मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

Adventure

एड़वेन्चर
लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


पिछले शनिवार और इतवार को मैं दीम्का के घर गया था. मेरे अंकल मीशा और आण्टी गाल्या का बेटा दीम्का, इतना प्यारा है. वो लोग लेनिनग्राद (पेरेस्त्रोयका के बाद – पीटरबुर्ग – अनु.) में रहते हैं. जब मेरे पास समय होगा तो मैं ये भी बताऊँगा कि मैं और दीम्का इस ख़ूबसूरत शहर में कितना घूमे और हमने वहाँ क्या क्या देखा. ये बेहद दिलचस्प और मज़ेदार किस्सा है.

मगर अभी तो मैं आपको सीधा सादा किस्सा सुनाने जा रहा हूँ, कि कैसे मुझे मम्मा के पास मॉस्को फ्लाइट से आना पड़ा. ये भी मज़ेदार है, क्योंकि ये एक एड़वेन्चर था.

वैसे तो मैं हवाई जहाज़ से सफ़र कर चुका हूँ, मगर अकेले, बिना किसी की सहायता के, एक भी बार नहीं गया! अंकल मीशा मुझे हवाई जहाज़ में बिठा देने वाले थे. मैं सही-सलामत मॉस्को पहुंच जाऊँगा, और हवाई अड्डे पर मम्मा और पापा मुझे लेने आने वाले थे. हमने इतनी सीधी सादी और बढ़िया प्लानिंग की थी.

मगर शाम को, जब मैं अंकल मीशा के साथ लेनिनग्राद एअरपोर्ट पहुँचा, तो पता चला कि कहीं कुछ फ्लाइट्स में देरी हो गई थी, और इसके कारण मॉस्को की फ्लाइट्स न पकड़ सकने वाले काफ़ी सारे लोग एअरपोर्ट पर इकट्ठे हो गए थे, और एक ऊँचा, तगड़ा अंकल हमें समझा रहा था कि परिस्थिति ऐसी है: मॉस्को जाने वाले लोग काफ़ी हैं, और हवाई जहाज़ है सिर्फ एक, और इसलिए, जो इस हवाई जहाज़ में घुस जाएगा, वही मॉस्को जा पाएगा. मैंने क़सम खाई कि इसी जहाज़ में घुसूंगा: क्योंकि मॉस्को में मेरे पापा जो आने वाले हैं एअरपोर्ट पे.

ये “ख़ुशख़बर” सुनकर अंकल मीशा ने मुझसे कहा:

 “जैसे ही हवाई जहाज़ में बैठेगा, मेरी ओर देखकर हाथ हिला देना, तब मैं फ़ौरन टेलिफ़ोन की ओर भागूँगा, तुम्हारे पापा को फोन कर दूँगा, कि तुम यहाँ से उड़ चुके हो, वो जागेंगे, कपड़े पहनेंगे और एअरपोर्ट पर तुझे लेने आ जाएँगे. समझ गया?”
मैंने कहा:
 “सब समझ गया!”

और मैं अंकल मीशा के बारे में सोचने लगा : ‘कितने भले और सज्जन हैं अंकल मीशा. कोई और होता तो बस मुझे पहुँचा देता, और बस! मगर ये मेरे मम्मा पापा को फ़ोन भी करने वाले हैं. और मैं रिले-रेस के बेटन की तरह रहूँगा. अंकल फ़ोन करेंगे और पापा मुझे लेने आ जाएँगे, और मैं उनके बिना हवाई जहाज़ में सिर्फ एक घण्टा रहूँगा, और वहाँ भी, मतलब, हवाई जहाज़ में, सब अपने ही हैं. डरने की कोई बात नहीं है!’

मैंने ज़ोर से कहा:
 “आप गुस्सा न करना कि मेरे कारण बस परेशानी ही होती है, मैं जल्दी ही हवाई जहाज़ में अकेले, अपने आप सफ़र करना सीख लूँगा, और आपको इतनी तकलीफ़ नहीं दूँग़ा...”
  “ये आप क्या कह रहे हैं, डियर सर! मैं बहुत ख़ुश हूँ! दीम्का भी तुझसे मिलकर बेहद ख़ुश था! और गाल्या आण्टी! चल, ये पकड़!” उन्होंने मेरी ओर टिकट बढ़ाया और चुप हो गए. मैं भी चुप हो गया.

और, तभी अचानक हवाई जहाज़ में ‘बोर्डिंग’ शुरू हो गई. ये तो भगदड़ ही हो रही थी. सब लोग हवाई जहाज़ की ओर लपके, और सबसे आगे भाग रहा था मैं, मेरे पीछे थे बाकी लोग.

मैं सीढ़ी तक पहुँचा, वहाँ ऊपर दो लड़कियाँ खड़ी थीं. बेहद ख़ूबसूरत. मैं भागते हुए उन तक पहुँचा और अपना टिकट बढ़ा दिया. उन्होंने मुझसे पूछा:
 “क्या तू अकेला है?”

मैंने उन्हें सारी बात बताई और प्लेन के अन्दर गया. मैं खिड़की पास बैठ गया और बिदा करने वालों की भीड़ को देखने लगा. अंकल मीशा पास ही में थे, मैं उनकी तरफ़ देखकर हाथ हिलाने लगा, और मुस्कुराने लगा. उन्होंने इस मुस्कुराहट को पकड़ लिया, मुझे सैल्यूट किया और फ़ौरन पलटकर टेलिफ़ोन की तरफ़ बढ़े, जिससे मेरे पापा को फ़ोन कर सकें. मैंने साँस छोड़ी और इधर उधर देखने लगा. लोग बहुत ज़्यादा थे, और सभी जल्दी-जल्दी बैठने की और उड़ने की कोशिश कर रहे थे. रात हो चली थी. आख़िर में सब बैठ गए, सबने अपना-अपना सामान रख दिया, और मैंने सुना कि इंजिन शुरू हो गया है. वह बड़ी देर तक गूँ-गूँ करता रहा और चिंघाड़ता रहा. मैं उकता गया.       

मैं सीट पर पीछे की ओर टिककर बैठ गया और हौले से आँखें बन्द कर लीं, जिससे कुछ देर ऊँघ लूँ. फिर मैंने सुना, कि हवाई जहाज़ चल पड़ा, और मैंने पूरा मुँह खोल लिया, जिससे दाँतों में दर्द न हो. फिर मेरे पास एअर-होस्टेस आई, मैंने आँखें खोलीं – उसके पास ट्रे में सौ या हज़ार छोटी छोटी खट्टी, और पेपरमिंट की गोलियाँ थीं. मेरी पड़ोसन ने पहले एक गोली उठाई, फिर दूसरी, मगर मैंने एकदम पाँच उठा लीं और तीन, चार, पाँच और ले लीं. गोलियाँ स्वादिष्ट हैं, क्लास के लड़कों को दूँगा. वे ख़ुशी ख़ुशी ले लेंगे, क्योंकि ये गोलियाँ हवाई हैं, हवाई जहाज़ से आई हैं. अगर न चाहो, तो भी ले लेते हो. एअर-होस्टेस खड़े खड़े मुस्कुरा रही थी: जैसे कह रही हो, चाहे जितनी ले लो, हमें कोई अफ़सोस नहीं है! मैं गोली चूसने लगा और अचानक मुझे महसूस हुआ कि हवाई जहाज़ लैण्डिंग कर रहा है. मैं खिड़की से चिपक गया.
मेरी पड़ोसन ने कहा:
 “देख, कितनी जल्दी आ गए!”

अब मैंने देखा कि हमारे सामने कई सारी बत्तियाँ प्रकट हो गई हैं. मैंने पड़ोसन से कहा:
 “ आप देखिए – मॉस्को!”

वो देखने लगी और अचानक मोटी आवाज़ में गाने लगी:
 “मॉस्को मेरा, ख़ूबसूरत...”

मगर तभी परदे के पीछे से एअरहोस्टेस बाहर आई, वही वाली, जो सबको गोलियाँ दे रही थी. मैं ख़ुश हो गया, कि अब वह और गोलियाँ देगी. मगर उसने कहा:
 “कॉम्रेड, पैसेंजर्स, मौसम ख़राब होने की वजह से मॉस्को का हवाई अड्डा बन्द कर दिया गया है. हम वापस लेनिनग्राद आ गए हैं. अगली फ्लाईट सुबह सात बजे जाएगी. रात भर के लिए किसी तरह बन्दोबस्त कर लीजिए.”
मेरी पड़ोसन ने फ़ौरन गाना बन्द कर दिया. चारों तरफ़ लोग ग़ुस्से से शोर मचाने लगे.

लोग सीढ़ी से उतरे और चुपचाप अपने अपने घरों को चल दिए, जिससे सुबह वापस आ जाएँ. मुझे तो याद ही नहीं था कि मीशा अंकल कहाँ रहते हैं. मुझे ये भी मालूम नहीं था कि उनके घर तक कैसे जाना चाहिए. मुझे उन लोगों के साथ रहना पड़ा, जिनके पास रात को रुकने के लिए जगह नहीं थी. ऐसे लोग भी काफ़ी सारे थे, और हम सब रेस्टॉरेंट की ओर चले खाना खाने के लिए. मैं भी उनके पीछे पीछे चला. सब मेज़ों पर बैठ गए. मैं भी बैठ गया.

मैंने एक जगह पकड़ ली. वहाँ पास ही में टेलिफ़ोन-बूथ था, इंटरसिटी. मैंने मॉस्को का नंबर घुमाया. क्या ख़याल है, फ़ोन किसने उठाया होगा? मेरी अपनी मम्मा ने. उसने कहा:
 “हैलो!”
 मैंने कहा:
 “हैलो!”
उसने कहा:
 “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है. आपको कौन चाहिए?”
मैंने कहा:
 “अनास्तासिया वासिल्येव्ना.”
उसने कहा:
 “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है! क्या मारिया पेत्रोव्ना?”
मैंने कहा:
 “तुम! तुम! तुम! मम्मा, ये तुम्हीं हो ना?”
उसने कहा:
 “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है. एक एक अक्षर अलग अलग करके बोलिए.”
मैंने कहा:
 “एम-ए, एम-ए. मम्मा, ये मैं हूँ.”
उसने कहा:
 डेनिस्का, ये तू है?”
मैंने कहा:
 “मेरी फ्लाइट कल सुबह सात बजे की है. हमारा मॉस्को का एअरपोर्ट बन्द है, वैसे सब ठीक ठाक है. पी-ए पी-ए क-ओ म-उ-झ-से मि-ल-ने को कहो!”
उसने कहा:
 “अच्-छा!”
मैंने कहा:
 “तो, अप-ना ख़-या-ल र-ख-ना!”
उसने कहा:
 “इं-त-ज़ा-र करूँगी! पापा तुझे लेने के लिए ठीक सात बजे निकलेंगे!”

मैंने रिसीवर रख दिया, और मेरे दिल में एकदम हल्कापन महसूस हुआ. तब मैं खाना खाने गया. मैंने कटलेट्स और पास्टा का ऑर्डर दिया, एक गिलास चाय भी मंगवाई. खाते खाते, यहाँ की चौड़ी-चौड़ी, आरामदेह कुर्सियाँ देखकर मैंने सोचा: “ओ-ओ, इन कुर्सियों पर आराम से सोया जा सकता है”.
मगर जब तक मैं खाता रहा, बड़े अचरज की बात हुई:  आधे ही मिनट के बाद मैंने देखा कि सब की सब कुर्सियाँ भर गई हैं. और मैंने सोचा: “कोई बात नहीं, मैं कोई सामन्त-वामन्त तो नहीं हूँ, फ़र्श पर भी सो जाऊँगा! कित्ती सारी जगह है!”

फिर एक आश्चर्य! आधे ही सेकण्ड में क्या देखता हूँ – पूरा फ़र्श लोगों से भर गया है: पैसेंजर्स,  शॉपिंग बैग्स, सूटकेसेस, थैलियाँ, बच्चे भी; पैर रखने की भी जगह नहीं थी. मुझे ग़ुस्सा भी आ गया!
फिर मैं बैठे हुए, लेटे हुए, अधलेटे लोगों के बीच से जाने लगा. बस, यूँ ही टर्मिनल पे घूमने निकल पड़ा.

इस सोये हुए शहर में घूमना आसान नहीं था. मैंने घड़ी पर नज़र डाली. साढ़े ग्यारह बज गए थे.
फिर अचानक मैं एक दरवाज़े तक पहुँचा, जिस पर लिखा था: “इंटर-सिटी टेलिफ़ोन”. मैं ख़ुश हो गया! यहाँ आराम से सोया जा सकता है. मैंने हौले से गद्देदार दरवाज़ा खोला.

स्टॉप! अचानक उछल पड़ा: वहाँ पहले से ही दो लोग थे. दो अंकल. फ़ौजी अफ़सर. वे मेरी तरफ़ देख रहे थे, और मैं उनकी तरफ़.   
फिर मैंने कहा:
”आप लोग कौन हैं?”
तब उनमें से एक, मूँछों वाले ने कहा:
 “हम लावारिस हैं!”
मुझे उन पर दया आई, और मैंने बेवकूफ़ी से पूछा:
 “और आपके माँ-बाप कहाँ हैं?”
मूँछों वाले ने रोनी सूरत बनाई और जैसे रोते रोते बोला:
“प्लीज़, मेहेरबानी करो, मेरे पापा को ढूँढ़ दो!”
और दूसरा, जो उससे जवान था, शेर की तरह ठहाके लगाने लगा. तब मुझे समझ में आया कि मूँछों वाला मज़ाक कर रहा है, क्योंकि अब वह भी हँसने लगा था, और उनके साथ मैं भी हँसने लगा. अब हम तीनों ही हँस रहे थे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और मेरे लिए जगह बना दी. मुझे गर्माहट महसूस होने लगी, मगर वहाँ तंग भी था और तकलीफ़देह भी, क्योंकि हर समय टेलिफ़ॉन बज रहा था और तेज़ रोशनी का बल्ब जल रहा था.

तब हमने एक अख़बार पे मोटे मोटे अक्षरों से लिखा: “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”, और जवान फ़ौजी ने बल्ब निकाल दिया. आवाज़ें बन्द हो गईं, रोशनी भी नहीं है. एक मिनट बाद बड़े दोस्त इस तरह खर्राटे लेने लगे, कि बस – ग़ज़ब! ऐसा लग रहा था जैसे वे बड़े बड़े लट्ठों को बड़ी बड़ी आरियों से काट रहे हैं. सोना तो असंभव था.

मैं लेटे लेटे अपने कारनामे के बारे में सोच रहा था. मज़ाकिया लग रहा था, और मैं पूरे समय अंधेरे में मुस्कुराता रहा.

अचानक एक ज़ोरदार, खनखनाती आवाज़ गूँजी:
 “लेनिनग्राद-मॉस्को फ़्लाइट से जाने वाले मुसाफ़िर ध्यान दें! हवाई जहाज़ “TU- 104” क्रमांक  52-48, पन्द्रह मिनट बाद, चार बजकर पचपन मिनट पर अतिरिक्त उड़ान भरने वाला है. बोर्डिंग के लिए पैसेंजर्स कृपया अपने टिकट दिखाकर दो नंबर के गेट से प्रस्थान करें!”

मैं फ़ौरन उछला, जैसे मुझे शॉक लगा हो, और अपने पड़ोसियों को जगाने लगा. मैंने धीमी आवाज़ में, मगर साफ़ साफ़ उनसे कहा:
 “ख़तरा! ख़तरा! उठो, ये ऑर्डर है!”
वे फ़ौरन उछल पड़े, और मुच्छड़ ने टटोल कर बल्ब वापस लगा दिया.
मैंने उन्हें समझाया कि बात क्या है. मुच्छड़ ने फ़ौरन कहा:
 “शाबाश, बच्चे!”
अब मैं तेरे साथ किसी भी मिशन पर जाऊँगा.
मतलब, अपने लावारिसों को तूने छोड़ा नहीं?”
मैंने कहा:
 “क्या कह रहे हैं, ऐसा कैसे हो सकता है!”

हम गेट नम्बर 2 की ओर भागे और हवाई जहाज़ में चढ़ गए.

यहाँ ख़ूबसूरत एयरहोस्टेस नहीं थीं, मगर हमें कोई फ़रक नहीं पड़ता था. और जब हम हवा में ऊपर उठे, तो छोटा वाला फ़ौजी अचानक ठहाका मार कर हँस पड़ा.
 “तू क्या कर रहा है?” मूँछों वाले ने उससे पूछा.
 “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”, उसने जवाब दिया. “ हा-हा-हा!” “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”!...”
 “हम वो कागज़ निकालना भूल गए,” मूँछों वाले ने जवाब दिया.

क़रीब चालीस मिनट बाद हम सही सलामत मॉस्को में उतर गए, और जब बाहर निकले, तो पता चला कि हमें लेने कोई भी नहीं आया है.

मैंने अपने पापा को ढूँढ़ा. वो नहीं आए थे...कहीं भी नहीं दिखे.

मैं समझ नहीं पा रहा था कि घर कैसे पहुंचूं. मैं निराश हो गया. रोने रोने को हो गया. और मैं, शायद रो ही पड़ता, मगर अचानक मेरे पास रात वाले दोस्त आए, मूँछों वाला और छोटा वाला.
मूँछों वाले ने कहा:
 “क्या, पापा नहीं आए?”
मैंने कहा:
 “नहीं मिले.”
जवान फ़ौजी ने पूछा:
 “तूने उन्हें कितने बजे आने के लिए कहा था?”
मैंने कहा:
 “मैंने उनसे कहा था कि जो फ़्लाइट सुबह सात बजे निकलती है, उस पे आ जाना.”
जवान फ़ौजी बोला:
 “समझ गया! यहाँ ग़लतफ़हमी हुई है. क्योंकि हम तो पाँच बजे की फ़्लाइट से निकले थे!”
मूँछों वाला हमारी बातचीत में शामिल हो गया:
 “मिलेंगे, कहीं नहीं जाएँगे! और, क्या तू कभी ‘कज़्लिक’ में गया है?”
मैंने कहा:
 “पहली बार सुन रहा हूँ! ये ‘कज़्लिक’ क्या चीज़ है?”
उसने जवाब दिया:
 “अभी देख.”
और उन्होंने अपने हाथ हिलाए.

एअरपोर्ट के प्रवेशद्वार पे एक छोटी सी कार आई, बेहद गन्दी और धब्बों वाली. फ़ौजी ड्राइवर का चेहरा मुस्कुरा रहा था.
मेरे फ़ौजी दोस्त कार में बैठ गए.

जब वे उसमें बैठ गए, तो मुझे उदासी ने घेर लिया. मैं खड़ा था और समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ. बहुत दुखी था. मैं, बस, खड़ा था. मूँछों वाले ने खिड़की से सिर निकालकर पूछा:
 “तू कहाँ रहता है?”
मैंने जवाब दे दिया.
उसने ड्राइवर से कहा:
 “अलीयेव! एहसान का बदला चुकाना चाहिए?”
वह कार से बोला:
 “करेक्ट!”
मूँछों वाला मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया:
“आ जा, डेनिस्का, ड्राइवर की बगल में बैठ जा. तुझे पता चलेगा कि फ़ौजी कैसे मदद करते हैं.”

ड्राइवर दोस्ताना अंदाज़ में मुस्कुराया. मुझे लगा, कि वो अंकल मीशा जैसा है.

 “बैठ जा, बैठ जा. हवा की स्पीड से ले चलूँगा!” उसने भर्राई आवाज़ में कहा.

मैं फ़ौरन उसकी बगल में बैठ गया. मुझे ख़ुशी हो रही थी. ऐसे होते हैं फ़ौजी! उनके साथ रहो, तो ज़रा भी नहीं भटकोगे.”

मैंने ज़ोर से कहा:
 “करेत्नी र्‍याद स्ट्रीट!”

ड्राइवर ने चाभी घुमाई. हम चल पड़े.

मैं चिल्लाया:
 “हुर्रे!”



*****    

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

Mera Dost Bhaloo

मेरा दोस्त भालू
                
                                               लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास  

एक बार मैं क्रिसमस ट्री सेलेब्रेशन के लिए सोकोल्निकी गया. हम सब को नीले कार्डबोर्ड के डिब्बे जैसा एक एक टिकट दिया गया था, वह छोटी सी किताब की तरह मुड़ा हुआ था, और कवर-पेज पर सुनहरे अक्षरों में चमचमा रहा था: “हैपी न्यू इयर!” और, जब टिकट खुलता, तो उसके पन्नों के बीच फ़ट् से  एक सजी-धजी क्रिसमस ट्री खड़ी हो जाती, और उसके चारों ओर गरम कोट और लम्बे-लम्बे कानों वाली टोपियाँ पहने कई जानवर, जैसे ख़रगोश और लोमड़ियाँ, पिछले पैरों पर खड़े हो जाते. ये बहुत बढ़िया बनाया गया था, और, सिर्फ इस टिकट के कारण मैंने फ़ौरन उनके पास सोकोल्निकी जाने का प्लान बना लिया. मैं ये देखना चाहता था कि उन्होंने वहाँ लड़कों के लिए और क्या क्या बनाया है. इससे पहले मैं सिर्फ अपने स्कूल की क्रिसमस ट्री पर जाता था या घर की क्रिसमस ट्री सजाता. इन क्रिसमस-ट्रीज़ पर बेहद मज़ा आता था, मगर उनमें जानवर नहीं होते थे. ऐसे वाले नहीं. इसलिए मैंने सोचा कि सोकोल्निकी ज़रूर जाऊँगा. मैं निकल पड़ा. हालाँकि टिकट पर लिखा था “आरंभ – ठीक 2 बजे”, फिर भी मैं ढ़ाई बजे पहुँचा, क्योंकि मुझे देर हो गई थी. हर मज़ेदार मौक़े पर मैं लेट ही हो जाता हूँ, - कुछ न कुछ हो ही जाता है. एक बार थियेटर पहुँचा, और स्टेज पर किसी लड़के ने एक सफ़ेद बालों वाली लड़की को ‘किस’ किया, तभी सब लोगों ने तालियाँ बजाईं और चिल्लाने लगे “ब्रेवो”, “वन्स मोर”. अब छत के नीचे लाइट कौंधी, और ये लड़का और उसकी लड़की इस तरह झुक-झुक कर पब्लिक का अभिवादन करने लगे, जैसे उन्होंने कोई चमत्कार कर दिया हो. और भी कई बार मैं लेट हो गया था. मुझे याद है, कि एक बार मम्मा ने केक बनाया और बोली:
 “आधा घण्टा घूम ले और जल्दी से आ जा, केक है!”
मैंने और मीश्का ने कम्पाऊण्ड में हॉकी की प्रैक्टिस की, और मैं फ़ौरन घर आ गया, मगर हमारा घर मेहमानों से भरा था, और मम्मा ने कहा:
 “देर कर दी, भाई! तुम्हारी केक हम खा गए! किचन में जा!”
मैं किचन में गया, वहाँ मुझे जैली और सूप दिया गया. केक के बदले ये क्या है? कोई मुक़ाबला ही नहीं है.
इस बार भी, हालाँकि मैं सात बजे उठ गया, मगर बेकार के काम करता रहा और क्रिसमस ट्री पर लेट हो गया.
सोकोल्निकी में इत्ती भीड थी! चारों ओर मुर्गियों के पैरों पर छोटे-छोटे घर बने थे, जैसे बाबा-ईगा का घर होता है, और मज़ेदार, बर्ड-हाऊस जैसे, चटखदार रंग में रंगे, सजे हुए और दोस्ताना घर. उनमें किताबें, मिठाइयाँ, डोनट्स या पैनकेक्स बेच रहे थे. सोकोल्निकी में बर्फ़ से बनी हुई बड़ी-बड़ी आकृतियाँ, ख़ूबसूरत घोड़े, डराने वाले ड्रैगन्स भी थे, और था एक मरा हुआ सिर, जिससे लड़ रहा था अविजित रुस्लान. तैंतीस भीमकाय हीरो बनाए गए थे, और हँस-राजकुमारी थी, स्पेस-शिप, ऐसा लगता था कि इन आकृतियों और प्रदर्शनियों का कोई अंत ही नहीं था, मैं एक आकृति से दूसरी की ओर जा रहा था, मुझे बहुत मज़ेदार लग रहा था, क्योंकि मैं भी आकृतियाँ बनाता हूँ, इसलिए इस बर्फीली ख़ूबसूरती से दूर नहीं हट सका और एक एक क़दम बढ़ाते बढ़ाते मैंने इस बात पर ग़ौर ही नहीं किया कि मैं लोगों से दूर इस वीथी पर बने जंगल में चला आया हूँ, मैंने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि रास्ता बार-बार मुड़ रहा था और लूप बना रहा था, और कुछ आकृतियाँ क़तार में नहीं, बल्कि कहीं बीच में रखी थीं, और मैं धीरे-धीरे थोड़ा सा भटक गया था.
इस समय आसमान से बर्फ गिरना शुरू हो गई, चारों ओर अंधेरा छाने लगा, और मुझे ऐसा लगा कि अगर मैं इन बर्फ़ के टीलों के क़रीब से इसी रास्ते से वापस जाऊँगा, तो काफ़ी समय लग जाएगा. मैंने छोटे रास्ते से जाने का फ़ैसला किया और सीधे, जंगल के बीच से, होकर जाने लगा, क्योंकि मुझे क़रीब-क़रीब ये तो पता था कि क्रिसमस ट्री कहाँ है. मुझे याद था कि मैं कहाँ से आया था, इसलिए मैं काफ़ी ख़ुश-ख़ुश वापस संकरी, बर्फ़ से ढंकी पगडंडी पर भागने लगा. वो भी चारों ओर जा रही थी: दाएँ, बाएँ, और हर तरफ़, और रास्ते के ऐसे हिस्से भी थे कि कह नहीं सकते थे कि मेट्रो कहाँ है, बड़ी क्रिसमस-ट्री कहाँ है और लोग कहाँ हैं.
इस तरह मैं काफ़ी देर तक भागता रहा और थकने लगा, परेशान भी होने लगा, मगर अचानक पास ही में मुझे एक सजा हुआ घर दिखाई दिया और मैं फ़ौरन शांत हो गया. इस घर की खिड़की में रोशनी नज़र आ रही थी, मुझे थोड़ी ख़ुशी हुई, और मैं सीधे सामने की ओर उछलने लगा, मगर मैं कुछ ही बार उछला होऊँगा, कि सामने खड़े एक मोटे चीड़ के पेड़ के पीछे से पगड़ण्डी पर एक भारी-भरकम भालू तैश में उछलकर सीधा मेरे सामने कूदा. हॉरिबल! वो गरजा और सीधा मुझ पर झपटा. मेरा तो कलेजा जैसे फट गया. मैं चिल्लाना चाहता था, मगर चिल्ला नहीं पाया. ज़बान चल ही नहीं रही थी. गला एकदम सूख गया. मैं जैसे ज़मीन में गड़ गया और मैंने हाथ ऊपर उठा दिए, मैं मुड़कर वापस भाग जाना चाहता था, मगर मुझे याद आया कि भालू अपने शिकार को शैतानी स्पीड से पकड़ लेता है, और अगर मैं उससे दूर भागूँगा, तो, हो सकता है कि उसे और गुस्सा आ जाए, और तब वह शायद तीन ही छलांगों में मुझे दबोच लेगा और मेरे टुकड़े- टुकड़े कर देगा! मैं ऐसा सोच रहा था, और भालू सीधा मेरे पास आया. वो इंजिन की तरह भक्-भक् कर रहा था, गरज रहा था और पंजे हिला रहा था, और मुझे याद आया कि मैंने पढ़ा था, कि अगर भालू के सामने पड़ जाओ तो अपने आप को कैसे बचाना चाहिए. ऐसा दिखाना चाहिए कि तुम मुर्दा हो, वो मुर्दों को नहीं खाता है! और पलक झपकते ही मैं ज़मीन पर गिर पड़ा और आँखें बन्द कर लीं, साँस रोकने की कोशिश करने लगा, मगर फिर भी साँस तो मैं ले ही रहा था, क्योंकि ये सब दौड़ने की वजह से हुआ था, और मेरा पेट धौंकनी की तरह चल रहा था. मैंने सुना कि भालू मेरे पास भागते हुए आ रहा है, और मैंने सोचा: “हो गया! अब मेरे टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे!” मगर वह मेरे नज़दीक नहीं आया...
और इस एक सेकण्ड में मैंने इतना कुछ सोचा, अपने आप से वो बुदबुदाता रहा!...
इस बारे में किसीको नहीं बताऊँगा. कभी भी नहीं और किसी को भी नहीं. मगर फिर उत्सुकता मुझे बेचैन करने लगी. मैंनो सोचा: ‘ताज्जुब है, आख़िर भालू बच्चे को उठाता कैसे होगा? इस बारे में तो सिर्फ किताबों में पढ़ते हो, मगर सचमुच में देखने का मौका फिर कभी नहीं मिलेगा.’ और, मैंने धीरे धीरे अपनी बाईं आँख खोलना शुरू किया. वो मुश्किल से खुल रही थी, क्योंकि या तो डर लग रहा था, या पलकें कसके चिपक गई थीं, पता नहीं, मगर कोशिश करके आँख को खोल ही लिया. देखता क्या हूँ, कि भालू मेरे ऊपर खड़ा है, पिछले ही पैरों पर, और उसके चेहरे पर ऐसे भाव हैं, जैसे उसे मालूम ही न हो कि अब क्या करे. और मेरे दिमाग़ में फिर से बिजली की तरह एक ख़याल कौंध गया. मुझे अपने आप को बचाने का एक और उपाय याद आ गया. भालू बहुत डरपोक होता है, और किसी भी तरह उसे डराने की कोशिश करनी चाहिए. हो सकता है, कि मुझे ज़ोर से चिल्लाना चाहिए? और मैंने बेवकूफ़-इवान वाली कहानी की तरह फ़ौरन सोच लिया:
 ‘जो होना है, हो! दो बार मरेगा नहीं, एक से बचेगा नहीं!’
और मैं ख़ौफ़नाक आवाज़ में चिल्लाया:
 “ भा s s  यहाँ से!”
भालू थरथराया और एक ओर को हट गया. वह मुझसे यूँ छिटक गया, जैसे उसे बिजली का शॉक लगा हो. और, जब वो उछला, तो रुका नहीं और मुझसे दूर भागने लगा. वह बड़ी तेज़ी से भाग रहा था और चारों पैरों पर खड़ा नहीं हो रहा था, शायद, बेहद डर गया था और दुनिया की हर चीज़ के बारे में भूल गया था. और मैंने क़रीब दो किलो का बर्फ का गोला उठाया, जो मेरे पास ही पड़ा था, और ऐसे उसकी तरफ़ फेंका, जिससे वह, मतलब, और भी तेज़ी से मुझसे दूर भागे, और समझ जाए कि मेरे साथ मज़ाक करना महंगा पड़ सकता है! ये बर्फ़ का टुकड़ा ठीक उसके सिर पे लगा. टक्! इससे बेहतर हो ही नहीं सकता था. इस मार से भालू लड़खड़ा भी गया. और तभी एक आश्चर्य हुआ!
भालू अचानक रुक गया, मेरी तरफ़ मुड़ा और बोला:
 “बच्चे, बदमाशी न कर!”
 मैं इतना डरा हुआ और उत्तेजित था, कि फ़ौरन इतना भी न समझ पाया कि दुनिया में ऐसा नहीं होता है कि भालू इन्सान की तरह बात करे, मैंने उससे कहा:
 “आप ख़ुद ही बदमाशी न करें! ख़ुद ही तो मुझे खा जाना चाहते थे!”
अब उसने कहा:
 “तू क्या कह रहा है? आर यू सीरियस? तू मुझसे डर गया? कहीं तूने ये तो नहीं सोच लिया कि मैं असली भालू हूँ? डर मत, डर मत, मैं भालू नहीं हूँ! मैं आर्टिस्ट हूँ! समझा? मैं तो तुझसे मज़ाक करना चाहता था, मगर तू बेहोश हो गया...आर्टिस्ट हूँ...”
मेरे दिल से एकदम बोझ उतर गया...मैं हँसने लगा. वाक़ई में, मैं भी कितना बेवकूफ़ हूँ! मैं ये भी भूल गया कि क्रिसमस-ट्री के प्रोग्राम में आर्टिस्ट अक्सर भालू की पोषाक पहन लेते हैं, जिससे बच्चों का मनोरंजन करें, और ये, ज़ाहिर था, कि वो ऐसा ही आर्टिस्ट था. मैं शांत हो गया और बोला:
 “और साबित कैसे करोगे?”
उसने कहा:
 “ये देख.”
उसने अपना सिर उतारा. जैसे लकड़ी के खंभे से घड़ा. जैसे टोपी. बस, उतार दिया. बेहद ख़ूबसूरत था सिर, बड़े बड़े दांत और चमकदार-लाल जीभ वाला. रोंएदार, और आँखें चमकदार. आर्टिस्ट ने उसे अपने फ़ैले हुए हाथों पर रखा और बोला:
 “चल, ये ले! पकड़, डर मत. मैं कुछ देर ताज़ी हवा में सांस ले लूँ, कुछ देर सुस्ता लूँ. बेहद भारी है. और तू आराम से चक्कर खा गया, ये तो अच्छा हुआ, कि ये मेरा नहीं है, और अगर ये असली होता तो, क्या होता, आँ?” 
और वह अपना असली सिर घुमाने लगा. असली वाला बड़ा बेडौल था. गंजा. गोल-गोल दयनीय आँखें...
तो, ऐसा भी होता है. अभी अभी तो मैं डर के मारे मरा जा रहा था, और अब बगल में, ख़रबूज़े की तरह.  भालू का सिर दबाए खड़ा हूँ, और इस डरावने सिर का मालिक एक आर्टिस्ट है. मेरा मुँह खुला था, मगर आर्टिस्ट मेरी ओर देखकर मुस्कुराया. फिर वह थोड़ा सा कँपकँपाया और बोला:
 “दिल में दर्द होता है...मुझे उत्तेजित नहीं होना चाहिए. और भागना नहीं चाहिए. चल, मुझे छोड़ दे.”
उसने मेरी ओर पंजा, मतलब हाथ बढ़ाया, और हम उस घर की तरफ़ बढ़े जो पास ही में था. मैं इसी घर की तरफ़ कुछ देर पहले भाग कर आया था. हम पहुँचने ही वाले थे, कि अचानक झाड़ी में से एक जोकर उछलकर बाहर आया और मुझे भालू के साथ देखकर चिल्लाने लगा:
”अव्राशोव, ये क्या है? आप कहाँ हैं? देर हो रही है! जल्दी करो, हमें अभी बुक्स-सिटी के पास डान्स करना है.”
 “क्या?” आर्टिस्ट-भालू चीख़ा. “और डान्स करना है? मैं आज पाँच बार डान्स कर चुका हूँ! मेरे लिए इतना ही बहुत है!...क्या सब लोगों का दिमाग़ चल गया है?”
“गुसाझिन ने कहा है,” जोकर ने कहा, “उसका आइडिया है. हमें लोगों को हँसाना होगा. चल, भागें!”
 “मेरे दिल में दर्द है,” आर्टिस्ट-भालू ने कहा, “और, गोशा, तुम हो कि ‘भागें!’.
धीरे धीरे जाएँगे. चल, बच्चे,” उसने मुझसे कहा, “मुझे मेरा सिर दे दे, कुछ नहीं किया जा सकता.” उसने एक बार फिर अपनी दयनीय आँखों से मेरी तरफ़ देखा और मुँह टेढ़ा करके मुस्कुराया: “तो, थके हुए बूढे, चल अपना अपना शेक्सपियर खोजें!”  
मैं कुछ भी नहीं समझ पाया. कैसा थका हुआ बूढ़ा? कौन थका हुआ बूढ़ा? कहाँ? मगर अभी इसके लिए वक़्त नहीं था और मैंने उसे भालू का सिर पहनने में मदद की.
उसने अपने नाख़ूनों वाले पंजों से मुझसे हाथ मिलाया.
 “उधर जा,” उसने एक तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “अभी मैं वहाँ डान्स करने वाला हूँ.”
और मैं उस तरफ़ चल पड़ा, जहाँ उसने इशारा किया था, और जल्दी ही वहाँ पहुँच गया, वहाँ कई सारे आर्टिस्ट्स थे, वे सवाल पूछ रहे थे, और बच्चे तुकबन्दी में जवाब दे रहे थे. ये ‘बोरिंग’ था, मगर अचानक जोकर प्रकट हुआ. वह एक तांबे का बर्तन बजा रहा था, और उसके पीछे पीछे मेरा दोस्त भालू लड़खड़ाते हुए चल रहा था. जोकर रो रहा था, और छींक रहा था, और जादू दिखा रहा था, और फिर उसने जेब से एक छोटा सा बाजा निकाला और उस पर ऊँगलियाँ फेरने लगा. और भालू ने अपनी जगह पर पैर से ताल देना शुरू कर दिया, और, आख़िर में, ज़ाहिर है, वह जोश में आकर डान्स करने लगा. वह ठीक-ठाक ही डान्स कर रहा था, और मुड़ रहा था, झुक रहा था, और गरज रहा था, और बच्चों की ओर लपक रहा था, और वे, हँसते हुए पीछे की ओर उछल रहे थे. उसने कई बार हँसाने वाले कारनामे किए, ये सब बड़ी देर तक चलता रहा. मैं एक ओर खड़ा होकर इंतज़ार कर रहा था, कि उसका प्रोग्राम कब ख़तम होता है, क्योंकि, चाहे जो भी हो जाए, मुझे एक बार फिर उसका इन्सानी चेहरा, उसकी दयनीय थकी हुई गोल-गोल आँखें देखना था.


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शनिवार, 12 दिसंबर 2015

My sister - Ksenia


क्सेनिया - मेरी बहना

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


एक बार, एक आम तरह का ही दिन था. मैं स्कूल से आया, थोड़ा सा खाया और खिड़की की सिल पर चढ़ गया. बहुत दिनों से मेरा दिल खिड़की के पास बैठने, आने जाने वालों को देखने और ख़ुद कुछ भी न करने को चाह रहा था. इस समय इस बात के लिए एकदम सही मौक़ा था. और, मैं खिड़की की सिल पर बैठ गया, और ख़ुद निठल्लापन करने लगा. इसी समय पापा उड़ते हुए कमरे में आए.
उन्होंने कहा:
 “ ‘बोर’ हो रहा है?”
मैंने जवाब दिया:
 “ओह, नहीं...बस यूँ ही...और, मम्मा आख़िर कब आएगी? पूरे दस दिनों से घर पे नहीं है!”
पापा ने कहा:
 “खिड़की पकड़! कस के पकड़, वर्ना सिर के बल उड़ने लगेगा.”
मैंने सावधानी के लिए खिड़की की फ्रेम कस के पकड़ ली और कहा:
 “क्या बात है?”
वो एक कदम पीछे हटे, जेब से कोई कागज़ निकाला, उसे दूर से ही दिखाया और बोले:
 “एक घण्टे बाद मम्मा आ रही है! ये रहा टेलिग्राम! तुझे बताने के लिए मैं सीधा काम से भागा भागा आया! खाना नहीं खाएँगे, सब एक साथ ही खाएँगे, मैं उसे रिसीव करने जा रहा हूँ, और तू कमरा ठीक ठाक करके हमारा इंतज़ार कर! डन?”
मैं फ़ौरन खिड़की से कूदा:
 “अफ़कोर्स, डन! हुर्रे! भागो, पापा, बुलेट की स्पीड़ से भागो, और मैं ये कर लेता हूँ! बस एक मिनट – और सब तैयार! चकाचक कर देता हूँ! भागो, टाइम मत वेस्ट करो, मम्मा को जल्दी ले आओ!”
पापा दरवाज़े की तरफ़ लपके. और, मैं काम पे लग गया. मेरा इमर्जेन्सी-जॉब शुरू हो गया, जैसे समन्दर में जा रहे जहाज़ पर होता है. इमर्जेन्सी-जॉब – ये डेक को चकाचक करने का काम होता है, और यहाँ तो मौसम शांत है, लहरों पर ख़ामोशी है – इसे निर्वात समय कहते हैं, और हम, नाविक, अपना काम करते रहते हैं.
“वन,टू! शिर्क-शार्क! कुर्सियाँ अपनी अपनी जगह पे! चुपचाप खड़े रहो! झाडू-वाडू! झाडू लगाएगा – फ़ौरन! कॉम्रेड फ़र्श, ये कैसे दिखाई दे रहे हो? चमको! अभ्भी! ऐसे! खाना! मेरी कमाण्ड सुनो! गैस पर, “प्लेटून” दाईं ओर से एक-एक, कड़ाही के पीछे भगौना – खड़े रहो! वन-टू! गाना गाएगा:

पापा सिर्फ तीली से करेंगे
चिर्क!
और आग फ़ौरन जलेगी
फ़िर्क!
गरम होते रहो! ऐसे. देखा, मैंने कैसा बढ़िया काम किया! असिस्टेंट! ऐसे बच्चे पर गर्व होना चाहिए! जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तब पता है मैं क्या बनूंगा? मैं बनूंगा – ओहो! मैं ओहो-हो भी बनूंगा! ओहोहूहाहो! वो बनूंगा मैं!
 मैं खूब देर तक खेलता रहा और जम कर अपनी तारीफ़ करता रहा, जिससे कि मम्मा और पापा का इंतज़ार ‘बोरिंग’ न लगे. आख़िर में दरवाज़ा धड़ाम से खुला, और उसमें फिर से पापा उड़ते हुए अन्दर आए! वो आ गए थे और बेहद उत्तेजित थे, सिर की हैट पीछे खिसक गई थी! वो अकेले ही पूरे ब्रास-बैण्ड ऑर्केस्ट्रा जैसे हो रहे थे, और साथ ही ऑर्केस्ट्रा के डाइरेक्टर भी! पापा हाथ हिला रहे थे.
“ज़ूम-ज़ूम!” पापा चिल्लाए, और मैं समझ गया कि मम्मा के आने की ख़ुशी में ये बड़े बड़े बिगुल बज रहे हैं. “पीख़-पीख़! तांबे की तश्तरियाँ झनझना रही थीं.                      
 इसके बाद कोई बिल्लियों जैसा म्यूज़िक शुरू हो गया. सौ आदमियों का कोरस चिल्लाने लगा. इन सौ आदमियों के लिए पापा अकेले गा रहे थे, मगर चूँकि पापा के पीछे दरवाज़ा खुला था, मैं बाहर कॉरीडोर में भागा, जिससे कि मम्मा से मिल सकूँ.
वह हाथों में एक बण्डल लिए हैंगर के पास खड़ी थी. जब उसने मुझे देखा, तो वह प्यार से मुस्कुराई और हौले से बोली:
 “हैलो, मेरे बच्चे! मेरे बिना तुम कैसे रहे?”
मैंने कहा:
 “मैंने तुम्हें बहुत ‘मिस’ किया.”
मम्मा ने कहा:
 “और, मैं तुम्हारे लिए एक सरप्राइज़ लाई हूँ!”
मैंने कहा:
 “एरोप्लेन?”
मम्मा ने कहा:
”देखो तो सही!”
हम बहुत धीमे से बात कर रहे थे. मम्मा ने बण्डल मेरी तरफ़ बढ़ाया. मैंने उसे ले लिया.
 “ये क्या है, मम्मा?” मैंने पूछा.
 “ये तेरी बहन क्सेनिया है,” उसी तरह धीमे से मम्मा ने कहा.
मैं चुप रहा.
तब मम्मा ने लेस वाला रूमाल हटाया, और मैंने अपनी बहन का चेहरा देखा. 
ये छोsssटा सा चेहरा था, और उसके ऊपर कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था. मैंने उसे पूरी ताक़त से हाथों में पकड़ा.
 “ज़ूम-बूम-त्रूम,” अचानक कमरे से मेरी बगल में पापा प्रकट हुए. उनका ऑर्केस्ट्रा अभी भी गरज रहा था.
 “अटेन्शन,” पापा ने अनाऊन्सर की आवाज़ में कहा, “छोटे बच्चे डेनिस्का को छोटी-सी बहना क्सेनिया इनाम में दी जाती है. पंजों से सिर तक की लम्बाई पचास सेंटीमीटर्स, सिर से एड़ियों तक – पचपन! वज़न तीन किलो दो सौ पचास ग्राम्स, पैकेजिंग को छोड़कर.
वो मेरे सामने पालथी मार के बैठ गए और मेरे हाथों के नीचे अपने हाथ लगा दिए, शायद, डर रहे थे, कि मैं क्सेनिया को गिरा दूँगा. उन्होंने मम्मा से अपनी नॉर्मल आवाज़ में पूछा:
 “और, ये किसके जैसी है?”
 “तुम्हारे जैसी,” मम्मा ने कहा.
 “ओह, नो!” पापा चहके. “अपने स्कार्फ़ में ये हमारी रिपब्लिक की ख़ूबसूरत फ़ोक-आर्टिस्ट कोर्चागिना-अलेक्सान्द्रोव्स्काया जैसी लग रही है, जिसे अपनी जवानी में मैं बहुत पसन्द करता था. अक्सर मैंने देखा है, कि अपनी ज़िन्दगी के आरंभ के कुछ दिनों में सभी छोटे बच्चे प्रसिद्ध आर्टिस्ट कोर्चागिना-अलेक्सान्द्रोव्स्काया जैसे लगते हैं. ख़ासकर नाक तो बेहद मिलती-जुलती है.
नाक तो एकदम निगाहों में भर जाती है.”
मैं अपनी बहन क्सेनिया को हाथों में लिए खड़ा ही रहा, जैसे बेवकूफ़ लिखे हुए झोले को लटकाए चलता है, और मुस्कुरा रहा था.
मम्मा उत्तेजना से बोली:
 “होशियारी से, प्लीज़, डेनिस, गिरा न देना.”
मैंने कहा:
 “क्या कहती हो, मम्मा? परेशान न हो! मैं बच्चों की पूरी साइकिल एक, बाएँ, हाथ में पकड़ लेता हूँ, क्या मैं इत्ती छोटी सी चीज़ को गिरा दूँगा?”
पापा ने कहा:
 “शाम को इसे नहलाएँगे! तैयार रहना!”
उन्होंने मेरे हाथों से बण्डल ले लिया, जिसमें क्सेनिया लिपटी थी, और चल पड़े. मैं भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा, और मेरे पीछे – मम्मा. हमने क्सेनिया को अलमारी की बाहर निकली हुई दराज़ में सुला दिया, और वह आराम से वहाँ पड़ी रही.
पापा ने कहा:
 “ये सिर्फ अभी के लिए, एक रात के लिए है. कल मैं इसके लिए छोटा सा पलंग ख़रीदूँगा, और वह पलंग पे सोया करेगी. और तू, डेनिस, चाभियों पर नज़र रख, जिससे कोई तेरी छोटी सी बहना को अलमारी में बन्द न कर दे. वर्ना बाद में ढूँढ़ते रहेंगे कि वो कहाँ चली गई...”
और, हम खाना खाने बैठे. मैं हर एक मिनट बाद उछल कर क्सेनिया को देख लेता. वह पूरे समय सोती रही. मुझे अचरज हुआ, और मैंने ऊँगली से उसका गाल छू लिया. गाल नरम-नरम था, बिल्कुल मक्खन  जैसा. अब, जब मैंने ध्यान से उसे देखा, तो पाया कि उसकी लम्बी-लम्बी काली पलकें हैं....
शाम को हम उसे नहलाने लगे. हमने पापा की मेज़ पर छोटा सा पाइप वाला टब रखा और वहाँ कई सारे गरम और ठण्डे पानी से भरे बर्तन ले आए. क्सेनिया अपने ड्रावर में लेटी रही और नहाने का इंतज़ार करती रही. वो, ज़ाहिर है, परेशान हो रही थी, क्योंकि ड्रावर चरमरा रहा था, दरवाज़े की तरह, और पापा, उल्टे, पूरे समय उसका मूड ठीक रखने की कोशिश कर रहे थे, जिससे कि वह ज़्यादा डरे नहीं. पापा इधर उधर पानी और तौलिए लिए घूम रहे थे, उन्होंने अपनी जैकेट उतारी, आस्तीनें चढ़ा लीं और ख़ुशामद करते हुए ज़ोर से चिल्लाए:
 “हमारे घर में सबसे बढ़िया कौन तैरता है? कौन सबसे बढ़िया गोते लगाता है? कौन सबसे बढ़िया बबल्स बनाता है?”


और, क्सेनिया का चेहरा ऐसा था, कि वही सबसे बढ़िया गोते लगाती है – पापा की ख़ुशामद काम कर गई. मगर जब उसे नहलाने लगे, तो उसके चेहरे पर इतना डर छा गया, कि देखो, भले आदमियों: सगे माँ-बाप अपनी बेटी को डुबा रहे हैं, और उसने एडी से टटोलते हुए टब की तली पा ली, उस पर एड़ी टिका ली और तभी कुछ शांत हुई, चेहरा कुछ सामान्य हुआ, अब वो इतना दुखी नहीं लग रहा था, और उसने अपने ऊपर पानी डालने दिया, मगर फिर भी उसके मन में शक ही था, अचानक पापा ने उसे थोड़ा सा पानी में डुबाया, उसका दम घुटने लगा...मैं फ़ौरन मम्मा की कुहनी के नीचे से निकला और क्सेनिया को अपनी ऊँगली थमा दी, और, ज़ाहिर है, मैं समझ गया था और मैंने वही किया जो करना चाहिए था, उसने मेरी ऊँगली पकड ली और पूरी तरह शांत हो गई. बच्ची ने इतनी बदहवासी से, इतनी कस कर मेरी ऊँगली पकड़ ली, जैसे डूबता हुआ इन्सान तिनके को पकड़ता है. और, मुझे उस पर दया आई, कि वह मेरा ही सहारा ले रही है, अपनी चिड़ियों जैसी ऊँगलियों की पूरी ताक़त से मुझे पकड़े हुए है, और इन ऊँगलियों से साफ़ महसूस हो रहा है कि अपनी बेशकीमती ज़िन्दगी के लिए वह अकेले मुझ पर ही भरोसा कर रही है और यह, कि ईमानदारी से कहूँ तो, ये सब नहाना-वहाना उसके लिए दुखदायी है, डरावना है, और ख़तरनाक है, और धमकीभरा है, और उसे ख़ुद को बचाना चाहिए: अपने ताक़तवर और बहादुर, बड़े भाई की ऊँगली थाम लेना चाहिए. और जब मैं ये सारी बात समझ गया, जब मैं समझ गया कि उस बेचारी को कितनी मुश्किल हो रही है, कितना डर लग रहा है, तो मैं फ़ौरन उससे प्यार करने लगा.

सोमवार, 17 अगस्त 2015

Wonderful Idea

वंडरफुल आइडिया

                                                                             लेखक: विक्टर द्रागून्स्की 
                                                                                        अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


क्लासेज़ ख़त्म होने के बाद मैंने और मीश्का ने अपना-अपना बैग उठाया और घर जाने लगे. सड़क गीली, कीचड़ से भरी, मगर ख़ुशनुमा थी. अभी-अभी भारी बारिश हुई थी, और डामर ऐसे चमक रहा था जैसे नया हो, हवा ताज़गी भरी और साफ़-सुथरी थी, पानी के डबरों में घरों की और आसमान की परछाई पड़ रही थी, और अगर कोई पहाड़ी की तरफ़ से उतरे, तो किनारे पे, फुटपाथ के पास, गरजते हुए पानी की बड़ी भारी धार बह रही थी, मानो पहाड़ी नदी हो. ख़ूबसूरत धार - भूरी, उसमें बवण्डर थे, भँवर थे, तेज़ लहरें थीं. सड़क के कोने पे, ज़मीन में एक जाली बनाई गई थी, और यहाँ पानी पूरी तरह से बेक़ाबू हो रहा था, वह नाच रहा था और फ़ेन उगल रहा था, कलकल कर रहा था, जैसे सर्कस का म्यूज़िक हो, या, फिर इस तरह बुदबुदा रहा था जैसे फ़्रायपैन में तला जा रहा हो. आह, कितना ख़ूबसूरत...

मीश्का ने जैसे ही ये सब देखा, फ़ौरन जेब से माचिस की डिबिया निकाल ली. मैंने पाल बनाने के लिए उसे डिबिया से दियासलाई निकाल कर दी, कागज़ का टुकड़ा दिया, हमने पाल बनाया और ये सब माचिस की डिबिया में घुसा दिया. फ़ौरन एक छोटा सा जहाज़ बन गया. हमने उसे पानी में छोड़ा, और वह फ़ौरन तूफ़ानी गति से चल पड़ा. वह इधर उधर हिचकोले खा रहा था, लहरें उसे थपेड़े लगा रही थीं, वह उछलता और आगे चल पड़ता, कभी कुछ देर ठहर जाता और कभी एकदम सौ नॉटिकल माईल्स की गति से भागने लगता. हमने फ़ौरन कमाण्ड्स देना शुरू कर दिया, क्योंकि अचानक ही हम कैप्टन और नेवीगेटर बन गए थे – मैं और मीश्का. जब जहाज़ उथली जगह पर ठहर जाता तो हम चिल्लाते:

 -पीछे चल – चुख़-चुख़-चुख़!                
 - पूरी तरह पीछे – चुख़-चुख़-चुख़!
 - एकदम पूरी तरह पीछे – चुख़-चुख़-चुख़-चाख़-चाख़-चाख़!
और मैं ऊँगली से जहाज़ को जिधर चाहे उधर मोड़ता, और मीश्का गरजता : 
 - स्टार्ट! ऊह – दब रहा है! ये ठीक है! पूरा आगे! चुख़-चुख़-चुख़!

इस तरह बदहवास चीख़ें निकालते हुए हम पागलों की तरह जहाज़ के पीछे-पीछे भाग रहे थे और भागते-भागते हम कोने तक पहुँचे, जहाँ जाली लगी थी, और अचानक हमारा जहाज़ पलट गया, भँवर में गोते लगाने लगा, और देखते-देखते नाक के बल उलट गया, टकराया और जाली में गिर गया.
मीश्का ने कहा:
 “अफ़सोस की बात है. डूब गया...”
और मैंने कहा:
 “हाँ, उफ़नता सैलाब उसे निगल गया. चल, नया जहाज़ छोडेंगे?”
मगर मीश्का ने सिर हिलाते हुए कहा:
 “संभव नहीं है. आज मुझे देर से घर पहुँचना मना है. आज पापा की ड्यूटी है.”
मैंने कहा:
 “किस बात की?”
 “उनकी बारी है,” मीश्का ने जवाब दिया.
 “नहीं,” मैंने कहा, “तू समझा नहीं. मैं पूछ रहा हूँ, कि तेरे पापा की किस काम की ड्यूटी है? किस काम की? सफ़ाई करने की? या मेज़ सजाने की?”
 “मेरे हिसाब से,” मीश्का ने कहा, “पापा की ड्यूटी मेरे साथ लगी है. उन्होंने और मम्मा ने इस तरह से अपनी-अपनी बारी लगाई है: एक दिन मम्मा, दूसरे दिन पापा. आज पापा की बारी है. कहीं मुझे खाना खिलाने के लिए ऑफ़िस से न आ गए हों, और ख़ुद जल्दी मचाते हैं, उन्हें वापस भी तो जाना होता है ना!”
”मीश्का, तू भी ना, इन्सान नहीं है!” तुझे ख़ुद अपने पापा को खाना खिलाना चाहिए, और यहाँ तो एक ‘बिज़ी’ आदमी काम से आता है ऐसे ठस दिमाग़ को खाना खिलाने! तू आठ साल का हो गया है! दूल्हे मियाँ!”
 “मम्मा को मुझ पर विश्वास ही नहीं होता. तू ऐसा मत सोच,” मीश्का ने कहा. “मैं घर में मदद तो करता हूँ, अभी पिछले ही हफ़्ते मैं उनके लिए ब्रेड लाया था...”
 “उनके लिए!” मैंने कहा. “उनके लिए! ज़रा देखिए, वो खाते हैं, और हमारा मीशेन्का सिर्फ हवा खाकर ही ज़िन्दा रहता है! ऐह, तू भी ना!”
मीश्का लाल हो गया और बोला:
 “चल, अपने-अपने घर जाएँगे!”

हमने अपनी चाल तेज़ कर दी. जब हम अपने-अपने घर की तरफ़ आने लगे तो मीश्का ने कहा:
 “हर रोज़ मैं अपना फ्लैट नहीं पहचान पाता. सभी बिल्डिंगें बिल्कुल एक जैसी हैं, बहुत उलझन होती है. क्या तू पहचान जाता है?”
 “नहीं, मैं भी नहीं पहचान पाता,” मैंने कहा, “अपनी बिल्डिंग का एंट्रेन्स ही नहीं पहचान पाता. ये हरा है, वो भी हरा है, सब हरे हैं...सब एक जैसे हैं, सब नये-नये हैं, और बालकनियाँ भी बिल्कुल एक जैसी हैं. सिर्फ मुसीबत.”
 “तो फिर तू क्या करता है?” मीश्का ने पूछा.
 “इंतज़ार करता हूँ, जब तक मम्मा बालकनी में नहीं आ जाती.”
 “वो तो कोई और मम्मा भी बालकनी में आ सकती है! तू दूसरी के यहाँ भी जा सकता है...”
 “क्या कह रहा है तू,” मैंने कहा, “मैं तो हज़ारों अनजान मम्माओं में से अपनी मम्मा को पहचान लूँगा.”
 “कैसे” मीश्का ने पूछा.
 “चेहरे से,” मैंने जवाब दिया.
 “पिछली पेरेन्ट्स मीटिंग में सारे पेरेंट्स आए थे, और कोस्तिकोव की दादी मेरे पापा के साथ जा रही थी,” मीश्का ने कहा, “तो, कोस्तिकोव की दादी ने कहा कि क्लास में तेरी मम्मा सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत है.”
 “बकवास,” मैंने कहा, “तेरी मम्मा भी ख़ूबसूरत है!”
 “बेशक,” मीश्का ने कहा, “मगर कोस्तिकोव की दादी ने कहा कि तेरी मम्मा सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत है.”

 अब हम बिल्कुल अपनी बिल्डिंग्स तक पहुँच गए. मीश्का परेशानी से इधर-उधर देखने लगा और घबराने लगा, मगर तभी कोई एक दादी-माँ हमारे पास आई और बोली:
 “ओह, ये तुम हो, मीशेन्का? क्या हुआ? मालूम नहीं है कि कहाँ रहते हो, हाँ? हमेशा की प्रॉब्लेम. ठीक है, चल, मैं तेरी पड़ोसन हूँ, घर तक ले जाऊँगी. उसने मीश्का का हाथ पकड़ा, और मुझसे बोली:
 “हम एक ही फ्लोर पे रहते हैं.”

और वो लोग चले गए. मीश्का ख़ुशी-ख़ुशी उसके साथ जा रहा था. मगर मैं अकेला रह गया बेनाम की इन एक जैसी गलियों में, बिना नंबरों वाली बिल्डिंग्स के बीच में और बिल्कुल भी सोच नहीं पा रहा था कि जाऊँ तो किधर जाऊँ, मगर मैंने तय कर लिया कि हिम्मत नहीं हारूँगा और मैं पहली ही बिल्डिंग की सीढ़ियाँ चढ़कर चौथी मंज़िल पर पहुँच गया. ये बिल्डिंगें तो कुल अठारह ही हैं, तो, अगर मैं सभी बिल्डिंगों की चौथी मंज़िल पर गया, तो घण्टे-दो घण्टे में अपने घर ज़रूर पहुँच जाऊँगा, ये पक्की बात है.

हमारी सभी बिल्डिंग्स में, हर दरवाज़े पर, बाईं ओर लाल बटन वाली घंटी लगी है. तो, मैं चौथी मंज़िल पर पहुँचा और मैंने घण्टी का बटन दबाया. दरवाज़ा खुला, उसमें से लम्बी, मुड़ी हुई नाक बाहर निकली और दरवाज़े की दरार से चीख़ी: “रद्दी पेपर नहीं हैं! कितनी बार बताऊँ!”

मैंने कहा, “सॉरी” और नीचे उतरा. हो गई गलती, क्या कर सकते हैं. फिर मैं अगली बिल्डिंग में घुसा. मैं घण्टी बजा भी नहीं पाया था कि दरवाज़े के पीछे से कोई कुत्ता इतनी भयानक, भर्राई हुई आवाज़ में भौंका कि मैं उस शिकारी कुत्ते के झपटने का इंतज़ार किए बगैर फ़ौरन भाग कर नीचे आ गया. अगली बिल्डिंग में, चौथी मंज़िल पर, एक लम्बी लड़की ने दरवाज़ा खोला और मुझे देखकर ख़ुशी से तालियाँ बजाते हुए चिल्लाने लगी:

 “वोलोद्या! पापा! मारिया सेम्योनोव्ना! साशा! सब लोग यहाँ आओ! छठवाँ!” कमरों से लोगों का एक झुण्ड बाहर आ गया, वो सब मेरी तरफ़ देख रहे थे, और ठहाके लगा रहे थे, तालियाँ बजा रहे थे, और गा रहे थे:
 “छठवाँ! ओय-ओय! छठवाँ! छठवाँ!...”
मैं आँखें फ़ाड़कर उनकी ओर देख रहा था. क्या पागल हैं? मैं बुरा मान गया:
यहाँ तो भूख लगी है, और पैर दर्द कर रहे हैं, और घर के बदले अनजान लोगों के बीच पहुँच गया, और वो मुझ पर हंस रहे हैं...
 मगर वह लड़की, ज़ाहिर था कि, समझ गई थी, कि मुझे अच्छा नहीं लग रहा है.
 “तुम्हारा नाम क्या है?” उसने पूछा और मेरे सामने पालथी मारकर बैठ गई, वह अपनी नीली-नीली आँखों से मेरी आँखों में देख रही थी.
 “डेनिस,” मैंने जवाब दिया.
उसने कहा: “तू बुरा न मान, डेनिस! सिर्फ, आज तू छठवाँ बच्चा है जो हमारे यहाँ आ गया. वो सब भी भटक गए थे. ये ले, तेरे लिए, एपल, खा ले, तेरी ताक़त वापस आ जाएगी.”
मैं एपल नहीं ले रहा था.
 “ले ले, प्लीज़,” उसने कहा, “मेरी ख़ातिर. मुझ पर मेहरबानी कर.”
 “सुन,” लड़की ने कहा, “मुझे ऐसा लगता है कि मैंने तुझे हमारे सामने वाली बिल्डिंग से निकलते हुए देखा है. तू एक बेहद ख़ूबसूरत औरत के साथ निकला था. वो तेरी मम्मा है?”
 “बेशक,” मैंने कहा, “मेरी मम्मा क्लास में सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत है.”
अब सब लोग फिर से हँस पड़े. बिना किसी वजह के. मगर लड़की ने कहा: “चल, तू भाग. अगर चाहे, तो हमारे यहाँ आया करना.”

मैंने ‘थैंक्यू’ कहा और उस लम्बी लड़की ने जिधर इशारा किया था, उस तरफ़ भागा. मैं घण्टी का बटन दबा भी नहीं पाया था कि दरवाज़ा खुल गया, और देहलीज़ पर खड़ी थी – मेरी मम्मा! उसने कहा:
 “हमेशा तेरा इंतज़ार करना पड़ता है!”
मैंने कहा: “भयानक स्टोरी है! मेरे पैर दुख रहे हैं, क्योंकि मैं अपनी बिल्डिंग नहीं ढूँढ़ पा रहा था. मुझे मालूम ही नहीं है कि हमारी बिल्डिंग कौन सी है, सारी बिल्डिंगें बिल्कुल एक जैसी जो हैं. मीश्का के साथ भी ऐसा ही हुआ! कोई भी अपनी बिल्डिंग नहीं ढूँढ पाता है! मैं आज का छठवाँ बच्चा था...और, मुझे भूख लगी है!”

और मैंने मम्मा को रद्दी पेपर वाली टेढ़ी नाक के बारे में, गुर्राते हुए खूँखार कुत्ते के बारे में और लम्बी लड़की और एपल के बारे में बताया.
 “तेरे लिए कोई निशान बनाना चाहिए,” पापा ने कहा, “जिससे की तू अपनी बिल्डिंग पहचान ले.
मैं बहुत ख़ुश हो गया:
 “पापा! मैंने सोच लिया! प्लीज़, हमारी बिल्डिंग पे मम्मा की तस्वीर लगा दो! मुझे दूर से ही पता चल जाएगा कि मैं कहाँ रहता हूँ!”
मम्मा हँसने लगी और बोली:
 “चल, बेकार की बात न सोच!”
मगर  पापा ने कहा:
 “आख़िर क्यों नहीं? एकदम वण्डरफुल आइडिया है!”


*****