शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

Hello!


हैलो!
लेखिका : नताल्या अब्राम्त्सेवा
अनुवाद : आ, चारुमति रामदास

एक बाग में रहता था एक घर. ख़ूबसूरत, मज़बूत, लकड़ी का – लट्ठे के ऊपर लट्ठा. सर्दियों में घर बर्फ के गर्म कंबल में दुबक कर सोता. सोता और देखता हरे-हरे सपने. हरे – इसलिए, कि घर को दुनिया में सबसे ज़्यादा चमकीला-हरा बसन्त और चटख-लाल गर्मियाँ पसन्द थीं. बसन्त में वह बाग, जिसमें घर रहता था, हरा होना शुरू हो जाता. घास की कोंपलें फूटतीं, सेब के, चेरी के, लिली के पेड़ों पर नन्हीं-नन्हीं पत्तियाँ प्रकट होती. फिर ये पत्तियाँ बड़ी-बड़ी पत्तियों में बदल जातीं, और घास ऊँची, घनी. चमकदार हो जाती. चारों ओर की हर चीज़ हरी-हरी हो जाती. हर चीज़, पोर्च के पास वाले लाल गुलाबों, एक खिड़की के नीचे सफ़ेद डेज़ी और दूसरी के नीचे वाले नीले फूलों को छोड़कर, जिन्हें “बश्माच्की” (“नन्हे जूते” – अनु.) भी कहते हैं.
गर्मियों में घर में हँसमुख, ख़ुशमिजाज़ लोग आते. वे, जिन्हें सैलानी कहते हैं. सैलानियों ने खिड़कियों की फ्रेम्स को हरे रंग में रंगा. और बूढ़े साही को शक्कर के छोटे-छोटे टुकड़े भी खिलाए. मैं ये बताना भूल गई, कि पोर्च के पास एक बूढ़ा साही अपने बिल में रहता था.
तो, ऐसे रहता था घर : हरे बाग में, ख़ुशमिजाज़ लोगों के साथ और पोर्च के पास वाले अपने बूढ़े साही के साथ. आराम से रहता था घर. सब कुछ अच्छा ही रहता, अगर एक अजीब-सा, छोटा-सा इलेक्ट्रिक इंजिन न आया होता. बात ये थी, कि घर के सामने से रेल की पटरियाँ गुज़रती थीं. या, अगर आप चाहें तो ये भी कह सकते हैं : घर रेल की पटरियों के पास था. ये महत्वपूर्ण नहीं है, कि कैसे कहा जाए, मगर, पुरानी पटरियों से गुज़रने वाली सभी रेलगाड़ियों से घर की दोस्ती थीं.
रेलगाड़ियाँ काफ़ी दिलचस्प बातें बताती थीं. ये आ रही है – साउथ एक्स्प्रेस. टुक्-टुक्-टुक् – पहिए खड़खड़ाते हैं. ये साउथ एक्स्प्रेस सुनाती है पीले नींबुओं और नीले समन्दर के बारे में. फ़िर से जानी पहचानी टुक्-टुक्-टुक् – ये है नॉर्थ एक्स्प्रेस. उसकी कहानी – नॉर्थ की चमचमाती बर्फ़ और काली चट्टानों के बारे में है.
काफ़ी सालों तक अच्छे पड़ोसियों की तरह हिल मिल कर रहे घर और रेल की पटरियाँ – उसकी रेलों समेत. सब कुछ अच्छा ही होता, अगर एक छोटा-सा इलेक्ट्रिक इंजिन न प्रकट होता. ये एक असाधारण रूप से व्यस्त इलेक्ट्रिक इंजिन था. वह कई बार घर के पास से गुज़रता, कुछ भी नहीं कहता और बेहद कर्कश सीटी बजाता.
“कैसा अजीब है ये,” घर सोचता, “ वह बहुत व्यस्त है, उसके पास बहुत काम है. ये बात मैं समझता हूँ. मगर फ़िर इतनी ज़ोर से सीटी क्यों बजाना?” अचरज से घर की चिमनी हिलने लगती. “जैसे ही मुझे देखता है, सीटी बजाने लगता है. बहुत अजीब है!”
घर ने बर्दाश्त किया, बर्दाश्त किया, मगर एक दिन उसके सब्र का बाँध टूट ही गया. उसने फ़ैसला कर लिया कि पुरानी, रिहायशी जगह को छोड़कर कहीं दूर चला जाएगा, जहाँ छोटे-से इलेक्ट्रिक इंजिन की सीटी न सुनाई दे. पोर्च राज़ी हो गया. तहखाना, अटारी और छत भी तैयार हो गए. मगर एक खिड़की बड़ी देर तक राज़ी नहीं हुई, वो, जो “बश्माकी” फूलों की ओर देखा करती थी. मगर आख़िरकार सबने मिलकर उसे मना ही लिया. भट्टी के पाइप ने अपनी परिचित गिलहरी से सलाह-मशविरा किया और पता लगाया कि बगल में ही, जंगल में एक बहुत अच्छा मैदान है. घर ने वहीं पर बसने का फ़ैसला किया.
जाने-पहचाने बाग से, हंसते-खेलते सैलानियों से, बूढ़े साही से जुदा होना बेशक बहुत बुरा लग रहा था. अफ़सोस था, मगर इलेक्ट्रिक इंजिन काफ़ी दर्दभरी ज़ोरदार सीटी बजा रहा था. एक बार घर ने सकुचाहट से अपने फ़र्श को चरमराते हुए कहा भी:
“मेरे प्यारे बाग़, और आप, हँसमुख लोगों, और तू, बूढ़े साही, समय आ गया है बिदा लेने का. मैं जंगल में जा रहा हूँ. वहाँ अकेला रहूँगा, क्योंकि इस छोटे इलेक्ट्रिक इंजिन ने मेरी बेइज़्ज़ती की है. वो मुझ पर सीटी क्यों बजाता है?!
और घर ने निकलते हुए एक पोर्च उठाया. मगर ये क्या!...हरा-हरा बाग बुरा मान गया और सरसराते हुए बोला:
“बेश—क, बे—श—क...हरे-हरे जंगल में तू फ़ौरन मेरे बारे में भू-ऊ-ऊ-ऊ-ल जाएगा. क्योंकि जंगल, शायद, मुझसे, तेरे बाग से, ज़्यादा हरा है.”
और हँसमुख सैलानी उदास-उदास हो गए और बुरा मानते हुए बोले:
“बेहद अफ़सोस है, मगर हमें तो अपने शहर के क्वार्टर्स में लौटना पड़ेगा. हम ऐसे घर में तो नहीं ना रह सकते, जो जंग़ल में हो. वहाँ रेलगाड़ी नहीं है. हम अपने काम के लिए शहर कैसे जाएँगे?”
और वे लोग अपने-अपनी सूटकेस भरने लगे.
और बूढ़ा साही, जो पोर्च के पास रहता था, बोला:
“जाओ-जाओ, जिसे जाना है जाओ. मगर मैं तो यहीं रहूँगा. मेरा ख़याल है, कि अगर इलेक्ट्रिक इंजिन सीटी बजाता है, तो इसकी कोई-न-कोई वजह ज़रूर होगी.”
“हाँ,” घर ने सोचा, “गड़बड़ हो रही है. मैं लोगों की गर्मियाँ ख़राब कर रहा हूँ. और बाग भी अकेला रह जाएगा. और बूढ़ा साही, शायद, बुरा मान गया है. क्या रुक जाऊँ? ना जाऊँ?”
मगर इसी समय छोटा इलेक्ट्रिक इंजिन कानों को बहरा करते हुए सीटी बजाने लगा. और घर ने फिर से जाने के लिए पोर्च को उठाया. सिर्फ बूढ़े साही ने उसे रोका.
“ठहर,” उसने कहा, “थोड़ा ठहर. कहीं तू सचमुच तो नहीं जा रहा है?”
अरे, पता नहीं, मालूम नहीं कि क्या करना चाहिए!” बूढ़ा घर रोते-रोते चरमराया. “मुझे लगता है, कि इलेक्ट्रिक इंजिन मेरी हँसी उड़ाता है. सिर्फ हँसी उड़ाता है! वर्ना, मुझे देखते ही वह सीटी क्यों बजाने लगता है?”
“आह,” बूढ़ा साही बोला. फिर उसने कहा – “ओय-ओय-ओय! आदरणीय घर, मेरा ख़याल है, कि तू बहुत बड़ी गलती कर रहा है. मैं अभी जाकर सारी बात का पता लगाता हूँ.”
बूढ़ा साही रेल-पटरियों की क्रॉसिंग के पास भागा और उसने चौकीदार से एक मिनट के लिए छोटे इंजिन को रोकने के लिए कहा. रेल के चौकीदार को बेहद अचरज हुआ. आज तक किसी भी साही ने उससे कुछ भी नहीं कहा था. अचरज तो हुआ, मगर वह राज़ी हो गया, क्योंकि वह अच्छा आदमी था.
तो, छोटा इलेक्ट्रिक इंजिन रुक गया, और बूढ़ा साही उससे आदर के साथ, धीमी आवाज़ में बातें करने लगा. जब इलेक्ट्रिक इंजिन को पता चला कि उसकी सीटी की वजह से कितनी मुसीबतें खड़ी हो सकती हैं, तो वह बेहद परेशान हो गया.
“माफ़ कीजिए,” उसने सकुचाते हुए कहा, “मुझे माफ़ कर दीजिए. मेरा कुसूर भी नहीं है. बस, हम एक-दूसरे को समझ नहीं पाए. मैं आपके घर की तौहीन करने के लिए सीटी नहीं बजाता था. बात ये है, कि हम - इलेक्ट्रिक इंजिन, स्टीमर, कोयले के इंजिन सीटियाँ या भोंपू बजाकर एक दूसरे से “हैलो!” कहते हैं. आपका घर रेल-पटरियों की बगल में ही रहता है, तो मैंने सोचा कि वह भी कुछ-कुछ रेलगाड़ी जैसा ही है. मैं सिर्फ सीटी नहीं बजाता था, बल्कि घर से “हैलो!” कहता था, और अब मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कि मुझे क्या करना चाहिए. सीटी बजाना मना है, मगर क्या “हैलो!” ना कहना अच्छी बात है?”
“सुन,” बूढ़ा साही बोला, “क्या तू हौले से हैलो नहीं कह सकता?”
“ऐसे?” छोटा इलेक्ट्रिक इंजिन बोला और उसने हल्की, ख़ुशनुमा सीटी बजाई.
“ये बात!! ये ही तो चाहिए,” बूढ़ा साही ख़ुश हो गया. और सब कुछ पहले जैसा ही रहा. घर अपने हरे बाग में ही रहता है. पोर्च के पास बूढ़ा साही रहता है. गर्मियों में सैलानी लोग आते हैं. और छोटा इलेक्ट्रिक इंजिन करीब से भागते हुए ख़ुशी से, हल्की आवाज़ में सीटी बजाता है.
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शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

The Old Frost and The Young Frost


बूढ़ा हिमराज और जवान हिम कुमार
लिथुआनिया की परी-कथा
अनुवाद : आ. चारुमति रामदास
   एक बार की बात है कि एक बूढ़ा हिमराज  (यहाँ हिमका अर्थ बर्फीली हवा से है – अनु.) रहता था और उसका एक बेटा था – नौजवान हिमकुमार. और इतना शेखीबाज़ था ये बेटा, कि बता नहीं सकते! अगर उसकी बातें सुनो, तो ऐसा लगता कि उससे ज़्यादा होशियार और शक्तिशाली दुनिया में कोई नहीं है. एक बार इस बेटे ने, नौजवान हिमकुमार ने सोचा :
“मेरा बाप बूढ़ा हो गया है! अपना काम अच्छी तरह नहीं कर सकता. मैं तो जवान भी हूँ और शक्तिशाली भी हूँ – लोगों को उससे ज़्यादा ठण्ड से जमा सकता हूँ! मुझसे कोई बच नहीं सकता, मेरा मुकाबला कोई नहीं कर सकता : सबको पछाड़ दूँगा!”
चल पड़ा हिमकुमार, ढूँढ़ने लगा कि किसको ठण्ड से जमाए. उड़ चला रास्ते पर और देखा – एक गाड़ी में ज़मीन्दार जा रहा है. घोड़ा तंदुरुस्त, खाया-पिया है – ज़मीन्दार ख़ुद भी मोटा है, उसका ओवरकोट फ़रका है, खूब गर्म है, पैर कालीन में दुबके हैं.    
हिमकुमार ने ज़मीन्दार को अच्छी तरह से देखा, हँस पड़ा.
“”ऐख,- उसने सोचा, - “तू गरम कपड़ों में कितना ही क्यों न दुबके, फिर भी मुझसे नहीं बच सकता! मेरा बूढ़ा बाप, हो सकता है, इतना अन्दर नहीं घुस पाता, मगर ठहर, मैं इत्ता तेरे भीतर घुसूँगा कि देखता रह जाएगा! ना ही ओवरकोट, ना ही कालीन तुझे बचा पायेंगे!”
हिमकुमार ज़मीन्दार की ओर लपका और लगा उसे पकड़ने: कालीन के नीचे घुसा, और दस्तानों में घुसा, और कॉलर में घुसा, और नाक पर वार करने लगा.
ज़मीन्दार ने अपने नौकर को हुक्म दिया कि घोड़े को ज़ोर से भगाए.
“वर्ना तो”, वह चिल्लाया, “मैं जम जाऊँगा!”
और हिमकुमार और ज़्यादा ताकत से उस पर हमला करने लगा, नाक पर और ज़ोर से वार करने लगा, हाथों और पैरों की उँगलियों को बर्फ बना दिया, साँस लेना मुश्किल कर दिया.
ज़मीन्दार – इधर से उधर, उधर से इधर – और सिकुड़ने लगा, गठरी बन गया, अपनी ही जगह पर गोल-गोल घूमने लगा.
“भगा,” वह चिल्लाया, “और जल्दी भगा!”
इसके बाद तो उसका चिल्लाना भी बन्द हो गया : उसकी आवाज़ ही खो गई.
ज़मीन्दार अपनी हवेली में आया, उसे अधमरी हालत में गाड़ी से उतारा गया.
भागा हिमकुमार बाप के पास, बूढ़े हिमराज के पास. उसके सामने शेखी मारने लगा:
“देखा, मेरा कमाल! देखा मेरा कमाल! तुम कहाँ मेरा मुकाबला कर सकते हो, बाप! देखा, कैसे मैंने ज़मीन्दार को बर्फ बना दिया! देखा, कैसे गर्म ओवरकोट से मैं भीतर घुस गया! तुम तो ऐसे ओवरकोट से नहीं घुस सकते! तुम ऐसे ज़मीन्दार को किसी हालत में बर्फ नहीं बना सकते!”
बूढ़ा हिमराज हँस पड़ा और बोला:
“शेखीबाज़ है तू! अपनी ताकत को पहले आज़मा लेता, फिर शेखी मारता. ये सही है : तूने मोटे ज़मीन्दार को ठण्ड से जमा दिया, उसके गर्म ओवरकोट के भीतर घुस गया. क्या ये कोई बड़ा काम है? ये देखो – ये दुबला-पतला मज़दूर फटे-पुराने कोट में जा रहा है, मरियल घोड़े पर. देख रहे हो?”
“देख रहा हूँ.”
“ये आदमी लकड़ियाँ काटने के लिए जंगल में जा रहा है. तुम उसे ठण्ड से जमाने की कोशिश करो. अगर जमा दिया – तो, यकीन कर लूँगा कि तुम वाकई में ताकतवर हो!”
“ये है नमूना!” जवान हिमकुमार ने जवाब दिया. “ अभ्भी एक पल में मैं उसे जमा दूँगा!”
हिमकुमार चिंघाड़ा, मज़दूर को पकड़ने लपका. पकड़ लिया, उस पर टूट पड़ा और लगा दबाने : कभी एक ओर से हमला करता, कभी दूसरी ओर से, मगर मज़दूर चलता ही रहा. हिमकुमार ने उसके पैर पकड़ने की कोशिश की. मगर मज़दूर अपनी स्लेज से उछला और घोड़े की बगल में दौड़ने लगा.
“अच्छा,” ‘हिमकुमार ने सोचा, “ठहर जा! मैं जंगल में तुझे जमा दूँगा!”
मज़दूर जंगल में आया, उसने कुल्हाड़ी निकाली और लगा पेड़ काटने – चारों ओर छिपटियाँ उड़ने लगीं!
मगर जवान हिमकुमार उसे चैन ही नहीं लेने दे रहा था : हाथों को, पैरों को पकड़ता है, और कॉलर में से भीतर घुसता है...
हिमकुमार जितनी ज़्यादा कोशिश करता, मज़दूर उतनी ही ज़ोर से कुल्हाड़ी चलाता, उतनी ही ताकत से लकड़ियाँ काटता.
वह इतना गर्म हो गया, कि उसने अपने दस्ताने भी उतार दिए.
हिमकुमार बड़ी देर तक मज़दूर पर हमला करता रहा, आख़िरकार वह थक गया.
“कोई बात नहीं,” उसने सोचा, “मैं फिर भी तुझे हरा ही दूँगा! जब तू घर पहुँच जाएगा तो मैं तेरी हड्डियों तक घुस जाऊँगा!”
स्लेज के पास भागा, दस्ताने देखे और उनके भीतर घुस गया. बैठा है और मुस्कुरा रहा है :
“देखूँगा, कि ये मज़दूर अपने दस्ताने कैसे पहनता है : वे तो इतने सख़्त हो गये हैं, कि उनके भीतर उँगलियाँ घुसाना असंभव है!”
हिमकुमार मज़दूर के दस्तानों के भीतर बैठा है, मगर मज़दूर लकड़ियाँ काटे ही जा रहा है.
तब तक काटता रहा, जब तक कि उसकी गाड़ी लकड़ियों से ऊपर तक भर न गई.
“अब,” बोला, “घर जा सकता हूँ!”
मज़दूर ने अपने दस्ताने उठाए, उन्हें पहनने लगा, मगर वे तो जैसे लोहे के हो गए थे.
“अब क्या करेगा?” जवान हिमकुमार अपने आप ही मुस्कुरा रहा था.
मगर जब मज़दूर ने देखा, कि दस्तानों को पहनना नामुमकिन है, तो उसने कुल्हाड़ी उठाई और उन पर वार करने लगा.
मज़दूर दस्तानों पर वार किए जा रहा है, और हिमकुमार भीतर बैठा “आह-ओह!किए जा रहा है.
और मज़दूर ने इतनी ताकत से हिमकुमार की कमर पे वार किए कि वह मुश्किल से जान बचाकर भागा. 
मज़दूर जा रहा है, लकड़ियाँ ले जा रहा है, अपने घोड़े पर चिल्ला रहा है. और जवान हिमकुमार अपने बाप के पास कराहता हुआ आया. बूढ़े हिमराज ने उसे देखा और हँसने लगा :
“क्या हुआ, बेटा, इतनी मुश्किल से क्यों चल रहे हो?”
“जब तक मज़दूर को जमाता रहा, ख़ुद ही मर गया.”
“और तू, बेटा, जवान हिमकुमार, इतने दर्द से क्यों कराह रहा है?”
“मज़दूर ने बड़ी बेदर्दी से कमर तोड़ दी!”
“ये, बेटा, जवान हिमकुमार, तेरे लिए सबक है: निठल्ले-ज़मीन्दारों से मुकाबला करना कोई होशियारी का काम नहीं है, मगर मज़दूर को कभी भी, कोई भी हरा नहीं सकता! ये बात याद रखो!”

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