ सुनाई दी;

“क्रीई-क्री , क्रीई-क्री, क्रीई-क्री...”

बुरातिनो ने कोठरी में देखते हुए सिर घुमाया.        

“ऐ, कौन है यहाँ?”

“यहाँ मैं हूँ, - क्रीई-क्री...”

बुरातिनो ने एक प्राणी को देखा, जो काफ़ी कुछ तिलचट्टे जैसा था, मगर जिसका सिर टिड्डे जैसा था, वह भट्टी के ऊपर वाली दीवार पर बैठा था और हौले से ‘क्रीई-क्री’ कर रहा था, - अपनी बाहर निकली, कांच जैसी, इन्द्रधनुष जैसी आंखों से देख रहा था, अपनी मूंछें हिला रहा था.

“ऐ-इ, तू कौन है?

“मैं - बोलने वाला झींगुर हूँ,” उस प्राणी ने कहा, “ मुझे इस कमरे में रहते हुए सौ साल से ज़्यादा हो गए हैं.”

“यहाँ मैं मालिक हूँ, तू यहाँ से भाग जा.”

“अच्छी बात है, मैं चला जाता हूँ, हांलाकि इस कमरे को छोड़ते हुए मुझे अफ़सोस हो रहा है, जहां मैंने सौ साल बिताए हैं,” बोलने वाले झींगुर ने जवाब दिया, “मगर इससे पहले कि मैं चला जाऊं, मेरी एक उपयोगी सलाह सुन लो.”

“बहुहुहुत ज़रुरत है मुझे बूढ़े झींगुर की सलाहों की...”        

“आह, बुरातिनो, बुरातिनो,” – झींगुर ने कहा, “ लाड़ लड़ाना छोडो, कार्लो का कहना सुनो, बिना काम के घर से बाहर न भागो और कल से स्कूल जाना शुरू करो. ये मेरी सलाह है. वरना भयानक खतरों और मुसीबतों का सामना करना पडेगा. तुम्हारी ज़िंदगी के लिए मैं एक मरी हुई, सूखी मक्खी भी नहीं दूंगा.”

“क् क् क्यों?” बुरातिनो ने पूछा.

“तुम खुद ही देख लेना - क् क् क्यों,” बोलने वाले झींगुर ने जवाब दिया.

“ऐख तू, सौ साल के झींगुर-खटमल!” बुरातिनो चीखा, “दुनिया में अगर मुझे कुछ पसंद हैं तो वो हैं साहसी कारनामे. कल पौ फटते ही मैं घर से भाग जाऊंगा – बागडों पर चढूँगा, पंछियों के घोसले बरबाद कर दूंगा, बच्चों को चिढाऊँगा, कुत्तों और बिल्लियों के पूँछें खीचूँगा...मैं कुछ और भी सोचूंगा!...” 

“मुझे तुम पर दया आती है, बुरातिनो, दया आती है, तू आंसुओं के कड़वे घूंट पिएगा.” 

“क् क् क्यों?” बुरातिनो ने फिर पूछा.

“क्योंकि तेरे पास लकड़ी का बेवकूफ सिर है.”   

तब बुरातिनो उछल कर कुर्सी पर चढ़ गया, कुर्सी से मेज़ पर, हथौड़ा लिया और उसे बोलने वाले झींगुर के सिर पर दे मारा.

बूढ़े, होशियार झींगुर ने गहरी आह भरी, उसने अपनी मूंछें हिलाईं और भट्टी के पीछे रेंग गया, - इस कमरे से हमेशा के लिए चला गया.

अपने ओछेपन के कारण बुरातिनो लगभग मरते-मरते बचा. पापा कार्लो ने उसके शरीर पर कागज़ की ड्रेस चिपकाई और वर्णमाला की किताब खरीदी.

बोलने वाले झींगुर के साथ हुई घटना के बाद सीढ़ियों के नीचे वाली कोठरी में बहुत उकताहट होने लगी. दिन लंबा-लंबा होने लगा. बुरातिनो के पेट में भी खलबली होने लगी.

उसने आंखें बंद कीं, और अचानक प्लेट में तली हुई मुर्गी देखी.

जोश में आंखें खोलीं, - प्लेट पर पड़ी मुर्गी गायब हो गई.

उसने फिर से आंखें बंद कीं – खीर से भरी प्लेट देखी, रास्पबेरी जैम के साथ.

आंखें खोलीं – खीर और रास्पबेरी जैम वाली प्लेट गायब हो गई थी.

 

3.

 

तब बुरातिनो को समझ में आया कि उसे बहुत भूख लगी है.

वह भट्टी की ओर भागा और आग पर रखी केतली में अपनी नाक घुसा दी, मगर बुरातिनो की लम्बी नाक केतली के आरपार हो गई , क्योंकि, जैसा कि हम जानते हैं, भट्टी, और आग, और धुआँ, और केतली को गरीब कार्लो ने पुराने कैनवास के टुकड़े पर चित्रित किया था.

बुरातिनो ने अपनी नाक बाहर खींची और छेद से देखा, - कैनवास के पीछे दीवार पर एक छोटे से दरवाज़े जैसी कोई चीज़ थी, मगर उसे मकड़ी के जाल ने इस तरह ढांक दिया था, कि कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

बुरातिनो सभी कोनों में ढूँढने के लिए भागा कि शायद कहीं कोई डबल रोटी की परत या बिल्ली द्वारा चबाई गई  हड्डी का कोई टुकड़ा ही मिल जाए.

आह, बेचारे गरीब कार्लो के यहाँ खाने के लिए कुछ भी, कुछ भी तो नहीं था!

अचानक उसने लकड़ी की छीलन वाली टोकरी में मुर्गी का अंडा देखा. उसे पकड़ा और खिड़की की सिल पर रख दिया और नाक से – टुक्-टुक् – छिलके को तोड़ दिया.

अंडे के भीतर से नन्ही सी आवाज़ चिरचिराई:

“धन्यवाद, लकड़ी के नन्हे इन्सान!”

टूटी हुई खोल से एक मुर्गी का पिल्ला बाहर आया, जिसकी पूंछ वाली जगह पर फूले-फूले पंख थे, और हंसती हुई आंखें थीं.

“अलबिदा! मम्मा मुर्गी कब से आँगन में मेरी राह देख रही है.”

 और मुर्गी का बच्चा खिड़की से बाहर कूद गया, - बस इतना ही देखा.

“ओय, ओय,” बुरातिनो चिल्लाया, “भूख लगी है!...”

आखिरकार दिन ख़तम होने को आया. कमरे में अन्धेरा छाने लगा.

बुरातिनो आग के चित्र के सामने बैठा था और भूख के मारे चुपचाप हिचकियाँ ले रहा था.

उसने देखा – सीढ़ियों के नीचे से, फर्श के नीचे से एक मोटा सिर दिखाई दिया. वह बाहर निकला, उसने कुछ सूंघा और छोटे वाले पंजों पर भूरा प्राणी रेगते हुए बाहर निकला.

धीरे धीरे वह छीलन वाली टोकरी की तरफ़ गया, उसमें घुसा, सूंघते हुए और टटोलते हुए, - गुस्से से छीलन को खंगालने लगा. हो सकता है, वह उस अंडे को ढूंढ रहा हो, जिसे बुरातिनो ने तोड़ दिया था.   

फिर वह रेंगकर टोकरी से बाहर आया और बुरातिनो के पास आया. दोनों तरफ़ लम्बे लम्बे काले बालों वाली अपनी काली नाक को घुमाते हुए उसे सूंघा. बुरातिनो के जिस्म से खाने लायक खुशबू नहीं आ रही थी, - अपनी लम्बी, पतली पूंछ घसीटते हुए वह करीब से गुज़र गया.

मगर उसकी पूंछ पकड़े बिना कैसे रह सकते हो! बुरातिनो ने फ़ौरन पूंछ पकड़ ली.

ये बूढा दुष्ट चूहा शुशारा था. 

डर के मारे, बुरातिनो को खींचते हुए, वह परछाई की तरह, सीढ़ियों के नीचे भागने ही वाला था, मगर देखा कि ये तो सिर्फ लकड़ी का छोकरा है, वह मुड़ा और भयानक गुस्से से उस पर लपका, ताकि उसका गला चबा जाए.

अब तो बुरातिनो घबरा गया, उसने चूहे की ठंडी पूंछ छोड़ दी और उछल कर कुर्सी पर चढ़ गया. चूहा – उसके पीछे भागा.

वह कुर्सी से खिड़की की सिल पर कूद गया. चूहा – उसके पीछे.

कुर्सी की सिल से पूरे कमरे में छलांग लगाकर वह उड़ते हुए मेज़ पर पहुंचा. चूहा – उसके पीछे...और वहां, मेज़ पर, उसने बुरातिनो का गला पकड़ लिया, उसे दांतों में दबाये हुए गिरा दिया, फर्श पर कूदा और सीढ़ियों के नीचे घसीटा, ज़मीन के नीचे.

“पापा कार्लो!” बुरातिनो बस इतना ही चिरचिराया.

“मैं यहाँ हूँ!” ज़ोरदार आवाज़ ने जवाब दिया.  

दरवाज़ा खुल गया, पापा कार्लो भीतर आये. पैर से लकड़ी का जूता उतारा और उसे चूहे पर दे मारा.

शुशारा ने, लकड़ी के बच्चे को छोड़कर, दांत किटकिटाए और छुप गया.

‘ये होता है लाड-प्यार का नतीजा!’ बुरातिनो को फर्श से उठाते हुए पापा कार्लो भुनभुनाए. देखा, की वह पूरी तरह सही सलामत है या नहीं. उसे अपने घुटनों पर बिठाया, जेब से प्याज़ निकाली, उसका छिलका उतारा - ले, खा ले!...”

बुरातिनो ने अपने भूखे दांत प्याज़ में गड़ा दिए - करकर करते हुए और होंठ चाटते हुए. इसके बाद पापा कार्लो की ब्रश जैसी दाढ़ी पर अपना मुंह घिसने लगा.

“मैं होशियार और समझदार बनूंगा, पापा कार्लो...बोलने वाले झींगुर ने मुझसे स्कूल जाने के लिए कहा है.”

“अच्छा सोचा है, बच्चे...”

“मगर, पापा कार्लो, मगर मैं तो – नंगा हूँ, लकड़ी का हूँ, - स्कूल में बच्चे मुझ पर हँसेंगे.”

“एहे,” कार्लो ने कहा और अपनी ब्रश जैसी ठोढी खुजाई. – “तू ठीक कह रहा है, बच्चे!”

उसने लैम्प जलाया, कैंची ली, गोंद लिया और रंगीन कागज़ के टुकड़े लिए. भूरे रंग के कागज़ से जैकेट और चमकीले हरे रंग के कागज़ से पैंट बना दी. पुराने बूटलेग से जूते बनाए और टोपी – फुंदे वाली – पुरानी जुराब से. ये सब उसने बुरातिनो को पहना दिया:

“खुशी से पहन ले!”

“पापा कार्लो,” – बुरातिनो ने कहा, “मगर मैं किताब के बिना स्कूल कैसे जाऊंगा?

“एहे, तू सही कह रहा है, बच्चे...”

पापा कार्लो ने अपना सिर खुजाया. कंधों पर अपना इकलौता पुराना जैकेट डाला और बाहर चला गया.

वह जल्दी ही लौट आया, मगर बिना जैकेट के. उसके हाथ में बड़े-बड़े अक्षरों, और लुभावने चित्रों वाली किताब थी.

“ये रही तुम्हारे लिए वर्णमाला की किताब. दिल लगाकर पढो.”

“पापा कार्लो, तुम्हारी जैकेट कहाँ है?

“जैकेट तो मैंने बेच दी. कोई बात नहीं, ऐसे ही काम चला लूंगा...सिर्फ तुम खुशी से रहो.”

बुरातिनो ने पापा कार्लो के भले हाथों में अपनी नाक घुसा दी.

“पढ़-लिख लूंगा, बड़ा हो जाऊंगा, तुम्हारे लिए हज़ारों नए जैकेट खरीदूंगा...”

बुरातिनो पूरी शिद्दत से अपनी ज़िंदगी की इस पहली शाम को बिना लाड़-प्यार के गुजारना चाहता था, जैसा उसे बोलने वाले झींगुर ने सिखाया था.

 

4

 

बुरातिनो वर्णमाला की किताब बेच देता है और गुड़ियों के थियेटर का टिकिट खरीद लेता है.

 

बुरातिनो ने सुबह जल्दी-जल्दी वर्णमाला की किताब बैग में रख ली और छलांग लगाते हुए स्कूल भाग गया.

रास्ते में उसने उन मिठाईयों की ओर भी नहीं देखा, जिन्हें दुकानों में सजा कर रखा गया था, - शहद में लिपटी खसखस की तिकोनी मिठाईयाँ, मीठी पाई, और डंडों पर लगे मुर्गों के आकार के लॉलीपॉप.

वह उन लड़कों की तरफ़ भी नहीं देखना चाहता था, जो कागज़ के सांप उड़ा रहे थे.

धारियों वाली बिल्ली बज़ीलियो, जिसकी पूंछ पकड़ी जा सकती थी, रास्ता पार कर रही थी. मगर बुरातिनो ने ऐसा करने से अपने आप को रोक लिया.  

जैसे जैसे वह स्कूल के पास पहुँच रहा था, उतने ही ज़्यादा जोर से कुछ ही दूरी पर, खुशनुमा संगीत सुनाई दे रहा था.

-     पी-पी-पी, - बंसी चीं चीं कर रही थी.

-     ला-ला-ला- वॉयलीन गा रहा था.

-     ज़िन-ज़िन – तांबे की तश्तरियां टिनटिन कर रही थीं.

-     बूम! – ड्रम दनादन मार रहा था.

-      

स्कूल के लिए दाईं ओर मुड़ना था, संगीत सुनाई दे रहा था बाईं तरफ़ से. बुरातिनो लड़खड़ाने लगा. पैर अपने आप समुद्र की ओर मुड़ गए, जहां:

-     ‘पी-पी, पीईईई...

-     ज़िन-लाला, ज़िन-ला-ला..

-     बूम!

 

‘स्कूल तो कहीं भागा नहीं जा रहा है’, बुरातिनो अपने आप से ज़ोर ज़ोर से बातें करने लगा, - मैं सिर्फ झाँकूंगा, थोड़ा सा सुनूंगा – और भाग कर स्कूल पहुँच जाऊंगा.

पूरी ताकत से वह समुन्दर की तरफ़ भागने लगा. उसे एक धारियों वाला तम्बू दिखाई दिया, जो समंदर से चल रही हवा में फडफडाती हुई रंगबिरंगी झंडियों से सजा हुआ था.

तंबू के ऊपर, चार संगीतकार नाच रहे थे.  

नीचे एक मोटी, मुस्कुराती हुई आन्टी टिकट बेच रही थी.  

प्रवेश द्वार के पास लोगों की बहुत बड़ी भीड़ खड़ी थी – लड़के और लड़कियां, सैनिक, लेमोनेड बेचने वाले, नन्हे बच्चों को दूध पिलाती हुई आयाएँ, आग बुझाने वाले, पोस्टमैन, - सब-सभी बड़ा भारी इश्तेहार पढ़ रहे थे:

गुड़ियों का थियेटर

सिर्फ एक शो

जल्दी आईये!

जल्दी आईये!

जल्दी आईये!

 

बुरातिनो ने एक लडके को बांह पकड़ कर खीचा:

“बताईये, प्लीज़, अन्दर जाने के लिए टिकट कितने का है?

लड़के ने दांत भींचते हुए आराम से जवाब दिया:

“चार साल्दा, लकड़ी के नन्हे इंसान.”

“आप समझ रहे हैं, बच्चे, मैं अपना बटुआ घर में भूल गया...क्या आप मुझे चार साल्दा उधार दे सकते हैं?...”

लड़के ने तिरस्कार से सीटी बजाई:

“ये मिला एक बेवकूफ!...”

“मुझे बहुहुहुहुत ख्वाहिश है गुड़ियों का थियेटर देखने की!” आँसू बहाते हुए बुरातिनो ने कहा.

“चार साल्दो में मेरा गज़ब का जैकेट खरीद लीजिये...”

“कागज़ का जैकेट चार साल्दो में? किसी और बेवकूफ़ को ढूंढ.”

“खैर, तो मेरी बढ़िया टोपी...”

“तेरी टोपी से तो सिर्फ टैडपोल को पकड़ सकते हैं...किसी और बेवकूफ को ढूंढ.”

बुरातिनो की नाक सर्द हो गई  – इतना दिल चाह रहा था उसका थियेटर में जाने को.

“लडके, तो चार साल्दो में मेरी नई वर्णमाला की किताब खरीद लो...”

“चित्रों के साथ?  

“गज़ज़ज़ब की तस्वीरों वाली और बड़े बड़े अक्षरों वाली.”

“अच्छा दे दे,” लड़के ने कहा, वर्णमाला की किताब ले ली और बेमन से चार साल्दो गिनकर दे दिए.

बुरातिनो मुस्कुराती मोटी औरत के पास भागा और चिरचिराया:

“सुनिए, मुझे इकलौते गुड़ियों के थियेटर के शो के लिए पहली कतार में टिकट दीजिए.”

 

 

 

 

 

5

कॉमेडी शो के दौरान कठपुतलियाँ बुरातिनो को पहचान लेती हैं

 

बुरातिनो पहली पंक्ति में बैठ गया और उत्साह से गिरे हुए परदे को देखता रहा.

परदे पर चित्रित थे नृत्य करते हुए लोग, काले नकाब पहनी गुडिया, सितारों वाले टोप पहने डरावने दढ़ियल आदमी, नाक और आंखों वाला पैनकेक जैसा सूरज, और अन्य मनोरंजक चित्र.

तीन बार घंटी बजाई गई, और परदा ऊपर उठा.

छोटे से स्टेज पर दायें और बाएं पुट्ठे के पेड़ थे. उनके ऊपर चाँद के आकार का एक फ़ानूस लटक रहा था और वह कांच के एक टुकड़े में परावर्तित हो रहा था, जिस पर रूई से बनाए गए, सुनहरी नाक वाले दो हंस तैर रहे थे. 

पुट्ठे के पेड़ के पीछे से एक छोटा सा आदमी लम्बी आस्तीनों वाली, लम्बी कमीज़ में प्रकट हुआ.

उसके चेहरे पर पाउडर पुती हुई थी, सफ़ेद, टूथ पाउडर जैसी.

उसने सम्माननीय पब्लिक का झुक कर अभिवादन किया और दुःख से बोला:

“नमस्ते, मेरा नाम प्येरो है...अब हम आपके सामने प्रस्तुत करने वाले हैं कॉमेडी ‘नीले बालों वाली लड़की, या खोपड़ी पर तैंतीस झापड़’. मुझे छड़ी से मारेंगे, झापड़ लगायेंगे और खोपड़ी पर चपत मारेंगे. ये बहुत मज़ेदार कॉमेडी है.       

दूसरे पुट्ठे के पेड़ के पीछे से दूसरा आदमी उछल कर बाहर आया, पूरा चौखानों वाला, जैसे शतरंज का बोर्ड हो.

उसने झुककर सम्मानित पब्लिक का अभिवादन किया:

“नमस्ते , मैं अर्लेकिन (जोकर – अनु.) हूँ!

इसके बाद प्येरो की ओर मुड़ा और उसे दो झापड़ जड़ दिए, इतनी जोर से कि उसके गालों से पाउडर झरने लगा.

“तू क्यों बिसूर रहा है, बेवकूफ़?

“मैं दुखी हूँ, क्योंकि मैं शादी करना चाहता हूँ,” प्येरो ने जवाब दिया.

“और, तूने शादी क्यों नहीं की?

“क्योंकि मेरी मंगेतर मुझसे दूर भाग गई...”

“हा-हा-हा,” अर्लेकिन हंसते हंसते लोट पोट हो गया, - “देखो इस मूरख को!...”

उसने डंडी उठाई और प्येरो पर जमा दी.

“तेरी मंगेतर का क्या नाम है?

“तू फिर से झगड़ा तो नहीं करेगा?

“अरे, नहीं, मैंने तो अभी सिर्फ़ शुरुआत ही की है.”

“ठीक है, तो, उसका नाम है मल्वीना, या नीले बालों वाली लड़की.”

“हा-हा-हा!” अर्लेकिन फिर से लोटपोट होने लगा और उसने प्येरो की खोपड़ी पर तीन झापड़ जड़ दिए. – “सुनिये, सम्माननीय दर्शकों...क्या नीले बालों वाली लड़कियां भी होती हैं?

मगर तभी, दर्शकों की तरफ़ मुड़कर उसने सामने वाली बेंच पर लकड़ी के बच्चे को देखा, जिसका मुंह कानों तक फैला था, नाक लम्बी थी, उसने फुंदने वाली टोपी पहनी थी...

“देखिये, ये बुरातिनो है!” – उसकी तरफ़ उंगली से इशारा करते हुए अर्लेकिन चिल्लाया.

“जीता-जागता बुरातिनो!” अपनी लम्बी आस्तीनें हिलाते हुए प्येरो चीखा.

कार्ड बोर्ड के पेड़ों के पीछे से बहुत सारी गुडिया उछलते हुए बाहर आईं – काली नकाब पहने लड़कियां, टोपियां पहने डरावने दाढ़ी वाले, झबरीले कुत्ते जिनकी आंखों के स्थान पर बटन थे, खीरे जैसी नाक वाले कुबड़े...

वे सब मोमबत्तियों की ओर भागे, जो फ़ुटलाईट्स की तरफ़ थीं, और देखते हुए चिल्लाए:

“ये बुरातिनो है! ये बुरातिनो है! हमारे पास, हमारे पास आओ, खुशनुमा जोकर बुरातिनो!”

तब वह बेंच से प्रॉम्प्टर के बूथ पर उछला, और वहाँ से स्टेज पर कूदा.

गुड़ियों ने उसे पकड़ लिया, उसे गले लगाने लगीं, चूमने लगीं, चुटकियाँ काटने लगीं...फिर सभी गुड़ियों ने ‘पोल्का बर्डी (पंछियों का पोल्का डांस – अनु.) गाना शुरू किया:

 

पंछी नाच रहा था पोल्का डांस

हरियाली में सुबह सबेरे.

नाक बाएं. पूंछ दाएँ , -

ये है पोलिश करबास.

दो झींगुर हैं – ड्रम के ऊपर,

मेंढक फूंके डबल बास  में.

नाक बाएं, पूंछ दाएं, -

ये है पोल्का बरबास.

पंछी नाच रहा है पोल्का,

क्योंकि वह है खुशी से भरा.

नाक बाएं, पूंछ दाएं, -

ऐसा था पोलेच्का नाच...

दर्शक भाव विभोर थे. एक आया तो आंसुओं में नहा गई . एक आग बुझाने वाले की आंखें तो रो रोकर लाल हो गईं.

सिर्फ पिछली बेंचों पर बैठे हुए लडके गुस्सा हो रहे थे और पैर थपथपा रहे थे:

“बहुत हो गई चूमा चाटी, छोटे नहीं हो, अपना ‘शो जारी रखो.”

ये सब शोर शरावा सुनकर स्टेज के पीछे से एक आदमी बाहर निकला, जो देखने में इतना डरावना था, कि उसकी एक झलक देखकर ही आदमी भय से पत्थर बन जाए.

घनी, उलझी हुई दाढी फर्श तक लटक रही थी, बाहर को निकली हुई आंखें गोल-गोल घूम रही थीं, बड़े भारी मुंह में दांत किटकिटा रहे थे, मानो वह आदमी नहीं, बल्कि कोई मगरमच्छ हो. उसके हाथ में सात पूँछों वाला चाबुक था.  

ये कठपुतली थियेटर का मालिक था, कठपुतली-विज्ञान का डॉक्टर सिन्योर कराबास बराबास.

“हां-हां-हां, हू-हू-हू!” वह बुरातिनो पर गरजा. – “तो, ये तूने मेरी ख़ूबसूरत कॉमेडी-शो को बर्बाद किया है?”

उसने बुरातिनो को पकड़ा, थियेटर के गोदाम में ले गया और उसे कील पर टांग दिया. वापस आकर गुड़ियों को सात पूँछों वाले चाबुक से धमकाया कि वे अपना शो जारी रखें.

कठपुतलियों ने किसी तरह कॉमेडी-शो को पूरा किया, परदा बंद हो गया, दर्शक चले गए.

कठपुतली-विज्ञान का डॉक्टर सिन्योर कराबास बराबास किचन में खाना खाने के लिए गया.

 

6

 

अपनी लम्बी दाढ़ी का नीचे वाला भाग जेब में घुसाकर, ताकि वह तंग न करे, वह भट्टी के सामने बैठा, जहां डंडे पर एक पूरा खरगोश और दो मुर्गियाँ भूनी जा रही थीं.

उँगलियों को एक दूसरे पर मलकर उसने भूने जा रहे खरगोश को स्पर्श किया, उसे वह नम प्रतीत हुआ.

भट्टी में लकडियाँ कम थीं. तब उसने तीन बार ताली बजाई.

अर्लेकिन और प्येरो भागकर आये.

“मेरे पास इस निठल्ले बुरातिनो को लाओ,” सिन्योर कराबास बराबास ने कहा. “वह सूखी लकड़ी से बना है, मैं उसे आग में फेंक दूंगा, मेरा खरगोश अच्छी तरह भुन जाएगा.

अर्लेकिनो और प्येरो घुटनों पर बैठ गए, अभागे बुरातिनो के लिए दया की भीख मांगने लगे.

“और, मेरा चाबुक कहाँ है?” करबास बरबास चीखा.

तब वे, बिसूरते हुए गोदाम में गए, कील पर टंगे बुरातिनो को उतारा और खींचकर किचन में ले आये.

सिन्योर करबास बरबास, बुरातिनो को भट्टी में जलाने के बदले उसे पांच सोने के सिक्के देता है और घर भेज देता है.

जब कठपुतलियों ने बुरातिनो के खींचकर भट्टी की जाली के पास फर्श पर डाल दिया, तो सिन्योर कराबास बराबास, भयानक रूप से नाक सुड़कते हुए, चिमटे से कोयले ऊपर नीचे करने लगा.

अचानक उसकी आंखों में जैसे खून उतर आया, फिर नाक, फिर पूरा चेहरा आड़ी झुर्रियों से भर गया. हो सकता है, उसकी नाक में कोयले का टुकड़ा घुस गया हो.

“आप्...आप्..आप्..” कराबास बराबास आंखें घुमाते हुए कराहा, “आप्-छी!”

और वह इस तरह छींका कि भट्टी में राख स्तंभ की तरह ऊपर उठी.    

कठपुतलियों के डॉक्टर ने छींकना आरम्भ किया, मगर वह अपने आप को रोक न सका और लगातार पचास, या कभी कभी सौ बार भी निरंतर छींकता ही रहा.

ऐसी असामान्य छींक ने उसे निर्बल कर दिया और वह दयालु बन गया.

प्येरो ने फुसफुसाकर बुरातिनो से चुपके से कहा:

“उसके साथ छींकों के बीच बात करने की कोशिश करो...”

“आप्-छी! आप्-छी!” कराबास बराबास ने खुले हुए मुंह से हवा भीतर खींची और एक धमाकेदार छींक ली, अपने सिर को हिलाते हुए और पैरों को पटकते हुए.

किचन में हर चीज़ हिल रही थी, कांच खडखडा रहे थे, खूंटियों पर टंगे पैन और भगौने हिल रहे थे.

इन छींकों के बीच बुरातिनो दयनीय और पतली आवाज़ में बिसूरने लगा:

“मैं बेचारा गरीब, अभागा, किसी को भी मुझ पर दया नहीं आती!”

“ये बिसूरना बंद कर!” कराबास बराबास चिल्लाया. “तुम मुझे डिस्टर्ब कर रहे हो... आप्-छी!”

“मेहेरबानी करें, सिन्योर,” बुरातिनो चहका.

“थैंक्स...और क्या – तेरे मां बाप ज़िंदा हैं? आप्-छी!”

“मेरी तो कभी भी, कभी भी माँ नहीं थी, सिन्योर. आह, मैं बदनसीब!” और बुरातिनो इतनी ज़ोर से चीखा की कराबास बराबास के कानों में जैसे सुईयां चुभने लगीं.

वह अपने जूतों से धमधम कर रहा था.

 

“बिसूरना बंद कर, कह रहा हूँ तुझसे!... आप्-छी! और क्या – तेरा बाप ज़िंदा है?

“मेरे गरीब पापा अभी ज़िंदा हैं, सिन्योर.”

“कल्पना कर सकता हूँ, तेरे पापा को यह जानकर कैसा लगेगा, कि मैंने तुम्हारे ऊपर एक खरगोश और दो मुर्गियाँ तली हैं....आप-छी!”

“मेरे गरीब पापा भूख और ठण्ड से जल्दी ही मर जायेंगे. बुढापे में मैं उनका इकलौता सहारा हूँ. दया कीजिये, मुझे छोड़ दीजिये, सिन्योर.”

“दस हज़ार शैतान!” कराबास बराबास गरजा. “दया-वया की कोई बात ही नहीं हो सकती. खरगोश और मुर्गियों को भूने ही जाना है. भट्टी में रेंग जा.”

“मैं ऐसा नहीं कर सकता, सिन्योर.”

“क्यों?” करबास बरबास ने पूछ लिया, सिर्फ इसलिए की बुरातिनो बोलता रहे और कानों में न चीखे.

“सिन्योर, मैंने पहले भी एक बार भट्टी में नाक घुसाने की कोशिश की थी और सिर्फ छेद ही कर पाया.”

“क्या बकवास है!” कराबास बरबास चौंक गया, “तुम नाक से भट्टी में छेद कैसे कर सके?

“इसलिए, सिन्योर, की भट्टी और आग पर रखी केतली पुराने कैनवास के टुकडे पर पेंट किये गए थे.”

“आप-छी!” कराबास बराबास इतनी जीर से छींका कि प्येरो बाईँ तरफ़ उड़ा. अर्लेकिन – दाईं तरफ, और बुरातिनो लट्टू की तरह घूमने लगा.   

“तुमने कैनवास के टुकडे पर बनायी गई  भट्टी, और आग, और केतली कहाँ देखी?

“मेरे पापा कार्लो की कोठरी में.”

“तेरे पापा – कार्लो!” – कराबास बराबास कुर्सी से उछला, उसने हाथ हिलाए, उसकी दाढी उड़ रही थी. – “ तो, मतलब, बूढ़े कार्लो की कोठरी मैं है गुप्त...”

मगर अब काराबास बराबास ने, ज़ाहिर है, इस उद्देश्य से कि किसी गुप्त रहस्य के बारे में कुछ न बोल जाए, दोनों मुट्ठियों से अपना मुंह बंद कर लिया. और इसी तरह कुछ देर बैठा रहा, बुझती हुई आग की ओर आँखें फाड़े हुए देखता रहा.

“अच्छा,” उसने आखिर कहा, “ मैं आधा भुना खरगोश और कच्चे चूज़े खा लूंगा. मैं तुम्हें जीवनदान देता हूँ, बुरातिनो. इतना ही नहीं....”

उसने दाढ़ी के नीचे से जैकेट की जेब में हाथ डाला, सोने के पांच सिक्के निकाले और बुरातिनो की ओर बढ़ा दिए.

“इतना ही नहीं...ये पैसे ले और कार्लो के लिए ले जा. मेरा सलाम कहना, कि मैं उससे विनती करता हूँ, कि किसी भी हालत में भूख और ठण्ड से नहीं मरना और सबसे ख़ास बात – अपनी कोठरी छोड़ कर कहीं न जाए, जिसमें पुराने कैनवास के टुकड़े पर चित्रित भट्टी है. जा, आराम से सो जा और सुबह जल्दी घर भाग जा.”

बुरातिनो ने पाँच सोने के सिक्के जेब में रखे और नम्र अभिवादन से उत्तर दिया:                                                                   

“धन्यवाद, सिन्योर. आपको पैसे देने के लिए मुझसे ज़्यादा विश्वसनीय हाथ नहीं मिलेंगे...”

अर्लेकिन और प्येरो बुरातिनो को गुड़ियों के शयनकक्ष में ले गए, जहां गुड़ियों ने फिर से बुरातिनो का आलिंगन करना, उसे चूमना, धक्के देना, चिकोटी काटना और फिर से गले लगाना शुरू कर दिया, जो न जाने कैसे भट्टी की भयानक मौत से बचकर भाग आया था.

उसने फुसफुसाते हुए गुड़ियों से कहा:

“यहाँ कोई रहस्य है.”

रास्ते में बुरातिनो दो भिखारियों – बिल्ली बज़ीलियो और लोमड़ी अलीसा से मिलता है.  

सुबह-सुबह बुरातिनो पैसे गिनता है,  - सोने के सिक्के उतने थे, जितनी हाथ में उंगलियां होती हैं, - पांच.

सोने के सिक्कों को मुट्ठी में दबाकर, वह छलांग लगाते हुए घर की ओर भागा और गाने लगा:

“खरीदूंगा पापा कार्लो के लिए नया जैकेट, बहुत सारे खसखस के तिकोने, डंडियों पर लगे मुर्गे.”

जब गुड़ियों के थियेटर का तंबू और लहराते हुए झंडे आंखों से ओझल हो गए, तो उसने दो भिखारियों को देखा, जो धूल भरे रास्ते पर सुस्ती से चल रहे थे: लोमड़ी अलीसा, जो तीन पंजों पर लड़खड़ाते हुए जा रही थी, और अंधी बिल्ली बज़ीलियो. 

ये वो बिल्ली नहीं थी, जिससे बुरातिनो कल रास्ते में मिला था, बल्कि दूसरी थी – ये भी बज़ीलियो थी और धारियोंवाली भी. बुरातिनो नज़दीक से गुज़र जाना चाहता था, मगर लोमड़ी अलीसा ने उससे प्यार से कहा:

“नमस्ते, भले बुरातिनो! जल्दी-जल्दी कहाँ जा रहे हो?

“घर, पापा कार्लो के पास.”

लोमड़ी ने और भी ज़्यादा प्यार से गहरी सांस ली:

“मैं नहीं जानती, कि तुम गरीब बेचारे कार्लो को ज़िंदा पाओगे या नहीं, भूख और ठण्ड से उसकी हालत बहुत खराब है...”

क्या तुमने यह देखा?” बुरातिनो ने मुट्ठी खोलकर सोने के पांच सिक्के दिखाए.

सिक्के देखकर लोमड़ी ने अनचाहे ही उनकी तरफ़ पंजा बढ़ा दिया, और बिल्ले ने अचानक अपनी अंधी आँखें खोल दीं, और वे हरे फानूस की तरह चमक उठीं.  

मगर बुरातिनो का इस ओर ध्यान नहीं गया.

“भले, अच्छे बुरातिनो, तुम इन सिक्कों का क्या करोगे?

“पापा कार्लो के लिए जैकेट खरीदूंगा...नई वर्णमाला खरीदूंगा...”

“वर्णमाला, ओह, ओह!” लोमड़ी अलीसा ने सिर हिलाते हुए कहा, “ ये पढ़ाई तुम्हारा कुछ भी भला नहीं करेगी...मैंने भी पढ़ा, पढ़ता रहा, और – देख -  तीन पंजों पर चल रहा हूँ.”

“वर्णमाला!” बिल्ला बज़ीलियो गुर्राया और गुस्से से अपनी मूंछों में फ़ुरफ़ुराया . “इस नासपीटी पढाई की वजह से मैंने अपनी आंख खो दी...”

रास्ते के निकट एक सूखी डाल पर अधेड़ कौआ बैठा था. सुन रहा था, सुन रहा था और उसने कांव-कांव किया.

“झूठ बोल रहे है, झूठ बोल रहे हैं!...”

बिल्ला बज़ीलियो फ़ौरन ऊंचे उछला, पंजे से कौए को गिरा दिया, उसकी आधी पूंछ खींच ली, - वह मुश्किल से उड़ पाया. और फिर से उसने दिखाया जैसे वह अंधा हो.     

 

7

“तुमने उसके साथ ऐसा क्यों किया, बिल्ले बजीलियो?” बुरातिनो ने अचरज से पूछा.

“आंखें तो अंधी हैं,” बिल्ले ने जवाब दिया, “ऐसा लगा – पेड़ पर कुत्ते का पिल्ला बैठा है...” वे तीनों धूल भरे रास्ते पर चल पड़े. लोमड़ी ने कहा:

“स्मार्ट, समझदार बुरातिनो, क्या तुम चाहोगे कि तुम्हारे पैसे दस गुना हो जाएँ?

“बेशक, चाहता हूँ! मगर ये कैसे करते हैं?

“बेहद आसान है. हमारे साथ चलो.”

“कहाँ?

“मूर्खों के देश में.”

बुरातिनो ने थोड़ी देर सोचा.

“नहीं, माफ़ करना, मैं अभी घर ही जाऊंगा.”

“शौक से, हम तुझे रस्सी से बांधकर तो नहीं खींच रहे हैं,” लोमड़ी ने कहा, - “तुम्हारे ही लिए बुरा है.”

“तुम्हारे ही लिए बुरा है,” बिल्ली गुरगुराई.

“अपने दुश्मन तुम ख़ुद ही हो.” लोमड़ी ने कहा.

“तुम ख़ुद ही अपने दुश्मन हो,” बिल्ली गुरगुराई.

“वर्ना तेरे पांच सोने के सिक्के पैसों के ढेर में बदल जाते...”

बुरातिनो रुक गया, उसने मुंह खोला...

“झूठ बोल रहे हो!”

लोमड़ी अपनी पूंछ पर बैठ गई, उसने अपने होंठ चाटे:

“मैं तुम्हें अभी समझाती हूँ.

“ मूर्खों के देश में एक जादुई खेत है, - उसका नाम है ‘चमत्कारों का खेत’... इस खेत में एक गढ़ा खोदो, तीन बार कहो: ‘क्रेक्स, फेक्स, पेक्स’, गढ़े में सोने के सिक्के रखो, उस पर मिट्टी डाल दो, ऊपर से नमक छिड़को, अच्छी तरह पानी डालो और सोने के लिए चले जाओ. सुबह गढ़े से छोटा सा पेड़ निकलेगा, उस पर पत्तों के बदले सोने के सिक्के लटकेंगे. समझ गए?

बुरातिनो उछल पडा:

“झूठ बोल रही हो!”

“चल, जायेंगे, बज़ीलियो,” अपमान से नाक घुमाकर लोमड़ी ने कहा, हम पर कोई यकीन ही नहीं करता – बस, कोई ज़रुरत नहीं है...”

“नहीं, नहीं,” बुरातिनो चीखा, “यकीन करता हूँ, यकीन करता हूँ!...चलो फ़ौरन ‘मूर्खों के देश’!

 

8

‘तीन मीनार’ सराय में

बुरातिनो, लोमड़ी अलीसा और बिल्ला बज़ीलियो पहाड़ से नीचे उतरे और चलते रहे, चलते रहे – खेतों से होकर, अंगूरों की बगिया से, चीड़ के पेड़ों के झुरमुट से होकर, समुद्र के किनारे पर आये और फिर से समुद्र से वापस मुड़े, उसी चीड़ों के झुरमुट से, अंगूरों की बगिया से...

पहाड़ी पर बसा छोटा सा शहर और उस पर चमकता सूरज कभी दायें दिखाई देते, तो कभी बाएं...

लोमड़ी अलीसा गहरी सांस लेते हुए बोली:

“आह, इतना आसान नहीं है ‘मूर्खों के देस” में पहुँचना, सारे पंजे झड जायेंगे...”

शाम होते होते उन्हें रास्ते के किनारे पर एक पुराना घर दिखाई दिया, सपाट छत वाला और उसके प्रवेश द्वार पर एक तख्ती टंगी थी:

“तीन मीनार सराय”       

सराय का मालिक मेहमानों का स्वागत करने के लिए उछलकर बाहर आया, अपने गंजे सिर से टोपी उतारी और झुककर अभिवादन किया, भीतर आने के लिए कहा.

“हम सूखी पपड़ी खा सकते हैं,” लोमड़ी ने कहा.

“कम से कम ब्रेड की पपड़ी ही दे देते,” बिल्ली ने दोहराया.

सराय में गए, भट्टी के पास बैठे, जहां सीखों पर और भगौनों में हर तरह की चीज़ें, भूनी जा रही थीं.

लोमड़ी बार बार होंठ चाट रही थी, बिल्ले बज़ीलियो ने मेज़ पर पंजे रख दिए, थके हुए थोबड़े को – पंजों पर, - और एकटक खाने की तरफ़ देखने लगा.

“ई, मालिक,” बुरातिनो ने शान से कहा, “हमें ब्रेड की तीन पपड़ियाँ दीजिये...”

मालिक अचरज से पीछे की ओर गिरते गिरते बचा, कि इतने ख़ास मेहमान इतनी छोटी चीज़ मांग रहे हैं.

“खुशमिजाज़, होशियार बुरातिनो आपसे मज़ाक कर रहा है, मालिक,” – लोमड़ी खिखियाई.

“वह मज़ाक कर रहा है,” बिल्ला बुदबुदाया.

“तीन ब्रेड की पपड़ियां दें, और उनके साथ वह बढ़िया भुना हुआ भेड़ का बच्चा,” लोमड़ी ने कहा, “और वह छोटा सा हंस का पिल्ला, और एक जोड़ी कबूतर सींख पर भुने हुए, और, हाँ, कुछ लिवर भी...”

“सबसे मोटी कार्प के छह टुकडे,” बिल्ले ने ऑर्डर दिता, “और कच्ची छोटी मछली स्नैक्स के लिए.”

संक्षेप में कहें तो, उन्होंने वह सब कुछ ले लिया, जो भट्टी में था: बुरातिनो के लिए सिर्फ ब्रेड की पपड़ी बची.

 

लोमड़ी अलीसा और बिल्ले बज़ीलियो ने सब कुछ हड्डियों समेत गटक लिया. उनके पेट फूल गए, थोबड़े चमक रहे थे.   

“घंटा भर आराम कर लेते हैं,” लोमड़ी ने कहा, - “और ठीक आधी रात को निकल पड़ेंगे. मालिक, हमें जगाना न भूलना...”

लोमड़ी और बिल्ला दो मुलायम बिस्तरों पर लुढ़क गए, खर्राटे लेने लगे और सीटी बजाने लगे. बुरातिनो कुत्तों के कूड़े के ढेर पर कोने में दुबक गया....

उसे गोल-गोल सोने के पत्तों वाले एक छोटे से पेड़ का सपना आया...जैसे ही उसने हाथ बढाया...”

“ऐ, सिन्योर बुरातिनो, टाईम हो गया, आधी रात हो गई  है...”

दरवाज़े पर खटखटाहट हो रही थी. बुरातिनो उछला, उसने आंखें मलीं. बिस्तर पर न तो बिल्ला था, ना ही लोमड़ी, - वह खाली था.

मालिक ने उसे समझाया:

“आपके आदरणीय मित्र जल्दी ही उठ गए, ठंडी पाईं खाकर ताज़े तवाने हो गए और चले गए...”

“क्या मेरे लिए कोई सन्देश दे गए हैं?

“बिल्कुल दे गए हैं, - कि आप, सिन्योर बुरातिनो, एक भी पल बर्बाद किये बिना जंगल की तरफ़ वाले रास्ते पर भागें...”

बुरातिनो दरवाज़े की ओर उछला, मगर मालिक देहलीज़ पर खड़ा था,  आँखें सिकोड़ रहा था, हाथ कमर पे रखे था:

“और डिनर के पैसे कौन देगा?

“ओय,” बुरातिनो चीखा, “कितना?

“पूरा एक सोने का सिक्का...”

बुरातिनो उसके पैरों के पास से खिसकना चाहता था, मगर मालिक ने डंडा पकड़ लिया, - उसकी ब्रश जैसी मूंछें, कानों के ऊपर वाले बाल भी खड़े हो गए.

“पैसे दे, कमीने, वर्ना तुझे खटमल की तरह मसल दूंगा!”

पांच में से एक सोने का सिक्का देना ही पडा. हताशा से हांफते हुए बुरातिनो ने उस नासपीटी सराय को छोड़ दिया.

रात अंधेरी थी, - ये तो कम ही था, - काजल की तरह काली थी. चारों ओर हर चीज़ सो रही थी. सिर्फ बुरातिनो के सिर पर खामोशी से उल्लू स्प्लूश्का उड रहा था.

मुलायम पंख से उसकी नाक को छूते हुए, स्प्ल्यूश्का ने दुहराया:

“यकीन न करना, यकीन न करना, यकीन न करना!”

वह गुस्से से रुक गया:

“तुझे क्या चाहिए?

“बिल्ले और लोमड़ी पर यकीन न करना...’

“तू भी ना!...”

वह आगे भागा और सुनता रहा कि कैसे स्प्ल्यूश्का उसके पीछे चिल्लाया:

“इस रास्ते पर डाकुओं से बच कर रहना.”

 

     

9

डाकू बुरातिनो पर हमला करते हैं

आसमान के किनारे पर हरे रंग का प्रकाश दिखाई दिया, - चांद निकल रहा था.

सामने नज़र आ रहा था काला जंगल.

बुरातिनो और जल्दी चलने लगा. उसके पीछे पीछे भी कोई और तेज़ी से चलने लगा.

वह भागने लगा. उसके पीछे पीछे बेआवाज़ छलांगें लगाते हुए कोई और तेज़ी से उछलने लगा.

वह मुडा.

दो लोग उसका पीछा कर रहे थे – उन्होंने सिरों पर बोरे पहने थे, जिनमें आंखों के लिए छेद बने हुए थे.

उनमें से एक, जो कद में छोटा था, चाकू घुमा रहा था, दूसरा, जो ऊंचा था, हाथ में पिस्तौल पकड़े था, जिसकी नली चौड़ी होती गई थी, चोंगे की तरह...

“आय-आय!” बुरातिनो चीखा और, हिरन की तरह, काले जंगल की तरफ़ लपका.

“रुक, रुक!” डाकू चिल्ला रहे थे. हालांकि बुरातिनो बेहद डर गया था, मगर फिर भी उसने अंदाज़ लगा लिया, - मुंह में सोने के चारों सिक्के ठूंस लिए और रास्ते से मुड़कर जामुन के पेड़ों की बागड़ की तरफ़ लपका...मगर तभी दो डाकुओं ने उसे पकड़ लिया...

“बटुआ या ज़िंदगी!”

बुरातिन जैसे समझ नहीं रहा था, कि उससे क्या चाहते हैं, सिर्फ नाक से जल्दी जल्दी सांस लेने लगा. डाकू उसे गर्दन पकड़कर झकझोर रहे थे, उनमें से एक पिस्तौल से धमका रहा था, दूसरा जेबें तलाश रहा था.

“तुम्हारे पैसे कहां हैं?” लंबा वाला गरजा.

“पैसे, कमीने!” छोटा वाला फुफ़कारा.      

“छोटे छोटे टुकड़े कर दूंगा!”

“सिर काट दूंगा!”

डर के मारे बुरातिनो इतना कांपने लगा, कि सोने के सिक्के उसके मुंह में झनझनाने लगे.

“तो, यहाँ हैं पैसे!” डाकू चीखे. “उसके मुंह में हैं पैसे...”

एक ने बुरातिनो को सिर से पकड़ा, दूसरे ने -  पैरों से. उसे उछालने लगे. मगर उसने और भी कसकर दांत भींच लिए.

उसे पैरों से उल्टा करके, डाकू उसका सिर ज़मीन पर पटकने लगे. मगर उस पर इसका भी कुछ असर न हुआ.    

वह डाकू, जो कद में छोटा था, जूते की चौड़ी नोक से उसके दांत खोलने की कोशिश करता रहा, लगभग खोल ही दिए थे, ...बुरातिनो ने चालाकी दिखाई – पूरी ताकत से उसके हाथ को काट लिया...मगर यह हाथ नहीं, बल्कि बिल्ली का पंजा था. डाकू जंगलीपन से चिल्लाया. बुरातिनो पलट गया, छिपकली की तरह, बागड़ की ओर भागा, कांटेदार झाड़ी पर कूदा, कांटों पर पतलून और जैकेट के टुकड़े छोड़कर, दूसरी तरफ रेंग गया और जंगल की तरफ़ भागा. 

जंगल के किनारे पर डाकुओं ने फ़िर से उसे पकड़ लिया. वह उछला, हिलती हुई एक डाल को पकड़कर पेड़ पर रेंग गया. डाकू – उसके पीछे. मगर सिर पर पहनी हुई थैलियाँ उनके काम में बाधा डाल रही थीं.

ऊपर तक चढ़ने के बाद, बुरातिनो झूलकर बगल वाले पेड़ पर कूद गया.

डाकू – उसके पीछे पीछे.

मगर दोनों के हाथ वहीं छूट गए, और वे धड़ाम से धरती पर गिर पड़े. 

जब तक वे कराहते और खुजाते रहे, बुरातिनो पेड़ से फिसला और भागने लगा, पैरों को इतनी तेज़ी से आगे बढ़ाते हुए कि वे आंखों से ओझल हो गए.

चांद के प्रकाश में पेड़ों की लंबी लंबी छायाएँ पड़ रही थीं. पूरा जंगल धारियों वाला हो गया था...

बुरातिनो कभी छाया में खो जाता, कभी उसकी सफ़ेद टोपी चांद की रोशनी में चमक जाती.

इस तरह वह तालाब तक आया. शीशे जैसे पानी के ऊपर चांद लटक रहा था, जैसे गुड़ियों के थियेटर में था.

बुरातिनो दाईं ओर झुका – कीचड़ था. बाईं ओर – कीचड...और पीछे टहनियां फिर से चरमरा रही थीं.

“पकड़ो, पकड़ो उसे!...”

डाकू क़रीब आ गए थे, वे गीली घास से ऊंचे कूद रहे थे, जिससे बुरातिनो को देख सकें.

“वो रहा!”

उसके सामने पानी में कूदने के अलावा कोई और चारा नहीं था. इसी समय उसने सफ़ेद हंस को देखा, जो किनारे के पास सो रहा था, सिर पंख में छुपाये. बुरातिनो तालाब में कूदा, डुबकी लगाई और हंस के पंजे पकड़ लिए.  

“गों, गों” – जागते हुए, हंस कुडकुडाया, “ये कैसा भद्दा मज़ाक है! मेरे पंजों को चैन से पड़े रहने दो!”

हंस ने अपने विशाल पंख फैलाए, और उसी समय, जब डाकुओं ने बुरातिनो के पानी से बाहर निकलते हुए पैरों को पकड़ लिया था, हंस बड़ी शान से तालाब से उड़ा.

दूसरे किनारे पर बुरातिनो ने उसके पंजे छोड़ दिए, अपना बदन फडफडाया, उछला और काई के ढेरों से होते हुए, बांस के झुरमुटों से होते हुए सीधे बड़े चांद की ओर भागा – टीलों के ऊपर.

 

10

डाकू बुरातिनो को पेड़ से लटकाते हैं

 

थकान के मारे बुरातिनो मुश्किल से पैर उठा रहा था, जैसे शरद ऋतु में मक्खी खिड़की की सिल पर चलती है.

अचानक अखरोट के पेड़ की टहनियों के बीच से उसने एक ख़ूबसूरत लॉन देखा और उसके बीचोंबीच – एक छोटा सा, चांद की रोशनी में चमकता हुआ, चार खिड़कियों वाला घर देखा. खिड़की के पल्लों पर सूरज, चांद और तारे बनाए गए थे. चारों तरफ़ बड़े बड़े आसमानी रंग के फूल खिल रहे थे.

पगडन्डियों पर साफ़ बालू बिछी हुई थी. झरने से पानी की पतली धार फूट रही थी, उसमें एक धारियोंवाली गेंद नाच रही थी.

बुरातिनो चौपाये की तरह पोर्च पर चढ़ गया. उसने दरवाज़ा खटखटाया. घर में शांति थी. उसने और ज़ोर से टकटक की, - हो सकता है, घर में लोग गहरी नींद में हों.

इस समय जंगल से फिर से डाकू उछलकर आये. वे तालाब में तैर कर आये थे, उनके बदन से पानी की धाराएं बह रही थीं. बुरातिनो को देखकर छोटे कद वाला डाकू बिल्ली की तरह दबी आवाज़ में फुफकारने लगा, ऊंचावाला लोमड़ी की तरह भौंकने लगा...

बुरातिनो हाथों-पैरों से दरवाज़ा भडभडा रहा था:

“मदद करो, मदद करो, भले आदमियों!...”    

तब छोटी खिड़की से एक घुंघराले बालों वाली, अच्छी और ऊपर को उठी हुई नाक वाली, ख़ूबसूरत लड़की ने सिर बाहर निकाला.

उसकी आंखें बंद थीं.

“बच्ची, दरवाज़ा खोलो, डाकू मेरा पीछा कर रहे हैं!”

“आह, क्या बकवास है!” बच्ची ने अपने सुन्दर मुंह से उबासी लेते हुए कहा. “ मैं सोना चाहती हूँ, मैं अपनी आंखें नहीं खोल सकती...”

उसने हाथ ऊपर उठाए, उनींदेपन से बदन को खींचा और खिड़की में छुप गई.

 बुरातिनो निराशा से नाक के बल रेत पर गिर गया और उसने मुर्दा होने का नाटक किया.

डाकू उछलकर उसके पास आये:

“आहा, अब हमसे दूर नहीं जा सकते...”

 कल्पना भी नहीं की जा सकती, कि बूरातिनो को मुँह खोलने पर मजबूर करने के लिए उन्होंने क्या क्या नहीं किया. यदि पीछा करते हुए उन्होंने अपनी पिस्तौल और चाकू न गिरा दिया होता, - तो इस जगह पर ही अभागे बुरातिनो के किस्से को ख़त्म किया जा सकता था.

आख़िर में डाकुओं ने उसे उल्टे टांगने का फैसला किया, पैरों पर रस्सी बांधी, और बुरातिनो चीड़ के पेड़ की टहनी से लटक गया... वे चीड़ के पेड़ के नीचे बैठे, अपने गीले कपड़े फैलाकर, और इंतज़ार करने लगे, कि कब उसके मुंह से सोने के सिक्के बाहर निकलते हैं...

सुबह तेज़ हवा चलने लगी, चीड़ के पत्ते शोर मचाने लगे. बुरातिनो हिल रहा था, टहनी की तरह. डाकू गीले कपड़ों में बैठे बैठे उकता गए...

“लटके रहो, दोस्त, शाम तक,” उन्होंने कड़वाहट से कहा और रास्ते पर किसी सराय को खोजने निकल पड़े.

11

नीले बालों वाली लड़की बुरातिनो को वापस जीवन में लाती है

चीड़ की टहनियों के पीछे, जहां बुरातिनो लटक रहा था, भोर हो रही थी. मैदान पर घास भूरी हो गई, नीले फूल ओस की बूंदों से ढंक गए थे.

घुंघराले नीले बालों वाली लड़की ने फिर से खिड़की से देखा, उसने अपनी ख़ूबसूरत उनींदी आंखें मलीं और पूरी तरह खोल दीं.

ये लड़की सिन्योर कराबास बराबास के गुड़ियों के थियेटर की सबसे सुन्दर गुडिया थी.

मालिक की असभ्य हरकतों को बर्दाश्त न कर सकने के कारण, वह थियेटर से भाग गई और भूरी घास के मैदान में एकांत घर में बस गई.

जानवर, पंछी और कुछ कीट उसे बहुत प्यार करते थे, - हो सकता है, इसलिए, कि वह बहुत अच्छा बर्ताव करती थी, और कोमल लड़की थी.

जानवर उसे जीवन के लिए आवश्यक हर चीज़ लाकर देते.

घूस – खाने योग्य जड़ें लातीं.

चूहे – शकर, पनीर और सॉसेज के टुकड़े.

कुलीन पूडल कुत्ता आर्तेमोन – ब्रेड-रोल लाता.

नीलकंठ पक्षी बाज़ार में उसके लिए चांदी के वर्क में लिपटे चॉकलेट्स चुराता.

मेंढक अखरोट के छिलकों में नींबू पानी लाते.

बाज़ – भुना हुआ मांस.

मई के भंवरे – अलग-अलग तरह की बेरियाँ लाते.

तितलियाँ – फूलों के पराग – पाउडर लगाने के लिए.

इल्लियाँ अपने शरीर से पेस्ट निकाल कर देतीं – दांत साफ़ करने के लिए और चरमराते दरवाजों पर लगाने के लिए.

अबाबीलें घर के पास मच्छरों और ततैया को ख़त्म कर देतीं...

तो, आंखें खोलने के बाद, नीले बालों लड़की ने फ़ौरन उल्टा लटके हुए बुरातिनो को देखा.

उसने गालों पर हाथ रखे और चिल्लाई:

“आह-आह-आह!”

खिड़की के नीचे, अपने कान फडफडाते हुए, भला कुत्ता आर्तेमोन प्रकट हुआ. उसने अभी-अभी अपने धड़ के पिछले आधे हिस्से के बाल काट दिए थे, जो वह हर रोज़ करता था. सामने वाले आधे हिस्से में घुंघराले बाल अच्छी तरह कंघी किये गए थे, पूंछ के अंत में लटकन को काले फ़ीते से बांधा गया था. सामने वाले पंजे पर – चांदी की घड़ी थी.    

“मैं तैयार हूँ!”

आर्तेमोन ने नाक एक ओर को मोडी और अपने सफ़ेद दांतों पर ऊपर का होंठ उठाया.  

“किसी को बुलाओ, आर्तेमोन!” बच्ची ने कहा. –“ बेचारे बुरातिनो को नीचे उतारना है, घर में ले जाना है और डॉक्टर को बुलाना है...”

“मैं तैयार हूँ!”

आर्तेमोन तत्परता से इस तरह घूमने लगा कि उसके पिछले पंजों से गीली रेत उड़ने लगी...वह चींटियों की बांबी की ओर लपका, भौंकते हुए सभी को उठा दिया और चार सौ चींटियों को भेजा – रस्सी कुतरने के लिए, जिस पर बुरातिनो लटक रहा था.

चार सौ समर्पित चींटियां झुंड में संकरी पगडंडी पर रेंगने लगीं, चीड के पेड़ पर चढ़ गईं और उन्होंने रस्सी को कुतर दिया.

आर्तेमोन ने अगले पंजों से गिरते हुए बुरातिनो को थाम लिया और उसे घर के भीतर ले गया...बुरातिनो को बिस्तर पर लिटाकर, कुत्ते की तेज़ चाल से जंगल की झाड़ियों में भागा और फ़ौरन वहां से मशहूर डॉक्टर उल्लू को, नर्स मेंढक को, और दवाईयों के जानकार बगामोल को ले आया, जो सूखी डंडी जैसा था.       

 

12

उल्लू बुरातिनो के सीने पर कान लगाता है

 

“मरीज़ करीब करीब मर ही गया है,” वह फुसफुसाया और उसने सिर एक सौ अस्सी डिग्री मोड़ लिया.

मेंढक बड़ी देर तक गीले पंजे से बुरातिनो के बदन को दबाता रहा. सोचते हुए, अपनी बाहर निकली आंखें चारों और घुमाता रहा. बड़े मुंह से बुदबुदाया:

“मरीज़ ज़िंदा है, बनिस्बत मरने के...”

लोगों के डॉक्टर बगामोल ने अपने सूखे, घास के पत्तों जैसे हाथों से बुरातिनो को छूना शुरू किया.

“दो बातों में से एक” – वह सरसराया, “या तो मरीज़ ज़िंदा है, या वह मर गया है. अगर वह ज़िंदा है – तो वह ज़िंदा रहेगा या ज़िंदा नहीं रहेगा. अगर वह मर चुका है – तो उसे पुनर्जीवित किया जा सकता है, या पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता.”

“नीम हकीम,” उल्लू ने कहा, अपने मुलायम पंख फड़फड़ाए और अंधेरी अटारी में उड़ गया.

गुस्से के मारे मेंढक की सभी नसें फूल गईं.

“कैसी घिनौनी असभ्यता है!”- वह टर्राया और अपना पेट फडफडाते हुए नम तहखाने में कूद गया. 

डॉक्टर बगामोल ने, मौके ने अनुसार, सूखी टहनी होने का नाटक किया और खिड़की से बाहर गिर गया.  

बच्ची ने अपने सुन्दर हाथ नचाए:

“तो, मैं उसे कैसे ठीक करूं, नागरिकों?

“कैस्टर ऑइल से,” मेंढक गोदाम से टर्राया.

“कैस्टर ऑइल से?” उल्लू अटारी में तिरस्कार से हंसा.

“या तो कैस्टर ऑइल से, या बिना कैस्टर ऑइल के,” खिड़की के पीछे बगामोल दांत किटकिटाते हुए बोला.

तब, खरोचों वाला, नील पड़ा हुआ, अभागा बुरातिनो कराहा:

“कैस्टर ऑइल की ज़रुरत नहीं है, मुझे काफ़ी अच्छा महसूस हो रहा है!”

नीले बालों वाली बच्ची फ़िक्र से उसके ऊपर झुकी:

“बुरातिनो, मैं विनती करती हूँ, - आंखें बंद करो, नाक पकड़ो और पी जाओ.”

“नहीं चाहिए, नहीं चाहिए, नहीं चाहिए!...”

“मैं तुम्हें शकर का टुकड़ा दूंगी...”

तभी फ़ौरन कंबल पर सफ़ेद चूहा चढ़ गया, वह शकर का टुकड़ा पकड़े हुए था.

“अगर तुम मेरी बात मानोगे, तो ये टुकड़ा तुम्हें मिलेगा,” बच्ची ने कहा.

“सिर्फ़ शकर दो...”

“अरे, ज़रा समझो, - अगर दवाईयाँ नहीं पियोगे, तो तुम मर सकते हो...”

“कैस्टर ऑइल पीने से बेहतर है मर जाना...”

तब बच्ची ने कठोरता से, बड़े आदमियों जैसे अंदाज़ में कहा:

“नाक बंद कर और छत की तरफ़ देख...एक, दो, तीन.”

उसने बुरातिनो के मुंह में कैस्टर ऑइल डाला, फ़ौरन शकर का टुकड़ा भी घुसा दिया और उसे चूम लिया.

“बस, हो गया...”

भले आर्तेमोन ने, जिसे हर भरी पूरी चीज़ अच्छी लगती थी, दांतों में अपनी पूंछ पकड़ ली, खिड़की के नीचे गोल गोल घूमने लगा, जैसे हज़ारों पंजों, हज़ारों कानों, हज़ारों चमकती आंखों का बवंडर हो.

 

13

नीली आंखों वाली बच्ची बुरातिनो को संभालना चाहती है

सुबह बुरातिनो उठा – प्रसन्न और तंदुरुस्त, जैसा कुछ हुआ ही न था.

 

नीले बालों वाली लड़की, छोटी मेज़ के पास बैठी, जिस पर गुड़ियों के बर्तन रखे थे,  बाग़ में उसका इंतज़ार कर रही थी.

उसका चेहरा अभी अभी धुला था, ऊपर मुड़ी हुई नाक और गालों पर फूलों के पराग थे.

बुरातिनो का इंतज़ार करते हुए, वह गुस्से से तंग कर रही तितलियों को भगा रही थी:

“चलो भी, बस हो गया...”

उसने लकड़ी ने बच्चे को सिर से पांव तक देखा, त्यौरियां चढ़ा लीं. उसे मेज़ पर बैठने को कहा और छोटे से कप में कोको डाला.

बुरातिनो मेज़ पे बैठ गया, पैर अपने नीचे मोड़ लिया. वह बादाम की बर्फी पूरी की पूरी मुंह में डाल रहा था और बिना चबाए निगल रहा था.

खीर वाले बाउल में सीधा उंगलियाँ डाल देता और मज़े से उन्हें चूसता.

जब बच्ची ज़मीन पर रेंगने वाले बुज़ुर्ग भौंरे को कुछ टुकड़े फेंकने के लिए वापस आई, तो उसने कॉफी पॉट पकड़ लिया, और पूरा कोको टोंटी से पी गया. उसका गला बंद हो गया, कोको मेज़पोश पर गिरा दिया.

तब बच्ची ने कड़ाई से उससे कहा:

“अपने नीचे से पैर बाहर खींचो और उसे मेज़ के नीचे लटकाओ. हाथों से मत खाओ, इसके लिए चम्मच और कांटे हैं.

गुस्से से वह पलकें फडफडाने लगी.  

तुम्हारी देखभाल कौन करता है, बताएंगे, प्लीज़?

“कभी पापा कार्लो मेरी देखभाल करते हैं, और कभी – कोई नहीं.”

“अब मैं तुम्हारी देखभाल करूंगी, इत्मीनान रखो.”   

‘मैं तो फंस गया,’ बुरातिनो ने सोचा.

घर के चारों और घास पर कुत्ता अर्तेमोन छोटे छोटे पंछियों के पीछे भाग रहा था. जब वे पेड़ों पर बैठते, वह अपना सिर उठाता, उछलता और विलाप करते हुए भौंकता.

‘बढ़िया पंछी पकड़ता है,’ बुरातिनो ने ईर्ष्या से सोचा.

मेज़ पर सलीके से बैठने के कारण उसके पूरे बदन पर चींटियाँ रेंग रही थीं.

आखिरकार दर्दभरा नाश्ता ख़त्म हो गया. बच्ची ने उससे नाक से कोको साफ़ करने को कहा. उसने अपनी पोशाक की सलवटें और रिबन ठीक किये, बुरातिनो को हाथ से पकड़ा और घर के भीतर ले गई – उसे तौर तरीके सिखाने के लिए.

और हंसमुख कुत्ता अर्तेमोन घास में भाग रहा था और भौंक रहा था; पंछी, जो उससे बिलकुल नहीं डरते थे, खुशी से सीटियाँ बजा रहे थे, पेड़ों के ऊपर हवा प्रसन्नता से बह रही थी.

“अपने चीथड़े उतारो, आपको बढ़िया जैकेट और पतलून देंगे,” बच्ची ने कहा.

चार दर्ज़ियों – मास्टर-अकेला, उदास केकड़ा शेप्तालो, भूरा कठफोडवा कलगी वाला, बड़ा भौंरा रगाच और चूहे लिज़ेता ने – बच्ची के पुराने कपड़ों से लड़कों की ख़ूबसूरत पोशाक तैयार कर दी. शेप्तालो, कठफोडवा ने ड्रेस काटी, केकड़े ने चोच से छेद बनाए और सिल दिए, भौंरा पिछले पैरों से धागा डाल रहा था, लिज़ेता उन्हें कुतर रहा था.

बुरातिनो को लड़की की उतरन पहनने में शर्म आ रही थी, मगर कपड़े बदलने ही पड़े. नाक सुड़सुड़ाते हुए, उसने  जैकेट की जेब में सोने के चार सिक्के छुपा दिए.

“अब बैठ जाओ, हाथ अपने सामने रखो. कूबड़ मत निकालो,” -. बच्ची ने कहा और चाक का टुकड़ा हाथ में लिया. “हम अंकगणित पढेंगे...तुम्हारी जेब में दो सेब हैं...”

बुरातिनो ने चालाकी से पलकें झपकाईं.

“यकीन कीजिये, एक भी नहीं है...”

“मैं कह रही हूँ,” बच्ची ने फ़ौरन दुहराया, “मान लेते हैं, कि आपकी जेब में दो सेब हैं.  किसी ने आपसे एक सेब ले लिया. आपके पास कितने सेब बचे?

“दो.”

“अच्छी तरह सोचो.”

बुरातिनो ने नाक-भौंह चढ़ाईं, - बहुत अच्छी तरह सोचा.

“दो...”

“क्यों?

“मैं तो किसी को सेब दूंगा ही नहीं, चाहे वह झगड़ा ही क्यों न करे!”

“तुम्हारे पास गणित की काबलियत ही नहीं है,” बच्ची ने चिढ़कर कहा. “चलो, डिक्टेशन लिखते हैं.”

उसने अपनी ख़ूबसूरत आंखें छत की और उठाईं.

“लिखो, ‘और गुलाब का फूल ईसप की हथेली में गिरा. अब इस जादुई वाक्य को उल्टा करके पढो.”

हमें पता ही है, कि बुरातिनो ने कभी कलम और दवात देखी ही नहीं थी.

बच्ची ने कहा: “लिखो” – और उसने फ़ौरन दवात में अपनी नाक घुसाई और जब नाक से कागज़ पर स्याही का धब्बा गिरा, तो खूब डर गया.

बच्ची ने हाथ नचाए, उसकी आँखों में आंसू छलक आये.

“तुम गंदे, घिनौने शरारती बच्चे हो, तुम्हें सज़ा मिलनी चाहिए.”

उसने खिड़की से बाहर झांका:

“अर्तेमोन, बुरातिनो को अँधेरे कमरे में ले जाओ!”

भला अर्तेमोन सफ़ेद दांत दिखाते हुए दरवाज़े में प्रकट हुआ. उसने बुरातिनो का जैकेट पकड़ा और, पीछे सरकते हुए, उसे कोठरी में ले गया, जहां कोनों में जालों में बड़ी बड़ी मकड़ियां लटक रही थीं. वहां उसे बंद कर दिया, उसे खूब डराने के लिए गुर्राया, और फिर से पंछियों के पीछे भाग गया.

बच्ची, गुड़ियों के लेस वाले पलंग पर गिर गई, और रो पड़ी, क्योंकि उसे लकड़ी के बच्चे के साथ इतनी सख्ती से पेश आना पडा. मगर, यदि देखभाल का ज़िम्मा उठाया है, तो काम पूरा करना ही होगा.

बुरातिनो अंधेरी कोठरी में कुडकुडा रहा था:

‘बेवकूफ़ बच्ची...अच्छी टीचर मिली, ज़रा सोचो...खुद का सिर तो चीनी मिट्टी का है, बदन में रूई ठूंसी हुई है...’    

कोठरी में हल्की सी चरमराहट हो रही थी, जैसे कोई छोटे छोटे दांतों से कुतर रहा हो:

“सुन, सुन...”

उसने स्याही के धब्बे वाली नाक उठाई और अँधेरे में छत के नीचे उलटे लटकते हुए चमगादड़ को पहचान लिया.

“तुझे क्या चाहिए?

“रात का इंतज़ार कर, बुरातिनो.”

“धीरे, धीरे,” कोनों में मकड़ियां सरसराईं, “हमारी जालियों को मत हिलाओ, हमारी मक्खियों को ना डराओ...”

बुरातिनो टूटे हुए घड़े पर बैठा था, अपना गाल टिकाये हुए. वह इससे भी बदतर बदले हुए कपड़ों में रह चुका था, मगर अन्याय उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था.

‘क्या बच्चों को ऐसे पढ़ाते हैं? ...ये तो यातना है, ना कि शिक्षा...ऐसे मत बैठो और ऐसे मत खाओ...अभी बच्ची ने ‘प्राइमर नहीं सीखी है, - वह फ़ौरन दवात पर आ जाती है...और कुत्ता शायद पंछियों को भगा रहा है, - उसे कोई फरक नहीं पड़ता...’

चमगादड़ फिर से चीखा:

“रात का इंतज़ार कर, बुरातिनो, मैं तुझे मूर्खों के देस ले चलूंगा, वहां दोस्त तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैंबिल्ली और लोमड़ी, खुशकिस्मती और प्रसन्नता. रात का इंतज़ार करो.  

 

 

14

 

बुरातिनो मूर्खों के देस पहुंचता है

 

नीले बालों वाली बच्ची कोठरी के दरवाज़े पर पहुंची.

“बुरातिनो, मेरे दोस्त, क्या आखिर तुम्हें पछतावा हो रहा है?

वह बहुत गुस्से में था, ऊपर से उसके दिमाग़ में कुछ और ही चल रहा था.

‘बहुत ज़रूरी है मेरे लिए पछतावा करना! इंतज़ार करते रहो...’

“तो, आपको सुबह तक कोठरी में बैठना पडेगा...”

बच्ची ने कड़वाहट से गहरी सांस ली और चली गई.

रात हो गई . उल्लू कोठरी में ठहाके लगाने लगा. मेंढक अपनी छिपने की जगह से निकला, जिससे मैदानों में चाँद के प्रतिबिंब को पेट से मार सके.

बच्ची लेस वाले पलंग पर सोने के लिए लेट गई  और बड़ी देर तक अफ़सोस से सिसकियाँ लेती रही.

आर्तेमोन, पूंछ के नीचे नाक घुसाकर, उसके शयनकक्ष के दरवाज़े पर सो रहा था.

घर में घंटे वाली घड़ी ने आधी रात के घंटे बजाये.

चमगादड़ छत से नीचे गिरा.     

“समय हो गया है, बुरातिनो, भाग!” वह उसके के ऊपर चीखा. “कोठरी के कोने में ज़मीन के नीचे, चूहों का छेद है...मैं लॉन में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ.”

वह छत वाली खिड़की की ओर उड गया. बुरातिनो कोठरी के कोने की ओर लपका, मकड़ियों के जाल में उलझते हुए. उसके पीछे मकड़ियाँ गुस्से से फुफकारने लगीं.

वह ज़मीन के नीचे चूहे की तरह रेंगने लगा. रास्ता अधिकाधिक संकरा होता गया. बुरातिनो अब मुश्किल से ज़मीन के नीचे खुद को खींच पा रहा था...और अचानक सिर के बल उड़ते हुए ज़मीन के नीचे उड गया.

वहां वह चूहेदानी में फंसते फंसते बचा, एक सांप की पूंछ पर पैर रख दिया, जिसने अभी अभी डाइनिंग रूम में सुराही से दूध पिया था, और बिल्ली वाले छेद से लॉन में कूद गया.

नीले फूलों के ऊपर एक चूहा ख़ामोशी से उड़कर गया.

“मेरे पीछे आ, बुरातिनो, मूर्खों के देस में!”

चमगादड़ की पूंछ नहीं होती, इसलिए वह पंछी की तरह सीधे नहीं उड़ सकते, बल्कि अपने झिल्लीदार पंखों पर ऊपर और नीचे उड़ते हैं – किसी शैतान की तरह; उनका मुंह हमेशा खुला हुआ रहता है, ताकि बिना समय गंवाए, रास्ते में मच्छर और रात की तितलियों को पकड़ सकें, चबा सकें, निगल सकें.

बुरातिनो उसके पीछे गर्दन तक ऊंची घास में भाग रहा था; गीला पॉरिज उसके गालों पर थप्पड़ मार रहा था.

अचानक चमगादड़ गोल चाँद की ओर ऊंचे उड़ा और वहां उसने चिल्लाकर किसी से कहा:

“ले आया!”

बुरातिनो फ़ौरन कुलांटी मारकर खड़ी चट्टान से नीचे की ओर भागा. वह लुढ़क रहा था, लुढ़क रहा था और कपासी की झाड़ियों पर गिरा.

खरोंचों से भरा बदन, रेत से पूरा भरा हुआ मुंह, आंखें फाड़े बैठ गया.

“बाप रे!”

 उसके सामने बिल्ली बज़ीलियो और लोमड़ी अलीसा खड़े थे. 

“बहादुर, साहसी बुरातिनो, शायद चाँद से टपका है,” लोमड़ी ने कहा.

“ताज्जुब की बात है, ये ज़िंदा कैसे रह गया,” बिल्ले ने उदासी से कहा.

बुरातिनो को पुराने परिचितों से मिलकर खुशी हुई, हांलाकि उसे इस बात से संदेह हो रहा था, कि बिल्ले का दायाँ पंजा कपड़े से बांधा गया है, और लोमड़ी की पूरी पूंछ दलदल की कीचड़ से सनी हुई है.

“बिना अच्छाई के बुराई हो ही नहीं सकती,” लोमड़ी ने कहा, “मगर तुम मूर्खों के देस पहुँच गए हो...”

और उसने पंजे से सूखी नदी के ऊपर बने टूटे हुए पुल की ओर इशारा किया. नदी के उस पार कचरे के ढेर के बीच जीर्ण शीर्ण घर दिखाई दे रहे थे, टूटी हुई टहनियों वाले कटे हुए पेड़ थे और विभिन्न दिशाओं में झुके हुए घंटाघर थे....

“इस शहर में खरगोश की खाल के मशहूर जैकेट बिकते है, पापा कार्लो के लिए,” अपने होंठ चाटते हुए, लोमड़ी गा रही थी, - “वर्णमाला रंगीन तस्वीरों वाली, ..आह, कैसे मीठे केक और डंडियों पर मुर्गे की शक्ल के लॉलीपॉप! तूने अभी तक अपने पैसे गुमा तो नहीं दिए, प्यारे बुरातिनो?

लोमड़ी अलीसा ने उसके पंजे पर चुटकी काट कर, उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद की, उसका जैकेट साफ़ किया और टूटे हुए पुल से ले गई . बिल्ला बजीलियो पीछे पीछे लंगडाते हुए चल रहा था.

आधी रात हो गई थी, मगर मूर्खों के शहर में कोई भी नहीं सो रहा था.

आड़ी-टेढ़ी, गंदी सड़क पर फुंसियों वाले कमज़ोर कुत्ते भटक रहे थे, भूख से उबासी ले रहे थे:

“ए-हे-हे...”

किनारों पर नोचे गए ‘फ़र’ वाली बकरियां फुटपाथ के पास धूल भरी घास चर रही थीं, पूंछ के किनारे को हिला रही थीं.

“बे-ए-ए-ए-ए-दा...”

सिर लटकाए, एक गाय खड़ी थी, उसकी हड्डियां चमड़ी से बाहर निकल रही थीं.

“ततककलीफ...” सोच में पड़ी वह दुहरा रही थी.

गन्दगी के ढेर पर नुचे हुए परों वाली चिड़िया थीं, - वे उड़ी नहीं थीं – चाहे आप उन्हें पैरों से क्यों न कुचल दो...

नुची हुई पूँछों वाले मुर्गे भूख से लड़खड़ा रहे थे...

मगर चौराहों पर पुलिस के डरावने बुलडॉग अटेन्शन में खड़े थे – तिकोनी टोपियों और कंटीली कॉलर में.

वे गंदे और भूखे निवासियों पर चिल्ला रहे थे:

“च च चलो! दायें रहो! रा-स्ता म-त रो-को!...

लोमड़ी बुरातिनो को रास्ते पर आगे खींचती हुई ले चली. उन्होंने चाँद की रोशनी में घूमती हुई, सोने के चश्मों में, अच्छी तरह खिलाई गई बिल्लियों को देखा, जो टोपी पहनी बिल्लियों के हाथों में हाथ डाले घूम रही थीं.

मोटा लीस – इस शहर की गवर्नर घूम रही थी, घमंड से नाक ऊपर उठाए, और उसके साथ थी – घमंडी लोमड़ी, जो हथेली में बैंगनी रात रानी का फूल पकड़े हुए थी.

लोमड़ी लीसा ने फुसफुसाकर कहा:

“ये, वो लोग घूम रहे हैं, जिन्होंने चमत्कारों के खेत में पैसे बोये हैं...आज आख़िरी रात है, जब यहाँ धन बोया जा सकता है. सुबह होते होते पैसों का ढेर इकट्ठा कर लोगे और हर चीज़ खरीद लोगे...चलो, जल्दी.”

लोमड़ी और बिल्ला बुरातिनो को एक बंजर भूमि पर ले आये, जहां टूटे हुए घड़े, फटे हुए जूते, छेदों वाले गलोश और चीथड़े बिखरे थे...एक दूसरे को काटते हुए वे बकबक कर रहे थे:

“गड्ढा खोदो.”

“सोने के सिक्के रखो.”

“उन पर नमक छिड़को.”

“उसे पोखर से बाहर निकालो, अच्छी तरह पानी डालो.”

“ये कहना न भूलो ‘क्रेक्स, फेक्स, पेक्स....”

बुरासिनो ने अपनी नाक खुजाई, जिस पर स्याही के धब्बे पड़े थे.

“आप, वैसे, कुछ दूर चले जाईये...”

“माय गॉड, हम तो देखना भी नहीं चाहते कि तुम पैसे कहाँ गाड़ने जा रहे हो!” लोमड़ी ने कहा. 

“ख़ुदा सलामत रखे!” बिल्ले ने कहा.

वे थोड़ा दूर हटे और कचरे के ढेर के पीछे छुप गए.

बुरातिनो ने गढ़ा खोदा. तीन बार फुसफुसाकर कहा: ‘क्रेक्स, फेक्स, पेक्स’,  गढ़े में सोने के चार सिक्के रख दिए, उन पर मिट्टी डाल दी, जेब से चुटकी भर नमक निकाला, ऊपर से छिड़क दिया. डबरे से चुल्लू भर पानी लिया, गढ़े पर डाल दिया.

और बैठकर इंतज़ार करने लगा कि पेड़ कब बड़ा होगा...

15

पुलिस वाले बुरातिनो को पकड़ लेते हैं और अपनी सफ़ाई में एक भी शब्द नहीं कहने देते. 

 

लोमड़ी अलीसा सोच रही थी कि बुरातिनो सोने के लिए जाएगा, मगर वह कचरे के ढेर पर बैठा रहा, इत्मीनान से नाक बाहर खींचे.

तब अलीसा ने बिल्ले को उस पर नज़र रखने के लिए कहा, और खुद नज़दीक के पुलिस स्टेशन में भागी.

वहां, धुएं से भरे कमरे में, स्याही के धब्बों से ढंकी मेज़ के पीछे, ड्यूटी पर तैनात बुलडॉग खूब खर्राटे ले रहा था। लोमड़ी ने भलमनसाहत से कहा:

“महाशय, साहसी ड्यूटी ऑफिसर, क्या एक सड़कछाप चोर को गिरफ्तार कर सकते हैं? इस शहर के सभी अमीर और आदरणीय निवासियों के सिर पर भयानक खतरा मंडरा रहा है.

ड्यूटी वाला बुलडॉग, जो आधी नींद से जाग गया, इतनी ज़ोर से भौंका कि लोमड़ी के नीचे डर के मारे एक डबरा बन गया.

“चोर! हूँ!”

लोमड़ी ने स्पष्ट किया, कि खतरनाक चोर-बुरातिनो को एक खाली जगह पर देखा गया.

ड्यूटी ऑफिसर ने, अभी भी गुर्राते हुए, घंटी बजाई.     

दो डॉबरमैने-पिंसर जासूस कमरे में घुस गए, जो कभी भी नहीं सोते थे, किसी पर भी भरोसा नहीं करते थे, और खुद अपने आप पर भी आपराधिक इरादों में लिप्त होने का संदेह करते थे.

ड्यूटी ऑफिसर ने उन्हें विभाग में खतरनाक अपराधी को ज़िंदा या मुर्दा लाने का हुक्म दिया. 

जासूसों ने संक्षेप में उत्तर दिया:

“त्याफ!”

और ख़ास चालाक अंदाज़ में, पिछले पैरों को बगल में रखते हुए, बंजर भूमि की ओर सरपट भागे.

आख़िरी सौ कदम वे अपने पेटों पर रेंग कर गए और अचानक बुरातिनो पर कूदे, उसे बगल के नीचे से पकड़ लिया और खींचते हुए डिपार्टमेंट ले गए. बुरातिनो पैर पटकता रहा, उनसे बताने की विनती करता रहा – किसलिए? किसलिए?

जासूसों ने जवाब दिया:

“वहां सब सुलझा लेंगे...”

लोमड़ी और बिल्ले ने, बिना समय गंवाए खोदकर सोने के चार सिक्के बाहर निकाले. लोमड़ी इतनी होशियारी से  पैसे बांटने लगी, कि बिल्ले को बस एक ही सिक्का मिला, और उसे – तीन.

बिल्ले ने खामोशी से अपने पंजे उसके मुंह पर गड़ा दिए.

लोमड़ी ने उसे अपने पंजों से कसकर पकड़ लिया. और वे दोनों कुछ देर बंजर ज़मीन पर गोले की तरह लुढ़कते रहे. बिल्ले और लोमड़ी के बालों के गुच्छे चाँद की रोशनी में उड़ रहे थे.

किनारे से एक दूसरे की चमड़ी नोंचकर, उन्होंने आपस में सिक्के आधे-आधे बांट लिए और उसी रात को शहर से गायब हो गए.

इस बीच जासूस बुरातिनो को पुलिस स्टेशन ले आए.

ड्यूटी पर तैनात बुलडॉग मेज़ के पीछे से बाहर आया और उसने खुद बुरातिनो की जेबों की तलाशी ली.

सिर्फ शकर के एक छोटे से टुकड़े और बादाम केक के चूरे के अलावा और कुछ भी न पाकर, ड्यूटी पर तैनात अफसर ने बुरातिनो को खून की प्यासी नज़रों से देखा:

“तूने तीन अपराध किये हैं, कमीने : तू - बेघर है, बगैर पासपोर्ट के है और बेकार है. इसे शहर के बाहर ले जाकर तालाब में डुबो दिया जाए.”  

जासूसों ने जवाब दिया:

“त्याफ!”

बुरातिनो ने पापा कार्लो के बारे में, अपने कारनामों के बारे में बताना चाहा. मगर, सब बेकार! जासूसों ने उसे पकड़ लिया, सरपट खींचते हुए शहर के बाहर ले गए और पुल से गहरे, गंदे तालाब में फेंक दिया, जो मेंढकों से, जोंकों से और पानी के भौंरों की गन्दगी से लबालब भरा था.   

बुरातिनो पानी में गोते लगाने लगा, और हरे रंग की बेलों ने उसे लपेट लिया.

बुरातिनो तालाब में रहने वालों से दोस्ती करता है, चार सोने के सिक्कों के गुम होने के बारे में जानता है और कछुए तोर्तिला से सुनहरी चाबी प्राप्त करता है.  

ये नहीं भूलना चाहिए कि बुरातिनो लकड़ी का था, और इसलिए डूब नहीं सकता था. फिर भी, वह इतना डर गया था, कि हरी काई से लिपटा, बड़ी देर तक पानी पर पड़ा रहा.

उसके चारों ओर तालाब में रहने वाले प्राणी इकट्ठा हो गए: अपनी बेवकूफियों की वजह से मशहूर काले पेट वाले मेंढक, चप्पुओं जैसे पिछले पंजों वाले पानी के भंवरे, जोंकें, लार्वा, जो सामने पड़ी हर चीज़ खा लेते हैं, यहां तक कि अपने आप को भी, और अंत में विभिन्न प्रकार के छोटे छोटे तन्तुयुक्त कीड़े.

मेंढक अपने कड़े होठों से उसे गुदगुदी कर रहे थे और खुशी से हुड की लटकन चबा रहे थे. लीचें उसके जैकेट की जेब में घुस गईं. एक पानी का भौंरा कई बार उसकी नाक पर चढ़ गया, जो पानी के काफ़ी ऊपर निकली हुई थी, और वहां से पानी में कूद जाता – पंछी की तरह.   

छोटे छोटे तन्तुयुक्त कीड़े, अपने बालों में उलझते, जो हाथों और पैरों के बदले उनके शरीरों पर थे, उनसे मुक्त होने की कोशिश करते, खाने के लिए कोई चीज़ ढूँढने की कोशिश कर रहे थे, मगर खुद ही पानी के भौरों के मुंह में गिर रहे थे.

बुरातिनो, आखिरकार इस सबसे उकता गया, वह पानी पर अपने पंजे चलाने लगा:

“भाग जाओ! मैं आपके लिए कोई मरी हुई बिल्ली नहीं हूँ.”

पानी में रहने वाले तितर-बितर हो गए. वह पेट के बल मुड़ा और तैरने लगा.

पानी की लिली के गोल-गोल पत्तों पर चाँद की रोशनी में बड़े मुंह वाले मेंढक बैठे थे, वे आंखें बाहर निकाले बुरातिनो की और देख रहे थे.

“कोई कटलफिश तैर रही है,” एक मेंढक टर्राया.

“नाक, सारस की तरह है,” दूसरा टर्राया.

“यह समुद्री मेंढक है,” तीसरा टर्राया.

बुरातिनो, कुछ देर आराम करने के लिए, वाटर-लिली के बड़े पत्ते पर बाहर आया. उसके ऊपर बैठ गया, घुटनों को कसकर पकड़ लिया और दांत किटकिटाते हुए बोला:

“सारे लड़के और लड़कियां जी भर के दूध पी चुके, गरम बिस्तरों में सो रहे हैं, सिर्फ मैं अकेला गीले पत्ते पर बैठा हूँ...मेंढकों, मुझे खाने के लिए कुछ दो.”

मेंढक, जैसा सबको मालूम है, बेरहम होते हैं. मगर ये सोचना गलत है कि उनका दिल नहीं होता. जब बुरातिनो ने दांत किटकिटाते हुए अपने दुर्भाग्यपूर्ण कारनामों के बारे में बताना शुरू किया, तो मेंढक एक के बाद एक उछलने लगे, अपने पिछले पैर उछालते हुए तालाब की तली में कूद गए.

वहां से वे एक मरा हुआ भौंरा, ड्रैगनफ्लाय का पंख, मिट्टी का टुकड़ा, ‘क्रस्तेशियन रो’ का एक दाना और कुछ सड़ी हुई जड़ें लाए.

ये सारी खाने की चीजें बुरातिनो के सामने रखकर मेंढक फिर से ‘वाटर लिली’ के पत्तों पर चढ़ गए और पत्थर जैसे बैठ गए, बाहर निकली आंखें और बड़े मुख वाले सिर उठाये.  

बुरातिनो ने सूंघा और मेंढकों की लाई हुई चीज़ों को मुंह में डाला.

“मुझे उल्टी आ रही है,” उसने कहा, “कैसा घिनौना खाना है!...”

तब सारे मेंढक फिर से एक साथी पानी में घुस गए...

तालाब की सतह पर हरे रंग का पट्टा सरसराया, और एक बड़ा, भयानक सांप का सिर प्रकट हुआ. वह उस पत्ते की और तैरने लगा, जिस पर बुरातिनो बैठा था.

उसकी टोपी के ऊपर वाली लटकन सिर के बल खड़ी हो गई . खौफ़ के मारे वह पानी में गिरते-गिरते बचा.

मगर यह सांप नहीं था. यह एक आधी अंधी आंखों वाला, अधेड़ कछुआ तर्तीला था, जो ज़रा भी खतरनाक नहीं था. 

आह तू, बुद्धिहीन, हर किसी पर विश्वास करने वाला, छोटे विचारों वाला!” तर्तीला ने कहा. “तुझे तो घर में बैठकर खूब मेहनत से पढ़ना चाहिए! और तू पहुँच गया ‘मूर्खों के देस में!”

“क्योंकि मैं पापा कार्लो के लिए और ज़्यादा सोने के सिक्के प्राप्त करना चाहता हूँ...मैं बहुहुहुहुत अच्छा और समझदार बालक हूँ...”

“तेरे पैसे बिल्ले और लोमड़ी ने चुराए हैं,” कछुए ने कहा. “वे तालाब के पास से भाग कर जा रहे थे, पानी पीने के लिए रुके थे, और मैंने उन्हें डींग मारते हुए सुना, कि तुम्हारे पैसे ज़मीन से खोद कर निकाले हैं, और उनके कारण वे आपस में झगड़ पड़े...ओह, तू बुद्धिहीन, हरेक पर विश्वास करने वाले, छोटे विचारों वाले!”

“डांटना नहीं चाहिए,” बुरातिनो बुदबुदाया, “ऐसी हालत में इंसान की मदद करना चाहिए...अब मैं क्या करूंगा? ओय-ओय-ओय!...पापा कार्लो के पास लौटकर कैसे जाऊंगा? आय-आय-आय!...”

उसने मुट्ठियों से आंखें पोंछी, और इतनी दयनीयता से कराहा, कि सारे मेंढकों एकदम गहरी आह भरी:

“ऊह-ऊह... तर्तीला, इंसान की मदद करो.”

कछुआ बड़ी देर तक चांद की ओर देखता रहा, उसे कुछ याद आया...

“एक बार मैंने इसी तरह इंसान की मदद की थी, मगर उसने बाद में मेरी दादी और दादा की खाल से कछुए  की कंघियाँ बनाईं,” उसने कहा. और फिर से बड़ी देर तक चांद की तरफ़ देखता रहा. “ अच्छा, यहाँ बैठ, नन्हे इंसान, और मैं रेंगते हुए तालाब के तल तक जाता हूँ, - हो सकता है, एक काम की चीज़ मिल जाए.”

उसने सांप जैसे सिर को भीतर खींच लिया और धीरे धीरे पानी के नीचे चला गया.

मेंढक फुसफुसा रहे थे:

“कछुआ तर्तीला कोई बड़ा रहस्य जानता है.”       

बहुत सारा समय बीत गया.

चाँद पहाड़ियों के पीछे डूबने लगा था.

हरी काई फिर से हिलने लगी, कछुआ प्रकट हुआ, मुंह में छोटी सी सोने की चाबी पकड़े.

उसने उसे बुरातिनो के पैरों के पास एक पत्ते पर रख दिया.

“बुद्धिहीन, मूर्खों पर भरोसा करने वाले, छोटे विचारों के,” – तर्तीला ने कहा, “दुखी न हो, कि लोमड़ी और बिल्ले ने तुम्हारे सोने के सिक्के चुरा लिए. मैं तुम्हें ये चाबी देता हूँ. उसे तालाब के तल पर एक आदमी ने गिरा दिया था, जिसकी दाढ़ी इतनी लम्बी थी कि वह उसे जेब में घुसा देता था, जिससे दाढी उसके चलने में बाधा न डाले. आह, कितनी मिन्नत कर रहा था, कि मैं तालाब के तल से ये चाबी खोज कर लाऊँ!...’

तर्तीला ने आह भरी, कुछ देर खामोश रहा, और फिर से ऐसी गहरी सांस ली कि पानी से बुलबुले उठने लगे...

“मगर मैंने उसकी मदद नहीं की, मैं तब लोगों पर बेहद गुस्सा था मेरी दादी और दादा की वजह से, जिनकी खाल से कछुए की कंघियां बनाई गई  थीं. दाढी वाले आदमी ने इस चाबी के बारे में बहुत कुछ बताया था, मगर मैं सब कुछ भूल गया. सिर्फ़ इतना याद है, कि इससे कोई दरवाज़ा खोला जा सकता है और इससे खुशी मिलेगी...”

बुरातिनो का दिल धड़कने लगा, आंखें जलने लगीं. वह अपने सभी दु:खों के बारे में भूल गया. उसने जैकेट की जेब से जोंकें निकालीं, वहां चाबी रखी, नम्रता से कछुए तर्तीला और मेंढकों को धन्यवाद दिया, पानी में कूद गया और किनारे की तरफ़ तैरने लगा.

जब वह काली छाया की तरह किनारे पर दिखाई दिया, तो मेंढकों ने पीछे से चिल्लाकर कहा:

“बुरातिनो, चाबी न खोना!”

 

16

बुरातिनो ‘मूर्खों के देस’ से भागता है और दुर्दैवी कॉम्रेड से मिलता है.

 

कछुए तर्तीला ने ‘मूर्खों के देस से जाने का रास्ता नहीं बताया.

बुरातिनो जहां सींग समाएं भागा जा रहा था. काले पेड़ों के पीछे तारे चमक रहे थे. रास्ते के ऊपर चट्टानें लटक रही थीं. संकरे रास्ते पर कोहरे का बादल था.

अचानक बुरातिनो के सामने एक भूरी गाँठ उछलने लगी. तभी कुत्ते का भौंकना भी सुनाई दिया.

बुरातिनो चट्टान से चिपक गया. उसकी बगल में ‘मूर्खों के शहर की पुलिस के दो बुलडॉग क्रूरता से, सूंघते हुए भागकर निकल गए.  

भूरी गांठ रास्ते से बगल में छिटक गई – ढलान पर. बुलडॉग – उसके पीछे पीछे.

जब पैरों की धमधम और कुत्तों के भौंकने की आवाज़ दूर चली गई  तो बुरातिनो ने इतनी तेज़ी से भागना शुरू कर दिया कि काली टहनियों के पीछे तारे जल्दी-जल्दी तैरने लगे.

अचानक भूरी गाँठ फिर से उछल कर रास्ते पर आ गई . बुरातिनो ने देख लिया, कि यह एक ख़रगोश है, और उसके ऊपर, उसके कान पकडे, एक कमजोर छोटा आदमी बैठा है.

ढलान से कंकड़ गिर रहे थे, - बुलडॉग खरगोश के पीछे पीछे रास्ते पर उछले, और फिर सब कुछ शांत हो गया.

बुरातिनो इतनी तेज़ी से भाग रहा था, कि अब तारे, मानो गुस्से से काली टहनियों के पीछे भाग रहे थे. 

तीसरी बार भूरे खरगोश ने उछल कर रास्ता पार किया. छोटे आदमी का सिर टहनी से टकराया, वह उसकी पीठ से फिसला और सीधे बुरातिनो के पैरों के पास गिरा.

“र्रर्रर्र – गाफ़! पकड़ो उसे!” खरगोश के पीछे पीछे पुलिस के बुलडॉग तेज़ी से भाग रहे थे: उनकी आँखों में इतना गुस्सा भरा था, कि उन्होंने न तो बुरातिनो को देखा , न ही कमजोर, पीले आदमी को.

“माफ़ करना माल्विना, हमेशा के लिए अलबिदा!” रोनी आवाज़ में आदमी बिसूर रहा था.

बुरातिनो उसके ऊपर झुका और उसने अचरज से देखा, कि ये तो प्येरो है लम्बी आस्तीनों वाली सफ़ेद कमीज़ में.

वह पहियों वाली नाली में सिर के बल पड़ा था और, ज़ाहिर है, स्वयं को मरा हुआ समझ रहा था और ज़िंदगी से जुदा होते हुए रहस्यमय वाक्य दुहरा रहा था: “ अलबिदा, मल्विना, अलबिदा हमेशा के लिए!” 

बुरातिनो ने उसे हिलाना शुरू किया, उसकी टांग पकड़ कर खींची, - प्येरो के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई. तब बुरातिनो ने जेब में पड़ी हुई जोंक को निकाला और बेजान आदमी की नाक के पास रखा.

जोंक ने ज़्यादा कुछ सोचे बिना उसकी नाक पर काट लिया. प्येरो फ़ौरन उठकर बैठ गया, उसने सिर हिलाया, जोंक को बाहर खींचा और कराहा:

“आह, लगता है कि अभी मैं ज़िंदा हूँ!”

बुरातिनो ने उसे गालों से पकड़ लिया, सफ़ेद, टूथ पावडर जैसे, उन्हें चूमा और पूछा:

“तुम यहाँ कैसे आये? तुम भूरे खरगोश पर क्यों सवार थे?

“बुरातिनो, बुरातिनो,” – प्येरो ने भय से चारों ओर देखते हुए जवाब दिया, - “मुझे फ़ौरन छुपा दो...क्योंकि कुत्ते भूरे खरगोश का पीछा नहीं कर रहे थे, - वे मेरा पीछा कर रहे थे...सिन्योर कराबास बराबास दिन रात मेरा पीछा करता रहता है. उसने ‘मूर्खों के शहर में पुलिस के कुत्तों को किराए पर लिया है और कसम खाई है कि मुझे ज़िंदा या मुर्दा – हर हाल में पकड़ेगा.”

दूर कहीं फिर से कुत्ते भौंके. बुरातिनो ने प्येरो को आस्तीन से पकड़ लिया और उसे खींच कर मिमोज़ा (छुई मुई का पेड़ – अनु.) की बेलों में ले गया, जो पीले, सुगन्धित, गोल गोल बटन जैसे फूलों से ढंकी हुई थीं.

वहां सड़े हुए पत्तों पर लेटे हुए, प्येरो ने फुसफुसाते हुए उससे कहना शुरू किया:  

“जानते हो, बुरातिनो, एक बार रात को हवा चिंघाड़ रही थी, घनघोर बारिश हो रही थी...”

प्येरो बताता है, कि वह कैसे खरगोश पर सवार होकर ‘मूर्खों के देस पहुँच गया.

“जानते हों बुरातिनो, एक बार रात को हवा चिंघाड़ रही थी, घनघोर बारिश हो रही थी. सिन्योर कराबास बराबास भट्टी  के पास बैठा पाईप के कश ले रहा था. सभी गुडिया सो गई थीं. मैं अकेला ही नहीं सोया था. मैं नीले बालों वाली लड़की के बारे में सोच रहा था...”

“सोचा भी तो किसके बारे में, बेवकूफ!” बुरातिनो ने उसकी बात काटी. “मैं कल रात को इस लड़की के पास से भाग आया – मकड़ियों वाली कोठरी से...”

“क्या? क्या तुमने नीले बालों वाली लड़की को देखा है? तुमने मेरी मल्वीना को देखा है?

“सोचो – गज़ब की है! रोतली और सताने वाली...”

प्येरो हाथ नचाते हुए उछल पड़ा.

“मुझे उसके पास ले चल...अगर तुम मल्वीना को ढूंढने में मेरी मदद करोगे, तो मैं तुम्हें सुनहरी चाबी का रहस्य बताऊंगा...”

“क्या!” बुरातिनो खुशी से चीखा. – “तुम सुनहरी चाबी का रहस्य जानते हो?

“जानता हूँ कि चाबी कहां है,  कैसे उसे हासिल करना है, जानता हूँ, कि उससे एक ख़ास दरवाज़ा खोलना है...मैंने उस रहस्य के बारे में सुन लिया था, और इसलिए सिन्योर कराबास बराबास मुझे पुलिस के कुत्तों के साथ ढूंढ रहा है.”

बुरातिनो फ़ौरन डींग मारना चाहता था, कि रहस्यमय चाबी उसकी जेब में है. कहीं बक न दे, इसलिए उसने सिर से अपना टोप खींचा और उसे मुंह में ठूंस लिया.

प्येरो उसे मल्वीना के पास ले चलने के लिए विनती कर रहा था. बुरातिनो ने ऊंगलियों की सहायता से इस बेवकूफ को समझाया, कि अभी अन्धेरा है और खतरा है, और जब सुबह होगी तो वे भागकर बच्ची के पास जायेंगे.        

प्येरो को फिर से मिमोसा की झाड़ियों के नीचे छिपने पर मजबूर करने के बाद, बुरातिनो खरखरी आवाज़ में बोला, क्योंकि उसका मुंह टोपी से बंद था:

“शुशुनाओ...”

“तो, - एक बार रात को हवा खूब शोर मचा रही थी...”

“इस बारे में तुम पहले ही शुशुना चुके हो...”

“तो,”- प्येरो कहता रहा, “ मैं, समझ रहे हो, सो नहीं रहा हूं, और अचानक सुनता हूँ: खिड़की पर किसी ने जोर से दस्तक दी.”

सिन्योर कराबास बराबास गरजा:

“ऐसे कुत्ते मौसम में कौन कडमडाया है?

“ये मैं हूँ – दुरेमार,” खिड़की के बाहर से जवाब आया, “औषधीय जोंक बेचने वाला. मुझे आग के पास अपने आप को सुखाने की इजाज़त दीजिये.”

“मुझे, समझ रहे हो ना, खूब इच्छा हो रही थी ये देखने की, कि औषधीय जोंकों के विक्रेता कैसे होते हैं. और – देखता हूँ:

सिन्योर कराबास बराबास कुर्सी से उठा, हमेशा की तरह उसने दाढ़ी पर पैर रखा, गालियाँ दीं, और दरवाज़ा खोला.

भीतर आया एक लंबा, गीला-गीला आदमी, छोटे-बेहद छोटे चेहरे वाला, इतना झुर्रियों वाला, जैसे गुच्ची मशरूम. उसने पुराना हरा ओवरकोट पहना था, बेल्ट से चिमटे, हुक और हेयरपिंस लटक रहे थे. उसने हाथों में टीन का डिब्बा और जाल पकड़ रखा था.

“अगर आपके पेट में दर्द है,” उसने इस तरह झुकते हुए कहा मानो उसकी कमर बीच से टूटी हो, “अगर आपको तेज़ सिर दर्द हो रहा हो अगर कानों में तेज़ खटखट हो रही हो, तो मैं कानों के पीछे आधा दर्जन बढ़िया जोंकें रख सकता हूँ.”

सिन्योर कराबास बराबास  गरजा:

“शैतान ले जाए, कोई जोंकें-वोंकें नहीं चाहिए! आग के पास जितना चाहो, गरमा सकते हो.”

दुरेमार भट्टी की ओर पीठ किये खड़ा था.

तभी उसके हरे कोट से भाप निकलने लगी और उसमें से कीचड़ की बू आने लगी.

“जोंकों का व्यापार बहुत बुरा चल रहा है,” उसने फिर से कहा. “अगर आपकी हड्डियों में दर्द है तो...ठन्डे पोर्क के एक टुकड़े और एक ग्लास वाईन के लिए मैं आपकी जांघ पर एक दर्जन बेहद बढ़िया जोंकें रखने के लिए तैयार हूँ...”    

“शैतान ले जाए, कोई जोंकें-वोंकें नहीं चाहिए!” कराबास बराबास चीखा. “ पोर्क खाओ और वाईन पी लो.”

दुरेमार ने पोर्क खाना शुरू किया, उसका चेहरा सिकुड़ रहा था और फ़ैल रहा था, रेज़िन की तरह. खाने और पीने के बाद, उसने एक चुटकी तम्बाकू मांगी.

“सिन्योर, मैं तृप्त हूँ और गरमा गया हूँ,” उसने कहा. “आपकी मेहमाननवाज़ी चुकाने के लिए मैं आपको एक रहस्य बताऊंगा.”

सिन्योर कराबास बराबास ने पाईप का कश लिया और जवाब दिया:

“दुनिया में सिर्फ एक ऐसा रहस्य है, जो मैं जानना चाहता हूँ. बाकी सब पर तो मैं थूकता हूँ.”

“सिन्योर,” दुरेमार ने फिर कहा, “मैं एक महान रहस्य जानता हूँ, कछुए तर्तीला ने उसे मुझे बताया था.”

इन शब्दों को सुनते ही कराबास बराबास ने आँखें बाहर निकालीं, उछला, दाढी में उलझ गया, सीधा घबराए हुए दुरेमार की ओर उछला, उसे अपने पेट से चिपका लिया और सांड की तरह गरजा:

“प्यारे दुरेमार, बेशकीमती दुरेमार, बोल, जल्दी बोल कि तुझे कछुए तर्तीला ने क्या बताया था!”

तब दुरेमार ने ये किस्सा सुनाया:

“मैं ‘मूर्खों के शहर के पास एक गंदे तालाब में जोंकें पकड़ रहा था. चार सोल्दा रोज़ की मजूरी पर मैंने एक गरीब आदमी को किराए पर रखा, - वह अपने कपड़े उतार देता, तालाब में गर्दन तक जाता और वहां खड़ा रहता जब तक कि उसके नंगे बदन से जोंकें न चिपक जातीं.

तब वह बाहर किनारे पर आता, मैं उसके बदन से जोंकें इकट्ठा करता और उसे फिर से तालाब में भेज देता.

जब इस तरह से हमने काफी सारी जोंकें इकट्ठा कर लीं, तो अचानक पानी के भीतर से सांप का सिर दिखाई दिया.

“सुन, दुरेमार,” सिर ने कहा, “तूने हमारे ख़ूबसूरत तालाब की सारी आबादी को डरा दिया है, तुम पानी को गंदा कर रहो हो, तुम मुझे नाश्ते के बाद चैन से आराम नहीं करने देते...ये बेहूदगी कब बंद होगी?...”

मैंने देखा कि वह साधारण कछुआ है, और, ज़रा भी डरे बिना मैंने जवाब दिया:

“जब तक आपके गंदे डबरे की सारी जोंकें नहीं पकड़ लेता...”

मैं आपको खरीदने के लिए तैयार हूँ, दुरेमार, ताकि तुम हमारे तालाब को अकेला छोड़ दो, और फिर कभी वापस न आओ.”

“तब मैं कछुए का मज़ाक उड़ाने लगा:

“आह, तू, बूढ़ी तैरने वाली सूटकेस, बेवकूफ आंटी तर्तीला, तुम मुझे क्या देकर खरीदोगी? क्या अपनी हडीली छत से, जहां अपने पंजे और सिर छुपाती हो...मैं तुम्हारी छत स्कैलप्स के लिए बेच दूंगा...” 

कछुआ गुस्से से हरा हो गया और मुझसे बोला:

“तालाब के तल पर जादू की चाबी पड़ी है...मैं एक आदमी को जानता हूँ, - वह इस चाबी को पाने के लिए दुनिया में कुछ भी करने को तैयार है...”

दुरेमार इन शब्दों को कह भी नहीं पाया था, कि कराबास बराबास पूरी ताकत से चीखा:

“वो आदमी – मैं हूँ! मैं! मैं! मेरे प्यारे दुरेमार, तो तुमने कछुए से चाबी क्यों नहीं ली?

“लो, और सुनो!” – दुरेमार ने जवाब दिया और अपने चेहरे की झुर्रियों को इकट्ठा किया, जिससे वह उबले हुए कुकुरमुत्ते की तरह हो गया. – “ये भी सुनो! - सबसे बेहतरीन जोकों के बदले कोई एक चाबी...”

संक्षेप में मेरा कछुए से झगड़ा हो गया, और उसने, पानी से पंजा निकाल कर कहा:

“कसम खाता हूँ – न तो तुमको , न ही कोई और जादू की चाबी को पा सकेगा. कसम खाता हूँ – वह उसी आदमी को मिलेगी, जो तालाब की पूरी आबादी को उसे मुझसे मांगने के लिए मना लेगा...”

ऊपर उठे पंजे से कछुआ पानी में डूब गया.”

एक भी पल खोये बिना ‘मूर्खों के देस’ भागो!” कराबास बराबास ने जल्दी जल्दी अपनी टोपी और लालटेन पकड़ते हुए दाढ़ी के सिरे को अपनी जेब में घुसा लिया. “मैं तालाब के किनारे बैठ जाऊंगा. मैं प्यार से मुस्कुराऊंगा. मैं मेंढकों से, टेडपोल से, पानी के भौंरों से भीख मांगूंगा...मैं हिचकियाँ लूंगा, किसी अकेली गाय की तरह, कराहूँगा, बीमार मुर्गी की तरह, रोऊँगा मगरमच्छ की तरह. मैं सबसे छोटे मेंढक के सामने घुटनों पर बैठ जाऊंगा...चाबी मेरे ही पास होनी चाहिए! मैं शहर जाऊंगा, मैं एक घर में जाऊंगा, मैं सीढ़ियों के नीचे वाले कमरे में झाकूंगा...मैं छोटा सा दरवाज़ा ढूंढूंगा, - उसके करीब से सब गुज़रते हैं, और किसी की भी उस पर नज़र नहीं पड़ती. चाबी को ‘की होल में घुसाऊंगा...”

“इस समय, समझ रहे हो, बुरातिनो,” – मिमोसा के पेड़ के नीचे सुन्दर पत्तियों पर बैठकर प्येरो कह रहा था, - “मुझे यह सब इतना दिलचस्प लगा, कि मैं परदे के पीछे से पूरा बाहर निकल आया.”

        

   

17

सिन्योर कराबास बराबास ने मुझे देख लिया.

“तू छुपकर सुन रहा है, कमीने!” और वह मुझे पकड़ने के लिए उछला,, ताकि आग में फेंक दे, मगर फिर से अपनी दाढ़ी में उलझ गया और भयानक धडाम के साथ, कुर्सियों को तितर बितर करते हुए, फर्श पर गिर पडा.

“याद नहीं है, कि मैं खिड़की के बाहर कैसे पहुंचा, कैसे फेंसिंग पर चढ़कर उससे बाहर आया. अँधेरे में हवा शोर मचा रही थी और बारिश थपेड़े मार रही थी.

“मेरे सिर के ऊपर काला बादल बिजली से चमक गया, और दस कदम पीछे मैंने भागते हुए कराबास बराबास और जोंकें बेचने वाले को देखा....मैंने सोचा: ‘मर गया, लड़खड़ाया और किसी मुलायम और गर्माहट भरी चीज़ पर गिरा, किसी के कानों को पकड़ लिया...

“ये भूरा खरगोश था. वह भय से चीखा, ऊंची छलांग लगाई, मगर मैं उसके कानों को पकड़े रहा, और हम अँधेरे खेतों से, अंगूर के बागों से, सब्जियों के बगीचों से होते हुए भागते रहे.

“जब खरगोश थक गया और बैठ गया, अपमान से अपना कटा हुआ होंठ चबाते हुए, मैंने उसका माथा चूम लिया.

“प्लीज़, थोड़ा और, थोड़ा और भागेंगे, प्यारे भूरे खरगोश...”

“खरगोश ने गहरी सांस ली, और हम फिर से उछलते हुए जाने लगे, न जाने कहीं दायें, तो कहीं बाएं...

 “जब बादल छट गये और चाँद निकल आया, तो मैंने पहाड़ के नीचे एक छोटा सा शहर देखा जिसमें अलग अलग दिशाओं में घंटाघर थे.

शहर वाले रास्ते पर कराबास बराबास और जोंकों का विक्रेता भाग रहे थे.

खरगोश ने कहा:

“एहे हे, ये है खरगोश की खुशी! वे ‘मूर्खों के शहर जा रहे हैं, ताकि पुलिस के कुत्ते किराए पर लें. हो गया, और हम गए काम से!”   

खरगोश उदास हो गया. उसने पंजों में नाक घुसा ली और कान लटका लिए.

मैंने उसकी विनती की, मैं रो रहा था, मैं उसके पैरों पर भी झुका. खरगोश टस से मस नहीं हुआ.

मगर जब शहर से दो चपटी नाक वाले बुलडॉग, जिनके दायें पंजों पर काली पट्टियां बंधी थीं, भागते हुए आए, तो खरगोश की पूरी काया थरथरा गई , - मैं मुश्किल से उछलकर उसकी पीठ पर बैठ गया, और वह बेतहाशा जंगल में भागने लगा...

बाकी तो तुम देख ही चुके हो, बुरातिनो.”

प्येरो ने अपनी कहानी ख़त्म की, और बुरातिनो ने उससे सावधानी से पूछा:

“और किस घर में, सीढ़ियों के नीचे किस कमरे में वह छोटा सा दरवाज़ा है, जिसे चाबी खोलती है?

“कराबास बराबास इस बारे में नहीं बता पाया...आह, क्या हमें इससे कोई फरक पड़ता है, - चाबी तालाब के तल पर है...हम कभी भी सुख नहीं देख पायेंगे...”

“और क्या तुमने ये देखा है?” बुरातिनो उसके कान में चीखा. और जेब से चाबी निकालकर प्येरो की नाक के सामने नचाई. – “ये रही चाबी!”

बुरातिनो और प्येरो मल्वीना के पास आये, मगर उन्हें मल्वीना और कुत्ते अर्तेमोन के साथ भागना पड़ता है.

जब सूरज पर्वत के चट्टानी शिखर पर आया, तो बुरातिनो और प्येरो झाड़ी के नीचे से बाहर आये और खेत से होते हुए भागे, जिस पर कल रात को चमगादड़ बुरातिनो को नीले बालों वाली लड़की के घर से ‘मूर्खों के देस ले गया था.

प्येरो की ओर देखने से हंसी आ रही थी, - वह फ़ौरन मल्वीना को देखने के लिए उतावला हो रहा था.

“सुनो,” वह हर पंद्रह सेकण्ड बाद पूछता, “बुरातिनो, क्या वह मुझे देखकर खुश होगी?

“मुझे क्या मालूम...”

पंद्रह सेकण्ड बाद फिर पूछता है:

“सुनो, बुरातिनो, और अगर उसे खुशी न हुई तो?

“मुझे क्या मालूम...”

आखिरकार उन्हें सफ़ेद घर दिखाई दिया, जिसके दरवाजों पर सूरज, चाँद औए सितारे बने हुए थे.

चिमनी से धुँआ निकल रहा था. उसके ऊपर एक छोटा सा, बिल्ली के सिर जैसा बादल तैर रहा था.

कुत्ता अर्तेमोन पोर्च पर बैठा था और रह रहकर बादल की तरफ़ देखकर भौंक रहा था.

बुरातिनो का नीले बालों वाली लड़की के पास लौटने का ज़रा भी मन नहीं था. मगर वह भूखा था और दूर से ही उबले हुए दूध की गंध सूंघ रहा था.

“अगर लड़की फिर से हमें पढ़ाने का निश्चय करे, तो दूध पी लेंगे, - और मैं किसी भी कीमत पर यहाँ नहीं रुकूंगा.”

इसी समय मल्वीना घर से बाहर आई. उसके एक हाथ में चीनी मिट्टी का कॉफी पॉट था और दूसरे में – कुकीज़ की डलिया.

अभी तक उसकी आखें रोई हुई लग रही थीं, - उसे यकीन था कि चूहे बुरातिनो को कोठरी से खीचकर ले गए और उसे खा गए थे.

वह रेत की पगडंडी पर गुड़ियों की मेज़ पर बैठी ही थी, कि नीले फूल हिलने लगे, उनके ऊपर सफ़ेद और पीली पत्तियों की तरह तितलियाँ उड़ने लगीं, और बुरातिनो और प्येरो प्रकट हुए.

मल्वीना ने अपनी आंखें इतनी चौड़ी खोलीं कि दोनों लकड़ी के लडके आराम से उनमें उछल सकते थे.

मल्वीना को देखते ही प्येरो अनाप-शनाप बडबडाने लगा, उसके शब्द इतने असंबद्ध और बेवकूफ़ी भरे थे, कि हम उन्हें यहाँ नहीं बताएंगे.

बुरातिनो ने इस तरह कहा, मानो कुछ हुआ ही न हो:

“ये, लो, मैं इसे ले आया, - इसे संभालो...”

मल्वीना आखिरकार समझ गई कि ये सपना नहीं है.

“आह, कैसी खुशी है!” वह फुसफुसाई, मगर फौरन बड़ों जैसी आवाज़ में आगे बोली: - “बच्चों, फौरन जाकर नहाओ और दांत साफ़ करो. अर्तेमोन, बच्चों को कुंए पर ले जाओ.”

“तूने देखा,” बुरातिनो बडबडाया, “उसके दिमाग़ में पागलपन है – नहाना, दांत साफ़ करना! दुनिया में हर कोई सफ़ाई से ही रहता है...”

फिर भी वे नहाए. अर्तेमोन ने अपनी पूंछ के पीछे बंधे हुए ब्रश से उनके जैकेट साफ़ किए...

मेज़ पर बैठे. बुरातिनो दोनों गालों में खाना भर रहा था. प्येरो ने केक का एक टुकड़ा भी नहीं चखा था; वह मल्वीना की तरफ़ ऐसे देख रहा था, जैसे वह बादाम के आटे से बनी हो. आखिर वह इससे उकता गई.

“अरे,” उसने उससे कहा, “आपने मेरे चेहरे पर ऐसा क्या देख लिया? शान्ति से नाश्ता कीजिए, प्लीज़.”

“मल्वीना,” प्येरो ने जवाब दिया, “मैं काफ़ी समय से कुछ भी नहीं खा रहा हूँ, मैं कवितायेँ रचता हूँ...”

बुरातिनो हंसी से थरथराने लगा.

मल्वीना को आश्चर्य हुआ और उसने फिर से आंखें पूरी खोल दीं.

“तो – अपनी कवितायेँ पढ़िए.”

अपने सुन्दर हाथ से उसने गाल पोंछा और अपनी ख़ूबसूरत आंखें बादल की ओर उठाईं, जो बिल्ली के सिर जैसा था.  

प्येरो ने इस तरह बिसूरते हुए कविता पढ़ना शुरू किया, जैसे वह गहरे कुएं के तल पर हो:

मल्वीना भाग गई पराए देस

मल्वीना खो गई , दुल्हन मेरी...

बिसूरता हूँ, नहीं जानता – कहाँ जाऊं...

क्या अलबिदा कहूं, गुड़ियों की ज़िंदगी को?

प्येरो पूरा पढ़ भी नहीं पाया, मल्वीना कविता की तारीफ़ भी नहीं कर पाई, जो उसे बहुत अच्छी लगी थी, कि रेत की पगडंडी पर भौंरा प्रकट हुआ.  

भयानक रूप से आंखें बाहर निकाल कर उसने बताया;

“आज रात को पागल कछुए तर्तीला ने कराबास बराबास को सुनहरी चाबी के बारे में सब कुछ बताया...”

मल्वीना भय से चिल्लाई, हांलाकि वह कुछ भी नहीं समझ पाई थी. सभी कवियों की तरह भुलक्कड़ प्येरो ने कुछ बेमतलब उद्गार प्रकट किये, जिन्हें हम यहाँ नहीं बताएँगे. मगर बुरातिनो फौरन उछला और उसने अपनी जेबों में बिस्कुट, शकर और मिठाई ठूंसना शुरू कर दिया.

“जितनी जल्दी हो, यहाँ से भाग जायेंगे. अगर पुलिस के कुत्ते कराबास बराबास को यहाँ ले आये – तो समझो हम मर गए.”

मल्वीना का चेहरा बदरंग हो गया, सफ़ेद तितली के पंख की तरह. प्येरो ने सोचा कि वह मर रही है, उस पर कॉफी पॉट गिरा दिया, और मल्वीना की बढ़िया ड्रेस पर कोको से ढँक गई .

ज़ोर से भौंकते हुए उछलकर अर्तेमोन ने, - क्योंकि उसे ही तो मल्वीना की ड्रेस धोनी पड़ती थी, प्येरो की कॉलर पकड़ ली और उसे हिलाने लगा, जब तक कि प्येरो ने तुतलाते हुए कह नहीं दिया:

“बस, बहुत हो गया, प्लीज़...”

भौंरा आंखें फाड़े इस गड़बड़ को देखता रहा और उसने फिर कहा:

“कराबास बराबास पुलिस के कुत्तों के साथ पंद्रह मिनट में यहाँ पहुँच जाएगा.”

मल्वीना कपड़े बदलने के लिए भागी. प्येरो बदहवासी से अपने हाथ नचा रहा था और उसने स्वयं को पीछे से रेत की पगडंडी पर फेंकने की कोशिश की. अर्तेमोन घरेलू सामान की थैलियाँ खीँच रहा था. दरवाज़े धडाम-धडाम कर रहे थे. कबूतर झाड़ी पर बैठे, बदहवासी से चिल्लाए जा रहे थे, गोरैयों ने ज़मीन से ऊपर उड़ान भरी. आतंक बढाने के लिए उल्लू जंगलीपन से अटारी के ऊपर ठहाके लगा रहा था. 

सिर्फ बुरातिनो ही परेशान नहीं था. उसने अर्तेमोन के ऊपर आवश्यक सामानों से भरे दो बैग लाद दिए. बैगों के ऊपर मल्वीना को बिठा दिया, जिसने बढ़िया सफ़र वाली ड्रेस पहनी थी. प्येरो को उसने कुत्ते की दुम पकड़े रहने का हुक्म दिया. खुद सामने खडा हो गया:

“घबराने की ज़रुरत नहीं है! चलो, भागें!”

जब वे – याने बुरातिनो, जो बहादुरी से कुत्ते के आगे आगे चल रहा था, मल्वीना, जो बैगों पर उछल रही थी, और पीछे पीछे प्येरो, जो सामान्य ज्ञान के बदले बेवकूफी भरी कविताओं से लबालब भरा था, - जब वे घनी घास से बाहर निकल कर एक समतल मैदान में आये, तो – जंगल से कराबास बराबास की उलझी हुई दाढ़ी दिखाई दी. उसने सूरज से बचने के लिए आंखों पर हथेली रखी थी और आसपास के नज़ारे को देख रहा था.  

18

जंगल के किनारे पर भयानक युद्ध

 

सिन्योर कराबास ने पुलिस के दो कुत्तों को पट्टे से पकड़ रखा था. समतल मैदान पर भगोड़ों को देखकर उसने अपना दांतेदार मुंह खोला.

“आहा!” वह चीखा और उसने कुत्तों को छोड़ दिया.

क्रूर कुत्ते पहले तो पिछले पंजों से मिट्टी कुरेदने लगे. वे गुर्राए भी नहीं, बल्कि वे दूसरी ही तरफ़ देख रहे थे, न कि भगोड़ों की ओर – इतना घमंड था उन्हें अपनी ताकत पर.

फिर कुत्ते धीरे धीरे उस जगह की ओर चले, जहां बुरातिनो, अर्तेमोन, प्येरो और मल्वीना खौफ़ से रुक गए थे.

ऐसा लगा कि सब ख़त्म हो गया है. कराबास बराबास टेढ़े पैरों से पुलिस के कुत्तों के पीछे चल रहा था. उसकी दाढी हर पल जैकेट की जेब से बाहर निकल जाती और पैरों के नीचे आ जाती और उनमें उलझ जाती थी.

अर्तेमोन ने अपनी पूंछ दबा ली और गुस्से से गुर्राने लगा. मल्वीना के हाथ थरथरा रहे थे:

“डर लग रहा है, डर लग रहा है!”

प्येरो ने आस्तीनें नीचे खींची और मल्वीना की तरफ़ देखा, उसे यकीन हो गया था कि सब कुछ ख़त्म हो गया है.

सबसे पहले बुरातिनो संभला.

“प्येरो,” वह चीखा, “लड़की का हाथ पकडो, तालाब के पास भागो, जहां हंस हैं!...अर्तेमोन, थैले उतार दो, घड़ी निकाल दो, - तुम लड़ोगे!...”

मल्वीना ने जैसे ही इस साहसी आदेश को सुना, वह अर्तेमोन की पीठ से कूद गई  और, अपनी ड्रेस उठाकर तालाब की ओर भागने लगी. प्येरो – उसके पीछे पीछे.

अर्तेमोन ने सामान की थैलियाँ फेंक दीं, पंजे से घड़ी उतार दी और पूंछ की नोक से फीता फेंक दिया. अपने सफ़ेद दांत दिखाए और दाएँ कूदा, बाएँ कूदा, अपनी मांसपेशियों को ठीक किया, और पिछले पैरों से मिट्टी फेंकने लगा.

बुरातिनो इटालियन देवदार के रालदार तने पर चढ़ गया, जो मैदान में अकेला खड़ा था, और वहां से चीखा, कराहा, और गला फाड़ कर चिल्लाया:

“जानवरों, पंछियों, कीड़ों! हमारे लोगों को मार रहे हैं! हम लकड़ी के बेगुनाह लोगों को बचाईये!...”

अर्तेमोन को देखते ही पुलिस के बुलडॉग उस पर लपके. चतुर कुत्ता मुडा और उसने एक कुत्ते की पूंछ का ठूंठ काट लिया और दूसरे को जांघ पर काट लिया.

बुलडॉग फूहड़पन से मुड़े और फिर से कुत्ते पर झपटे. वह ऊंचे उछला, उन्हें अपने नीचे से जाने दिया, और फिर से एक की कमर और दूसरे की पीठ को नोंच लिया.

बुलडॉग तीसरी बार उस पर लपके, तब अर्तेमोन पूंछ को नीचे लटकाकर मैदान में गोल गोल चक्कर लगाने लगा, कभी पुलिस कुत्तों को अपने पास आने देता तो कभी ठीक उनकी नाक के सामने एक किनारे कूद जाता...     

चपटी नाक वाले बुलडॉग्स को अब सचमुच में गुस्सा आ गया, वे सूंघ रहे थे, वे अर्तेमोन के पीछे बिना जल्दबाज़ी किये भाग रहे थे, ज़िद से, वे फुर्तीले कुत्ते के गले तक पहुँचने के बजाय मर जाना ज़्यादा अच्छा समझ रहे थे. 

इस बीच कराबास बराबास इटालियन देवदार के पास पहुंचा, उसने तने को पकड़ा और उसे झकझोरने लगा:                                                   

“नीचे उतर, नीचे उतर!”

बुरातिनो ने हाथों से, पैरों से, दांतों से टहनी को ऐसे कसकर पकड़ लिया, की टहनियों पर लटकते सभी शंकु हिलने लगे.

इटालियन देवदार के शंकु – नुकीले और भारी होते हैं, छोटे तरबूज जितने. ऐसे शंकु की चोट सिर पर झेलना – तो ओय-ओय!

बुरातिनो मुश्किल से हिलती हुई टहनी को पकड़े हुए था. उसने देखा कि अर्तेमोन ने अपनी लाल चीथड़े जैसी जीभ बाहर निकाली और धीरे धीरे भाग रहा है.   

“चाबी दे!” कराबास बराबास अपना जबड़ा खोलकर गरजा.    

बुरातिनो टहनी पर रेंगने लगा, एक मोटे शंकु तक पहुंचा और उसका डंठल चबाने लगा, जिस पर वह लटका हुआ था. कराबास बराबास ने उसे और ज़ोर से हिलाया, और भारी शंकु नीचे उड़ा – बाख! – सीधे उसके दांतेदार जबड़े में.

कराबास बराबास धम् से नीचे बैठ गया.

बुरातिनो ने दूसरा शंकु तोड़ा और वह – बाख! – धडाम् से कराबास बराबास के सिर पर गिरा, मानो ड्रम पर गिरा हो.

“हमारे लोगों को मार रहे हैं,” बुरातिनो फिर चिल्लाया. “बेगुनाह लकड़ी के इंसानों की मदद करो!”

सबसे पहले मदद करने के लिए आए उड़ते हुए स्विफ्ट पक्षी, - निचले स्तर पर उड़ते हुए उन्होंने बुलडॉग्स की नाक के सामने हवा को काटना शुरू कर दिया.

बुलडॉग्स बेकार ही दांत हिलाते रहे – स्विफ्ट पक्षी कोई मक्खी नहीं है: बिजली की भूरी कड़क के समान -  नाक की बगल से गुज़र गए!

बादल से, जो बिल्ली के सिर जैसा था, काली चील गिरी – वो, जो आम तौर से मल्वीना के लिए शिकार लाती थी; उसने पुलिस के कुत्ते की पीठ में पंजे चुभो दिए, अपने शानदार पंखों पर चढ़ गई, कुत्ते को उठाया और उसे छोड़ दिया...

कुत्ता, चीखते हुए, पंजे ऊपर किये धडाम् से ढेर हो गया.

अर्तेमोन एक किनारे से दूसरे कुत्ते पर उछला, उसे अपने सीने से मारा, गिरा दिया, काटा, उछल कर दूर हट गया...

और फिर से मैदान में इकलौते देवदार के पेड़ के चारों ओर अर्तेमोन और उसके पीछे पस्त, नोंचे गए पुलिस के कुत्ते भागने लगे.

अर्तेमोन की मदद के लिए दो मेंढक आये. वे दो सांपों को खींच रहे थे, जो बुढापे के कारण अंधे हो गए थे. सांपों को तो वैसे भी मरना ही था – चाहे सड़े हुए तने के नीचे, या बगुले के पेट में. मेंढकों ने उन्हें एक शानदार मौत मरने के लिए मनाया.

शानदार अर्तेमोन ने अब खुल्लम खुल्ला लड़ाई में शामिल होने का फैसला कर लिया.

वह अपनी पूंछ पर बैठ गया, दांत दिखाने लगा.

बुलडॉग उस पर झपटे, और वे तीनों ही गेंद जैसे लुढ़कने लगे.  

अर्तेमोन अपने जबड़े किटकिटा रहा था, पंजों से लड़ रहा था. बुलडॉग घावों और खरोंचों पर ध्यान दिए बिना, एक बात की प्रतीक्षा कर रहे थे : अर्तेमोन के गले तक पहुंचने की – खतरनाक पकड़ के साथ. पूरा मैदान आहों और कराहों से भर गया था.

अर्तेमोन की सहायता के लिए साही का परिवार आया: खुद साही, साही की बीबी, साही की सास, साही की दो अविवाहित बुआएं और साही के नन्हे पिल्ले.

सुनहरे लबादों में मोटे काले-मखमली भौंरे उड़ रहे थे, गुस्सैल बरैया अपने पंखों से फ़ुफकार रही थीं. मिट्टी के कीड़े और लम्बी मूंछों वाले काटने वाले कीड़े रेंग रहे थे.

सारे जानवर, पंछी और कीटक निःस्वार्थ भाव से पुलिस के घृणित कुत्तों पर टूट पड़े.      

साही, साही की बीबी, साही की सास, साही की दो अविवाहित बुआएं और साही के नन्हे पिल्ले गोल-गोल होकर क्रोकेट बॉल की रफ्तार से अपनी सुईयों से बुलडॉगों के थोबड़ों पर मार रहे थे.

मक्खियाँ और भंवरे तेज़ी से उड़कर आते और उन्हें ज़हरीले डंक मारते. गंभीर चीटियां आराम से उनकी नाकों में घुस जातीं और वहां ज़हरीला फॉर्मिक  एसिड छोड़तीं.

 जमीनी भँवरे और खटमल नाभि पर काट रहे थे.

 चील कभी एक कुत्ते को चोंच मारती, तो कभी दूसरे की खोपड़ी पर टेढ़ी चोंच मारती.

तितलियां और मक्खियां घना काला बादल बनकर उनकी आंखों के सामने छा गईं, जिससे रोशनी धुंधली हो गई.

मेंढकों ने दो सांपों को तैयार रखा जो शहीद होने के लिए तैयार थे.             

और जब एक बुलडॉग ने अपना जबड़ा चौड़ा खोला, जिससे कि चींटियों का फॉर्मिक एसिड बाहर उगल दे, तो अंधा बूढ़ा सांप सिर के बल उछल कर उसके गले के सामने आया और स्क्रू की तरह अन्ननलिका में घुस गया. ऐसा ही दूसरे बुलडॉग के साथ भी हुआ : दूसरा अंधा सांप उसके जबड़े की ओर लपका. दोनों कुत्ते फटेहाल, खरोचों के साथ, हांफते हुए असहाय ज़मीन पर लुढ़कने लगे. भला अर्तेमोन युद्ध में विजयी हुआ.

इस बीच कराबास बराबास ने आखिरकार अपने विशाल मुंह से कंटीले शंकु को बाहर निकाल दिया.

सिर पर मार लगने की वजह से उसकी आंखें बाहर निकल आई थीं. लड़खड़ाते हुए, उसने फिर से इटालियन देवदार के तने को पकड़ लिया. हवा उसकी दाढ़ी को उड़ा रही थी.

बुरातिनो ने, बिल्कुल ऊपर बैठे बैठे गौर किया कि कराबास बराबास की दाढ़ी का सिरा, जो हवा के कारण ऊपर उठा हुआ था, राल वाले तने से चिपक गया है.

बुरातिनो एक टहनी पर लटक गया और, चिढ़ाते हुए चिल्लाया:

“चचा, नहीं पकड़ पाओगे, चचा, नहीं पकड़ पाओगे!...”

वह ज़मीन पर कूदा और चीड़ के चारों ओर भागने लगा. कराबास बराबास, लड़खड़ाते हुए, हाथ फैलाए, ताकि बच्चे को पकड़ सके, पेड़ के चारों ओर उसके पीछे दौड़ने लगा.

एक बार भागा, ऐसा लगा कि उसने अपनी टेढ़ी मेढ़ी उँगलियों से छिटक गए बच्चे को पकड़ लिया, दूसरी बार भागा, तीसरी बार भागने के बाद...उसकी दाढ़ी तने के चारों ओर लिपट गई , राल से पक्की चिपक गई.

जब दाढ़ी समाप्त हो गई और कराबास बराबास नाक के बल पेड़ का आधार ले रहा था, तो बुरातिनो ने उसे लम्बी जीभ दिखाई और हंसों वाले तालाब की ओर भागा – मल्वीना और प्येरो को ढूँढने के लिए. बदहाल अर्तेमोन तीन पंजों पर, चौथे को मोड़े हुए, लंगड़ाते हुए उनके पीछे चलने लगा.

मैदान में पुलिस के दो कुत्ते रह गए, जिनकी ज़िंदगी के लिए, ज़ाहिर है, एक मरी हुई सूखी मक्खी भी नहीं दी जा सकती थी, और परेशान गुडिया विज्ञान का डॉक्टर सिनीऑर कराबास बराबास, जिसकी दाढ़ी इटालियन देवदार से पक्की चिपक गई थी.               

     

19

गुफ़ा में

मल्वीना और प्येरो सरकंडों के बीच एक नम, गर्म टीले पर बैठे थे. मकड़ी के जाल ने उन्हें ऊपर से ढांक दिया था, जो अटा पडा था पतंगों के पंखों, और बेहाल मच्छरों से.

छोटे छोटे नीले पंछी, जो एक टीले से दूसरे पर उड़ रहे थे, प्रसन्न अचरज से फूट फूट कर रोती हुई बच्ची को देख रहे थे.

दूर से हताशापूर्ण सिसकियाँ और चीखें सुनाई दे रही थीं, - ये अर्तेमोन और बुरातिनो थे, ज़ाहिर है, उन्होंने अपने जीवन की बहुत बड़ी कीमत लगाई थी.

“डर लग रहा है, डर लग रहा है!” मल्वीना बार बार दुहरा रही थी और हताशा से बर्डोक के पत्ते से अपना मुंह ढांक रही थी. 

प्येरो अपनी कविता से उसे सांत्वना देने की कोशिश कर रहा था :

 

बैठे हैं हम टीले पर,

जहां खिलते हैं फूल, -

पीले, प्यारे,

बेहद खुशबू वाले.

गुजारेंगे पूरी गर्मियां

हम इसी टीले पर,

आह – एकांत में,

सबको चकित करते हुए...

मल्वीना उस पर पांव पटकने लगी:

“आपने मुझे बेज़ार कर दिया, बेज़ार कर दिया है, बच्चे! ताज़ा फूल तोड़ो, - देख तो रहे हो, कि ये पूरा गीला है और इसमें छेद हैं.”

अचानक दूर से शोर और चीखें रुक गईं, मल्वीना ने धीरे से हाथ हिलाए:

“अर्तेमोन और बुरातिनो मर गए...”   

और वह मुंह के बल टीले से हरी काई में कूद गई.

प्येरो उसके चारों ओर बेवकूफी से लड़खड़ा रहा था. हवा बांसों से गुज़रते हुए हौले हौले सीटी बजा रही थी. आखिरकार कदमों की आहट सुनाई दी. निःसंदेह ये कराबास बराबास चल रहा था, जिससे मल्वीना और प्येरो को बेदर्दी से पकड़कर अपनी अंतहीन जेबों में डाल दे. बांस दूर दूर हो गए, - और बुरातिनो प्रकट हुआ: नाक ऊपर को उठी हुई, मुंह कानों तक खींचा हुआ. उसके पीछे पीछे लंगडाते हुए चल रहा था अर्तेमोन, दो थैलियों के बोझ से बेहाल....

“और, - मुझसे लड़ाई करना चाहते थे!” मल्वीना और प्येरो की प्रसन्नता पर ध्यान दिए बिना बुरातिनो ने कहा, - “मेरे लिए बिल्ली क्या, लोमड़ी क्या, पुलिस के कुत्ते क्या, और खुद कराबास बराबास भी क्या – थू! बच्ची, कुत्ते की पीठ पर चढ़ जा, बच्चे, पूंछ पकड़ ले. चलें...”

कुहनियों से बांस हटाते हुए वह बहादुरी से टीलों पर चल पडा - तालाब का चक्कर लगाते हुए उस पार...

मल्वीना और प्येरो उससे पूछने की हिम्मत भी न कर सके कि पुलिस के कुत्तों के साथ लड़ाई कैसे ख़त्म हुई और कराबास बराबास उनका पीछा क्यों नहीं कर रहा है.

जब तालाब के दूसरे किनारे पर पहुंचे, तो भला अर्तेमोन कराहने और चारों पंजों पर लंगड़ाने लगा. उसकी ज़ख्मों पर पट्टी बांधने के लिए रुकना ज़रूरी था. पथरीली चट्टान पर खड़े चीड़ की विशाल जड़ों के नीचे, उन्होंने एक गुफ़ा देखी. वहां सभी गांठों को घसीटा और उसीमें अर्तेमोन भी रेंग गया. शानदार कुत्ते ने पहले अपने हरेक पंजे को जीभ से चाटा फिर उसे मल्वीना के आगे बढ़ा दिया. बुरातिनो ने मल्वीना की पुरानी कमीज़ फाड़कर पट्टियां बना दीं, प्येरो उन्हें पकड़े रहा, मल्वीना ने पंजों पर पट्टियां बाँध दीं.

पट्टियां बांधने के बाद अर्तेमोन को थर्मामीटर लगाया गया, और कुत्ता शान्ति से सो गया.

बुरातिनो ने कहा,
“प्येरो
, तालाब पर जा, पानी ले आ.”

प्येरो आज्ञाधारक की भांति चल पड़ा, कवितायेँ गुनगुनाते हुए और ठोकर खाते हुए, रास्ते में उसने ढक्कन खो दिया, मुश्किल से चायदानी की तली में पानी लाया.

बुरातिनो ने कहा:

“मल्वीना, भागकर जा और अलाव के लिए टहनियां ले आ.”

मल्वीना ने हिकारत से बुरातिनो की ओर देखा, कंधा उचकाया – और कुछ सूखे डंठल ले आई.

बुरातिनो ने कहा:

“ ये है सज़ा, इन शरीफ़ लोगों के साथ...”

वह खुद पानी लाया, खुद ही टहनियां और चीड़ के शंकु इकट्ठा किये, गुफा के प्रवेशद्वार के पास अलाव जलाया, जो इतना शोर मचा रहा था, कि ऊँचे देवदार की टहनियां झूलने लगीं...खुद ही पानी में कोको बनाया.

“तैयार है! अब नाश्ते के लिए आ जाओ...”

अपने होंठ भींचे, मल्वीना पूरे समय चुप थी. मगर अब, उसने दृढता से, बड़ों जैसी आवाज़ में कहा:

“ऐसा न सोचना, बुरातिनो, कि अगर तुमने कुत्तों से लड़ाई की और जीत गए, हमें कराबास बराबास से बचाया और उसके बाद भी बहादुरी से काम करते रहे, तो तुम्हें खाने से पहले हाथों और दांतों को साफ़ करने से छुट्टी मिल जायेगी...”

बुरातिनो बैठा रह गया : ये लो!” उसने दृढ चरित्र वाली लड़की की ओर आंखें निकाल कर देखा.

मल्वीना गुफा से बाहर निकली और उसने ताली बजाई:

“तितलियों, इल्लियों, भौंरों, मेंढकों....”

एक मिनट भी नहीं बीता, कि बड़ी बड़ी तितलियां उड़ती हुई आ गईं, जो फूलों के पराग से ढंकी थीं. रेंगते हुए इल्लियां और गोबर की गंभीर मक्खियां भी आ पहुँची. पेट पर टपटपाते मेंढक भी आ गए...  

तितलियाँ, पंखों से आहें भरते हुए, गुफ़ा की दीवारों पर बैठ गईं, ताकि भीतर सुन्दर लगे और गिरती हुई मिट्टी खाने की चीज़ों में न गिरे.

गोबर के भौंरे गुफ़ा के फर्श से पूरे कचरे को गेंद की तरह गोल गोल घुमाते हुए बाहर ले गए और उसे दूर फेंक दिया.

मोटी सफ़ेद इल्ली बुरातिनो के सिर पर चढ़ गई  और, उसकी नाक से लटकते हुए, उसके दांतों पर थोड़ी पेस्ट गिरा दी. चाहो, ना चाहो, दांतों को साफ़ करना ही पडा.

दूसरी इल्ली ने प्येरो के दांत साफ़ कर दिए.

एक उनींदा बिज्जू प्रकट हुआ, जो झबरे सूअर की तरह लग रहा था. ..उसने अपने पंजे से भूरी इल्लियों को उठाया, उन्हें दबाकर जूतों पर भूरी पेस्ट निकाली और अपनी पूंछ से जूतों के तीनों जोड़े बढ़िया साफ़ कर दिए – मल्वीना के, बुरातिनो के और प्येरो के. साफ़ करके उसने उबासी ली:

“आ-हा-हा” – और ठुमकते हुए चला गया.         

एक हंसमुख, चुलबुला चटकीला हूपो (एक पक्षी- अनु,) लाल कलगी के साथ उड़ते हुए आया, जो सीधी खड़ी हो जाती थी, जब वह किसी बात से हैरान हो जाता.

“किसके बाल बनाने हैं?

“मेरे,” मल्वीना ने कहा. “बालों में कंघी करो और उन्हें घुंघराले बना दो, मैं अव्यवस्थित हूँ...”

“मगर आईना कहाँ है? सुनो, प्यारी...”

तब बाहर निकली आंखों वाले मेंढकों ने कहा:

“हम लाएंगे...”

दस मेंढक पेट के बल तालाब की ओर भागे. दर्पण के बदले वे दर्पण जैसी कार्प मछली को घसीटते हुए लाये, जो इतनी मोटी और उनींदी थी कि उसे पंखों से खींचते हुए कहाँ घसीट रहे हैं, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था. कार्प को मल्वीना के सामने पूंछ पर रखा गया. ताकि उसका दम न घुट जाए, उसके मुंह में केतली से पानी उंडेला गया. नखरेबाज हूपो ने मल्वीना के बालों को घुंघराले बनाकर उनमें कंघी कर दी. सावधानी से दीवार से एक तितली ली और उससे बच्ची की नाक पर पावडर लगा दिया.

“हो गया, प्यारी...”

और – फुर्रर्रर्र! चटकीली गेंद के समान वह गुफ़ा से बाहर उड़ गया.   

मेंढक दर्पण जैसी कार्प मछली को वापस तालाब ले गए. बुरातिनो और प्येरो ने – चाहो, न चाहो – हाथ दो लिए और गर्दन भी. मल्वीना ने नाश्ता करने की इजाज़त दे दी.

नाश्ते के बाद, घुटनों से टुकड़ों को झटक कर, उसने कहा:

“बुरातिनो, मेरे दोस्त, पिछली बार हम और तुम डिक्टेशन पर रुके थे. पाठ आगे बढ़ाते हैं....”

बुरातिनो का मन हुआ कि गुफ़ा से बाहर कूद जाए – जहां सींग समाएं. मगर अपने असहाय साथियों और बीमार कुत्ते को तो छोड़ा नहीं जा सकता था! वह बुदबुदाया:

“लिखने का सामान नहीं लाये हैं...”

“झूठ है, लाये हैं,” अर्तेमोन कराहा. वह थैली तक रेंग गया, दांतों से उसे खोला और स्याही की दावात, पेन्सिल बॉक्स, नोट बुक और छोटा सा ग्लोब भी बाहर निकाला.

कलम को नोक के बिल्कुल नज़दीक से न पकड़ें, वरना आपकी उँगलियों पर स्याही लग जायेगी,” – मल्वीना ने कहा. उसने अपनी ख़ूबसूरत आंखें गुफ़ा की छत पर तितलियों की ओर उठाईं और...

इसी समय टहनियों की सरसराहट और असभ्य आवाज़ें सुनाई दीं, - गुफ़ा के पास से औषधीय जोंकों का विक्रेता दुरेमार और पैरों को घसीटता कराबास बराबास जा रहे थे.

गुड़ियों के थियेटर के डाइरेक्टर के माथे पर बड़ी लाल गाँठ थी, उसकी नाक सूज गई थी, दाढी – उलझ गई थी  और डामर से पुती हुई थी.

आहें भरते हुए और थूकते हुए वह बोला:

“वे ज़्यादा दूर तक नहीं भागे होंगे. वे यहीं कहीं, जंगल में ही हैं.”

बुरातिनो हर हाल में कराबास बराबास से सुनहरी चाबी का भेद उगलवाना चाहता था.

कराबास बराबास और दुरेमार धीरे धीरे गुफा के सामने से गुज़ारे.

मैदान में हुई लड़ाई के समय औषधीय जोंकों का विक्रेता डर के मारे झाड़ी के पीछे छुप गया था. जब सब कुछ समाप्त हो गया, तो उसने इंतज़ार किया, जब तक कि अर्तेमोन और बुरातिनो घनी घास में छुप न गए, और तभी बड़ी मुश्किलों से उसने इटालियन चीड़ के तने से कराबास बराबास की दाढ़ी को खींच कर अलग किया.

“तो, बच्चे ने तुम्हारी अच्छी खबर ली!” दुरेमार ने कहा. “आपको अपनी खोपडी पर दो दर्जन सबसे बढ़िया जोंकें रखनी होंगी....”

कराबास बराबास चीखा:

“एक सौ हज़ार शैतान! चलो, उन शैतानों का पीछा करें!...”

कराबास बराबास और दुरेमार भगोड़ों को ढूँढने निकले. उन्होंने हाथों से घास को हटाया, हर झाड़ी को अच्छी तरह देखा, हर टीले को टटोला.

उन्होंने बूढ़े चीड़ की जड़ों के पास अलाव का धुआं देखा, मगर उनके दिमाग में भी यह बात न आई, कि इस गुफा में लकड़ी के इंसान छुपे हैं और उन्होंने अलाव भी जलाया है. 

“इस बदमाश बुरातिनो के कलम वाले चाकू से टुकडे टुकडे कर दूंगा!” कराबास बराबास बडबडाया. 

 

  

20

 

भगोड़े गुफा में छुप गए.

 

   अब क्या करें? भाग जाएँ? मगर पट्टियां बंधा हुआ अर्तेमोन गहरी नींद सो रहा था. कुत्ते को चौबीस घंटे सोना चाहिए था, ताकि उसके घाव भर जाएं.

क्या भले कुत्ते को गुफ़ा में अकेला छोड़ दिया जाए?

नहीं, नहीं, बचना है – तो सबको एक साथ, मरना है – तो सबको एक साथ...

बुरातिनो, प्येरो और मल्वीना, गुफ़ा की गहराई में, अपनी नाकें नीची किये, बड़ी देर तक विचार विमर्श करते रहे. ये फैसला किया : सुबह तक यहीं इंतज़ार किया जाए, गुफ़ा के प्रवेश द्वार को टहनियों से ढांक दिया जाए और जडी-बूटी से ठीक होने के लिए अर्तेमोन को पौष्टिक काढ़ा दिया जाए. बुरातिनो ने कहा:

“चाहे कुछ भी हो जाए, मैं कराबास बराबास से ये जानना चाहता हूँ, कि वो दरवाज़ा कहाँ है, जो सुनहरी चाबी से खुलता है. दरवाज़े के पीछे कोई ग़ज़ब की, आश्चर्यजनक चीज़ सुरक्षित रखी हुई है...और वह हमारे लिए खुशनसीबी लायेगी.”

“आपके बगैर रहने में डर लग रहा है, डर लग रहा है,” मल्वीना के कराहते हुए कहा.

“और आपको प्येरो की क्या ज़रुरत है?

“आह, वह सिर्फ कवितायेँ पढ़ता है...”

“मैं मल्वीना की हिफ़ाज़त करूंगा, शेर की तरह,” प्येरो भर्राई आवाज़ में बोला, जैसे शिकारी बोलते हैं, - “आप मुझे अभी तक नहीं जानते हैं...”

“शाबाश, प्येरो, मुझे बहुत खुशी है!”

और बुरातिनो कराबास बराबास के पीछे भागा.

उसने जल्दी ही उन्हें देख लिया. गुड़ियों के थियेटर का डाइरेक्टर नदी के किनारे पर बैठा था, दुरेमार ने उसके घूमड़ पर औषधी पत्तों का लेप लगा दिया था. दूर से ही कराबास बराबास के खाली पेट में भयानक गड़गड़ाहट ओर औषधीय जोंकों के विक्रेता के खाली पेट में उबाऊ चीखें सुनाई दे रही थीं.   

“सिन्योर, हमें कुछ खा-पी लेना चाहिए,” – दुरेमार कह रहा था, “बदमाशों की तलाश देर रात तक खिंच सकती है.”

“मैं तो अभ्भी पूरा सूअर और दो बत्तखें खा जाऊंगा,” कराबास बराबास ने उदास होकर जवाब दिया.

दोस्त “थ्री मिन्नोज़” सराय की तरफ़ चल पड़े – उसका बोर्ड पहाडी पर दिखाई दे रहा था. मगर कराबास बराबास और दुरेमार से भी पहले बुरातिनो वहां पहुँच गया, घास की तरफ़ झुकते हुए, ताकि उसे देख न लें.      

सराय के दरवाज़े के पास बुरातिनो दबे पांव एक बड़े मुर्गे की ओर आया, जिसने कोई दाना या मुर्गी की आंत का टुकड़ा पाकर गर्व से अपनी लाल कलगी को झटका, पंजे हिलाए और जोश से मुर्गियों को दावत के लिए बुलाया:

“को-को-को!”

बुरातिनो ने अपनी हथेली पर बादाम केक के टुकड़े रखकर उसकी तरफ़ बढाए:

“नोश फरमाईये, सिन्योर कमांडर इन चीफ़.”

मुर्गे ने कड़ी नज़र से लकड़ी के बच्चे की ओर देखा, मगर वह अपने आप को रोक नहीं पाया और उसकी हथेली पर चोंच मारी.

“को-को-को!...”

“सिन्योर कमांडर इन चीफ़, मुझे सराय तक जाना है, मगर इस तरह, कि मालिक मुझे न देखे. मैं आपकी शानदार रंगबिरंगी पूंछ के पीछे छुप जाऊंगा, और आप मुझे सीधे भट्टी तक ले चलिए. ठीक है?

“को-को!” और भी ज़्यादा गर्व से मुर्गे ने जवाब दिया.

उसे कुछ भी समझ में नहीं आया था, मगर ऐसा न दिखाने के लिए, कि वह कुछ भी नहीं समझा है, शान से सराय के खुले दरवाज़े की ओर चल पडा. बुरातिनो ने किनारों से उसे पंखों के नीचे पकड़ लिया, उसकी पूंछ से खुद को ढांक लिया, और उकडू बैठकर किचन तक पहुँच गया, सीधे भट्टी के पास, जहां सराय का गंजा मालिक आग पर चमचे और फ्रायिंग पैन को आग पर घुमा रहा था.   

भाग जा, बासे शोरवे के मांस!” मालिक मुर्गे पर चिल्लाया और उसे इतनी जोर से लात मारी कि मुर्गा – कू-दाख-ताख-ताख!” बदहवासी से चीखते हुए बाहर रास्ते पर खूब घबराई हुई मुर्गियों की ओर उड़ गया.

बुरातिनो, बिना किसी की नज़र पड़े मालिक के पैरों के पास से फिसल गया और बड़ी मिट्टी की सुराही के पीछे बैठ गया.

तभी कराबास बराबास और दुरेमार की आवाजें सुनाई दीं.

मालिक नीचे झुकते हुए उनसे मिलने गया.

बुरातिनो मिट्टी की सुराही में रेंग गया और वहां छुप गया.

 

 

21

बुरातिनो सुनहरी चाबी का रहस्य जान जाता है.

 

कराबास बराबास और दुरेमार तले हुए पिगलेट को खाकर तृप्त हो गए. मालिक ने गिलासों में वाईन डाली.

कराबास बराबास ने पिगलेट की टांग चूसते हुए मालिक से कहा:

“बकवास वाइन है तेरी, उस सुराही से डालो!” और उसने हड्डी से सुराही की ओर इशारा किया, जिसमें बुरातिनो बैठा था.       

तब मालिक ने सुराही उठाई और उसे उलट दिया. बुरातिनो ने पूरी ताकत से कोहनियों को सुराही के किनारों पर टिका दिया, ताकि बाहर न गिर जाए.

“वहां कुछ-कुछ काला सा है,” कराबास बराबास भर्राया.

“वहां कुछ कुछ सफ़ेद सा है,” दुरेमार ने पुष्टि की.

“सिन्योर, मेरी जुबान काट दो, मेरी कमर में गोली मार दो – सुराही खाली है!”

“तो, उसे यहाँ मेज़ पर रख दे – हम उसमें हड्डियां डालते जायेंगे.”

सुराही, जिसमें बुरातिनो बैठा था, गुड़ियों के थियेटर के डाइरेक्टर और औषधीय जोंकों के विक्रेता के बीच में रखी गई . बुरातिनो के सिर पर कुतरी हुई हड्डियां और छिलके गिर रहे थे.

बहुत सारी वाईन पीने के बाद कराबास बराबास ने भट्टी की आग की तरफ़ दाढी फैला दी, ताकि उससे चिपकी हुई राल टपक जाए.

“बुरातिनो को हथेली पर रखूंगा,  - उसने शेखी मारते हुए कहा, “दूसरी हथेली से झापड़ मारूंगा, - उसके नीचे गीला हो जाएगा.”    

“बदमाश पूरी तरह इसी के काबिल है,” दुरेमार ने पुष्टि की, “मगर पहले उस पर अच्छी तरह से जोंकें चिपकाई जाएं, जिससे वे उसका पूरा खून सोख लें...”

“नहीं!” कराबास बराबास ने मुट्ठी मारते हुए कहा, “पहले मैं उसके पास से सुनहरी चाबी छीनूंगा...”

मालिक भी बातचीत में शामिल हो गया, - उसे लकड़ी के नन्हे-नन्हे लोगों के पलायन के बारे में पहले से ही पता चल गया था.

“सिन्योर, आपको खोजने की तकलीफ़ उठाने की कोई ज़रुरत नहीं है. मैं अभी दो फुर्तीले छोकरों को बुलाता हूँ, - जब तक आप वाईन पीकर तरोताज़ा होते हैं, वे फुर्ती से सारा जंगल छान मारेंगे और बुरातिनो को घसीटते हुए यहाँ ले आयेंगे.

“अच्छा. भेजो छोकरों को,” कराबास बराबास ने अपने भारी भरकम तलवों को आग के सामने रखते हुए कहा. और चूंकि वह नशे में धुत हो गया था, तो गला फाड़कर गाना गाने लगा:

 

मेरे लोग हैं अजीब,

बुद्धू, काठ का,

गुड़ियों का मालिक,

ऐसा हूँ मैं, चलो भी ...

खतरनाक करबास,

शानदार बरबास...

गुड़िया मेरे सामने

बिछ जातीं जैसे घास.

चाहे हो तुम सुन्दर

मेरे पास है चाबुक,

चाबुक सात पूंछों वाला,

चाबुक सात पूंछों वाला.

जैसे ही हिलाऊंगा कोड़ा –

मेरे लोग हैं नम्र

खूब गायेंगे गाने,

जमा करेंगे पैसे

मेरी बड़ी जेब में,

मेरी बड़ी जेब में...

 

तब बुरातिनो ने सुराही की गहराई से गरजती हुई आवाज़ में बोला: ‘भेद खोल, अभागे, भेद खोल!...”

कराबास बराबास ने आश्चर्यचकित होकर अपने जबड़े किटकिटाए और आंखें निकालते हुए दुरेमार की ओर देखा.

“क्या ये तुम हो?”

“नहीं, ये मैं नहीं था...”

“तो फिर किसने कहा, कि मैं रहस्य खोल दूं?

दुरेमार अन्धविश्वासी था, इसके अलावा, उसने बहुत सारी वाईन भी पी ली थी. डर के मारे उसका चेहरा नीला पड़ गया और उस पर झुर्रियां पड़ गईं, खुरदुरे मशरूम की तरह. उसकी तरफ़ देखते हुए कराबास बराबास भी दांत किटकिटाने लगा. 

“रहस्य खोल,” सुराही की गहराई से फिर से भेदभरी आवाज़ चीखी, “वरना तू इस कुर्सी से उठ नहीं पायेगा, अभागे!”

कराबास बराबास ने उछलने की कोशिश की, मगर वह थोड़ा सा भी उठ नहीं पाया.

“कै-कै-कैसा रा-रह-रहस्य?” उसने हकलाते हुए पूछा.

आवाज़ ने जवाब दिया:

“कछुए तर्तीला का रहस्य.”

डर के मारे दुरेमार धीरे धीरे मेज़ के नीचे रेंग गया. कराबास बराबास का जबड़ा गिर गया. 

“दरवाज़ा कहां है, दरवाज़ा कहां है?”- शरद ऋतु की रात में पाईप में गूँजती हुई हवा के समान आवाज गरजी...

“बताता हूँ, बताता हूँ, चुप हो जा, चुप हो जा!” कराबास बराबास फुसफुसाया. “दरवाज़ा – बूढ़े कार्लो की कोठरी में है, चित्र बनी हुई चिमनी के पीछे...”

उसने ये शब्द कहे ही थे, कि आंगन से मालिक भीतर आया. 

“ये हैं वफ़ादार छोकरे, पैसों के लिए, सिन्योर, वे आपके पास शैतान को भी ले आयेंगे...”

और उसने दरवाज़े में खड़ी लोमड़ी अलीसा और बिल्ले बज़ीलियो की ओर इशारा किया. लोमड़ी ने आदर से पुरानी हैट उतार दी:

“सिन्योर कराबास बराबास आपको गरीबी के कारण दस सोने के सिक्के देंगे, और हम आपके हाथों में बदमाश बुरातिनो को सौंप देंगे, इस जगह से बिना हिले.”

कराबास बराबास ने दाढ़ी के नीचे जैकेट की जेब में हाथ डाला, दस सोने के सिक्के निकाले.

“ये रहे पैसे, मगर बुरातिनो कहां है?

लोमड़ी ने कई बार सिक्के गिने, गहरी सांस ली, आधे बिल्ले को दिए, और पंजे से इशारा किया;

“वो इस सुराही में है, सिन्योर, आपकी नाक के नीचे...”

कराबास बराबास ने मेज़ से सुराही उठाई और तैश में उसे पत्थर के फर्श पर तोड़ दिया. सुराही के टुकड़ों और कुतरी हुई हड्डियों के ढेर से बुरातिनो बाहर उछला. जब तक सब मुंह खोले खड़े थे, वह, तीर की तरह, सराय से आंगन में भागा – सीधे मुर्गे की ओर, जो बड़ी देर से गर्व से कभी एक आंख से तो कभी दूसरी आंख से मरे हुए कीड़ों को देख रहा था.

“तो, ये तूने मुझे धोखा दिया है, सड़े हुए खीमे!” तैश में नाक बाहर निकालते हुए बुरातिनो ने उससे कहा. “अब अपनी पूरी ताकत से मुझे नोंचो...”

और वह उसकी शानदार पूंछ से कसकर चिपक गया. मुर्गे को कुछ भी समझ में नहीं आया, वह पंख फैलाकर अपनी लम्बी टांगों से भागने लगा. बुरातिनो – तैश में – उसके पीछे, - टीले के नीचे, रास्ते से होकर, खेत से, जंगल की ओर.

कराबास बराबास, दुरेमार और सराय का मालिक आखिरकार अचरज से होश में आये और बुरातिनो के पीछे भागे. मगर उन्होंने चाहे कितनी ही नज़र इधर उधर दौड़ाई, वह कहीं भी दिखाई नहीं दिया, सिर्फ दूर खेत में मुर्गा पूरी ताकत से खेत पार कर रहा था. मगर चूंकि सबको मालूम था कि वह बेवकूफ़ है, तो उस मुर्गे पर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया.   

22

बुरातिनो जीवन में पहली बार हताश होता है, मगर सब कुछ अच्छी तरह समाप्त हो जाता है.

 

बेवकूफ़ मुर्गा पस्त हो गया, अपनी चोंच खोले, वह मुश्किल से भाग रहा था. बुरातिनो ने आखिरकार उसकी मरोड़ी हुई पूंछ छोड़ दी.

“जा, जनरल, अपनी मुर्गियों के पास भाग...”

और अकेला ही चल पड़ा उस ओर जहां पत्तों के बीच से हंसों का तालाब चमक रहा था.

ये रहा चट्टानी पहाड़ी पर देवदार का पेड़, और ये रही गुफा. चारों ओर टूटी हुई टहनियां बिखरी हैं. घास पहियों के निशानों से कुचली हुई है.

बुरातिनो का दिल तेज़ी से धड़कने लगा. वह पहाड़ी से कूद गया, मुड़ी हुई जड़ों के नीचे देखा...

गुफ़ा खाली थी!!!

न तो मल्वीना थी, न प्येरो, ना ही अर्तेमोन.  

सिर्फ दो चीथड़े पड़े थे. उसने उन्हें उठाया,- ये प्येरो की कमीज़ की फटी हुई आस्तीनें थीं.

दोस्तों का किसी ने अपहरण कर लिया है! वे मर चुके हैं! बुरातिनो मुंह के बल गिर गया – उसकी नाक ज़मीन में गहरे धंस गई.

वह केवल अभी समझ पाया था, कि दोस्त उसे कितने प्यारे हैं. मल्वीना चाहे पढ़ाने का काम करती रहे, प्येरो हज़ारों बार निरंतर कविताएँ सुनाता रहे, - बुरातिनो अपने दोस्तों को फिर से देखने के लिए सुनहरी चाबी भी दे देता.

उसके सिर के पास खामोशी से मिट्टी का एक मुलायम टुकड़ा उठा, गुलाबी हथेलियों वाला रोंएदार चूहा रेंगकर बाहर निकला, तीन बार छींककर उसने कहा:

“मैं अंधा हूँ, मगर मैं बढ़िया सुन सकता हूँ. यहाँ एक गाड़ी आई थी, जिसे भेडें खींच रही थीं. उसमें बैठा था लीस, ‘मूर्खों के शहर का गवर्नर, और जासूस. गवर्नर ने हुक्म दिया:

“उन बदमाशों को गिरफ्तार किया जाए, जिन्होंने ड्यूटी करते हुए मेरे सर्वश्रेष्ठ पुलिसवालों को पीटा! गिरफ्तार करो! जासूसों ने जवाब दिया:

“त्याफ!”      

गुफ़ा के भीतर लपके, और वहां बेतहाशा हाथापाई शुरू हो गई . तुम्हारे दोस्तों को बाँध दिया, गठरियों समेत गाड़ी में डाल दिया, और चले गए.

नाक ज़मीन में घुसाए पड़े रहने में क्या फ़ायदा था! बुरातिनो उछला और पहियों के निशानों के पीछे पीछे भागने लगा. तालाब का चक्कर लगाया, घनी घास वाले खेत में पहुंचा. चल रहा था, चल रहा था...उसके दिमाग में कोई प्लान नहीं था. साथियों को बचाना है – बस इतना ही. चट्टान तक पहुंचा, जहां से पिछली से पिछली रात को कांटेदार पौधों पर गिर पड़ा था. नीचे एक गंदा तालाब देखा, जिसमें कछुआ रहता था. तालाब के रास्ते पर एक गाड़ी उतर रही थी, जिसे नोचे हुए रोओं वाली, कंकाल जैसी दो कमज़ोर भेड़ें खींच रही थीं.

बॉक्स पर फूले फूले गालों वाला, सोने का चष्मा पहने एक मोटा बिल्ला बैठा था, - उसने गवर्नर के यहां कान में गुप्त रूप से कानाफूसी एजेंट के रूप में काम किया था. उसके पीछे – महत्वपूर्ण लोमड़ी, गवर्नर...बंडलों पर लेटे थे मल्वीना, प्येरो और पूरे बदन पूर पट्टियां बंधा अर्तेमोन, - हमेशा अच्छी तरह कंघी की गई  उसकी पूँछ ब्रश के समान धूल पर घिसट रही थी.

गाड़ी के पीछे चल रहे थे दो जासूस – डॉबरमैन - पिंसर.   

अचानक जासूसी कुत्तों ने अपने थोबड़े उठाए और चट्टान के ऊपर बुरातिनो की सफ़ेद टोपी देखी.

तेज़ छलांगों से पिंसर खड़ी चट्टान पर चढ़ने लगे. मगर इससे पहले कि वे ऊपर तक पहुंचते, बुरातिनो ने, - उसे न तो छुपने के लिए कोई जगह थी, ना ही वहां से भागने की – सिर के ऊपर हाथ रखे और – अबाबील की तरह – सबसे ऊंची जगह से नीचे कूद गया, गंदे तालाब में, जो हरी काई से ढंका था.

उसने हवा में वक्र बनाया, और, अगर तेज़ हवा के झोंके न होते तो निश्चित ही, तालाब में आंटी तर्तीला के संरक्षण में पहुंचता.

हवा ने हल्के, लकड़ी के बुरातिनो को पकड़ लिया, उसे घुमाया, दोहरे कॉर्क स्क्रू की तरह घुमाया, एक किनारे फेंक दिया, और वह, गिरते हुए, सीधे गाड़ी में गवर्नर लोमड़ी के सिर पर गिरा.        

सुनहरा चश्मा पहने मोटा बिल्ला अचानक बक्से से गिर पड़ा, और चूंकि वह बदमाश और डरपोक था, तो उसने नाटक किया कि बेहोश हो गया है.

लोमड़ी गवर्नर, जो खुद भी हताश डरपोक था, चिल्लाते हुए ढलान पर भागा और फ़ौरन बिज्जू के बिल में घुस गया. वहां उसके साथ अच्छा नहीं हुआ : ऐसे मेहमानों से बिज्जू कठोरता से पेश आते है.

भेड़ें भाग गईं, गाड़ी पलट गई , मल्वीना, प्येरो और अर्तेमोन थैलियों समेत लुढ़कते हुए रंगबिरंगे फूलों पर लुढ़क गए.

ये सब इतनी तेज़ी से हुआ, कि आप, प्यारे पाठकों, अपने हाथों की सारी उंगलियाँ भी न गिन पाते.

डॉबरमैन – पिंसर बड़ी बड़ी छलांगें लगाते हुए, चट्टान से नीचे कूद गए. पलटी हुई गाड़ी के पास पहुँचने पर उन्होंने मोटे बिल्ले को बेहोश देखा. पौधों पर गिरे हुए लकड़ी के छोटे छोटे आदमियों को और पट्टियां बंधे हुए झबरे कुत्ते को देखा.

मगर लोमड़ी गवर्नर का कहीं अता पता नहीं था.

वह गायब हो गया – जैसे ज़मीन में गड़प हो गया वो, जिसकी जासूसों को हिफाज़त करनी थी, आंख की पुतली की तरह.

पहले जासूस ने अपना थोबड़ा उठाकर, निराशाभरी चीख निकाली.

दूसरे जासूस ने भी वैसा ही किया:

“आय-आय-आय, आय-ऊ-ऊ-ऊ!...”

वे लपके और पूरी ढलान छान मारी. फिर से निराशा से विलाप करने लगे, क्योंकि उन्हें दिखाई दे रहे थे चाबुक और लोहे की जाली.

अपमान से अपना पिछला भाग हिलाते हुए, वे ‘मूर्खों के शहर पहुंचे, ताकि पुलिस विभाग में झूठ बोल दें, कि गवर्नर को ज़िंदा ही आसमान में उठा लिया गया था, - तो रास्ते में सोच रहे थे कि अपनी सफ़ाई में क्या कहेंगे. बुरातिनो ने हौले से अपने जिस्म को टटोला – हाथ, पैर, सलामत थे. वह पौधों के बीच रेंग गया और मल्वीना तथा प्येरो को रस्सियों से आज़ाद कर दिया.

मल्वीना ने एक भी लब्ज़ कहे बिना, बुरातिनो के कंधे पर हाथ रखा, मगर उसे चूम नहीं पाई – उसकी लम्बी नाक बाधा डाल रही थी.

प्येरो की बाँहें कुहनियों तक फटी हुई थीं, गालों से सफ़ेद पाउडर गिर रहा था, और पता चला कि उसके गाल सामान्य ही हैं – गुलाबी, कविताओं के प्रति उसके प्यार के बावजूद.

“मैं बहादुरी से लड़ा,” कर्कश आवाज़ में उसने कहा. “अगर टांग अडाकार मुझे न रोका गया होता – तो वे मुझे पकड़ नहीं पाते.”

 

23

मल्वीना ने पुष्टि की: - वह शेर की तरह लड़ा

उसने प्येरो की गर्दन में हाथ डाल दिए और उसके दोनों गालों को चूम लिया.

“बस हो गया, बस हो गया चूमना,” बुरातिनो भुनभुनाया, “चलो भागते हैं, अर्तेमोन को पूंछ से घसीटेंगे.”

  उन तीनों ने अभागे कुत्ते की पूंछ पकड़ ली और उसे पहाडी पर ऊपर की ओर खींचने लगे.

“छोडिये, मैं खुद चला जाऊंगा, मुझे इतना अपमान लग रहा है,” पट्टियों से बंधा हुआ कुत्ता कराहा.

“नहीं, नहीं, तुम काफ़ी कमजोर हो.”

मगर वे मुश्किल से ढलान का आधा रास्ता पार कर पाए थे, कि ऊपर कराबास बराबास और दुरेमार प्रकट हुए. लोमड़ी अलीसा ने पंजे से भगोड़ों को दिखाया, बिल्ले बज़ीलियो ने अपनी मूंछों पर ताव दिया और हिकारत से गुरगुराया.   

“हा-हा-हा, कितना चालाक है!” कराबास बराबास ने ठहाका मारते हुए कहा. “सुनहरी चाबी अपने आप मेरे हाथों में आ रही है!”

बुरातिनो जल्दी से सोचने लगा कि इस नई मुसीबत से कैसे निकले. प्येरो ने मल्वीना को गले लगाया, वह हर कीमत पर उसका जीवन बचाना चाहता था. इस बार बचने की कोई उम्मीद नहीं थी.

ढलान के ऊपर दुरेमार ठहाके लगा रहा था.

“सिन्योर कराबास बराबास, बीमार कुत्ते को आप मुझे दे दीजिए, मैं उसे तालाब में जोंकों के पास फेंक दूंगा, ताकि मेरी जोंकें मोटी हो जाएँ...”

मोटे कराबास बराबास को नीचे उतरने में आलस आ रहा था, उसने भगोड़ों को अपनी सॉसेज जैसी उंगली से इशारा किया:

“आओ, मेरे पास आओ, बच्चों...”

“अपनी जगह से हिलना नहीं!” बुरातिनो ने हुक्म दिया. “मरना – कितना मजेदार है! प्येरो, अपनी सबसे बुरी कवितायेँ सुनाओ. मल्वीना ज़ोर ज़ोर ठहाके लगाओ...”

कुछ कमियों के बावजूद, मल्वीना एक अच्छी दोस्त थी. उसने आंसू पोंछे और इतने आक्रामक रूप से उनके लिए हंसने लगी जो ढलान के ऊपर खड़े थे.

प्येरो ने फ़ौरन कविता बनाई और अप्रिय आवाज़ में चीखने लगा:

अफसोस है लोमड़ी एलिस के लिए –

डंडा कर रहा उसका इंतज़ार.

बिल्ला बजीलियो है भिखारी –

चोर है, नीच बिल्ला.

दुरेमार, हमारा है बेवकूफ,

फूहड़ कुकुरमुत्ता.

कराबास तू बराबास,

नहीं डरते ज़्यादा तुझसे...

साथ ही बुरातिनो ठुमके लगा रहा था और चिढ़ा रहा था:

“ऐ, तू, गुड़ियों के थियेटर के डाइरेक्टर, बिअर के पुराने पीपे, मोटे बोरे, बेवकूफियों से ठसाठस भरे हुए, नीचे उतर, उतर कर हमारे पास आ, - मैं तेरी कम्बख्त दाढी पर थूकूँगा!”

जवाब में कराबास बराबास खतरनाक ढंग से गुर्राया, दुरेमार ने अपने पतले हाथ आसमान की ओर उठाए.

लोमड़ी अलीसा कुटिलता से हंस पड़ी.

 “इन बदमाशों की गर्दनें मरोड़ने की इजाज़त दीजिये?

बस, एक मिनट और, और सब ख़त्म हो जाता...अचानक सीटियाँ बजाते हुए अबाबीलें आ गईं:

“यहाँ, यहाँ, यहाँ!...”

कराबास बराबास के सिर के ऊपर मैगपाई चक्कर लगाने लगी, ज़ोर से बकबक करते हुए:

“जल्दी, जल्दी, जल्दी!...”

और चट्टान के ऊपर बूढ़े पापा कार्लो प्रकट हुए. आस्तीनें ऊपर किये हुए, हाथ में – नुकीली छड़ी थी, भँवे तनी हुई थीं...

उन्होंने कंधे से कराबास बराबास को धक्का दिया, कुहनी से – दुरेमार को, लोमड़ी अलीसा की पीठ पर डंडा खींच दिया, जूते से बिल्ले बज़ीलिओ को दूर उछाल दिया...

इसके बाद, झुककर और चट्टान से नीचे झांकते हुए, जहां लकड़ी के इन्सान खड़े थे, खुशी से बोले:

“मेरे बच्चे, बुरातिनो, नन्हे बदमाश, तू ज़िंदा है और तंदुरुस्त है, - जल्दी से मेरे पास आ जा!”

 

24

 

आखिरकार बुरातिनो पापा कार्लो, मल्वीना, प्येरो और अर्तेमोन के साथ घर लौटता है.

कार्लो के अचानक प्रकट होने से, उसकी छड़ी और चढ़ी हुई भौंहों से बदमाश भयभीत हो गए.

लोमड़ी अलीसा घनी घास में घुस गई और वहां भागने लगी, कभी कभी ठहर जाती, क्योंकि छड़ी की मार से सिहर उठती थी. बिल्ला बज़ीलियो, दस कदम उड कर गुस्से से फुफकारता, साइकिल के पंक्चर टायर की तरह.

दुरेमार ने हरे कोट के पल्ले उठाए और चट्टान से नीचे उतरने लगा, बार बार यह दुहराते हुए:

“मैंने कुछ नहीं किया, मैंने कुछ नहीं किया...”

मगर एक चढ़ाई पर वह फिसल गया, भयानक शोर और छपाक के साथ तालाब में औंधे मुंह जा गिरा.

कराबास बराबास जहाँ खड़ा था, वहीं खड़ा रहा. उसने सिर्फ अपना सिर कन्धों तक नीचे खींच लिया; उसकी दाढी किसी चीथड़े की तरह लटक रही थी. बुरातिनो, प्येरो और मल्वीना ऊपर पहुंचे. पापा कार्लो ने एक एक करके उन्हें उठाया और उंगली से धमकाते हुए बोले:

“तुम्हें अभी सबक सिखाता हूँ, शैतानों!”

और उन्हें सीने से लगा लिया.

फिर वह चट्टान से कुछ कदम नीचे उतरा और अभागे कुत्ते के पास बैठ गया. वफ़ादार आर्तेमोन ने थोबड़ा उठाया और कार्लो की नाक को चाटा. बुरातिनो ने फ़ौरन अपना सिर सीने से बाहर निकाला:

“पापा कार्लो, हम बगैर कुत्ते के घर नहीं जायेंगे.”

“ए–हे-हे,” कार्लो ने जवाब दिया, “मुश्किल होगी, खैर, किसी तरह तुम्हारे नन्हे कुत्ते को ले जाऊंगा.”

उसने आर्तेमोन को कंधे पर डाला और, भारी बोझ से दुहरा होते हुए, ऊपर चढ़ा, जहां, उसी तरह अपना सिर ताने, आंखें बाहर निकाले, कराबास बराबास खडा था. – “मेरी प्यारी गुड़ियों...” वह बुदबुदाया.

पापा कार्लो ने उसे गंभीरता से जवाब दिया:

“तुम भी ना! किसके साथ बुढ़ापे में पाला पड़ा है, - सारी दुनिया में मशहूर बदमाशों से, दुरेमार से, बिल्ले से, लोमड़ी से. छोटे लोगों की बेइज्ज़ती करते हो! शर्म आनी चाहिए, डॉक्टर! और कार्लो शहर के रास्ते पर चल पडा.

कराबास बराबास खिंचे हुए सिर से उसके पीछे पीछे चल पडा. “मेरी गुड़ियों को वापस दो!...” – “किसी कीमत पर न देना! – बुरातिनो सीने के पीछे से सिर बाहर निकालते हुए चीखा.

इस तरह चलते रहे, चलते रहे. ‘थ्री मिन्नोज़’ सराय को पार किया, जहां, गंजा मालिक दरवाज़े पर झुक कर खडा दोनों हाथों से भाप निकालते बर्तनों की ओर इशारा कर रहा था.

दरवाज़े के पास आगे-पीछे, आगे-पीछे अपनी नुची हुई पूंछ के साथ घूमते हुए, गुस्से से मुर्गा बुरातिनो की बदमाश हरकत के बारे में बता रहा था. मुर्गियां सहानुभूति से सिर हिला रही थीं:

“आह-आह, कितना डरावना है! ऊख-ऊख, हमारा बेचारा मुर्गा!...”

कार्लो पहाड़ी पर चढ़ गया, जहां से समुद्र दिखाई दे रहा था, जिसमें हवा चलने के कारण कहीं कहीं मटमैले पट्टे दिखाई दे रहे थे, किनारे के पास – छोटा सा पुराना शहर, जो तपते हुए सूरज के कारण रेत के रंग का दिखाई दे रहा था और कठपुतलियों के थियेटर की कैनवास की छत.   

कराबास बराबास कार्लो से तीन कदम पीछे खड़ा होकर गरजा:

“मैं तुम्हें गुड़िया के लिए सौ सोने के सिक्के दूंगा, बेच दे.”

बुरातिनो, मल्वीना और प्येरो की सांस रुक गई -  वे इंतज़ार करने लगे कि कार्लो क्या कहता है.

उसने जवाब दिया:

“नहीं! अगर तू थियेटर के दयालु, अच्छे डाइरेक्टर होते, तो मैं तुम्हें, यूं ही इन नन्हे इंसानों को तुम्हें दे देता. मगर तुम – किसी मगरमच्छ से भी ज़्यादा बुरे हो. न तो तुम्हें दूंगा, न ही बेचूंगा, भाग जा.”

कार्लो पहाडी से नीचे उतरा और, कराबास बराबास की ओर ध्यान न देते हुए, शहर में गया.  

वहां सुनसान चौक में पुलिसवाला निश्चल खडा था.

गर्मी और उकताहट के मारे उसके कान लटक गए थे, पलकें चिपक गईं थीं, तिकोनी हैट के ऊपर मक्खियाँ उड़ रही थीं.

कराबास बराबास ने अचानक अपनी दाढी को जेब में घुसाया, कार्लो को पीछे से कमीज़ से पकड़ा और पूरे चौक में गरजा:

“चोर को पकड़ो, उसने मेरी गुड़ियों को चुरा लिया है!...”

मगर पुलिस वाला, जिसे गर्मी लग रही थी और उकताहट हो रही थी हिला तक नहीं. कराबास बराबास उसकी तरफ उछला और मांग करने लगा कि कार्लो को गिरफ़्तार किया जाए.

“और तू कौन है?” पुलिसवाले ने आलस से पूछा.

“मैं गुड़ियों के विज्ञान का डॉक्टर, मशहूर थियेटर का डाइरेक्टर, सर्वश्रेष्ठ सम्मानप्राप्त नाईट, तरबार के राजा का निकटतम मित्र, सिन्योर कराबास बराबास हूँ...”

“मगर तुम मुझ पर चिल्लाओ नहीं,” पुलिसवाले ने जवाब दिया.

जब तक कराबास बराबास उससे उलझ रहा था, पापा कार्लो, जल्दी जल्दी  पुल के पत्थरों पर छडी खटखटाते हुए, उस घर के पास पहुंचा, जिसमें वह रहता था. उसने सीढ़ियों के नीचे वाली आधी अंधेरी कोठरी का दरवाज़ा खोला, अर्तेमोन को कंधे से नीचे उतारा, उसे बेंच पर रखा, बगल के पीछे से बुरातिनो, मल्वीना और प्येरो को बाहर निकाला और उम्हें एक दूसरे की बगल में मेज़ पर बिठा दिया. मल्वीना ने फ़ौरन कहा:

“पापा कार्लो, सबसे पहले बीमार कुत्ते पर ध्यान दीजिये. बच्चों, फ़ौरन हाथ-मुंह धो लो...”

अचानक उसने बदहवासी से हाथ हिलाए:

“और मेरे ड्रेसेस! मेरे नए जूते, मेरे रिबन्स खाई के नीचे छूट गए, गोखरुओं के बीच!...”

“कोई बात नहीं, परेशान न हो,” कार्लो ने कहा, “शाम को मैं जाऊंगा, तुम्हारी थैलियाँ ले आऊँगा.”

उसने सावधानी से अर्तेमोन के पंजों की पट्टियां खोल दीं. देखा, कि घाव करीब करीब अच्छे हो गए हैं, और कुत्ता अपनी जगह से इसलिए नहीं हिल पा रहा था, क्योंकि वह भूखा था.

“दलिए की एक प्लेट और दिमाग की हड्डी,” अर्तेमोन कराहा, “और मैं शहर के सारे कुत्तों से लड़ने के लिए तैयार हूँ.”

“आय-आय-आय,” कार्लो ने रोनी आवाज़ में कहा, “और मेरे पास एक भी टुकड़ा नहीं, जेब में एक भी सल्दो नहीं...”

मल्वीना दयनीयता से रो पड़ी. प्येर ने मुट्ठी से माथा पोंछा, कल्पना करते हुए.

“मैं रास्ते पर जाऊंगा, कवितायेँ सुनाऊंगा, आने जाने वाले मुझे मुट्ठियाँ भर के सल्दो देंगे.”

कार्लो ने सिर हिलाया:

“बेटे, तू आवारागर्दी के इल्ज़ाम में पुलिस-थाने में रात गुज़ारेगा. 

बुरातिनो को छोड़कर बाकी सभी उदास थे. वह चालाकी से मुस्कुरा रहा था, इस तरह गोल गोल घूम रहा था, जैसे मेज़ पर नहीं, बल्कि उल्टे बटन पर बैठा हो.

“दोस्तों, - बस हो गया रोना धोना!” वह फर्श पर कूदा और जेब से कुछ निकाला. “पापा कार्लो, फावड़ा लो, दीवार से छेद वाले कैनवास को अलग करो.

और उसने अपनी लम्बी नाक से भट्टी की ओर इशारा किया, और भट्टी के ऊपर रखे बर्तन की ओर, और धुएँ की ओर, जो पुराने कैनवास के टुकड़े पर चित्रित थे.

कार्लो को अचरज हुआ.

“बच्चे, तुम दीवार से इस ख़ूबसूरत चित्र को क्यों चीरना चाहते हो? सर्दियों में मैं उसकी ओर देखता हूँ और कल्पना करता हूँ, कि ये असली आग है और हांडी में मटन का असली सालन है, लहसुन डाला हुआ, और मुझे थोड़ी गर्माहट महसूस होती है.”

“पापा कार्लो, गुड़ियों का ईमानदार वादा करता हूँ, -  तुम्हारे पास भट्टी में असली आग होगी, असली लोहे की हांडी होगी और गरम गरम सालन होगा. कैनवास फाड़ दो.”

बुरातिनो ने यह इतने विश्वास से कहा कि पापा कार्लो ने अपनी खोपड़ी खुजलाई, सिर हिलाया, घुरघुराया, घुरघुराया, - चिमटा और हथौड़ा लिया और कैनवास फाड़ने लगा. उसके पीछे, जैसा कि हम जानते हैं, सब कुछ मकड़ी के जालों से ढंका हुआ था और मरी हुई मकड़ियाँ लटक रही थीं.   

कार्लो ने सावधानी से मकड़ी के जाले हटाये. तब काले पड़ चुके चीड़ का छोटा सा दरवाज़ा दिखाई दिया. उस पर चारों कोनों में मुस्कुराते हुए चेहरे खुदे हुए थे, और बीच में – नाचता हुआ, लम्बी नाक वाला छोटा सा आदमी.

जब उसके ऊपर से धूल झाड़ी गई, तो मल्वीना, प्येरो, पापा कार्लो, और यहाँ तक कि भूखा अर्तेमोन भी एक सुर में चहके:

“ये तो खुद बुरातिनो का पोर्ट्रेट है!”

“मैंने ऐसा ही सोचा था,” बुरातिनो ने कहा, हालांकि उसने ऐसा कुछ भी नहीं सोचा था और खुद भी चकित हो गया. – “और ये रही दरवाज़े की चाबी. पापा कार्लो, खोलो...”

ये छोटा सा दरवाज़ा और यह सुनहरी चाबी,” कार्लो ने कहा, “बहुत पहले बनाए गए थे, किसी बहुत कुशल कारीगर द्वारा. चलो, देखते हैं, कि दरवाज़े के पीछे क्या छुपाया गया है.”

उसने चाबी दरवाज़े के छेद में डाली और उसे घुमाया...एक हल्की सी, प्यारी धुन गूंजी, जैसे कोई हार्मोनियम बज रहा हो...

पापा कार्लो ने दरवाज़े को धक्का दिया. वह चरमराहट के साथ खुलने लगा.

इसी समय खिड़की से बाहर तेज़ तेज़ कदमों की आवाज़ सुनाई दी, और साथ ही गरजी कराबास बराबास की आवाज़:  
“गिबरीश के राजा के नाम पर – बूढ़े बदमाश कार्लो को गिरफ्तार कीजिए!”

 

25

 

कराबास बराबास सीढ़ी के नीचे वाली कोठरी में घुसता है.

 

कराबास बराबास ने, जैसा कि हम जानते हैं, बहुत कोशिश की ऊंघते हुए पुलिसवाले को मनाने की, कि वह कार्लो को गिरफ़्तार करे. कुछ भी हासिल न होने पर, कराबास बराबास रास्ते पर भागने लगा.

उसकी लहराती हुई दाढ़ी आने जाने वालों के बटन और छतरियों में उलझ रही थी.

वह धक्के दे रहा था और दांत किटकिटा रहा था. उसके पीछे लडके तीखी सीटियां बजा रहे थे, उसकी पीठ पर सड़े हुए सेब फेंक रहे थे.

कराबास बराबास शहर-प्रमुख के यहाँ गया. इस दोपहर के गर्म समय में प्रमुख बगीचे में बैठा था, फ़व्वारे के निकट, सिर्फ अंडरवियर पहने और लेमोनेड पी रहा था.

प्रमुख की छः ठोडियां थीं, उसकी नाक गुलाबी गालों में डूब गई  थी. उसकी पीठ के पीछे, चीड़ के नीचे, चार उदास पुलिसवाले बार बार लेमोनेड़ की बोतलें खोल रहे थे.

कराबास बराबास प्रमुख के सामने घुटनों पर गिर गया और, दाढी से चेहरे पर आये आंसू फैलाते हुए चिल्लाने लगा:

“मैं अभागा अनाथ हूँ, मेरा अपमान किया गया, मेरा सब कुछ लूट लिया गया, मुझे मारा गया...”

“अनाथ बच्चे, तेरा किसने अपमान किया है?” प्रमुख ने मुश्किल से सांस लेते हुए पूछा.

“सबसे दुष्ट शत्रु, घुमक्कड़, बाजा बजाने वाला कार्लो. उसने मेरी तीन सबसे बढ़िया गुड़ियों को चुरा लिया, वह मेरे मशहूर थियेटर को आग लगाना चाहता है, अगर उसे फ़ौरन गिरफ्तार न किया गया, तो वह पूरे शहर को जला देगा और लूट लेगा.

अपने शब्दों को प्रभावशाली बनाने के लिए कराबास बराबास ने मुट्ठी भर सोने के सिक्के बाहर खीँचे और प्रमुख के जूते में डाल दिए.  

संक्षेप में, उसने ऐसी शिकायतें कीं, इतना झूठ बोला, कि डरे हुए प्रमुख ने चीड़ के नीचे खड़े चार पुलिसवालों को हुक्म दिया:

“आदरणीय अनाथ के साथ जाओ और क़ानून के नाम पर जो भी आवश्यक हो, करो.”

कराबास बराबास चारों पुलिसवालों के साथ कार्लो की कोठरी की ओर भागा और चिल्लाया:

“गिबरीश के राजा के नाम पर – चोर और बदमाश को गिरफ़्तार करो!”

मगर दरवाज़े बंद थे. कोठरी में किसी ने जवाब नहीं दिया. कराबास बराबास ने हुक्म दिया:

“गिबरीश के राजा के नाम से – दरवाज़ा तोड़ दो!”

पुलिसवालों ने दरवाज़ा दबाया, दरवाज़े के सड़े हुए पल्ले कुंदों से गिर गए, और चारों बहादुर पुलिसवाले, अपनी तलवारें खनखनाते हुए, सीढ़ी के नीचे वाली कोठरी में घुस गए.

यह ठीक उसी पल हुआ, जब दीवार में छुपे गुप्त दरवाज़े से, झुककर कार्लो निकल रहा था.   

वह सबसे अंत में छुपा. दरवाज़ा – झन्!...धडाम से बंद हो गया. हल्का संगीत भी बंद हो गया. सीढ़ी के नीचे कोठरी में सिर्फ गंदी पट्टियां और फटा हुआ कैनवास पड़े हुए थे, जिस पर भट्टी का चित्र था...

कराबास बराबास गुप्त दरवाज़े की ओर कूद गया, उसे मुट्ठियों और जूतों से मारने लगा:

“त्रा-ता–ता-ता !”

मगर दरवाज़ा मज़बूत था.

कराबास बराबास भाग कर आया और दरवाज़े पर अपनी पीठ से धक्का मारा.

दरवाज़ा नहीं खुला.

वह पैर पटकते हुए पुलिसवालों के पास गया:

तराबार्स्की सम्राट के नाम पर इस नासपीटे दरवाज़े को तोड़ दो!...”

पुलिसवाले एक दूसरे को टटोल रहे थे – कोई नाक के धब्बे देख रहा था, कोई सिर का घूमड़. 

“नहीं, यहां काम बहुत भारी है,” – उन्होंने जवाब दिया और शहरप्रमुख के पास यह कहने के लिए गए, कि उन्होंने सब कुछ क़ानून के अनुसार किया है, मगर लगता है, कि बूढ़े घुमक्कड़ ऑर्गन वादक की खुद शैतान मदद कर रहा है, क्योंकि वह दीवार के आरपार निकल गया.

कराबास बराबास ने अपनी दाढ़ी नोंची, फर्श पर लोट गया और पागल की तरह सीढ़ी के नीचे वाली खाली कोठरी में बिसूरने लगा, चीखने-चिल्लाने लगा और लोट पोट होने लगा.

 

 

 

 

 

 

26

 

गुप्त दरवाज़े के पीछे उन्हें क्या मिला.

 

जब कराबास बराबास पागल की तरह भाग रहा था और अपनी दाढ़ी खीच रहा था, तब बुरातिनो – सबसे आगे, और उसके पीछे मल्वीना, प्येरो, अर्तेमोन और – सबसे अंत में – पापा कार्लो पत्थर की खड़ी सीढी से नीचे अंधेरे में उतर रहे थे.

पापा कार्लो ने जलती हुई मोमबत्ती का टुकड़ा पकड़ रखा था. उसकी फडफडाती लौ अर्तेमोन के झबरे सिर से या प्येरो के फैले हुए हाथ से बड़ी बड़ी परछाईयाँ डाल रही थी, मगर अँधेरे को प्रकाशमान नहीं कर रही थी, जहां सीढ़ी जा रही थी.

डर के मारे रो न पड़े, इसलिए मल्वीना अपने कानों में चुटकी काट रही थी.

प्येरो, - हमेशा की तरह, हर चीज़ से बेखबर,- कवितायेँ गुनगुना रहा था:

 

 

नाचती परछाईयाँ दीवार पर, -

नहीं है मुझे कोई डर.

सीढ़ी हो चाहे खड़ी,

या हो खतरनाक अन्धेरा, -

फिर भी भूमिगत रास्ता

ले जाएगा कहीं न कहीं...

बुरातिनो अपने साथियों से आगे चल रहा था, - नीचे गहराई में उसकी सफ़ेद टोपी मुश्किल से दिखाई दे रही थी.

अचानक किसी चीज़ के फुफकारने की, गिरने की, लुढ़कने की आवाज़ आई, और उसकी शिकायत भरी आवाज़ सुनाई दी:

“मेरी मदद करो!”

अर्तेमोन फ़ौरन, अपने ज़ख्मों और भूख को भूलकर, मल्वीना और प्येरो को फांदकर, काली आंधी की तरह सीढ़ियों से नीचे लपका.

उसके दांत किटकिटा रहे थे. कोई प्राणी घिनौनी आवाज़ में चिल्लाया.

सब कुछ शांत हो गया. सिर्फ मल्वीना का दिल अलार्म घड़ी की तरह ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था.

प्रकाश की एक चौड़ी किरण नीचे से सीढी टकराई. मोमबत्ती की लौ, जिसे पापा कार्लो ने पकड़ा था, पीली हो गई.     

“देखिये, जल्दी देखिए!” बुरातिनो ने ज़ोर से पुकारा.

मल्वीना पलट कर जल्दी जल्दी एक एक सीढ़ी उतरने लगी, उसके पीछे उछल रहा था प्येरो. आख़िर में, झुककर, उतर रहा था कार्लो, जिसके लकड़ी के जूते बार बार पैरों से फिसल जा रहे थे.  

नीचे, वहां, जहां सीधी सीढ़ी समाप्त हो रही थी, पत्थर के चौक पर अर्तेमोन बैठा था. वह अपने होंठ चाट रहा था. उसके पैरों के पास गला घोंटा हुआ चूहा शुशारा पड़ा था.

बुरातिनो दोनों हाथों से सडा हुआ नमदे का परदा हटा रहा था, - उससे पत्थर की दीवार में बने छेद को ढांका गया था. वहां से नीला प्रकाश निकल रहा था. 

जब वे छेद से होकर निकले, तो सबसे पहली चीज़ जो उन्होंने देखी – वे थीं सूरज की बिखरती हुई किरणें. वे मेहराबदार छत से गिरकर गोल खिड़की से होते हुए आ रही थीं.   

चौड़ी फ़ैली हुई किरणें, उनमें नृत्य करते हुए धूलकणों समेत पीले संगमरमर के गोल कमरे को प्रकाशित कर रही थीं. कमरे के बीचोंबीच आश्चर्यजनक रूप से सुन्दर गुड़ियों का थियेटर था. उसके परदे पर बिजली की आड़ी तिरछी रेखा चमचमा रही थी.  

परदे के किनारों से दो वर्गाकार टॉवर्स उभरे, जिन्हें इस तरह रंगा गया था, मानो वे छोटी छोटी ईंटों से बने हों. टीन की ऊंची छतें चमचम चमक रही थीं.

बाएं टॉवर पर तांबे की सुईयों वाली घड़ी थी. डायल पर हर अंक के सामने एक लड़के और लड़की के हंसते हुए चेहरे थे.

दाएं टॉवर पर – रंगबिरंगे शीशों की गोल खिड़की थी.

इस खिड़की के ऊपर, हरे टीन की छत के ऊपर, बोलने वाला झींगुर बैठा था. जब सब लोग अपने मुंह खोले, इस अद्भुत थियेटर के सामने रुक गए, तो झींगुर ने स्पष्टता से धीरे धीरे कहा:

“मैंने चेतावनी दी थी, कि तुम्हें भयानक खतरों का सामना करना पडेगा, बुरातिनो. अच्छा हुआ कि सब कुछ अच्छी तरह समाप्त हो गया, मगर भयानक तरीके से भी समाप्त हो सकता था...तो...”

झींगुर की आवाज़ बूढ़ी और कुछ आहत थी, क्योंकि बोलने वाले झींगुर को अपने ज़माने में हथौड़े की मार पड़ी थी, और अपनी सौ साल की आयु और स्वाभाविक भलमनसाहत के बावजूद, वह अवांछित अपमान को भूल नहीं पाया था. इसलिए उसने आगे कुछ नहीं कहा, - अपनी मूंछें खींची, मानो उनसे धूल झाड़ रहा हो, और धीरे से कहीं अकेली दरार में रेंग गया – गहमा गहमी से दूर.

तब पापा कार्लो ने कहा:

“और मैं तो सोच रहा था, कि हमें यहाँ, हद से हद, सोने और चांदी का ढेर मिलेगा, - मगर मिला बस एक पुराना खिलौना.

वो टॉवर में बनी घड़ी के पास आए, डायल पर टकटक किया, और चूंकि घड़ी के किनारे तांबे की कील पर चाबी लटक रही थी, उन्होंने उसे लेकर घड़ी में चाबी भर दी...

ज़ोर से टिकटिक होने लगी. काटे चलने लगे. बड़ा काटा, बारह के पास पहुंचा, छोटा – छः के पास. टॉवर के भीतर कुछ गुनगुनाहट और फुसफुसाहट होने लगी. घड़ी ने खनखनाते हुए छः घंटे बजाये...

तभी दाएं टॉवर में रंगबिरंगे कांच से बनी छोटी सी खिड़की खुल गयी, घड़ी की चाबी का रंगबिरंगा पंछी बाहर कूदा और, अपने पंखों को फडफडाते कर उसने छः बार गाया:

“- यहाँ-यहाँ, यहाँ-यहाँ, यहाँ-यहाँ...”

पंछी छुप गया, खिड़की धडाम से बंद हो गई, सुरीला संगीत बजने लगा. और परदा उठ गया...

किसी ने भी, पापा कार्लो ने भी कभी इतनी सुन्दर सजावट नहीं देखी थी.  

स्टेज पर एक बाग़ था. चांदी और सोने के पत्तों वाले छोटे छोटे पेड़ों पर नाखून जितने आकार की चाबी वाली मैनाएँ गा रही थीं. एक पेड़ पर सेब लटक रहे थे, जिनमें से हरेक कूटू के दाने से बड़ा नहीं था. पेड़ों के नीचे मोर घूम रहे थे और, पंजों के बल उठकर सेबों पर चोंच मार रहे थे. लॉन पर दो बकरी के बच्चे, उछल रहे थे और एक दूसरे को धक्के मार रहे थे, और हवा में मुश्किल से दिखाई देने वाली तितलियाँ उड़ रही थीं.

इस तरह एक मिनट बीत गया. मैनाएँ खामोश हो गईं, मोर और बकरी के मेमने बगल वाली विंग्स के पीछे हट गए. पेड़ स्टेज के फर्श के नीचे गुप्त तहखानों में गायब हो गए.   

पीछे वाली सजावट से बारीक कपड़े के बादल छटने लगे. ऐसा लगा कि रेगिस्तान के ऊपर लाल सूरज आ गया है. दाएं और बाएं, बगल वाली विंग्स से लताओं की सांपों जैसी शाखाएं बाहर झाँकने लगीं, - उनमें से एक के ऊपर तो वाकई में सांप था. दूसरी पर अपनी पूंछें पकड़ कर बंदरों का परिवार झूल रहा था.

ये अफ्रीका था.

रेगिस्तान की रेत पर लाल सूरज के नीचे जानवर गुज़र रहे थे.

तीन छलांगों में अयाल वाला सिंह गुज़र गया, हांलाकि वह बिल्ली के बच्चे से बड़ा नहीं था, मगर डरावना था.

गिरते-पड़ते टेडी बेयर छाता लिए अपने पिछले पंजों पर चलकर निकल गया.

घिनौना मगरमच्छ रेंगते हुए आया, - उसकी घिनौनी आँखों ने दयालु होने का दिखावा किया. मगर फिर भी अर्तेमोन ने विश्वास नहीं किया और उस पर गुर्राने लगा.

एक गैंडा सरपट दौड़ते हुए आया – सुरक्षा के लिए उसके नुकीले सींग पर रबर की गेंद पहनाई गयी थी.

जिराफ भागते हुए गुज़रा, जो धारियों वाले, सींगों वाले ऊँट के समान था, पूरी ताकत से गर्दन बाहर निकाले हुए. फिर गुज़रा हाथी, - बच्चों का दोस्त, - बुद्धिमान, भले स्वभाव का, - अपनी सूंड हिला रहा था, जिसमें उसने सोया की कैंडी पकड़ रखी थी.   

सबसे अंत में एक बहुत ही गंदा जंगली कुत्ता – सियार निकला. अर्तेमोन भौंकते हुए उस पर उछला, - पापा कार्लो को उसकी पूछ पकड़ कर मुश्किल से उसे खींचना पडा.

जानवर गुज़र गए. सूरज अचानक बुझ गया. अँधेरे में कुछ चीज़ें, ऊपर से नीचे आईं, कुछ चीज़ें बगल से सरका दी गईं. एक आवाज़ आई, जैसे तारों पर कमान खींची जा रही हो.   

मटमैले स्ट्रीट लाईट्स जल उठे. स्टेज पर था शहर का चौक. घरों के दरवाज़े खुल गए, नन्हे इंसान बाहर भागे, खिलौनों की ट्राम में चढ़ गए. कंडक्टर ने घंटी बजाई, ड्राईवर ने हैंडल घुमाया, नन्हा बच्चा फ़ौरन सॉसेज से चिपक गया, पुलिस वाले ने सीटी बजाई, - ट्रामगाड़ी ऊंचे ऊंचे घरों के बीच से बगल वाली सड़क पर चली गई.               

एक साइकिल सवार गुज़रा – जिसके पहिये जैम वाली प्लेट से बड़े नहीं थे. अखबार वाला भागा, - फाड़े हुए कैलेण्डर के पन्ने चौकोर आकार में रखे हुए – इतना ही आकार था उसके अखबारों का.     

आईसक्रीम वाला चौक से आईसक्रीम की गाडी चला रहा था. घरों की छोटी छोटी बालकनियों में छोटी बच्चियां आईं और उसे देखकर हाथ हिलाने लगीं, मगर आईसक्रीम वाले ने हाथ हिला दिए और बोला:

“सब खा गए, अगली बार आना.”

अब परदा गिर गया, और उसके ऊपर फिर से बिजली की आड़ी- तिरछी, सुनहरी रेखा चमक गई.  

पापा कार्लो, मल्वीना, प्येरो उत्तेजना के बाद अपने होश नहीं संभाल सके. बुरातिनो, जेबों में हाथ डाले, नाक हवा में उठाकर शेखी से बोला:

“तो – देखा? मतलब. मैं यूं ही आंटी तोर्तीला की दलदल में नहीं भीगा था...इस थियेटर में हम कॉमेडी प्रस्तुत करेंगे – पता है कौनसी? – ‘सुनहरी चाबी या बुरातिनो और उसके दोस्तों के असाधारण कारनामे’. कराबास बराबास निराशा से टूट जाएगा.”

प्येरो ने मुट्ठियों से झुर्रियों वाला माथा पोंछा:

“मैं शानदार पदों में ये कॉमेडी लिखूंगा.”

“मैं आईस्क्रीम और टिकट बेचूंगी,” मल्वीना ने कहा. – “अगर आपको मुझमें योग्यता नज़र आए, तो अच्छी लड़कियों की भूमिका करने की कोशिश करूंगी...”

“ठहरो, बच्चों, और पढाई कब करोगे?” पापा कार्लो ने पूछा.

सबने फ़ौरन जवाब दिया:

“पढाई करेंगे सुबह...और शाम को काम करेंगे थियेटर में...”

“अच्छा, ठीक हैं बच्चों,” पापा कार्लो ने कहा, “और बच्चों, मैं भी हारमोनियम बजाऊंगा, सम्माननीय पब्लिक के मनोरंजन के लिए, और अगर इटली में शहर-शहर घूमेंगे, तो मैं घोड़ा संभालूँगा और लहसुन के साथ मटन पकाऊंगा...”

अर्तेमोन ने अपना कान उठाकर सुना, चमकीली आंखों से दोस्तों की ओर देखा, पूछा: उसे क्या करना है?

बुरातिनो ने कहा:

“अर्तेमोन थियेटर की संपत्ति की और नाटकों की वेशभूषा की हिफाज़त करेगा, हम उसे स्टोर रूम की चाबी देंगे. थियेटर में ‘शो के समय वह परदे के पीछे शेर की गर्जना, गैंडे की धमधम, मगरमच्छ के दांतों की किटकिटाहट,   अपनी पूंछ को तेज़ी से घुमाते हुए हवा की साँय साँय या अन्य आवश्यक आवाजों का प्रभाव पैदा करेगा.

“और तुम, और तुम, बुरातिनो?” सबने पूछा. “थियेटर में क्या बनोगे?

“प्यारों, मैं कॉमेडी में अपने आप को ही पेश करूंगा और पूरी दुनिया में मशहूर हो जाऊंगा!”

 

27

 

नया कठपुतलियों का थियेटर अपना पहला ‘शो प्रस्तुत करता है.

 

कराबास बराबास बड़े खतरनाक मूड में भट्टी के सामने बैठा था. नम लकडियां मुश्किल से जल रही थीं. बाहर बारिश की झड़ी लगी थी. कठपुतलियों के थियेटर की छत टपक रही थी. गुड़ियों के हाथ और पैर नम हो गए थे, रिहर्सल्स में कोइ काम नहीं करना चाह रहा था, सात पूँछों वाले चाबुक की धमकी के बावजूद. गुड़ियों ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था, और पैंट्री में कीलों पर टंगे टंगे कड़वाहट से फुसफुसा रही थीं.

थियेटर में सुबह से एक भी टिकट नहीं बिका था. और कराबास बराबास के थियेटर में उकताहट भरे नाटक और भूखे, फटेहाल कलाकारों को देखने जाता भी कौन!

शहर के घंटाघर में घड़ी ने छः बजाये. कराबास बराबास निराशा से दर्शकहॉल में घूम रहा था, - हॉल खाली था.

“शैतान ले जाए, सभी सम्माननीय दर्शकों को,” वह गुर्राया और बाहर निकला. बाहर आते हुए उसने देखा, आंखें झपकाईं और इस तरह से मुंह खोला की एक कौआ उड़कर उसमें जा सकता था.

उसके थियेटर के सामने, बड़े, नए कैनवास के तम्बू के सामने, समुद्र से आ रही नम हवा की ओर ध्यान न देते हुए भारी भीड़ खड़ी थी.  

टेंट के प्रवेश के ऊपर टोपी पहने, एक लम्बी नाक वाला आदमी खडा था, भर्राई हुई तुरही बजा रहा था और चिल्लाकर कुछ कह रहा था.

पब्लिक हंस रही थी, तालियाँ बजा रही थी, और बहुत सारे लोग तम्बू के अन्दर चले गए.

कराबास बराबास के पास दुरेमार आया; उससे, कीचड़ की बू आ रही थी, जैसी पहले कभी नहीं आती थी.

“ए-हे-हे,” चेहरे पर गुस्सैल झुर्रियां लाते हुए उसने कहा, “औषधीय जोंकों से कुछ लेना देना नहीं है. मैं उनके पास जाना चाहता हूँ,” – दुरेमार ने नए तम्बू की तरफ़ इशारा किया, “उनके पास मोमबत्तियां जलाने या फर्श साफ़ करने का काम मांगूंगा.”

“ये किसका नासपीटा थियेटर है? ये कहाँ से आया?” कराबास बराबास गुर्राया.

“ये खुद गुड़ियों ने अपना ‘कठपुतलियों का थियेटर ‘ मोलनिया (बिजली – अनु.) खोला है, वे खुद ही पद्य में नाटक लिखते हैं, खुद ही भूमिकाएं करते हैं.”

कराबास बराबास ने अपने दांत किटकिटाए, दाढी नोंची और नए कैनवास के टेंट की ओर चला. उसके प्रवेश द्वार के ऊपर बुरातिनो चिल्ला रहा था:

“लकड़ी के इंसानों के जीवन पर आधारित मनोरंजक, आकर्षक पहला प्रयोग. वास्तविक घटनाओं पर आधारित – इस बारे में, कि हमने कैसे अपने दुश्मनों को बुद्धि, बहादुरी और सूझ बूझ से हराया...”

कठपुतलियों के थियेटर के प्रवेश द्वार के पास कांच के बूथ में मल्वीना बैठी थी नीले बालों में ख़ूबसूरत रिबन बांधे और कठपुतलियों के जीवन पर आधारित मज़ेदार कॉमेडी के दर्शकों को मुश्किल से टिकट दे पा रही थी 

पापा कार्लो नए मखमली जैकेट में हारमोनियम घुमा रहे थे और खुशी से सम्माननीय दर्शकों को देखकर आंखें मिचका रहे थे.

अर्तेमोन ने लोमड़ी अलीसा को पूंछ पकड़कर टेंट से बाहर घसीटा, जो बिना टिकट के घुस गई थी.

बिल्ला बजीलियो भी बिना टिकट के, चालाकी से निकल लिया था, और बारिश में पेड़ पर बैठकर गुस्सैल आंखों से नीचे देख रहा था.

बुरातिनो, गाल फुलाकर भर्राई हुई तुरही बजा रहा था:

“ ‘शो शुरू  हो रहा है.”  

और वह कॉमेडी का पहला दृश्य करने के लिए सीढ़ी से नीचे भागा, जिसमें दिखाया गया था कि कैसे गरीब बेचारे पापा कार्लो ठूंठ से लकड़ी का इंसान बनाते हैं, ज़रा भी सोचे बिना कि यह उनके लिए सुख लाएगा.

सबसे अंत में थियेटर में रेंगते हुए आया कछुआ तोर्तीला, मुंह में मानद टिकट पकड़े हुए जो सुनहरे कोनों वाले चर्मपत्र पर बना हुआ था.  

‘शो शुरू हो गया. कराबास बराबास उदास होकर अपने खाली थियेटर में लौट आया. उसने सात पूँछों वाला चाबुक उठाया. गोदाम का दरवाज़ा खोला.

“मैं तुम्हें ऐसा सबक सिखाऊंगा, कि आलस भूल जाओगे!” वह तैश में चीखा. – “मैं तुम्हें पब्लिक को मेरे पास आकर्षित करना सिखाऊंगा!”

उसने चाबुक लहराया. मगर किसी ने भी जवाब नहीं दिया. गोदाम खाली था. सिर्फ कीलों पर रस्सियों के टुकड़े लटक रहे थे.

सारी कठपुतलियाँ – अर्लेकिन, और काले मास्क वाली लड़कियां, और सितारों वाली नुकीली टोपियां पहने जादूगर, और खीरे जैसी नाक वाले कुबड़े, और अरब, और कुत्ते – सब, सब, सभी कठपुतलियां कराबास बराबास के यहाँ से भाग गए थे.

भयानक विलाप करतरे हुए वह थियेटर से उछल कर बाहर रास्ते पर आया. उसने देखा, कि कैसे उसके बचे खुचे कलाकार डबरे से होकर नए थियेटर की ओर भाग रहे थे, जहां प्रसन्नता से संगीत बज रहा था, ठहाके सुनाई दे रहे थे, तालियाँ बज रही थीं.

कराबास बराबास केवल कागज़ के कुत्ते को ही पकड़ पाया, जिसकी आंखों के बदले बटन थे. मगर उसके ऊपर, न जाने कहाँ से, अर्तेमोन ने हमला किया, उसे गिरा दिया, कुत्ते को खींच लिया और उसे साथ लेकर तम्बू में भाग गया, जहां स्टेज के पीछे भूखे कलाकारों के लिए लहसुन के साथ गरम गरम मटन का सूप बनाया गया था.

कराबास बराबास उसी तरह बारिश में डबरे में बैठा रहा.

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