मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

The Crane and the Heron


सारस और बगुला
लेखक : व्लादीमिर दाल्
  अनुवाद : आ. चारुमति रामदास

उड़ रहा था उल्लू – ख़ुशमिजाज़ उल्लू ;  उड़ रहा था, उड़ रहा था और बैठ गया, घुमाया सिर, देखा इधर-उधर, उठा और फिर से उड़ान भरी; उड़ रहा था, उड़ रहा था और बैठ गया, घुमाया सिर, देखा इधर-उधर, और आँखें उसकी हैं सपाट, देखें ना घर ना घाट!
ये परीकथा नहीं है, प्रस्तावना है, और परीकथा है आगे.

बसन्त ऋतु पड़ गई सर्दियों के पीछे और लगी उसे सूरज से खदेड़ने-भूनने, और लगी हरी-हरी, कोमल घास को धरती से बुलाने; जागी–भागी घास सूरज को देखने, लाई साथ में फूल पहले – बर्फ से ढंके : नीले और सफ़ेद, नीले-लाल और पीले-भूरे. समुन्दर पार से खिंचे आए मुसाफ़िर पंछी : कलहँस और हँस, सारस और बगुले, टिटिहरी और बत्तख, गाने वाली चिड़िया और अकडू-फुदकी. सब उड़कर आये हमारे रूस में, घोसले बुनने, परिवारों के साथ रहने. अपने-अपने प्रदेश में बिखर गए : स्तेपियों में, जंगलों में, दलदलों में, झरनों में.
सारस अकेला खड़ा है खेत में, इधर-उधर देख रहा है, सिर हिलाता है और सोचता है : “मुझे अब घर बसा लेना चाहिए, घोसला बनाना चाहिए और घरवाली लाना चाहिए”.
बुना उसने घोसला ठीक दलदल के पास, और दलदल में, टीले पर बैठी थी लम्बी-लम्बी नाक वाली बगुला मेम सा, बैठी है, और सारस को देख रही है, अपने आप मुस्कुरा रही है : “कैसा बेढंगा है!”
उसी समय सारस ने सोचा : “बगुला मेम साब से शादी की बात करता हूँ, वो हमारे ही खानदान पर गई है : चोंच हमारे जैसी, और टाँगें भी लम्बी-लम्बी”. चला वह दलदल में अनचले रास्ते पर : पैरों से छप-छप करते, टाँगें और पूँछ दलदल में धँस रहे हैं; चोंच का लेता है सहारा – पूँछ बाहर खींचता है, चोंच धँस जाती है चोंच निकालता है – पूँछ धँस जाती है; मुश्किल से बगुले के टीले तक पहुँचता है, देखता है छड़ी की ओर और पूछता है :
“क्या बगुला-मेमसाब घर में हैं?”
“यहीं है वो. क्या चाहिए?” बगुला मेम साब ने जवाब दिया.
“मुझसे ब्याह कर लो,” सारस ने कहा.
“किसी हालत में न करूंगी ब्याह तुमसे, दुबले-पतले, सींकिया जवान से : तेरी कमीज़ भी छोटी-सी है, और तू ख़ुद पैदल घूमता है, कंजूसी से रहता है, मुझे घोंसले में भूखा मार डालेगा!”
ये बातें सारस को अपमानजनक लगीं. वह चुपचाप मुड़ा और वापस घर लौट गया : छप-छप, छप-छप.
अपने घर में बैठे-बैठे बगुला मेम साब ने सोचा, “आख़िर, क्यों मैंने उसे इनकार किया, क्या मुझे अकेले रहना अच्छा लगता है? वो अच्छी नस्ल का है, सब कहते हैं उसे छैला, चलता है कलगीवाला; उसके पास जाकर अच्छी बात कहती हूँ”.
चल पड़ी बगुला मेम सा, मगर दलदल कोई पास तो नहीं था : कभी एक पाँव फँसता, कभी दूसरा, एक निकालती – दूसरा फँसता. पंख फैलाती – चोंच गड़ाती; जैसे तैसे पहुँच गई और बोली :
“सारस, मैं तुझसे शादी करूँगी!”
“नहीं, बगुला मेम सा,” सारस उससे बोला, “मैंने इरादा बदल दिया है, मैं तुझसे शादी नहीं करना चाहता. जहाँ से आई है, वहीं लौट जा!”
बगुला मेम साब को शरम आई, उसने पंख में अपने आप को छुपा लिया, और चल पड़ी अपने टीले की ओर; मगर सारस को उसे जाता देखकर अफ़सोस हुआ कि क्यों मना कर दिया; वह घोंसले से बाहर उछला और चला उसके पीछे पीछे दलदल में छप-छप करते हुए. उसके पास आकर बोला :
“अच्छा, चल, ऐसा ही करते हैं, बगुला मेम सा, मैं तुझे अपनी बीबी बनाऊँगा.”
मगर बगुला-मेम साब बैठी थी गुस्से में-खूब गुस्से में और सारस से बात नहीं करना चाहती.
“सुन, मैडम-बगुला, मैं तुझसे शादी करूँगा,” सारस ने फिर कहा.
“तू तो करेगा, मगर मैं नहीं चाहती,” उसने जवाब दिया.
क्या करता! सारस वापस अपने घर चला. “ऐसी बदमिजाज़ है,” उसने सोचा, “अब तो मैं किसी भी हालत में उससे ब्याह नहीं करूँगा!”
सारस घास में आकर बैठा और वह उस तरफ़ देखना भी नहीं चाहता था, जहाँ बगुला मेम साब रहती थी. मगर बगुला मेम साब ने फिर से अपना इरादा बदल दिया : “अकेले रहने के बदले दोनों का मिलकर रहना बेहतर है. जाकर उससे समझौता करती हूँ और उससे शादी कर लेती हूँ”.
चल पड़ी फिर से दलदल में. दलदल का रास्ता लम्बा था, दलदल चिपचिपी थी : कभी एक पाँव फँसता, तो कभी दूसरा. पंख फैलाती – चोंच गड़ाती; मुश्किल से सारस के घोंसले तक पहुँची और बोली : “सारस्का, सुन रे, ऐसा ही करते हैं, मैं तुझसे ब्याह कर लूँगी!”
मगर सारस ने जवाब दिया :
“चली फ्योदरा ईगर को ब्याहने, कर ही लेती ब्याह फ्योदरा ईगर से, मगर ईगर माना ही नहीं.”
ऐसा कहकर सारस ने मुँह फेर लिया. बगुला मेम साब चली गई.
सारस सोचता रहा, सोचता रहा, उसे फिर से अफ़सोस हुआ, जब बगुला मेम साब ख़ुद चाहती है, तो वह उससे ब्याह क्यों न करे; फौरन उठा और फिर से दलदल में चल पड़ा : पैरों से छप-छप करते हुए, मगर पैर और पूँछ फँस ही जाते; चोंच गड़ाता है, पूँछ निकालता है – चोंच फँस जाती है, और चोंच निकालता है - पूँछ फँस जाती है.
इसी तरह वे आज तक एक दूसरे के पास आ-जा रहे हैं; रास्ता रौंद दिया, मगर खीर तो पकाई ही नहीं.

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शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

The Crow



कौआ
लेखक : व्लादीमिर दाल्
अनुवाद : आ. चारुमति रामदास

क समय की बात है, कि जंगल में एक कौआ रहता था, वह अकेला नहीं,, बल्कि नानियों, अम्माओं, छोटे बच्चों, नज़दीकी और दूर के पड़ोसियों समेत रहता था. समुन्दर के किनारे से पक्षी उड़कर आते - बड़े और छोटे, बत्तखें और हंस, छोटे और नन्हे पंछी; और पहाड़ों पर, घाटियों में, जंगलों में, चरागाहों में घोंसले बनाते और अण्डे देते. कौए ने ये देखा और चला मुसाफ़िर पक्षियों की बेइज़्ज़ती करने और उनके अण्डे छीनने. उल्लू उड़ रहा था और उड़ते हुए उसने देखा कि कौआ छोटे और बड़े पंछियों की बेइज़्ज़ती कर रहा है, अण्डे खींच रहा है.
“रुक,” वह बोला, “फ़ालतू कौए, तुझ पर मुकदमा चलाएँगे और तुझे सज़ा दिलवाएँगे!”
और उड़ गया – दूर, बहुत दूर, पथरीले पहाड़ों पर, भूरे गरुड़ के पास. उड़ कर पहुँचा और विनती करने लगा :
“ माई-बाप, भूरे गरुड़, गुनहगार कौए के ख़िलाफ़ हमें न्याय दो! उसकी वजह से छोटे-बड़े पंछियों का जीना मुश्किल हो रहा है : हमारे घोंसले तोड़ देता है, पिल्ले चुराता है, अण्डे घसीट कर ले जाता है और उन्हें अपने कौओं के पिल्लों को खिलाता है!
भूरे गरुड़ ने सिर हिलाया और अपने हल्के, छोटे से दूत, नन्ही चिड़िया को कौए को बुलाने के लिए भेजा. चिड़िया ने पंख फड़फड़ाए और कौए को बुलाने के लिए उड़ गई. कौआ इनकार करने लगा, मगर सारे पंछियों की ताकत उसके ख़िलाफ़ हो गई, सभी पंछी उसे काटने लगे, चोंच गड़ाने लगे, गरुड़ के पास इन्साफ़ के लिए खदेड़ने लगे. कोई चारा नहीं था – उसने काँव-काँव किया और उड़ने लगा, और सारे पंछी आसमान में उठकर उसके पीछे-पीछे उड़ने लगे.
वे गरुड़ के निवास पर पहुँचे और उसे घेर कर बैठ गए, और कौआ बैठा बीच में और गरुड़ के सामने बदमाशी करने लगा, होशियारी दिखाने लगा.
गरुड़ ने कौए से पूछना शुरू किया :
“कौए, तुम्हारे बारे में शिकायत है, कि तुम दूसरों का माल खा जाते हो, बड़े और छोटे पंछियों के पिल्ले और अण्डे घसीट कर ले जाते हो!”
“बकवास, माई-बाप भूरे गरुड़, कोरी बकवास, मैं सिर्फ छिलके ही चुनता हूँ!”
“तुम्हारे बारे में मेरे पास ये शिकायत भी आई है, कि जैसे ही किसान बीज बोने के लिए खेत में आता है, तुम अपने सभी कौए भाई-बंधुओं समेत झपटते हो और बीजों में चोंच मारने लगते हो!
“ बकवास, माई-बाप भूरे गरुड़, कोरी बकवास! मैं अपने दोस्तों के साथ, बड़े बच्चों के साथ, छोटे बच्चों के साथ, घर के लोगों के साथ सिर्फ ताज़ी जोती गई भूमि से कीड़े घसीटता हूँ!”
“और चारों ओर लोग शिकायत करते हैं, कि जैसे ही वे फसल काट कर ढेर बनाते हैं, तुम अपने कौओं के झुण्ड समेत हल्ला बोल देते हो और पूलियाँ उलट-पुलट कर देते हो, और ढेर बिखेर देते हो!”
“बकवास, माई-बाप भूरे गरुड़, कोरी बकवास! ये तो हम अच्छे काम में मदद करते हैं – पूलियाँ बिखेर देते हैं, जिससे कि सूरज और हवा को आने दें, जिससे फफूँद न लगे और अनाज सूख जाए!”      
गरुड़ को बूढ़े झूठे-कौए पर बहुत गुस्सा आया, उसने उसे जेल के, लोहे की सलाखों वाले एक कमरे में बंद करके लोहे के ताले लगाने का हुक्म दिया. वहीं पर वह कौआ आज तक बैठा है!     
             
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शनिवार, 26 जनवरी 2019

Lomdi aur Bhaloo




लोमड़ी और भालू
लेखक : व्लादीमिर दाल्
अनुवाद : आ. चारुमति रामदास

एक थी लोमड़ी-मौसी;  बुढ़ापे में अपने-आप अपना इंतज़ाम करना उसे बहुत बुरा लगता था, तो वो आई भालू के पास और उससे बिनती करने लगी कि उसे अपने घर में रहने दे:
“मुझे भीतर आने दो, मिखाइलो पतापिच, मैं लोमड़ी बूढ़ी, समझदार, जगह लूँगी बेहद कम, ज़्यादा नहीं खाऊँगी, ज़्यादा नहीं पिऊँगी, तुम्हारे खाने के बाद जो बचेगा, वो ही खाऊँगी, हड्डियाँ साफ़ करूँगी.”
भालू बिना सोचे-समझे तैयार हो गया. लोमड़ी भालू के घर रहने के लिए आ गई और हर चीज़ ग़ौर से देखने और सूँघने लगी कि उसके घर में कहाँ क्या रखा है. मीशेन्का को संग्रह करने की आदत थी, ख़ुद पेट भर के खाता, और लोमड़ी को भी अच्छी तरह खिलाता.
एक बार लोमड़ी को ड्योढ़ी में शेल्फ पर शहद का बर्तन दिखाई दिया, और लोमड़ी और भालू, दोनों को ही मीठा बहुत अच्छा लगता है; रात को वह लेटी और सोचने लगी, कि कैसे जाकर शहद चाटे, पूँछ से ठकठकाने लगी और लगी भालू से पूछने:
“मीशेन्का, क्या कोई हमारा दरवाज़ा खटखटा रहा है?”
भालू ने सुना.
सही है,” वह बोला, “खटखटा रहे हैं.”
“ये, मतलब, मेरे लिए, बूढ़ी डॉक्टरनी के लिए आए हैं.”
“तो क्या,” भालू ने कहा, “जाओ.”
“ओह, चचा, उठने का बिल्कुल मन नहीं है!”
“अरे, जा भी,” भालू ने कहा, “मैं तेरे पीछे दरवाज़ा भी बंद नहीं करूँगा.
लोमड़ी ने आह-आह किया, भट्टी से उतरी, मगर जैसे ही दरवाज़े से बाहर निकली, उसने फुर्ती से काम किया! शेल्फ पर चढ़ गई और शहद के जार पे लपकी; खाती रही, खाती रही, पूरी ऊपरी सतह खा गई, पेट भर खाया; जार पर कपड़ा बांधा, उस पर ढक्कन रखा, ऊपर से पत्थर रखा, सब कुछ वैसा ही ठीक-ठाक कर दिया जैसा भालू करता था, और झोंपड़ी मे ऐसे लौटी, जैसे कुछ हुआ ही न हो.
भालू ने उससे पूछा:
क्या, मौसी, दूर गई थी क्या?”
“करीब ही गई थी, चचा; पडोसियों ने बुलाया था, उनका बच्चा बीमार हो गया था.”
“कुछ आराम पड़ा?”
“आराम पड़ा.”
“बच्चे का नाम क्या है?”
“वेर्खूशेच्का, चचा.”
“ये नाम कभी सुना नहीं”, भालू ने कहा.
“लो, सुनो! चचा, दुनिया में अजीब-अजीब नामों की क्या कमी है!”
 भालू सो गया, और लोमड़ी भी सो गई.
लोमड़ी को शहद पसंद आ गया, अगली रात भी वह लेटी और तख़त पर पूँछ से ठकठकाने लगी:
“मीशेन्का, कहीं फिर तो कोई खटखटा नहीं रहा है?”
भालू ने ग़ौर से सुना और बोला:
“सही है, मौसी, खटखटा रहे हैं!”
“मतलब, मुझे बुलाने आए हैं!”
“तो क्या, मौसी, जाओ,” भालू ने कहा.
“ओह, चचा, उठने का, बूढ़ी हड्डियाँ तोड़ने का मन नहीं हो रहा है!”
“ चल, जा,” भालू बोला, “ मैं तेरे पीछे दरवाज़ा बंद नहीं करूँगा.”
  लोमड़ी ने आह-आह किया, भट्टी से उतरी, दरवाज़े की तरफ़ आई, मगर जैसे ही दरवाज़े से बाहर निकली, उसने फुर्ती से काम किया! शेल्फ पर चढ़ गई और शहद के जार पे लपकी; खाती रही, खाती रही, बीच वाला पूरा हिस्सा खा गई, पेट भर के खाया; जार पर कपड़ा बांधा, उस पर ढक्कन रखा, ऊपर से पत्थर रखा, सब कुछ वैसा ही ठीक-ठाक कर दिया और झोंपड़ी मे लौटी.
भालू ने उससे पूछा:
“क्या दूर गई थीं, मौसी?”
“पास ही गई थी, चचा. पड़ोसियों ने बुलाया था, उनके बच्चे की तबियत बिगड़ गई थी.”
“क्या आराम पड़ा?”
“आराम पड़ा.”
“बच्चे का नाम क्या है?”
“सिर्योदच्का, चचा.”
“ये नाम कभी सुना नहीं,” भालू ने कहा.
“लो, सुनो! चचा, दुनिया में अजीब-अजीब नामों की क्या कमी है!”
इसके बाद दोनों सो गए.
लोमड़ी को शहद पसंद आ गया; तीसरी रात भी वह लेटी और पूँछ से ठकठकाने लगी और पूछने लगी:
“मीशेन्का, कहीं फिर से तो कोई दरवाज़ा नहीं खटख़टा रहा है?”
भालू ने सुना और कहा:
“सही है, मौसी, खटखटा ही रहे हैं.”
“मतलब, मेरे ही लिए आए हैं.”
“तो क्या, मौसी, अगर बुला रहे हैं, तो जाओ,” भालू ने कहा.
“ओह, चचा, उठने का, बूढ़ी हड्डियाँ तोड़ने का बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा है! देख तो रहे हो, एक भी रात सोने नहीं देते!”
“चल, चल, उठ,” भालू ने कहा, “मैं तेरे पीछे दरवाज़ा बंद नहीं करूँगा.”
लोमड़ी ने आह-आह किया, भट्टी से उतरी, दरवाज़े की तरफ़ आई, मगर जैसे ही दरवाज़े से बाहर निकली, उसने फुर्ती से काम किया! शेल्फ पर चढ़ गई और शहद के जार के पे लपकी; खाती रही, खाती रही, बचा-खुचा पूरा शहद खा गई, पेट भर के खाया; जार पर कपड़ा बांधा, उस पर ढक्कन रखा, ऊपर से पत्थर रखा, सब कुछ वैसा ही ठीक-ठाक कर दिया और झोंपड़ी मे लौटी. झोंपड़ी में लौटकर भट्टी पर चढ़ गई और गुड़ी-मुड़ी होकर लेट गई.
भालू लोमड़ी से पूछने लगा:
“दूर गई थीं क्या, मौसी?”
“पास ही, चचा. पड़ोसियों ने बच्चे का इलाज करने के लिए बुलाया था.”
“क्या आराम पड़ा?”
“आराम पड़ा.”
“बच्चे का नाम क्या है?”
“पस्लेदीश्कम, चचा. पस्लेदीश्कम, पतापविच!”
“ऐसा नाम कभी सुना नहीं,” भालू ने कहा. 
“अरे, चचा, दुनिया में क्या कम अजीब नाम होते हैं!”
भालू सो गया, और लोमड़ी भी सो गई.
कुछ समय के बाद लोमड़ी को फिर से शहद की तलब आई – आख़िर लोमड़ी को मीठा जो पसन्द है, - उसने बीमार होने का नाटक किया : आह-ऊह करती रही, भालू को चैन नहीं लेने दिया, पूरी रात खाँसती रही.
“मौसी,” भालू ने कहा, “कुछ ले लेतीं, ठीक हो जातीं.”
“ओह, चचा, मेरे पास नींद की दवा है, उसमें सिर्फ शहद मिलाना पड़ेगा और सब कुछ चुटकियों में ठीक हो जाएगा.”
भालू फर्श से उठा और ड्योढ़ी में आया, जार उतारा – मगर जार तो खाली था!
“शहद कहाँ गया?” भालू चीखा. “मौसी, ये तेरी ही करतूत है!”
लोमड़ी इतना खाँसने लगी, कि उससे जवाब ही देते नहीं बना.
“मौसी, शहद किसने खाया?”
“कैसा शहद?”
“अरे, मेरा, जो जार में था!”
“अगर तेरा था, तो मतलब, तूने ही खाया होगा,” लोमड़ी ने जवाब दिया.
“नहीं,” भालू ने कहा, “मैंने उसे नहीं खाया, वक्त-ज़रूरत के लिए संभाल के रखा था; ये, मतलब, मौसी, तूने ही शरारत की है?”
“आह, तू, कितनी बेइज़्ज़ती की मेरी! मुझ ग़रीब बेचारी अनाथ को अपने घर बुलाया और अब मुझे दुनिया से हटा देना चाहते हो! नहीं, दोस्त, मैं वो नहीं हूँ! मैं, लोमड़ी, पल भर में कुसूरवार को पकड़ लूँगी, पता कर लूँगी कि शहद किसने खाया है.
भालू ख़ुश हो गया और उसने कहा:
“मेहेरबानी करो, मौसी, पता लगाओ!”
“चलो, सूरज के सामने सोते हैं – जिसके पेट से शहद टपकेगा, उसीने उसे खाया है.”
लेट गए, सूरज उन्हें गरमा रहा था. भालू खर्राटे लेने लगा, मगर लोमड़ी – फ़ौरन घर आई: जार से बचा-खुचा शहद निकाला, उसे भालू के बदन पर पोत दिया, और ख़ुद उँगलियाँ धोकर, भालू को जगाने लगी.
“उठ, चोर को ढूँढ़ लिया! मैंने चोर को ढूँढ़ लिया!” – लोमड़ी भालू के कान में चिल्लाई.
“कहाँ?” भालू गरजा.
“ये रहा,” लोमड़ी ने कहा और उसने भालू को दिखाया कि उसका पूरा पेट शहद से लथपथ है. भालू बैठ गया, आँखें मली, पेट पर पंजा फेरा – पंजा तो चिपक गया, और लोमड़ी चिल्लाकर बोली:
“देखा, मिखाइलो पतापविच, सूरज ने तो तेरे भीतर से शहद बाहर निकाल दिया! फिर कभी-भी, चचा, अपना दोष दूसरे के सिर पे न डालना!”
इतना कहकर लोमड़ी ने पूँछ हिला दी, सिर्फ भालू ने ही उसे देखा.  

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सोमवार, 21 जनवरी 2019

Markhani Gaay



मरखनी गाय
                                                    लेखक: कन्स्तान्तिन उशीन्स्की
         अनुवाद: आ. चारुमति रामदास   

हमारे यहाँ एक गाय थी, मगर वह इतनी अजीब, इतनी मरखनी थी, कि मुसीबत! हो सकता है, इसीलिए, शायद, वह दूध भी कम देती थी. माँ और बहनें उससे बेज़ार हो गई थीं.
अक्सर ऐसा होता कि उसे झुण्ड़ में चरने के लिए खदेड़ते, और वो या तो दोपहर को वापस आ जाती, या खेत में मिलती – जाओ, जाकर उसे निकालो! ख़ासकर, जब उसका बछड़ा होता – तब तो उसे रोकना नामुमकिन होता! एक बार तो उसने अपने सींगों से पूरे बाड़े को तहस-नहस कर दिया था, बछड़े के पास भागी थी. उसके सींग लम्बे-लम्बे और एकदम सीधे थे. पापा ने कई बार उसके सींग काट कर छोटे करने की सोची, मगर टालता रहा, जैसे उसे कुछ पूर्वाभास हो गया था.              
और कितनी चंचल और जोशीली थी! कैसे अपनी पूँछ उठाती, सिर नीचे करती, और उछलती – घोड़े पर सवार होकर भी उसे नहीं पकड़ सकते थे.
एक बार गर्मियों में शाम को वह चरवाहे के पास से काफ़ी पहले ही भाग गई : घर में बछड़ा था. मम्मा ने गाय को दुहा, बछड़े को छोड़ा और बहन से – जो करीब बारह साल की थी – बोली” फेन्या, इन्हें नदी पे ले जा, किनारे पर चरने दे, मगर देखना, कि खेत में न घुस जाए. रात होने में अभी काफ़ी वक्त है, यहाँ बेकार क्यों खड़े रहें. 
फ़ेन्या ने डंडा उठाया, बछड़े और गाय को हाँका, किनारे तक ले गई, और ख़ुद विलो के पेड़ के नीचे बैठकर बैंगनी फूलों का मुकुट बनाने लगी, जिन्हें उसने रास्ते में आते-आते तोड़ा था: मुकुट बना रही है और गाना गा रही है. फ़ेन्या ने सुना कि झाड़ियों में कुछ सरसराहट हो रही है, नदी के दोनों तरफ़ घनी झाड़ियाँ थीं.  
फ़ेन्या ने देखा कि कोई भूरी-सी चीज़ घनी झाड़ियों के बीच से आ रही है, और बेवकूफ़ लड़की को ऐसा लगा कि ये हमारा कुत्ता, सेर्को है. ये तो सबको मालूम है कि भेड़िया कुत्ते से बहुत मिलता है, सिर्फ गर्दन आसानी से मुड़ती नहीं है, पूँछ डंडी जैसी, थोबड़ा झुका हुआ और आख़ें चमकती हैं. मगर फ़ेन्या ने तो कभी भी भेड़िये को करीब से देखा नहीं था.
फ़ेन्या कुत्ते को बुलाने लगी , “सेर्को, सेर्को!” – देखती क्या है कि – बछड़ा, और उसके पीछे-पीछे गाय उस पर पागलों की तरफ़ झपट पड़े. फ़ेन्या उछली, विलो के पेड़ से चिपक गई, समझ में नहीं आ रहा था, कि क्या करे, बछड़ा उसकी ओर भागा, और गाय ने अपने पिछले हिस्से से दोनों को पेड़ से दबाए रखा, सिर झुकाया, गरजी, सामने वाले खुरों से ज़मीन खोदने लगी, सींगों को सीधे भेड़िये की तरफ़ मोड़ा.
फ़ेन्या बेहद डर गई, उसने दोनों हाथों से पेड़ को कस कर पकड़ लिया, चिल्लाना चाह रही थी – मगर आवाज़ ही नहीं निकली. और भेड़िया सीधे गाय पर लपका, मगर उछल कर पीछे हट गया – पहली नज़र में ऐसा लगा कि गाय ने उसे सींगों से दबा दिया है. देखा भेड़िये ने कि चालाकी से काम नहीं बनेगा और वह कभी इधर से, तो कभी उधर से लपकने लगा, ताकि एक ओर से किसी तरह गाय से लिपट जाए, या बछड़े को पकड़ ले – मगर हर तरफ़ सींग उसके सामने आ जाते.
फ़ेन्या अभी भी समझने की कोशिश कर रही थी कि माजरा क्या है, वह भागना चाह रही थी, मगर गाय जाने ही नहीं दे रही थी, वैसे ही पेड़ से दबा रही थी.
अब लड़की चिल्लाने लगी, मदद के लिए पुकारने लगी. हमारा कज़ाक वहीं पहाड़ी पर जुताई कर रहा था, उसने सुना कि गाय गरज रही है, और लड़की चिल्ला रही है, उसने अपना हल छोड़ा और चीख की तरफ़ भागा. कज़ाक ने देखा कि क्या हो रहा है, मगर वह खाली हाथों से भेड़िये पर हमला नहीं कर सकता था – भेड़िया काफ़ी बड़ा था और तैश में था; कज़ाक ने अपने बेटे को बुलाया जो वहीं खेत में जुताई कर रहा था.
जैसे ही भेड़िये ने देखा कि लोग भागते हुए आ रहे हैं – वह ढीला पड़ गया, एक दो बार चिल्लाया और झाड़ियों में भाग गया.
फ़ेन्या को कज़ाक मुश्किल से घर ले आए, लड़की इतनी डर गई थी.
पापा इतने ख़ुश हो गए, कि उन्होंने गाय के सींग नहीं काटे थे.
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गुरुवार, 17 जनवरी 2019

Safed Ghar



सफ़ेद घर
लेखक - बरीस झित्कोव
अनुवाद – आ. चारुमति रामदास


हम समुन्दर के किनारे पर रहते थे, और मेरे पापा के पास एक बढ़िया पाल वाली नौका थी. मैं उसे बड़ी अच्छी तरह चला सकता था – चप्पू भी चलाता था, और पाल खींचकर भी जाता था. मगर फिर भी पापा मुझे अकेले समुन्दर में नहीं जाने देते थे. मैं था बारह साल का.
एक बार मुझे और बहन नीना को पता चला कि पापा दो दिनों के लिए घर से दूर जा रहे हैं, और हमने नाव पर उस तरफ़ जाने का प्लान बनाया; खाड़ी के उस तरफ़ एक बहुत अच्छा छोटा सा घर था: सफ़ेद, लाल छत वाला. घर के चारों ओर बगिया थी. हम वहाँ कभी नहीं गए थे, हमने सोचा, कि वहाँ बहुत अच्छा होगा. शायद एक भला बूढ़ा अपनी बुढ़िया के साथ रहता होगा. नीना कहती है, कि उनके पास एक छोटा सा कुत्ता भी होगा, वो भी भला होगा. बूढ़े शायद दही खाते होंगे और हमारे आने से उन्हें ख़ुशी होगी, हमें भी वो दही देंगे.
तो, हमने ब्रेड और पानी के लिए बोतलें बचाना शुरू कर दिया. समंदर में तो पानी नमकीन होता है ना, और अगर अचानक रास्ते में प्यास लगी तो?
पापा शाम को चले गए, और हमने फ़ौरन मम्मा से छुप के बोतल में पानी भर लिया. वर्ना पूछेगी : किसलिए? और, फिर सब गुड़-गोबर हो जाता.
जैसे ही कुछ उजाला हुआ, मैं और नीना हौले से खिड़की से बाहर निकले, अपने साथ नाव में ब्रेड और पानी की बोतलें रख लीं. मैंने पाल लगा दिए, और हम समुंदर में आए. मैं कप्तान की तरह बैठा था, और नीना नाविक की तरह मेरी बात सुन रही थी.
हवा हल्के-हल्के चल रही थी, और लहरें छोटी-छोटी थीं, और मुझे और नीना को ऐसा लग रहा था, मानो हम एक बड़े जहाज़ में हैं, हमारे पास खाने-पीने का स्टॉक है, और हम दूसरे देश को जा रहे हैं. मैं सीधा लाल छत वाले घर की ओर चला. फिर मैंने बहन से नाश्ता बनाने के लिए कहा. उसने ब्रेड के छोटे-छोटे टुकड़े किए और पानी की बोतल खोली. वह नाव में नीचे ही बैठी थी, मगर अब, जैसे ही मुझे नाश्ता देने के लिए उठी, और पीछे मुड़ कर देखा, हमारे किनारे की ओर, तो वह ऐसे चिल्लाई, कि मैं काँप गया:
“ओय, हमारा घर मुश्किल से नज़र आ रहा है!” और वह बिसूरने लगी.
मैंने कहा:
“रोतली, मगर  बूढ़ों का घर नज़दीक है.”
उसने सामने देखा और और भी बुरी तरह चीखी:
“और बूढ़ों का घर भी दूर है : हम उसके पास बिल्कुल नहीं पहुँचे हैं, मगर अपने घर से दूर हो गए हैं!”
वह बिसूरने लगी, और मैं चिढ़ाने के लिए ब्रेड खाने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो. वह रो रही थी और मैं समझा रहा था;
“वापस जाना चाहती है, तो डेक से कूद जा और तैर कर घर पहुँच जा, मगर मैं तो बूढ़ों के पास जाऊँगा.”
फिर उसने बोतल से पानी पिया और सो गई. मैं स्टीयरिंग पर बैठा रहा, और हवा वैसे ही चल रही है. नाव आराम से जा रही है, और पिछले हिस्से की तरफ़ पानी कलकल कर रहा है. सूरज ऊपर आ गया था.
मैंने देखा कि हम उस किनारे के बिल्कुल नज़दीक आ गए हैं और घर भी साफ़ दिखाई दे रहा है. नीना उठेगी और देखेगी – ख़ुश हो जाएगी! मैंनें इधर-उधर देखा, कि कुत्ता कहाँ है. मगर ना तो कुत्ता, ना ही बूढ़ लोग दिखाई दिए.
अचानक नाव लड़खड़ाई और एक किनारे मुड़ गई. मैंने फौरन पाल उतारे, जिससे पूरी तरह पलट न जाए. नीना उछली. वह अभी तक नींद में थी, वह समझ ही नहीं पाई, कि कहाँ है, और उसने आँखें फाड़ कर देखा. मैंने कहा:
“रेत में घुस गए हैं, उथले पानी में फँस गए हैं, मैं अभी धकेलता हूँ. और, ये रहा घर.”
मगर उसे घर देखकर ख़ुशी नहीं हुई, वह और ज़्यादा डर गई. मैंने कपड़े उतारे, पानी में कूदा और धकेलने लगा.
मैंने पूरी ताकत लगा दी, मगर नाव टस से मस नहीं हुई. मैंने उसे कभी एक तरफ़ तो कभी दूसरी तरफ़ झुकाया. मैंने पाल उतार दिए, मगर कुछ फ़ायदा नहीं हुआ.
नीना चिल्लाकर बूढ़े को मदद के लिए पुकारने लगी. मगर वो घर दूर था, और कोई भी बाहर नहीं आया. मैंने नीना को बाहर कूदने की आज्ञा दी, मगर इससे भी नाव हल्की नहीं हुई: नाव मज़बूती से रेत में धँस गई थी. मैंने पैदल चलकर किनारे की ओर जाने की कोशिश की. मगर जहाँ भी जाओ, सब जगह गहरा पानी था. कहीं जाने का सवाल ही नहीं था. और इतना दूर कि तैरकर जाना भी मुमकिन नहीं था.
और घर से भी कोई बाहर नहीं आ रहा है. मैंने ब्रेड खाई, पानी पिया और नीना से बात नहीं की. वह रो रही थी और कह रही थी:
“ लो, फँसा दिया ना, अब हमें यहाँ कोई नहीं ढूँढ़ पायेगा. समुंदर के बीच उथली जगह पर बिठा दिया. कैप्टन! मम्मा पागल हो जाएगी. देख लेना. मम्मा मुझसे कहती ही थी : “अगर तुम लोगों को कुछ हो गया, तो मैं पागल हो जाऊँगी”.
मगर मैं ख़ामोश रहा. हवा बिल्कुल थम गई. मैं सो गया.
जब मेरी आँख खुली, तो चारों ओर घुप अँधेरा था. नीन्का, नाव की बिल्कुल नोक पर बेंच के नीचे दुबक कर कराह रही थी. मैं उठकर खड़ा हो गया, और पैरों के नीचे नाव हल्के-हल्के, आज़ादी से हिचकोले लेने लगी. मैंने जानबूझकर उसे ज़ोर से हिलाया. नाव आज़ाद हो गई. मैं ख़ुश हो गया! हुर्रे! हम उथले पानी से निकल गए थे. ये हवा ने अपनी दिशा बदल दी थी, उसने पानी को धकेला, नाव ऊपर उठी, और वह उथले पानी से बाहर निकल आई.       
मैंने चारों तरफ़ देखा. दूर रोशनियाँ जगमगा रही थीं – ढेर सारी. ये हमारे वाले किनारे पर थीं : छोटी-छोटी, चिनगारियों जैसी. मैं पाल चढ़ाने के लिए लपका. नीना उछली और पहले तो उसने सोचा कि मैं पागल हो गया हूँ. मगर मैंने कुछ नहीं कहा.
और जब नाव को रोशनियों की ओर मोड़ा, तो उससे कहा;
“क्या, रोतली? घर जा रहे हैं. बिसूरने की ज़रूरत नहीं है.
हम पूरी रात चलते रहे. सुबह-सुबह हवा थम गई. मगर हम किनारे के पास ही थे. हम चप्पू चलाते हुए घर तक पहुँचे. मम्मा गुस्सा भी हुई और ख़ुश भी हुई. मगर हमने उससे विनती की, कि पापा को कुछ न बताए.
बाद में हमें पता चला, कि उस घर में साल भर से कोई भी नहीं रहता है.
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शुक्रवार, 18 मार्च 2016

Chiki Brik


चिकी-ब्रीक

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
            अनुवाद: आ. चारुमति रामदास 
                                    
      
हाल ही की बात है, मैं बस जैसे मर ही गया था. हँसते-हँसते. और सब इस मीशा की वजह से.

एक बार पापा ने कहा:
”कल, डेनिस्का, हम घास चरने जाएँगे. कल मम्मा की भी छुट्टी है और मेरी भी. अपने साथ किसे ले जाएँगे?”
 “ज़ाहिर है, किसे – मीश्का को.”
मम्मा ने पूछा:
 “क्या उसे जाने देंगे?”
 “अगर हमारे साथ जा रहा है, तो जाने देंगे. उसमें क्या है?” मैंने कहा. “चलो, मैं उसे इन्वाइट करके आता हूँ.”

और मैं मीश्का के यहाँ भागा. जब उनके घर में घुसा तो कहा, “नमस्ते!” उसकी मम्मा ने मुझे जवाब नहीं दिया, बल्कि उसके पापा से कहा:
 “देखो, कैसा अच्छा बच्चा है, नहीं तो हमारा...”

मैंने उन्हें सारी बात समझाई, कि हम मीश्का को कल शहर से बाहर, गाँव में, घूमने के लिए इन्वाइट कर रहे हैं, और उन्होंने फ़ौरन इजाज़त दे दी, और अगली सुबह हम निकल पड़े.
बहुत मज़ा आ रहा था इलेक्ट्रिक ट्रेन में जाने में, बहुत ज़्यादा!

पहली बात, बेंचों के हत्थे चमक रहे थे. दूसरी बात, अलार्म चेन्स – लाल-लाल, बिल्कुल आँखों के सामने लटक रही हैं. और चाहे कितनी ही बार क्यों न जाओ, हमेशा उस चेन को खींचने का या कम से कम हाथ से सहलाने का मन करता है. और सबसे ख़ास बात – खिड़की से बाहर देख सकते हो, वहाँ एक ख़ास छोटी सी सीढ़ी थी. अगर कोई बहुत छोटा है, तो इस सीढ़ी पे खड़े होकर सिर बाहर निकाल सकता है. मैंने और मीश्का ने फ़ौरन एक खिड़की पे कब्ज़ा कर लिया, दोनों एक ही खिड़की से बाहर देख रहे थे, बहुत बढ़िया लग रहा था ये देखना कि चारों ओर एकदम नई घास बिखरी है और फ़ेन्सिंग्स पर रंग बिरंगी चादरें टंगी हैं, ख़ूबसूरत, जैसे जहाज़ों पर फ़हराते हुए झण्डे.

मगर पापा और मम्मा हमें चैन से देखने नहीं दे रहे थे. वे हर मिनट पीछे से पतलून पकड़ कर हमें पीछे खींचते और चिल्लाते:
 “बाहर सिर मत निकालो, कह रहे हैं तुमसे! वर्ना बाहर लुढ़क जाओगे!”
मगर हम बाहर झाँकते ही रहे. तब पापा ने चालाकी से काम लिया. उन्होंने सोच लिया था कि चाहे जो हो जाए, हमें खिड़की से हटा ही देंगे. इसलिए उन्होंने मज़ाकिया चेहरा बनाया और जानबूझ कर सर्कस वालों जैसी आवाज़ में कहा:
 “ऐ, बच्चा लोग! अपनी-अपनी जगह पे बैठ जाओ! ‘शो’ शुरू होने जा रहा है!”
मैं और मीश्का फ़ौरन खिड़की से दूर उछले और बगल में ही बेंच पे बैठ गए, क्योंकि मेरे पापा       मशहूर मसख़रे हैं, और हम समझ गए कि अब कोई मज़ेदार चीज़ होगी. कम्पार्टमेंट के सारे पेसेंजर्स ने भी अपने सिर घुमाए और वो पापा की तरफ़ देखने लगे. और वो, जैसे कुछ हुआ ही न हो, अपनी बात कहते रहे:
 “सम्माननीय दर्शकों! अब आपके सामने प्रोग्राम पेश करेगा काले जादू का, नींद में चलने का, और सम्मोहन का मास्टर, जिसे आज तक कोई हरा नहीं सका!!! पूरी दुनिया में जाने-माने जादूगर ऑस्ट्रेलिया और मलाखोव्का के चहेते, तलवारें, खाने के बन्द डिब्बे और जलते हुए इलेक्ट्रिक बल्ब्स निगलने वाले, प्रोफेसर एडवर्ड कन्द्रात्येविच किओ-सिओ! ऑर्केस्ट्रा – म्यूज़िक! त्रा-बी-बो-बूम-ल्या-ल्या! त्रा-बी-बो-बूम-ल्या-ल्या!”
सबकी नज़रें पापा पे जम गईं, और वो मेरे और मीश्का के सामने खड़े होकर बोले:
 “मौत की रिस्क वाला आइटम! ज़िन्दा तर्जनी को पब्लिक के सामने उखाड़ना! कमज़ोर दिल वालों से निवेदन है कि बेहोश होकर फर्श पे न गिर जाएँ, बल्कि हॉल से बाहर चले जाएँ. अटेन्शन, प्लीज़!”

 अब पापा ने अपने हाथ इस तरह से रखे कि मुझे और मीश्का को लगा, जैसे वो अपने दाएँ हाथ से बाईं तर्जनी को पकड़ रहे हैं. फिर पापा पूरे तन गए, लाल हो गए, उन्होंने चेहरा भयंकर बना लिया, मानो वो दर्द से मर रहे हैं, और फिर अचानक वो गुस्से में आ गए, अपनी हिम्मत बटोरी और...अपनी ऊँगली उखाड़ दी! हाँ, सही में!... हमने ख़ुद देखा...ख़ून नहीं था. मगर ऊँगली भी नहीं थी! वहाँ एकदम चिकनी जगह थी. ग्यारंटी से कहता हूँ!
पापा ने कहा:
 “वॉयला!”

मुझे ये भी नहीं मालूम कि इसका मतलब क्या होता है. मगर फिर भी मैंने तालियाँ बजाईं, और मीश्का ने कहा ‘वन्स मोर’.
तब पापा ने दोनों हाथ झटके, कॉलर के पीछे ले गए, और बोले:
 “आले-ओप्! चिकी-ब्रिक!”
और ऊँगली वापस लगा दी! हाँ-हाँ! न जाने कहाँ से पुरानी जगह पे नई ऊँगली आ गई! बिल्कुल वैसी ही, पहली वाली से ज़रा भी फ़रक नहीं, स्याही का धब्बा भी, वो भी वैसा ही था! मैं तो, बेशक समझ गया कि ये कोई जादू है और मैं हर हाल में पापा से जान लूँगा, कि इसे कैसे किया जाता है, मगर मीश्का तो बिल्कुल भी नहीं समझ पाया. उसने कहा:
 “ऐसा कैसे हो गया?”
पापा सिर्फ मुस्कुरा दिए:
 “जब बड़े हो जाओगे, तो काफ़ी कुछ जान जाओगे!”
तब मीश्का ने दयनीयता से कहा:
”प्लीज़, एक बार और दुहराइए! चिकी-ब्रिक!”

पापा ने सब कुछ फिर से दुहराया, ऊँगली उखाड़ी और वापस बिठा दी, और फिर से सॉलिड सरप्राइज़. इसके बाद पापा ने झुककर अभिवादन किया, और हम समझे कि ‘शो’ ख़तम हो गया, मगर, पता चला कि ऐसा कुछ भी नहीं था. पापा ने कहा:
”काफ़ी सारी फ़रमाइशों को देखते हुए, ‘शो’ जारी रहता है! अब आप देखेंग़े फ़कीर की कुहनी पर घिसटता हुआ सिक्का! माएस्ट्रो, त्रिबो-बि-बुम-ल्या-ल्या!”
और पापा ने सिक्का निकाला, उसे अपनी कुहनी पे रखा और इस सिक्के को सरकाते हुए अपने कोट में गिराने की कोशिश करने लगे. मगर वो कहीं भी नहीं सरका, बल्कि पूरे समय गिरता ही रहा, तब मैं पापा के ऊपर ख़ूब हँसने लगा. मैंने कहा:
”ऐख़, ऐख! ये फ़कीर है! सिर्फ मुसीबत, न कि फ़कीर!”
सब लोग ठहाका लगाने लगे, पापा ख़ूब लाल हो गए और चिल्लाए:
 “ऐ, तू, सिक्के! फ़ौरन घिसट! वर्ना मैं तुझे उस अंकल को दे दूँगा आइस्क्रीम ख़रीदने के लिए! तू भी क्या याद रखेगा!”   
और सिक्का मानो पापा से डर गया और फ़ौरन कुहनी पर घिसटने लगा. और ग़ायब हो गया.
 “क्या, डेनिस्का, हार गया?” पापा ने कहा. “कौन चिल्ला रहा था कि मैं मुसीबत-फ़कीर हूँ? और अब देखिए: तमाशा-मूकाभिनय! खोए हुए सिक्के का बेहतरीन बच्चे मीश्का की नाक से निकलना! चिकी-ब्रिक!”
और पापा ने मीश्का की नाक से सिक्का खींच कर बाहर निकाला. ओह, दोस्तों, मैं नहीं जानता था कि मेरे पापा इत्ते सुपर हैं! मीश्का तो गर्व से दमक रहा था. वो अचरज से चमक रहा था और उसने फिर से ज़ोर से चिल्लाकर पापा से कहा;
 “प्लीज़, एक बार और चिकी-ब्रिक दुहराइए!”

पापा ने फिर से सब कुछ दुहराया, और इसके बाद मम्मा ने कहा:
 “इंटरवल! अब हम रेस्टारेंट में जाएँगे.”
और उसने हमें एक-एक सॉसेज वाला सैण्डविच दिया. मैं और मीशा इन सैण्डविचेस पे झपट पड़े, हम खा रहे थे, पैर हिला रहे थे, और इधर-उधर देख रहे थे. अचानक मीश्का बिना बात के बोल पड़ा:
 “मुझे मालूम है कि आपकी हैट किसके जैसी है.”
मम्मा ने पूछा:
 “अच्छा, बता – किसके जैसी है?”
 “कास्मोनॉट के हेल्मेट जैसी.”
पापा ने कहा:
 “करेक्ट. वाह, मीश्का, बिल्कुल सही निरीक्षण किया! और सच में, ये हैट कास्मोनॉट के हेल्मेट जैसी ही है. कुछ नहीं कर सकते, फ़ैशन कोशिश करती है कि मॉडर्न ज़माने से पिछड़ न जाए. अच्छा, मीश्का, इधर आ!”
और पापा ने हैट लेकर मीश्का के सिर पे रख दी.
 “बिल्कुल पोपोविच!” मम्मा ने कहा.

मीश्का वाक़ई में किसी छोटे कास्मोनॉट जैसा था. वो इतनी शान से बैठा था, और इतना मज़ेदार दिख रहा था, कि वहाँ से गुज़रने वाले सब लोग उसकी तरफ़ देखते और मुस्कुराने लगते.

और पापा भी मुस्कुरा रहे थे, और मम्मा भी, और मैं भी मुस्कुरा रहा था कि मीश्का इतना प्यारा है.
फिर हमारे लिए एक-एक आइस्क्रीम ख़रीदी गई, और हम उसे खाने लगे और चाटने लगे, मगर मीश्का ने मुझसे पहले ख़तम कर ली और फिर से खिड़की की तरफ़ गया. उसने चौखट पकड़ ली, छोटी वाली सीढ़ी पर चढ़ा और बाहर की ओर झुका.

हमारी इलेक्ट्रिक ट्रेन तेज़ और एक समान गति से भागी जा रही थी, खिड़की से बाहर नज़ारे मानो उड़ रहे थे, और ऐसा लग रहा था कि मीश्का को कास्मोनॉट वाली हेल्मेट पहन कर खिड़की से बाहर सिर निकालने में मज़ा आ रहा था, वो इतना ख़ुश था कि उसे दुनिया में किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं थी. मैं उसकी बगल में खड़ा होना चाह रहा था, मगर तभी मम्मा ने मुझे कुहनी मारी और आँखों से पापा की तरफ़ इशारा किया.

पापा हौले से उठे और पंजों के बल चलते हुए कम्पार्टमेण्ट के दूसरे हिस्से में गए, वहाँ भी खिड़की खुली थी, और उसमें से कोई भी नहीं देख रहा था. पापा बड़े रहस्यमय लग रहे थे, चारों ओर सब लोग शांत हो गए और पापा की तरफ़ ध्यान देने लगे. वो दबे पाँव इस दूसरी वाली खिड़की के पास आए, सिर बाहर निकाला और सामने देखने लगे, ट्रेन की दिशा में, उसी तरफ़, जिधर मीश्का देख रहा था. फिर पापा ने धीरे-धीरे अपना दाहिना हाथ बाहर निकाला, सावधानी से मीश्का की ओर बढ़ाया और अचानक बिजली की तेज़ी से उसके सिर से मम्मा की हैट खींच ली! पापा फ़ौरन खिड़की से दूर उछले और हैट को पीठ के पीछे छुपा लिया, वहीं उसे बेल्ट से लटका दिया. मैंने बड़ी अच्छी तरह ये सब देखा. मगर मीश्का ने तो नहीं देखा! उसने सिर पकड़ लिया, वहाँ मम्मा की हैट न पाकर डर गया, खिड़की से पीछे उछला और डरते हुए मम्मा के सामने खड़ा हो गया. मम्मा चहकी:
 “क्या बात है? क्या हुआ, मीश्का? मेरी नई हैट कहाँ है? कहीं हवा में तो नहीं उड़ गई? मैंने तुझसे कहा था: बाहर सिर न निकाल. मेरा दिल मुझसे कह रहा था, कि मैं बिना हैट के रह जाऊँगी! अब मैं क्या करूँ?”

मम्मा ने दोनों हाथों में अपना चेहरा छुपा लिया और कंधे हिलाने लगी, जैसे वो ज़ोर ज़ोर से रो रही हो. बेचारे मीश्का की ओर देखकर बड़ी दया आ रही थी, वो धीमी आवाज़ में बुदबुदा रहा था:
 “रोइए नहीं...प्लीज़. मैं आपको नई हैट ख़रीद दूँगा...मेरे पास पैसे हैं...सैंतालीस कोपेक. मैंने डाक टिकटों के लिए इकट्ठा किए थे...”
उसके होंठ थरथरा रहे थे, और पापा, बेशक, ये बर्दाश्त न कर सके. उन्होंने फ़ौरन अपना चेहरा मज़ाकिया बना लिया और सर्कस वालों जैसी आवाज़ में चिल्लाए:
 “नागरिकों, अटेन्शन प्लीज़! रोइए नहीं और शांत हो जाइए! आप ख़ुशनसीब हैं कि महान जादूगर एडवर्ड कन्द्रात्येविच किओ-सिओ को जानते हैं! अभी एक शानदार ट्रिक दिखाई जाएगी: “हैट की वापसी, जो नीली एक्स्प्रेस से बाहर गिर गई थी”. होशियार! अटेन्शन! चिकी-ब्रिक!”

और पापा के हाथों में मम्मा की हैट दिखाई दी. मैं भी नहीं देख पाया था, कि कितनी चालाकी से पापा ने उसे पीठ के पीछे से निकाला था. सब लोग ‘आह-आह!’ करने लगे. मीश्का का चेहरा ख़ुशी से चमकने लगा. अचरज के मारे उसकी आँख़ें माथे तक चढ़ गईं. वो इतना उत्तेजित था, कि बस उड़ने ही वाला था. वो जल्दी से पापा के पास गया, उनसे हैट ली, भागकर वापस आया और पूरी ताक़त से उसे सचमुच में खिड़की से बाहर फेंक दिया.
फिर वो मुड़ा और मेरे पापा से बोला;
 “प्लीज़, एक बार और दुहराइए...चिकी-ब्रिक!”

तभी तो ये हुआ कि हँसी के मारे मैं बस मर ही नहीं गया.


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