शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

बुरातिनो - 15

 

15

पुलिस वाले बुरातिनो को पकड़ लेते हैं और अपनी सफ़ाई में एक भी शब्द नहीं कहने देते. 

 

अनुवाद: चारुमति रामदास 


लोमड़ी अलीसा सोच रही थी कि बुरातिनो सोने के लिए जाएगा, मगर वह कचरे के ढेर पर बैठा रहा, इत्मीनान से नाक बाहर खींचे.

तब अलीसा ने बिल्ले को उस पर नज़र रखने के लिए कहा, और खुद नज़दीक के पुलिस स्टेशन में भागी.

वहां, धुएं से भरे कमरे में, स्याही के धब्बों से ढंकी मेज़ के पीछे, ड्यूटी पर तैनात बुलडॉग खूब खर्राटे ले रहा था। लोमड़ी ने भलमनसाहत से कहा:

“महाशय, साहसी ड्यूटी ऑफिसर, क्या एक सड़कछाप चोर को गिरफ्तार कर सकते हैं? इस शहर के सभी अमीर और आदरणीय निवासियों के सिर पर भयानक खतरा मंडरा रहा है.

ड्यूटी वाला बुलडॉग, जो आधी नींद से जाग गया, इतनी ज़ोर से भौंका कि लोमड़ी के नीचे डर के मारे एक डबरा बन गया.

“चोर! हूँ!”

लोमड़ी ने स्पष्ट किया, कि खतरनाक चोर-बुरातिनो को एक खाली जगह पर देखा गया.

ड्यूटी ऑफिसर ने, अभी भी गुर्राते हुए, घंटी बजाई.     

दो डॉबरमैने-पिंसर जासूस कमरे में घुस गए, जो कभी भी नहीं सोते थे, किसी पर भी भरोसा नहीं करते थे, और खुद अपने आप पर भी आपराधिक इरादों में लिप्त होने का संदेह करते थे.

ड्यूटी ऑफिसर ने उन्हें विभाग में खतरनाक अपराधी को ज़िंदा या मुर्दा लाने का हुक्म दिया. 

जासूसों ने संक्षेप में उत्तर दिया:

“त्याफ!”

और ख़ास चालाक अंदाज़ में, पिछले पैरों को बगल में रखते हुए, बंजर भूमि की ओर सरपट भागे.

आख़िरी सौ कदम वे अपने पेटों पर रेंग कर गए और अचानक बुरातिनो पर कूदे, उसे बगल के नीचे से पकड़ लिया और खींचते हुए डिपार्टमेंट ले गए. बुरातिनो पैर पटकता रहा, उनसे बताने की विनती करता रहा – किसलिए? किसलिए?

जासूसों ने जवाब दिया:

“वहां सब सुलझा लेंगे...”

लोमड़ी और बिल्ले ने, बिना समय गंवाए खोदकर सोने के चार सिक्के बाहर निकाले. लोमड़ी इतनी होशियारी से  पैसे बांटने लगी, कि बिल्ले को बस एक ही सिक्का मिला, और उसे – तीन.

बिल्ले ने खामोशी से अपने पंजे उसके मुंह पर गड़ा दिए.

लोमड़ी ने उसे अपने पंजों से कसकर पकड़ लिया. और वे दोनों कुछ देर बंजर ज़मीन पर गोले की तरह लुढ़कते रहे. बिल्ले और लोमड़ी के बालों के गुच्छे चाँद की रोशनी में उड़ रहे थे.

किनारे से एक दूसरे की चमड़ी नोंचकर, उन्होंने आपस में सिक्के आधे-आधे बांट लिए और उसी रात को शहर से गायब हो गए.

इस बीच जासूस बुरातिनो को पुलिस स्टेशन ले आए.

ड्यूटी पर तैनात बुलडॉग मेज़ के पीछे से बाहर आया और उसने खुद बुरातिनो की जेबों की तलाशी ली.

सिर्फ शकर के एक छोटे से टुकड़े और बादाम केक के चूरे के अलावा और कुछ भी न पाकर, ड्यूटी पर तैनात अफसर ने बुरातिनो को खून की प्यासी नज़रों से देखा:

“तूने तीन अपराध किये हैं, कमीने : तू - बेघर है, बगैर पासपोर्ट के है और बेकार है. इसे शहर के बाहर ले जाकर तालाब में डुबो दिया जाए.”  

जासूसों ने जवाब दिया:

“त्याफ!”

बुरातिनो ने पापा कार्लो के बारे में, अपने कारनामों के बारे में बताना चाहा. मगर, सब बेकार! जासूसों ने उसे पकड़ लिया, सरपट खींचते हुए शहर के बाहर ले गए और पुल से गहरे, गंदे तालाब में फेंक दिया, जो मेंढकों से, जोंकों से और पानी के भौंरों की गन्दगी से लबालब भरा था.   

बुरातिनो पानी में गोते लगाने लगा, और हरे रंग की बेलों ने उसे लपेट लिया.

बुरातिनो तालाब में रहने वालों से दोस्ती करता है, चार सोने के सिक्कों के गुम होने के बारे में जानता है और कछुए तोर्तिला से सुनहरी चाबी प्राप्त करता है.  

ये नहीं भूलना चाहिए कि बुरातिनो लकड़ी का था, और इसलिए डूब नहीं सकता था. फिर भी, वह इतना डर गया था, कि हरी काई से लिपटा, बड़ी देर तक पानी पर पड़ा रहा.

उसके चारों ओर तालाब में रहने वाले प्राणी इकट्ठा हो गए: अपनी बेवकूफियों की वजह से मशहूर काले पेट वाले मेंढक, चप्पुओं जैसे पिछले पंजों वाले पानी के भंवरे, जोंकें, लार्वा, जो सामने पड़ी हर चीज़ खा लेते हैं, यहां तक कि अपने आप को भी, और अंत में विभिन्न प्रकार के छोटे छोटे तन्तुयुक्त कीड़े.

मेंढक अपने कड़े होठों से उसे गुदगुदी कर रहे थे और खुशी से हुड की लटकन चबा रहे थे. लीचें उसके जैकेट की जेब में घुस गईं. एक पानी का भौंरा कई बार उसकी नाक पर चढ़ गया, जो पानी के काफ़ी ऊपर निकली हुई थी, और वहां से पानी में कूद जाता – पंछी की तरह.   

छोटे छोटे तन्तुयुक्त कीड़े, अपने बालों में उलझते, जो हाथों और पैरों के बदले उनके शरीरों पर थे, उनसे मुक्त होने की कोशिश करते, खाने के लिए कोई चीज़ ढूँढने की कोशिश कर रहे थे, मगर खुद ही पानी के भौरों के मुंह में गिर रहे थे.

बुरातिनो, आखिरकार इस सबसे उकता गया, वह पानी पर अपने पंजे चलाने लगा:

“भाग जाओ! मैं आपके लिए कोई मरी हुई बिल्ली नहीं हूँ.”

पानी में रहने वाले तितर-बितर हो गए. वह पेट के बल मुड़ा और तैरने लगा.

पानी की लिली के गोल-गोल पत्तों पर चाँद की रोशनी में बड़े मुंह वाले मेंढक बैठे थे, वे आंखें बाहर निकाले बुरातिनो की और देख रहे थे.

“कोई कटलफिश तैर रही है,” एक मेंढक टर्राया.

“नाक, सारस की तरह है,” दूसरा टर्राया.

“यह समुद्री मेंढक है,” तीसरा टर्राया.

बुरातिनो, कुछ देर आराम करने के लिए, वाटर-लिली के बड़े पत्ते पर बाहर आया. उसके ऊपर बैठ गया, घुटनों को कसकर पकड़ लिया और दांत किटकिटाते हुए बोला:

“सारे लड़के और लड़कियां जी भर के दूध पी चुके, गरम बिस्तरों में सो रहे हैं, सिर्फ मैं अकेला गीले पत्ते पर बैठा हूँ...मेंढकों, मुझे खाने के लिए कुछ दो.”

मेंढक, जैसा सबको मालूम है, बेरहम होते हैं. मगर ये सोचना गलत है कि उनका दिल नहीं होता. जब बुरातिनो ने दांत किटकिटाते हुए अपने दुर्भाग्यपूर्ण कारनामों के बारे में बताना शुरू किया, तो मेंढक एक के बाद एक उछलने लगे, अपने पिछले पैर उछालते हुए तालाब की तली में कूद गए.

वहां से वे एक मरा हुआ भौंरा, ड्रैगनफ्लाय का पंख, मिट्टी का टुकड़ा, ‘क्रस्तेशियन रो’ का एक दाना और कुछ सड़ी हुई जड़ें लाए.

ये सारी खाने की चीजें बुरातिनो के सामने रखकर मेंढक फिर से ‘वाटर लिली’ के पत्तों पर चढ़ गए और पत्थर जैसे बैठ गए, बाहर निकली आंखें और बड़े मुख वाले सिर उठाये.  

बुरातिनो ने सूंघा और मेंढकों की लाई हुई चीज़ों को मुंह में डाला.

“मुझे उल्टी आ रही है,” उसने कहा, “कैसा घिनौना खाना है!...”

तब सारे मेंढक फिर से एक साथी पानी में घुस गए...

तालाब की सतह पर हरे रंग का पट्टा सरसराया, और एक बड़ा, भयानक सांप का सिर प्रकट हुआ. वह उस पत्ते की और तैरने लगा, जिस पर बुरातिनो बैठा था.

उसकी टोपी के ऊपर वाली लटकन सिर के बल खड़ी हो गयी. खौफ़ के मारे वह पानी में गिरते-गिरते बचा.

मगर यह सांप नहीं था. यह एक आधी अंधी आंखों वाला, अधेड़ कछुआ तर्तीला था, जो ज़रा भी खतरनाक नहीं था. 

आह तू, बुद्धिहीन, हर किसी पर विश्वास करने वाला, छोटे विचारों वाला!” तर्तीला ने कहा. “तुझे तो घर में बैठकर खूब मेहनत से पढ़ना चाहिए! और तू पहुँच गया ‘मूर्खों के देस में!”

“क्योंकि मैं पापा कार्लो के लिए और ज़्यादा सोने के सिक्के प्राप्त करना चाहता हूँ...मैं बहुहुहुहुत अच्छा और समझदार बालक हूँ...”

“तेरे पैसे बिल्ले और लोमड़ी ने चुराए हैं,” कछुए ने कहा. “वे तालाब के पास से भाग कर जा रहे थे, पानी पीने के लिए रुके थे, और मैंने उन्हें डींग मारते हुए सुना, कि तुम्हारे पैसे ज़मीन से खोद कर निकाले हैं, और उनके कारण वे आपस में झगड़ पड़े...ओह, तू बुद्धिहीन, हरेक पर विश्वास करने वाले, छोटे विचारों वाले!”

“डांटना नहीं चाहिए,” बुरातिनो बुदबुदाया, “ऐसी हालत में इंसान की मदद करना चाहिए...अब मैं क्या करूंगा? ओय-ओय-ओय!...पापा कार्लो के पास लौटकर कैसे जाऊंगा? आय-आय-आय!...”

उसने मुट्ठियों से आंखें पोंछी, और इतनी दयनीयता से कराहा, कि सारे मेंढकों एकदम गहरी आह भरी:

“ऊह-ऊह... तर्तीला, इंसान की मदद करो.”

कछुआ बड़ी देर तक चांद की ओर देखता रहा, उसे कुछ याद आया...

“एक बार मैंने इसी तरह इंसान की मदद की थी, मगर उसने बाद में मेरी दादी और दादा की खाल से कछुए  की कंघियाँ बनाईं,” उसने कहा. और फिर से बड़ी देर तक चांद की तरफ़ देखता रहा. “ अच्छा, यहाँ बैठ, नन्हे इंसान, और मैं रेंगते हुए तालाब के तल तक जाता हूँ, - हो सकता है, एक काम की चीज़ मिल जाए.”

उसने सांप जैसे सिर को भीतर खींच लिया और धीरे धीरे पानी के नीचे चला गया.

मेंढक फुसफुसा रहे थे:

“कछुआ तर्तीला कोई बड़ा रहस्य जानता है.”       

बहुत सारा समय बीत गया.

चाँद पहाड़ियों के पीछे डूबने लगा था.

हरी काई फिर से हिलने लगी, कछुआ प्रकट हुआ, मुंह में छोटी सी सोने की चाबी पकड़े.

उसने उसे बुरातिनो के पैरों के पास एक पत्ते पर रख दिया.

“बुद्धिहीन, मूर्खों पर भरोसा करने वाले, छोटे विचारों के,” – तर्तीला ने कहा, “दुखी न हो, कि लोमड़ी और बिल्ले ने तुम्हारे सोने के सिक्के चुरा लिए. मैं तुम्हें ये चाबी देता हूँ. उसे तालाब के तल पर एक आदमी ने गिरा दिया था, जिसकी दाढ़ी इतनी लम्बी थी कि वह उसे जेब में घुसा देता था, जिससे दाढी उसके चलने में बाधा न डाले. आह, कितनी मिन्नत कर रहा था, कि मैं तालाब के तल से ये चाबी खोज कर लाऊँ!...’

तर्तीला ने आह भरी, कुछ देर खामोश रहा, और फिर से ऐसी गहरी सांस ली कि पानी से बुलबुले उठने लगे...

“मगर मैंने उसकी मदद नहीं की, मैं तब लोगों पर बेहद गुस्सा था मेरी दादी और दादा की वजह से, जिनकी खाल से कछुए की कंघियां बनाई गयी थीं. दाढी वाले आदमी ने इस चाबी के बारे में बहुत कुछ बताया था, मगर मैं सब कुछ भूल गया. सिर्फ़ इतना याद है, कि इससे कोई दरवाज़ा खोला जा सकता है और इससे खुशी मिलेगी...”

बुरातिनो का दिल धड़कने लगा, आंखें जलने लगीं. वह अपने सभी दु:खों के बारे में भूल गया. उसने जैकेट की जेब से जोंकें निकालीं, वहां चाबी रखी, नम्रता से कछुए तर्तीला और मेंढकों को धन्यवाद दिया, पानी में कूद गया और किनारे की तरफ़ तैरने लगा.

जब वह काली छाया की तरह किनारे पर दिखाई दिया, तो मेंढकों ने पीछे से चिल्लाकर कहा:

“बुरातिनो, चाबी न खोना!”

सोमवार, 26 जनवरी 2026

बुरातिनो - 14

 14

 

बुरातिनो मूर्खों के देस पहुंचता है

अनुवाद: चारुमति रामदास

नीले बालों वाली बच्ची कोठरी के दरवाज़े पर पहुंची.

“बुरातिनो, मेरे दोस्त, क्या आखिर तुम्हें पछतावा हो रहा है?

वह बहुत गुस्से में था, ऊपर से उसके दिमाग़ में कुछ और ही चल रहा था.

‘बहुत ज़रूरी है मेरे लिए पछतावा करना! इंतज़ार करते रहो...’

“तो, आपको सुबह तक कोठरी में बैठना पडेगा...”

बच्ची ने कड़वाहट से गहरी सांस ली और चली गई.

रात हो गयी. उल्लू कोठरी में ठहाके लगाने लगा. मेंढक अपनी छिपने की जगह से निकला, जिससे मैदानों में चाँद के प्रतिबिंब को पेट से मार सके.

बच्ची लेस वाले पलंग पर सोने के लिए लेट गयी और बड़ी देर तक अफ़सोस से सिसकियाँ लेती रही.

आर्तेमोन, पूंछ के नीचे नाक घुसाकर, उसके शयनकक्ष के दरवाज़े पर सो रहा था.

घर में घंटे वाली घड़ी ने आधी रात के घंटे बजाये.

चमगादड़ छत से नीचे गिरा.     

“समय हो गया है, बुरातिनो, भाग!” वह उसके के ऊपर चीखा. “कोठरी के कोने में ज़मीन के नीचे, चूहों का छेद है...मैं लॉन में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ.”

वह छत वाली खिड़की की ओर उड गया. बुरातिनो कोठरी के कोने की ओर लपका, मकड़ियों के जाल में उलझते हुए. उसके पीछे मकड़ियाँ गुस्से से फुफकारने लगीं.

वह ज़मीन के नीचे चूहे की तरह रेंगने लगा. रास्ता अधिकाधिक संकरा होता गया. बुरातिनो अब मुश्किल से ज़मीन के नीचे खुद को खींच पा रहा था...और अचानक सिर के बल उड़ते हुए ज़मीन के नीचे उड गया.

वहां वह चूहेदानी में फंसते फंसते बचा, एक सांप की पूंछ पर पैर रख दिया, जिसने अभी अभी डाइनिंग रूम में सुराही से दूध पिया था, और बिल्ली वाले छेद से लॉन में कूद गया.

नीले फूलों के ऊपर एक चूहा ख़ामोशी से उड़कर गया.

“मेरे पीछे आ, बुरातिनो, मूर्खों के देस में!”

चमगादड़ की पूंछ नहीं होती, इसलिए वह पंछी की तरह सीधे नहीं उड़ सकते, बल्कि अपने झिल्लीदार पंखों पर ऊपर और नीचे उड़ते हैं – किसी शैतान की तरह; उनका मुंह हमेशा खुला हुआ रहता है, ताकि बिना समय गंवाए, रास्ते में मच्छर और रात की तितलियों को पकड़ सकें, चबा सकें, निगल सकें.

बुरातिनो उसके पीछे गर्दन तक ऊंची घास में भाग रहा था; गीला पॉरिज उसके गालों पर थप्पड़ मार रहा था.

अचानक चमगादड़ गोल चाँद की ओर ऊंचे उड़ा और वहां उसने चिल्लाकर किसी से कहा:

“ले आया!”

बुरातिनो फ़ौरन कुलांटी मारकर खड़ी चट्टान से नीचे की ओर भागा. वह लुढ़क रहा था, लुढ़क रहा था और कपासी की झाड़ियों पर गिरा.

खरोंचों से भरा बदन, रेत से पूरा भरा हुआ मुंह, आंखें फाड़े बैठ गया.

“बाप रे!”

 उसके सामने बिल्ली बज़ीलियो और लोमड़ी अलीसा खड़े थे. 

“बहादुर, साहसी बुरातिनो, शायद चाँद से टपका है,” लोमड़ी ने कहा.

“ताज्जुब की बात है, ये ज़िंदा कैसे रह गया,” बिल्ले ने उदासी से कहा.

बुरातिनो को पुराने परिचितों से मिलकर खुशी हुई, हांलाकि उसे इस बात से संदेह हो रहा था, कि बिल्ले का दायाँ पंजा कपड़े से बांधा गया है, और लोमड़ी की पूरी पूंछ दलदल की कीचड़ से सनी हुई है.

“बिना अच्छाई के बुराई हो ही नहीं सकती,” लोमड़ी ने कहा, “मगर तुम मूर्खों के देस पहुँच गए हो...”

और उसने पंजे से सूखी नदी के ऊपर बने टूटे हुए पुल की ओर इशारा किया. नदी के उस पार कचरे के ढेर के बीच जीर्ण शीर्ण घर दिखाई दे रहे थे, टूटी हुई टहनियों वाले कटे हुए पेड़ थे और विभिन्न दिशाओं में झुके हुए घंटाघर थे....

“इस शहर में खरगोश की खाल के मशहूर जैकेट बिकते है, पापा कार्लो के लिए,” अपने होंठ चाटते हुए, लोमड़ी गा रही थी, - “वर्णमाला रंगीन तस्वीरों वाली, ..आह, कैसे मीठे केक और डंडियों पर मुर्गे की शक्ल के लॉलीपॉप! तूने अभी तक अपने पैसे गुमा तो नहीं दिए, प्यारे बुरातिनो?

लोमड़ी अलीसा ने उसके पंजे पर चुटकी काट कर, उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद की, उसका जैकेट साफ़ किया और टूटे हुए पुल से ले गयी. बिल्ला बजीलियो पीछे पीछे लंगडाते हुए चल रहा था.

आधी रात हो गई थी, मगर मूर्खों के शहर में कोई भी नहीं सो रहा था.

आड़ी-टेढ़ी, गंदी सड़क पर फुंसियों वाले कमज़ोर कुत्ते भटक रहे थे, भूख से उबासी ले रहे थे:

“ए-हे-हे...”

किनारों पर नोचे गए ‘फ़र’ वाली बकरियां फुटपाथ के पास धूल भरी घास चर रही थीं, पूंछ के किनारे को हिला रही थीं.

“बे-ए-ए-ए-ए-दा...”

सिर लटकाए, एक गाय खड़ी थी, उसकी हड्डियां चमड़ी से बाहर निकल रही थीं.

“ततककलीफ...” सोच में पड़ी वह दुहरा रही थी.

गन्दगी के ढेर पर नुचे हुए परों वाली चिड़िया थीं, - वे उड़ी नहीं थीं – चाहे आप उन्हें पैरों से क्यों न कुचल दो...

नुची हुई पूँछों वाले मुर्गे भूख से लड़खड़ा रहे थे...

मगर चौराहों पर पुलिस के डरावने बुलडॉग अटेन्शन में खड़े थे – तिकोनी टोपियों और कंटीली कॉलर में.

वे गंदे और भूखे निवासियों पर चिल्ला रहे थे:

“च च चलो! दायें रहो! रा-स्ता म-त रो-को!...

लोमड़ी बुरातिनो को रास्ते पर आगे खींचती हुई ले चली. उन्होंने चाँद की रोशनी में घूमती हुईसोने के चश्मों में, अच्छी तरह खिलाई गई बिल्लियों को देखा, जो टोपी पहनी बिल्लियों के हाथों में हाथ डाले घूम रही थीं.

मोटा लीस – इस शहर की गवर्नर घूम रही थी, घमंड से नाक ऊपर उठाए, और उसके साथ थी – घमंडी लोमड़ी, जो हथेली में बैंगनी रात रानी का फूल पकड़े हुए थी.

लोमड़ी लीसा ने फुसफुसाकर कहा:

“ये, वो लोग घूम रहे हैं, जिन्होंने चमत्कारों के खेत में पैसे बोये हैं...आज आख़िरी रात है, जब यहाँ धन बोया जा सकता है. सुबह होते होते पैसों का ढेर इकट्ठा कर लोगे और हर चीज़ खरीद लोगे...चलो, जल्दी.”

लोमड़ी और बिल्ला बुरातिनो को एक बंजर भूमि पर ले आये, जहां टूटे हुए घड़े, फटे हुए जूते, छेदों वाले गलोश और चीथड़े बिखरे थे...एक दूसरे को काटते हुए वे बकबक कर रहे थे:

“गड्ढा खोदो.”

“सोने के सिक्के रखो.”

“उन पर नमक छिड़को.”

“उसे पोखर से बाहर निकालो, अच्छी तरह पानी डालो.”

“ये कहना न भूलो ‘क्रेक्स, फेक्स, पेक्स....”

बुरासिनो ने अपनी नाक खुजाई, जिस पर स्याही के धब्बे पड़े थे.

“आप, वैसे, कुछ दूर चले जाईये...”

“माय गॉड, हम तो देखना भी नहीं चाहते कि तुम पैसे कहाँ गाड़ने जा रहे हो!” लोमड़ी ने कहा. 

“ख़ुदा सलामत रखे!” बिल्ले ने कहा.

वे थोड़ा दूर हटे और कचरे के ढेर के पीछे छुप गए.

बुरातिनो ने गढ़ा खोदा. तीन बार फुसफुसाकर कहा: ‘क्रेक्स, फेक्स, पेक्स’,  गढ़े में सोने के चार सिक्के रख दिएउन पर मिट्टी डाल दी, जेब से चुटकी भर नमक निकाला, ऊपर से छिड़क दिया. डबरे से चुल्लू भर पानी लिया, गढ़े पर डाल दिया.

और बैठकर इंतज़ार करने लगा कि पेड़ कब बड़ा होगा...