शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

Fantomas

फ़ैंटोमस*

* (एक काल्पनिक सुपरहीरो)

लेखक: विक्टर  द्रागूनस्की
अनुवाद: आ.चारुमति रामदास


ये तस्वीर भी ग़ज़ब की तस्वीर है! ये है तस्वीर! मैं आपसे सही में कहता हूँ, कि इस तस्वीर को देखकर कोई भी दीवाना हो सकता है. साधारण तस्वीर को देखने से कोई असर नहीं होता.

मगर “फ़ैंटोमस” – बात ही अलग है! पहली बात, रहस्य! दूसरी, मास्क! तीसरी, एडवेन्चर्स और फ़ाइट्स! और चौथी बात, बेहद इंटरेस्टिंग है, बस!

और, ज़ाहिर है, सारे लड़कों ने, जैसे ही इस तस्वीर को देखा, सब “फ़ैंटोमस-फ़ैंटोमस” खेलने लगे. इसमें सबसे ख़ास है – बेहद ख़तरनाक चिट्ठियाँ लिखना और उन्हें अप्रत्याशित जगहों पर घुसेड़ देना. खूब मज़ा आता है. जिसे भी फ़ैंटोमस वाली चिट्ठी मिलती, फ़ौरन डर के मारे कांपने लगता. बूढ़ी औरतें भी, जो ज़िन्दगी भर प्रवेश द्वार के पास बैठी रहती थीं, अब ज़्यादातर घर में ही रहती हैं. अपनी मुर्गियों के साथ ही सो जाती हैं. बात समझ में भी आती है. आप ख़ुद ही सोचिए: क्या उस बूढ़ी औरत का दिमाग़ ठिकाने पे रह सकता है, जिसे अपने लेटर-बॉक्स में सुबह ही ऐसी मज़ेदार चिठी मिली हो:

‘अपनी गिस-स्टव संबाल! वो उड़ जाने वाला है!’

ऐसे में तो बहादुर से बहादुर बुढ़िया का दिमाग़ भी ख़राब हो जाएगा, और वो पूरे दिन किचन में बैठी रहेगी, अपने गैस-स्टोव की हिफ़ाज़त करेगी और दिन में पाँच बार मॉस्को-गैस को फ़ोन लगाएगी. बड़ा ‘फ़नी’ लगता है. जब मॉस्को-गैस वाली लड़की पूरे दिन कम्पाऊण्ड में घूमती रहती है, और चिल्लाती है:     “ये फ़ैंटोमस फिर से हंगामा कर रहा है! ऊ, सत्यानास हो जाए!” तो ऐसा लगता है कि हँसते-हँसते पेट फूट जाएगा!...

सारे लड़के हँसते रहते हैं और एक दूसरे को आँख़ मारते हैं, और, न जाने कहाँ से बिजली की तेज़ी से नई-नई फ़ैंटोमस की चिट्ठियाँ प्रकट हो जाती हैं, हर फ्लैट में अलग-अलग. जैसे:

’रात को बाहर न निकलना. माड्डालूँगा!’        
या:

‘तेरे बारे में सब जानते है, अपनी बीबी से डर!’

या फिर सिर्फ ऐसी:

‘अपनी फ़ोटो बनवा! सफ़ेद चप्पल में.’

हालाँकि ये सब हर समय मज़ाकिया नहीं होता था , बल्कि बेवकूफ़ी भरा ही होता था, मगर फिर भी हमारे कम्पाऊण्ड में काफ़ी शांति रहने लगी. सब लोग जल्दी सोने लगे, और मिलिशिया कॉम्रेड पार्खोमोव अक्सर हमारे यहाँ दिखाई देने लगा. वह हमें समझाता, कि हमारा खेल – ये बग़ैर किसी मक़सद का, बग़ैर किसी मतलब का खेल है, सिर्फ बेहूदगी है. वो ये भी बताता कि वही खेल अच्छा होता है, जिससे लोगों को कोई फ़ायदा हो – जैसे वोलीबॉल या फिर टाऊन-टाऊन जिनसे हमारी मारने की ताक़त और नज़र का निशाना मज़बूत होते हैं, मगर तुम्हारी चिट्ठियों से कुछ भी मज़बूत नहीं होता, और उनकी किसी को ज़रूरत भी नहीं है, वे सिर्फ आपकी बेवकूफ़ी ज़ाहिर करती हैं.

 “अपनी ड्रेस की तरफ़ ही ध्यान देते,” कॉम्रेड पार्खोमोव कहता. “देखो, जूते!” और उसने मीशा के धूल भरे जूतों की तरफ़ इशारा किया. “स्कूल के स्टूडेण्ट को शाम को ही उन्हें साफ़ करना चाहिए!”

ऐसा काफ़ी दिनों तक चलता रहा, और हम अपने फ़ैंटोमस को थोड़ा आराम देने लगे और सोचने लगे, कि अब बहुत हो गया. बहुत खेल लिए! मगर ऐसा नहीं था!

अचानक हमारे यहाँ एक और फ़ैंटोमस हंगामा मचाने लगा, और वो भी कैसे! बस, भयानक! बात ये हुई कि हमारी बिल्डिंग में एक बूढ़ा टीचर रहता है, वो कब का रिटायर हो चुका है, लम्बा और दुबला पतला, जैसे स्कूल-मैगज़ीन का पात्र – कोल, हाथ में छड़ी भी वैसी ही लिए रहता है – ज़ाहिर है, अपनी ऊँचाई के हिसाब से ली होगी. हमने फ़ौरन उसका नाम कोल येदीनित्सिन रख दिया, मगर फिर अपनी सुविधा के लिए उसे सिर्फ ‘कोल’ कहकर बुलाने लगे.

एक बार मैं सीढ़ियाँ उतर रहा था, तो देखता क्या हूँ कि उसके लेटर-बॉक्स में फ़टी हुई, मुड़ी-तुड़ी चिट्ठी लगी है. पढ़ता हूँ:

“कोल, ऐ कोल!
       चुबाऊँगा तुजमें उकोल*!”

इस चिट्ठी में लाल पेन से सारी गलतियाँ सुधारी गई थीं, और अंत में बड़ा सा ‘1’ ** बना था. और साफ़, सही-सही लिखा था:
“तूने चाहे जैसे भी लिखा हो, इतने गन्दे, ज़मीन पे पड़े हुए कागज़ पे कभी नहीं लिखना चाहिए. एक बात और: सलाह देता हूँ कि ग्रामर का ध्यान रखो.”

दो दिन बाद हमारे ‘कोल’ के दरवाज़े पर नोटबुक का साफ़ कागज़ लटक रहा था. कागज़ पर दबा-दबा कर, जोश से लिखा गया था:

“थूकता हूँ तेरे ग्रमर पे!”

तो, नासपीटा फ़ैंटोमस, ग़ुस्से में आ गया था! एक और सिलसिला शुरू हो रहा था. कितने शर्म की बात है. एक बात अच्छी थी: फ़ैंटोमस की चिट्ठी पूरी तरह लाल पेन्सिल से रंगी थी और नीचे पड़ा था – 2. पहली बार ही की तरह साफ़-साफ़ अक्षरों में ‘नोट’ लिखा था:

“कागज़ काफ़ी साफ़ है. तारीफ़ करता हूँ. सलाह: ग्रामर के नियमों के अलावा, अपनी निरीक्षण शक्ति भी बढ़ाओ, आँख वाली याददाश्त, तब तुम ‘ग्रमर’ नहीं लिखोगे. मैंने तो पिछले ख़त में इस शब्द का प्रयोग किया था. “ग्रामर”. याद रखना चाहिए.”

इस तरह उनके बीच काफ़ी लम्बी ख़तो-किताबत चलती रही. फ़ैंटोमस काफ़ी दिनों तक हमारे ‘कोल’ को क़रीब-क़रीब हर रोज़ ख़त लिखता रहा, मगर ‘कोल’ उसके प्रति वैसा ही कठोर था. छोटी-छोटी गलतियों के लिए भी ‘कोल’ फ़ैंटोमस को अपना फ़ौलादी ‘2’ ही देता था, और ऐसा लगता था कि ये कभी ख़त्म ही नहीं होगा.

मगर एक दिन रईसा इवानोव्ना ने हमें क्लास में डिक्टेशन दिया. कठिन था. डिक्टेशन लिखते-लिखते  हम सब कराह रहे थे, पसीने-पसीने हो रहे थे. दुनियाभर के सबसे कठिन शब्द थे उस डिक्टेशन में. जैसे, अंत में ऐसा वाक्य था: “हम सुखद अंत तक पहुँच ही गए”. इस वाक्य ने सबको परेशान कर दिया. मैंने लिखा: “सखद अंत तक पहुँच गए”. और रईसा इवानोव्ना ने कहा:

”ऐह, तुम, दुखदाई लेखकों, सिर्फ एक मीशा स्लोनोव ने कुछ ढंग का लिखा है, मुझे तुम्हारी सूरत भी नहीं देखनी है! जाओ! टहलो! कल फिर से शुरू करेंगे.”

हम अपने-अपने घर चले गए.        

मैं तो जलन के मारे चरमरा ही गया, जब अगले दिन ‘कोल’ के दरवाज़े पे बर्फ़ जैसे सफ़ेद कागज़ का पन्ना देखा और उस पर ख़ूबसूरत अक्षरों में लिखा था:

“थैंक्यू, ‘कोल! मुझे रूसी भाषा में ‘3’ मिले हैं! ज़िन्दगी में पहली बार! हुर्रे!
तुम्हारी इज़्ज़त करने वाला - फ़ैंटोमस!”

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* उकोल रूसी शब्द है, जिसका अर्थ है – इंजेक्शन है, तुकबन्दी को देखते हुए इसका अनुवाद नहीं किया है – अनु.  

** यदि किसी विद्यार्थी को 1 या 2 नम्बर मिलते हैं, तो वह अनुत्तीर्ण होता है, पास होने के लिए 3, उत्तम – 4, और अतिउत्तम ग्रेड के लिए 5 अंक होना ज़रूरी है.  

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

Adventure

एड़वेन्चर
लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


पिछले शनिवार और इतवार को मैं दीम्का के घर गया था. मेरे अंकल मीशा और आण्टी गाल्या का बेटा दीम्का, इतना प्यारा है. वो लोग लेनिनग्राद (पेरेस्त्रोयका के बाद – पीटरबुर्ग – अनु.) में रहते हैं. जब मेरे पास समय होगा तो मैं ये भी बताऊँगा कि मैं और दीम्का इस ख़ूबसूरत शहर में कितना घूमे और हमने वहाँ क्या क्या देखा. ये बेहद दिलचस्प और मज़ेदार किस्सा है.

मगर अभी तो मैं आपको सीधा सादा किस्सा सुनाने जा रहा हूँ, कि कैसे मुझे मम्मा के पास मॉस्को फ्लाइट से आना पड़ा. ये भी मज़ेदार है, क्योंकि ये एक एड़वेन्चर था.

वैसे तो मैं हवाई जहाज़ से सफ़र कर चुका हूँ, मगर अकेले, बिना किसी की सहायता के, एक भी बार नहीं गया! अंकल मीशा मुझे हवाई जहाज़ में बिठा देने वाले थे. मैं सही-सलामत मॉस्को पहुंच जाऊँगा, और हवाई अड्डे पर मम्मा और पापा मुझे लेने आने वाले थे. हमने इतनी सीधी सादी और बढ़िया प्लानिंग की थी.

मगर शाम को, जब मैं अंकल मीशा के साथ लेनिनग्राद एअरपोर्ट पहुँचा, तो पता चला कि कहीं कुछ फ्लाइट्स में देरी हो गई थी, और इसके कारण मॉस्को की फ्लाइट्स न पकड़ सकने वाले काफ़ी सारे लोग एअरपोर्ट पर इकट्ठे हो गए थे, और एक ऊँचा, तगड़ा अंकल हमें समझा रहा था कि परिस्थिति ऐसी है: मॉस्को जाने वाले लोग काफ़ी हैं, और हवाई जहाज़ है सिर्फ एक, और इसलिए, जो इस हवाई जहाज़ में घुस जाएगा, वही मॉस्को जा पाएगा. मैंने क़सम खाई कि इसी जहाज़ में घुसूंगा: क्योंकि मॉस्को में मेरे पापा जो आने वाले हैं एअरपोर्ट पे.

ये “ख़ुशख़बर” सुनकर अंकल मीशा ने मुझसे कहा:

 “जैसे ही हवाई जहाज़ में बैठेगा, मेरी ओर देखकर हाथ हिला देना, तब मैं फ़ौरन टेलिफ़ोन की ओर भागूँगा, तुम्हारे पापा को फोन कर दूँगा, कि तुम यहाँ से उड़ चुके हो, वो जागेंगे, कपड़े पहनेंगे और एअरपोर्ट पर तुझे लेने आ जाएँगे. समझ गया?”
मैंने कहा:
 “सब समझ गया!”

और मैं अंकल मीशा के बारे में सोचने लगा : ‘कितने भले और सज्जन हैं अंकल मीशा. कोई और होता तो बस मुझे पहुँचा देता, और बस! मगर ये मेरे मम्मा पापा को फ़ोन भी करने वाले हैं. और मैं रिले-रेस के बेटन की तरह रहूँगा. अंकल फ़ोन करेंगे और पापा मुझे लेने आ जाएँगे, और मैं उनके बिना हवाई जहाज़ में सिर्फ एक घण्टा रहूँगा, और वहाँ भी, मतलब, हवाई जहाज़ में, सब अपने ही हैं. डरने की कोई बात नहीं है!’

मैंने ज़ोर से कहा:
 “आप गुस्सा न करना कि मेरे कारण बस परेशानी ही होती है, मैं जल्दी ही हवाई जहाज़ में अकेले, अपने आप सफ़र करना सीख लूँगा, और आपको इतनी तकलीफ़ नहीं दूँग़ा...”
  “ये आप क्या कह रहे हैं, डियर सर! मैं बहुत ख़ुश हूँ! दीम्का भी तुझसे मिलकर बेहद ख़ुश था! और गाल्या आण्टी! चल, ये पकड़!” उन्होंने मेरी ओर टिकट बढ़ाया और चुप हो गए. मैं भी चुप हो गया.

और, तभी अचानक हवाई जहाज़ में ‘बोर्डिंग’ शुरू हो गई. ये तो भगदड़ ही हो रही थी. सब लोग हवाई जहाज़ की ओर लपके, और सबसे आगे भाग रहा था मैं, मेरे पीछे थे बाकी लोग.

मैं सीढ़ी तक पहुँचा, वहाँ ऊपर दो लड़कियाँ खड़ी थीं. बेहद ख़ूबसूरत. मैं भागते हुए उन तक पहुँचा और अपना टिकट बढ़ा दिया. उन्होंने मुझसे पूछा:
 “क्या तू अकेला है?”

मैंने उन्हें सारी बात बताई और प्लेन के अन्दर गया. मैं खिड़की पास बैठ गया और बिदा करने वालों की भीड़ को देखने लगा. अंकल मीशा पास ही में थे, मैं उनकी तरफ़ देखकर हाथ हिलाने लगा, और मुस्कुराने लगा. उन्होंने इस मुस्कुराहट को पकड़ लिया, मुझे सैल्यूट किया और फ़ौरन पलटकर टेलिफ़ोन की तरफ़ बढ़े, जिससे मेरे पापा को फ़ोन कर सकें. मैंने साँस छोड़ी और इधर उधर देखने लगा. लोग बहुत ज़्यादा थे, और सभी जल्दी-जल्दी बैठने की और उड़ने की कोशिश कर रहे थे. रात हो चली थी. आख़िर में सब बैठ गए, सबने अपना-अपना सामान रख दिया, और मैंने सुना कि इंजिन शुरू हो गया है. वह बड़ी देर तक गूँ-गूँ करता रहा और चिंघाड़ता रहा. मैं उकता गया.       

मैं सीट पर पीछे की ओर टिककर बैठ गया और हौले से आँखें बन्द कर लीं, जिससे कुछ देर ऊँघ लूँ. फिर मैंने सुना, कि हवाई जहाज़ चल पड़ा, और मैंने पूरा मुँह खोल लिया, जिससे दाँतों में दर्द न हो. फिर मेरे पास एअर-होस्टेस आई, मैंने आँखें खोलीं – उसके पास ट्रे में सौ या हज़ार छोटी छोटी खट्टी, और पेपरमिंट की गोलियाँ थीं. मेरी पड़ोसन ने पहले एक गोली उठाई, फिर दूसरी, मगर मैंने एकदम पाँच उठा लीं और तीन, चार, पाँच और ले लीं. गोलियाँ स्वादिष्ट हैं, क्लास के लड़कों को दूँगा. वे ख़ुशी ख़ुशी ले लेंगे, क्योंकि ये गोलियाँ हवाई हैं, हवाई जहाज़ से आई हैं. अगर न चाहो, तो भी ले लेते हो. एअर-होस्टेस खड़े खड़े मुस्कुरा रही थी: जैसे कह रही हो, चाहे जितनी ले लो, हमें कोई अफ़सोस नहीं है! मैं गोली चूसने लगा और अचानक मुझे महसूस हुआ कि हवाई जहाज़ लैण्डिंग कर रहा है. मैं खिड़की से चिपक गया.
मेरी पड़ोसन ने कहा:
 “देख, कितनी जल्दी आ गए!”

अब मैंने देखा कि हमारे सामने कई सारी बत्तियाँ प्रकट हो गई हैं. मैंने पड़ोसन से कहा:
 “ आप देखिए – मॉस्को!”

वो देखने लगी और अचानक मोटी आवाज़ में गाने लगी:
 “मॉस्को मेरा, ख़ूबसूरत...”

मगर तभी परदे के पीछे से एअरहोस्टेस बाहर आई, वही वाली, जो सबको गोलियाँ दे रही थी. मैं ख़ुश हो गया, कि अब वह और गोलियाँ देगी. मगर उसने कहा:
 “कॉम्रेड, पैसेंजर्स, मौसम ख़राब होने की वजह से मॉस्को का हवाई अड्डा बन्द कर दिया गया है. हम वापस लेनिनग्राद आ गए हैं. अगली फ्लाईट सुबह सात बजे जाएगी. रात भर के लिए किसी तरह बन्दोबस्त कर लीजिए.”
मेरी पड़ोसन ने फ़ौरन गाना बन्द कर दिया. चारों तरफ़ लोग ग़ुस्से से शोर मचाने लगे.

लोग सीढ़ी से उतरे और चुपचाप अपने अपने घरों को चल दिए, जिससे सुबह वापस आ जाएँ. मुझे तो याद ही नहीं था कि मीशा अंकल कहाँ रहते हैं. मुझे ये भी मालूम नहीं था कि उनके घर तक कैसे जाना चाहिए. मुझे उन लोगों के साथ रहना पड़ा, जिनके पास रात को रुकने के लिए जगह नहीं थी. ऐसे लोग भी काफ़ी सारे थे, और हम सब रेस्टॉरेंट की ओर चले खाना खाने के लिए. मैं भी उनके पीछे पीछे चला. सब मेज़ों पर बैठ गए. मैं भी बैठ गया.

मैंने एक जगह पकड़ ली. वहाँ पास ही में टेलिफ़ोन-बूथ था, इंटरसिटी. मैंने मॉस्को का नंबर घुमाया. क्या ख़याल है, फ़ोन किसने उठाया होगा? मेरी अपनी मम्मा ने. उसने कहा:
 “हैलो!”
 मैंने कहा:
 “हैलो!”
उसने कहा:
 “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है. आपको कौन चाहिए?”
मैंने कहा:
 “अनास्तासिया वासिल्येव्ना.”
उसने कहा:
 “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है! क्या मारिया पेत्रोव्ना?”
मैंने कहा:
 “तुम! तुम! तुम! मम्मा, ये तुम्हीं हो ना?”
उसने कहा:
 “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है. एक एक अक्षर अलग अलग करके बोलिए.”
मैंने कहा:
 “एम-ए, एम-ए. मम्मा, ये मैं हूँ.”
उसने कहा:
 डेनिस्का, ये तू है?”
मैंने कहा:
 “मेरी फ्लाइट कल सुबह सात बजे की है. हमारा मॉस्को का एअरपोर्ट बन्द है, वैसे सब ठीक ठाक है. पी-ए पी-ए क-ओ म-उ-झ-से मि-ल-ने को कहो!”
उसने कहा:
 “अच्-छा!”
मैंने कहा:
 “तो, अप-ना ख़-या-ल र-ख-ना!”
उसने कहा:
 “इं-त-ज़ा-र करूँगी! पापा तुझे लेने के लिए ठीक सात बजे निकलेंगे!”

मैंने रिसीवर रख दिया, और मेरे दिल में एकदम हल्कापन महसूस हुआ. तब मैं खाना खाने गया. मैंने कटलेट्स और पास्टा का ऑर्डर दिया, एक गिलास चाय भी मंगवाई. खाते खाते, यहाँ की चौड़ी-चौड़ी, आरामदेह कुर्सियाँ देखकर मैंने सोचा: “ओ-ओ, इन कुर्सियों पर आराम से सोया जा सकता है”.
मगर जब तक मैं खाता रहा, बड़े अचरज की बात हुई:  आधे ही मिनट के बाद मैंने देखा कि सब की सब कुर्सियाँ भर गई हैं. और मैंने सोचा: “कोई बात नहीं, मैं कोई सामन्त-वामन्त तो नहीं हूँ, फ़र्श पर भी सो जाऊँगा! कित्ती सारी जगह है!”

फिर एक आश्चर्य! आधे ही सेकण्ड में क्या देखता हूँ – पूरा फ़र्श लोगों से भर गया है: पैसेंजर्स,  शॉपिंग बैग्स, सूटकेसेस, थैलियाँ, बच्चे भी; पैर रखने की भी जगह नहीं थी. मुझे ग़ुस्सा भी आ गया!
फिर मैं बैठे हुए, लेटे हुए, अधलेटे लोगों के बीच से जाने लगा. बस, यूँ ही टर्मिनल पे घूमने निकल पड़ा.

इस सोये हुए शहर में घूमना आसान नहीं था. मैंने घड़ी पर नज़र डाली. साढ़े ग्यारह बज गए थे.
फिर अचानक मैं एक दरवाज़े तक पहुँचा, जिस पर लिखा था: “इंटर-सिटी टेलिफ़ोन”. मैं ख़ुश हो गया! यहाँ आराम से सोया जा सकता है. मैंने हौले से गद्देदार दरवाज़ा खोला.

स्टॉप! अचानक उछल पड़ा: वहाँ पहले से ही दो लोग थे. दो अंकल. फ़ौजी अफ़सर. वे मेरी तरफ़ देख रहे थे, और मैं उनकी तरफ़.   
फिर मैंने कहा:
”आप लोग कौन हैं?”
तब उनमें से एक, मूँछों वाले ने कहा:
 “हम लावारिस हैं!”
मुझे उन पर दया आई, और मैंने बेवकूफ़ी से पूछा:
 “और आपके माँ-बाप कहाँ हैं?”
मूँछों वाले ने रोनी सूरत बनाई और जैसे रोते रोते बोला:
“प्लीज़, मेहेरबानी करो, मेरे पापा को ढूँढ़ दो!”
और दूसरा, जो उससे जवान था, शेर की तरह ठहाके लगाने लगा. तब मुझे समझ में आया कि मूँछों वाला मज़ाक कर रहा है, क्योंकि अब वह भी हँसने लगा था, और उनके साथ मैं भी हँसने लगा. अब हम तीनों ही हँस रहे थे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और मेरे लिए जगह बना दी. मुझे गर्माहट महसूस होने लगी, मगर वहाँ तंग भी था और तकलीफ़देह भी, क्योंकि हर समय टेलिफ़ॉन बज रहा था और तेज़ रोशनी का बल्ब जल रहा था.

तब हमने एक अख़बार पे मोटे मोटे अक्षरों से लिखा: “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”, और जवान फ़ौजी ने बल्ब निकाल दिया. आवाज़ें बन्द हो गईं, रोशनी भी नहीं है. एक मिनट बाद बड़े दोस्त इस तरह खर्राटे लेने लगे, कि बस – ग़ज़ब! ऐसा लग रहा था जैसे वे बड़े बड़े लट्ठों को बड़ी बड़ी आरियों से काट रहे हैं. सोना तो असंभव था.

मैं लेटे लेटे अपने कारनामे के बारे में सोच रहा था. मज़ाकिया लग रहा था, और मैं पूरे समय अंधेरे में मुस्कुराता रहा.

अचानक एक ज़ोरदार, खनखनाती आवाज़ गूँजी:
 “लेनिनग्राद-मॉस्को फ़्लाइट से जाने वाले मुसाफ़िर ध्यान दें! हवाई जहाज़ “TU- 104” क्रमांक  52-48, पन्द्रह मिनट बाद, चार बजकर पचपन मिनट पर अतिरिक्त उड़ान भरने वाला है. बोर्डिंग के लिए पैसेंजर्स कृपया अपने टिकट दिखाकर दो नंबर के गेट से प्रस्थान करें!”

मैं फ़ौरन उछला, जैसे मुझे शॉक लगा हो, और अपने पड़ोसियों को जगाने लगा. मैंने धीमी आवाज़ में, मगर साफ़ साफ़ उनसे कहा:
 “ख़तरा! ख़तरा! उठो, ये ऑर्डर है!”
वे फ़ौरन उछल पड़े, और मुच्छड़ ने टटोल कर बल्ब वापस लगा दिया.
मैंने उन्हें समझाया कि बात क्या है. मुच्छड़ ने फ़ौरन कहा:
 “शाबाश, बच्चे!”
अब मैं तेरे साथ किसी भी मिशन पर जाऊँगा.
मतलब, अपने लावारिसों को तूने छोड़ा नहीं?”
मैंने कहा:
 “क्या कह रहे हैं, ऐसा कैसे हो सकता है!”

हम गेट नम्बर 2 की ओर भागे और हवाई जहाज़ में चढ़ गए.

यहाँ ख़ूबसूरत एयरहोस्टेस नहीं थीं, मगर हमें कोई फ़रक नहीं पड़ता था. और जब हम हवा में ऊपर उठे, तो छोटा वाला फ़ौजी अचानक ठहाका मार कर हँस पड़ा.
 “तू क्या कर रहा है?” मूँछों वाले ने उससे पूछा.
 “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”, उसने जवाब दिया. “ हा-हा-हा!” “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”!...”
 “हम वो कागज़ निकालना भूल गए,” मूँछों वाले ने जवाब दिया.

क़रीब चालीस मिनट बाद हम सही सलामत मॉस्को में उतर गए, और जब बाहर निकले, तो पता चला कि हमें लेने कोई भी नहीं आया है.

मैंने अपने पापा को ढूँढ़ा. वो नहीं आए थे...कहीं भी नहीं दिखे.

मैं समझ नहीं पा रहा था कि घर कैसे पहुंचूं. मैं निराश हो गया. रोने रोने को हो गया. और मैं, शायद रो ही पड़ता, मगर अचानक मेरे पास रात वाले दोस्त आए, मूँछों वाला और छोटा वाला.
मूँछों वाले ने कहा:
 “क्या, पापा नहीं आए?”
मैंने कहा:
 “नहीं मिले.”
जवान फ़ौजी ने पूछा:
 “तूने उन्हें कितने बजे आने के लिए कहा था?”
मैंने कहा:
 “मैंने उनसे कहा था कि जो फ़्लाइट सुबह सात बजे निकलती है, उस पे आ जाना.”
जवान फ़ौजी बोला:
 “समझ गया! यहाँ ग़लतफ़हमी हुई है. क्योंकि हम तो पाँच बजे की फ़्लाइट से निकले थे!”
मूँछों वाला हमारी बातचीत में शामिल हो गया:
 “मिलेंगे, कहीं नहीं जाएँगे! और, क्या तू कभी ‘कज़्लिक’ में गया है?”
मैंने कहा:
 “पहली बार सुन रहा हूँ! ये ‘कज़्लिक’ क्या चीज़ है?”
उसने जवाब दिया:
 “अभी देख.”
और उन्होंने अपने हाथ हिलाए.

एअरपोर्ट के प्रवेशद्वार पे एक छोटी सी कार आई, बेहद गन्दी और धब्बों वाली. फ़ौजी ड्राइवर का चेहरा मुस्कुरा रहा था.
मेरे फ़ौजी दोस्त कार में बैठ गए.

जब वे उसमें बैठ गए, तो मुझे उदासी ने घेर लिया. मैं खड़ा था और समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ. बहुत दुखी था. मैं, बस, खड़ा था. मूँछों वाले ने खिड़की से सिर निकालकर पूछा:
 “तू कहाँ रहता है?”
मैंने जवाब दे दिया.
उसने ड्राइवर से कहा:
 “अलीयेव! एहसान का बदला चुकाना चाहिए?”
वह कार से बोला:
 “करेक्ट!”
मूँछों वाला मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया:
“आ जा, डेनिस्का, ड्राइवर की बगल में बैठ जा. तुझे पता चलेगा कि फ़ौजी कैसे मदद करते हैं.”

ड्राइवर दोस्ताना अंदाज़ में मुस्कुराया. मुझे लगा, कि वो अंकल मीशा जैसा है.

 “बैठ जा, बैठ जा. हवा की स्पीड से ले चलूँगा!” उसने भर्राई आवाज़ में कहा.

मैं फ़ौरन उसकी बगल में बैठ गया. मुझे ख़ुशी हो रही थी. ऐसे होते हैं फ़ौजी! उनके साथ रहो, तो ज़रा भी नहीं भटकोगे.”

मैंने ज़ोर से कहा:
 “करेत्नी र्‍याद स्ट्रीट!”

ड्राइवर ने चाभी घुमाई. हम चल पड़े.

मैं चिल्लाया:
 “हुर्रे!”



*****    

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

Mera Dost Bhaloo

मेरा दोस्त भालू
                
                                               लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास  

एक बार मैं क्रिसमस ट्री सेलेब्रेशन के लिए सोकोल्निकी गया. हम सब को नीले कार्डबोर्ड के डिब्बे जैसा एक एक टिकट दिया गया था, वह छोटी सी किताब की तरह मुड़ा हुआ था, और कवर-पेज पर सुनहरे अक्षरों में चमचमा रहा था: “हैपी न्यू इयर!” और, जब टिकट खुलता, तो उसके पन्नों के बीच फ़ट् से  एक सजी-धजी क्रिसमस ट्री खड़ी हो जाती, और उसके चारों ओर गरम कोट और लम्बे-लम्बे कानों वाली टोपियाँ पहने कई जानवर, जैसे ख़रगोश और लोमड़ियाँ, पिछले पैरों पर खड़े हो जाते. ये बहुत बढ़िया बनाया गया था, और, सिर्फ इस टिकट के कारण मैंने फ़ौरन उनके पास सोकोल्निकी जाने का प्लान बना लिया. मैं ये देखना चाहता था कि उन्होंने वहाँ लड़कों के लिए और क्या क्या बनाया है. इससे पहले मैं सिर्फ अपने स्कूल की क्रिसमस ट्री पर जाता था या घर की क्रिसमस ट्री सजाता. इन क्रिसमस-ट्रीज़ पर बेहद मज़ा आता था, मगर उनमें जानवर नहीं होते थे. ऐसे वाले नहीं. इसलिए मैंने सोचा कि सोकोल्निकी ज़रूर जाऊँगा. मैं निकल पड़ा. हालाँकि टिकट पर लिखा था “आरंभ – ठीक 2 बजे”, फिर भी मैं ढ़ाई बजे पहुँचा, क्योंकि मुझे देर हो गई थी. हर मज़ेदार मौक़े पर मैं लेट ही हो जाता हूँ, - कुछ न कुछ हो ही जाता है. एक बार थियेटर पहुँचा, और स्टेज पर किसी लड़के ने एक सफ़ेद बालों वाली लड़की को ‘किस’ किया, तभी सब लोगों ने तालियाँ बजाईं और चिल्लाने लगे “ब्रेवो”, “वन्स मोर”. अब छत के नीचे लाइट कौंधी, और ये लड़का और उसकी लड़की इस तरह झुक-झुक कर पब्लिक का अभिवादन करने लगे, जैसे उन्होंने कोई चमत्कार कर दिया हो. और भी कई बार मैं लेट हो गया था. मुझे याद है, कि एक बार मम्मा ने केक बनाया और बोली:
 “आधा घण्टा घूम ले और जल्दी से आ जा, केक है!”
मैंने और मीश्का ने कम्पाऊण्ड में हॉकी की प्रैक्टिस की, और मैं फ़ौरन घर आ गया, मगर हमारा घर मेहमानों से भरा था, और मम्मा ने कहा:
 “देर कर दी, भाई! तुम्हारी केक हम खा गए! किचन में जा!”
मैं किचन में गया, वहाँ मुझे जैली और सूप दिया गया. केक के बदले ये क्या है? कोई मुक़ाबला ही नहीं है.
इस बार भी, हालाँकि मैं सात बजे उठ गया, मगर बेकार के काम करता रहा और क्रिसमस ट्री पर लेट हो गया.
सोकोल्निकी में इत्ती भीड थी! चारों ओर मुर्गियों के पैरों पर छोटे-छोटे घर बने थे, जैसे बाबा-ईगा का घर होता है, और मज़ेदार, बर्ड-हाऊस जैसे, चटखदार रंग में रंगे, सजे हुए और दोस्ताना घर. उनमें किताबें, मिठाइयाँ, डोनट्स या पैनकेक्स बेच रहे थे. सोकोल्निकी में बर्फ़ से बनी हुई बड़ी-बड़ी आकृतियाँ, ख़ूबसूरत घोड़े, डराने वाले ड्रैगन्स भी थे, और था एक मरा हुआ सिर, जिससे लड़ रहा था अविजित रुस्लान. तैंतीस भीमकाय हीरो बनाए गए थे, और हँस-राजकुमारी थी, स्पेस-शिप, ऐसा लगता था कि इन आकृतियों और प्रदर्शनियों का कोई अंत ही नहीं था, मैं एक आकृति से दूसरी की ओर जा रहा था, मुझे बहुत मज़ेदार लग रहा था, क्योंकि मैं भी आकृतियाँ बनाता हूँ, इसलिए इस बर्फीली ख़ूबसूरती से दूर नहीं हट सका और एक एक क़दम बढ़ाते बढ़ाते मैंने इस बात पर ग़ौर ही नहीं किया कि मैं लोगों से दूर इस वीथी पर बने जंगल में चला आया हूँ, मैंने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि रास्ता बार-बार मुड़ रहा था और लूप बना रहा था, और कुछ आकृतियाँ क़तार में नहीं, बल्कि कहीं बीच में रखी थीं, और मैं धीरे-धीरे थोड़ा सा भटक गया था.
इस समय आसमान से बर्फ गिरना शुरू हो गई, चारों ओर अंधेरा छाने लगा, और मुझे ऐसा लगा कि अगर मैं इन बर्फ़ के टीलों के क़रीब से इसी रास्ते से वापस जाऊँगा, तो काफ़ी समय लग जाएगा. मैंने छोटे रास्ते से जाने का फ़ैसला किया और सीधे, जंगल के बीच से, होकर जाने लगा, क्योंकि मुझे क़रीब-क़रीब ये तो पता था कि क्रिसमस ट्री कहाँ है. मुझे याद था कि मैं कहाँ से आया था, इसलिए मैं काफ़ी ख़ुश-ख़ुश वापस संकरी, बर्फ़ से ढंकी पगडंडी पर भागने लगा. वो भी चारों ओर जा रही थी: दाएँ, बाएँ, और हर तरफ़, और रास्ते के ऐसे हिस्से भी थे कि कह नहीं सकते थे कि मेट्रो कहाँ है, बड़ी क्रिसमस-ट्री कहाँ है और लोग कहाँ हैं.
इस तरह मैं काफ़ी देर तक भागता रहा और थकने लगा, परेशान भी होने लगा, मगर अचानक पास ही में मुझे एक सजा हुआ घर दिखाई दिया और मैं फ़ौरन शांत हो गया. इस घर की खिड़की में रोशनी नज़र आ रही थी, मुझे थोड़ी ख़ुशी हुई, और मैं सीधे सामने की ओर उछलने लगा, मगर मैं कुछ ही बार उछला होऊँगा, कि सामने खड़े एक मोटे चीड़ के पेड़ के पीछे से पगड़ण्डी पर एक भारी-भरकम भालू तैश में उछलकर सीधा मेरे सामने कूदा. हॉरिबल! वो गरजा और सीधा मुझ पर झपटा. मेरा तो कलेजा जैसे फट गया. मैं चिल्लाना चाहता था, मगर चिल्ला नहीं पाया. ज़बान चल ही नहीं रही थी. गला एकदम सूख गया. मैं जैसे ज़मीन में गड़ गया और मैंने हाथ ऊपर उठा दिए, मैं मुड़कर वापस भाग जाना चाहता था, मगर मुझे याद आया कि भालू अपने शिकार को शैतानी स्पीड से पकड़ लेता है, और अगर मैं उससे दूर भागूँगा, तो, हो सकता है कि उसे और गुस्सा आ जाए, और तब वह शायद तीन ही छलांगों में मुझे दबोच लेगा और मेरे टुकड़े- टुकड़े कर देगा! मैं ऐसा सोच रहा था, और भालू सीधा मेरे पास आया. वो इंजिन की तरह भक्-भक् कर रहा था, गरज रहा था और पंजे हिला रहा था, और मुझे याद आया कि मैंने पढ़ा था, कि अगर भालू के सामने पड़ जाओ तो अपने आप को कैसे बचाना चाहिए. ऐसा दिखाना चाहिए कि तुम मुर्दा हो, वो मुर्दों को नहीं खाता है! और पलक झपकते ही मैं ज़मीन पर गिर पड़ा और आँखें बन्द कर लीं, साँस रोकने की कोशिश करने लगा, मगर फिर भी साँस तो मैं ले ही रहा था, क्योंकि ये सब दौड़ने की वजह से हुआ था, और मेरा पेट धौंकनी की तरह चल रहा था. मैंने सुना कि भालू मेरे पास भागते हुए आ रहा है, और मैंने सोचा: “हो गया! अब मेरे टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे!” मगर वह मेरे नज़दीक नहीं आया...
और इस एक सेकण्ड में मैंने इतना कुछ सोचा, अपने आप से वो बुदबुदाता रहा!...
इस बारे में किसीको नहीं बताऊँगा. कभी भी नहीं और किसी को भी नहीं. मगर फिर उत्सुकता मुझे बेचैन करने लगी. मैंनो सोचा: ‘ताज्जुब है, आख़िर भालू बच्चे को उठाता कैसे होगा? इस बारे में तो सिर्फ किताबों में पढ़ते हो, मगर सचमुच में देखने का मौका फिर कभी नहीं मिलेगा.’ और, मैंने धीरे धीरे अपनी बाईं आँख खोलना शुरू किया. वो मुश्किल से खुल रही थी, क्योंकि या तो डर लग रहा था, या पलकें कसके चिपक गई थीं, पता नहीं, मगर कोशिश करके आँख को खोल ही लिया. देखता क्या हूँ, कि भालू मेरे ऊपर खड़ा है, पिछले ही पैरों पर, और उसके चेहरे पर ऐसे भाव हैं, जैसे उसे मालूम ही न हो कि अब क्या करे. और मेरे दिमाग़ में फिर से बिजली की तरह एक ख़याल कौंध गया. मुझे अपने आप को बचाने का एक और उपाय याद आ गया. भालू बहुत डरपोक होता है, और किसी भी तरह उसे डराने की कोशिश करनी चाहिए. हो सकता है, कि मुझे ज़ोर से चिल्लाना चाहिए? और मैंने बेवकूफ़-इवान वाली कहानी की तरह फ़ौरन सोच लिया:
 ‘जो होना है, हो! दो बार मरेगा नहीं, एक से बचेगा नहीं!’
और मैं ख़ौफ़नाक आवाज़ में चिल्लाया:
 “ भा s s  यहाँ से!”
भालू थरथराया और एक ओर को हट गया. वह मुझसे यूँ छिटक गया, जैसे उसे बिजली का शॉक लगा हो. और, जब वो उछला, तो रुका नहीं और मुझसे दूर भागने लगा. वह बड़ी तेज़ी से भाग रहा था और चारों पैरों पर खड़ा नहीं हो रहा था, शायद, बेहद डर गया था और दुनिया की हर चीज़ के बारे में भूल गया था. और मैंने क़रीब दो किलो का बर्फ का गोला उठाया, जो मेरे पास ही पड़ा था, और ऐसे उसकी तरफ़ फेंका, जिससे वह, मतलब, और भी तेज़ी से मुझसे दूर भागे, और समझ जाए कि मेरे साथ मज़ाक करना महंगा पड़ सकता है! ये बर्फ़ का टुकड़ा ठीक उसके सिर पे लगा. टक्! इससे बेहतर हो ही नहीं सकता था. इस मार से भालू लड़खड़ा भी गया. और तभी एक आश्चर्य हुआ!
भालू अचानक रुक गया, मेरी तरफ़ मुड़ा और बोला:
 “बच्चे, बदमाशी न कर!”
 मैं इतना डरा हुआ और उत्तेजित था, कि फ़ौरन इतना भी न समझ पाया कि दुनिया में ऐसा नहीं होता है कि भालू इन्सान की तरह बात करे, मैंने उससे कहा:
 “आप ख़ुद ही बदमाशी न करें! ख़ुद ही तो मुझे खा जाना चाहते थे!”
अब उसने कहा:
 “तू क्या कह रहा है? आर यू सीरियस? तू मुझसे डर गया? कहीं तूने ये तो नहीं सोच लिया कि मैं असली भालू हूँ? डर मत, डर मत, मैं भालू नहीं हूँ! मैं आर्टिस्ट हूँ! समझा? मैं तो तुझसे मज़ाक करना चाहता था, मगर तू बेहोश हो गया...आर्टिस्ट हूँ...”
मेरे दिल से एकदम बोझ उतर गया...मैं हँसने लगा. वाक़ई में, मैं भी कितना बेवकूफ़ हूँ! मैं ये भी भूल गया कि क्रिसमस-ट्री के प्रोग्राम में आर्टिस्ट अक्सर भालू की पोषाक पहन लेते हैं, जिससे बच्चों का मनोरंजन करें, और ये, ज़ाहिर था, कि वो ऐसा ही आर्टिस्ट था. मैं शांत हो गया और बोला:
 “और साबित कैसे करोगे?”
उसने कहा:
 “ये देख.”
उसने अपना सिर उतारा. जैसे लकड़ी के खंभे से घड़ा. जैसे टोपी. बस, उतार दिया. बेहद ख़ूबसूरत था सिर, बड़े बड़े दांत और चमकदार-लाल जीभ वाला. रोंएदार, और आँखें चमकदार. आर्टिस्ट ने उसे अपने फ़ैले हुए हाथों पर रखा और बोला:
 “चल, ये ले! पकड़, डर मत. मैं कुछ देर ताज़ी हवा में सांस ले लूँ, कुछ देर सुस्ता लूँ. बेहद भारी है. और तू आराम से चक्कर खा गया, ये तो अच्छा हुआ, कि ये मेरा नहीं है, और अगर ये असली होता तो, क्या होता, आँ?” 
और वह अपना असली सिर घुमाने लगा. असली वाला बड़ा बेडौल था. गंजा. गोल-गोल दयनीय आँखें...
तो, ऐसा भी होता है. अभी अभी तो मैं डर के मारे मरा जा रहा था, और अब बगल में, ख़रबूज़े की तरह.  भालू का सिर दबाए खड़ा हूँ, और इस डरावने सिर का मालिक एक आर्टिस्ट है. मेरा मुँह खुला था, मगर आर्टिस्ट मेरी ओर देखकर मुस्कुराया. फिर वह थोड़ा सा कँपकँपाया और बोला:
 “दिल में दर्द होता है...मुझे उत्तेजित नहीं होना चाहिए. और भागना नहीं चाहिए. चल, मुझे छोड़ दे.”
उसने मेरी ओर पंजा, मतलब हाथ बढ़ाया, और हम उस घर की तरफ़ बढ़े जो पास ही में था. मैं इसी घर की तरफ़ कुछ देर पहले भाग कर आया था. हम पहुँचने ही वाले थे, कि अचानक झाड़ी में से एक जोकर उछलकर बाहर आया और मुझे भालू के साथ देखकर चिल्लाने लगा:
”अव्राशोव, ये क्या है? आप कहाँ हैं? देर हो रही है! जल्दी करो, हमें अभी बुक्स-सिटी के पास डान्स करना है.”
 “क्या?” आर्टिस्ट-भालू चीख़ा. “और डान्स करना है? मैं आज पाँच बार डान्स कर चुका हूँ! मेरे लिए इतना ही बहुत है!...क्या सब लोगों का दिमाग़ चल गया है?”
“गुसाझिन ने कहा है,” जोकर ने कहा, “उसका आइडिया है. हमें लोगों को हँसाना होगा. चल, भागें!”
 “मेरे दिल में दर्द है,” आर्टिस्ट-भालू ने कहा, “और, गोशा, तुम हो कि ‘भागें!’.
धीरे धीरे जाएँगे. चल, बच्चे,” उसने मुझसे कहा, “मुझे मेरा सिर दे दे, कुछ नहीं किया जा सकता.” उसने एक बार फिर अपनी दयनीय आँखों से मेरी तरफ़ देखा और मुँह टेढ़ा करके मुस्कुराया: “तो, थके हुए बूढे, चल अपना अपना शेक्सपियर खोजें!”  
मैं कुछ भी नहीं समझ पाया. कैसा थका हुआ बूढ़ा? कौन थका हुआ बूढ़ा? कहाँ? मगर अभी इसके लिए वक़्त नहीं था और मैंने उसे भालू का सिर पहनने में मदद की.
उसने अपने नाख़ूनों वाले पंजों से मुझसे हाथ मिलाया.
 “उधर जा,” उसने एक तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “अभी मैं वहाँ डान्स करने वाला हूँ.”
और मैं उस तरफ़ चल पड़ा, जहाँ उसने इशारा किया था, और जल्दी ही वहाँ पहुँच गया, वहाँ कई सारे आर्टिस्ट्स थे, वे सवाल पूछ रहे थे, और बच्चे तुकबन्दी में जवाब दे रहे थे. ये ‘बोरिंग’ था, मगर अचानक जोकर प्रकट हुआ. वह एक तांबे का बर्तन बजा रहा था, और उसके पीछे पीछे मेरा दोस्त भालू लड़खड़ाते हुए चल रहा था. जोकर रो रहा था, और छींक रहा था, और जादू दिखा रहा था, और फिर उसने जेब से एक छोटा सा बाजा निकाला और उस पर ऊँगलियाँ फेरने लगा. और भालू ने अपनी जगह पर पैर से ताल देना शुरू कर दिया, और, आख़िर में, ज़ाहिर है, वह जोश में आकर डान्स करने लगा. वह ठीक-ठाक ही डान्स कर रहा था, और मुड़ रहा था, झुक रहा था, और गरज रहा था, और बच्चों की ओर लपक रहा था, और वे, हँसते हुए पीछे की ओर उछल रहे थे. उसने कई बार हँसाने वाले कारनामे किए, ये सब बड़ी देर तक चलता रहा. मैं एक ओर खड़ा होकर इंतज़ार कर रहा था, कि उसका प्रोग्राम कब ख़तम होता है, क्योंकि, चाहे जो भी हो जाए, मुझे एक बार फिर उसका इन्सानी चेहरा, उसकी दयनीय थकी हुई गोल-गोल आँखें देखना था.


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