सोमवार, 26 जनवरी 2026

बुरातिनो - 14

 14

 

बुरातिनो मूर्खों के देस पहुंचता है

अनुवाद: चारुमति रामदास

नीले बालों वाली बच्ची कोठरी के दरवाज़े पर पहुंची.

“बुरातिनो, मेरे दोस्त, क्या आखिर तुम्हें पछतावा हो रहा है?

वह बहुत गुस्से में था, ऊपर से उसके दिमाग़ में कुछ और ही चल रहा था.

‘बहुत ज़रूरी है मेरे लिए पछतावा करना! इंतज़ार करते रहो...’

“तो, आपको सुबह तक कोठरी में बैठना पडेगा...”

बच्ची ने कड़वाहट से गहरी सांस ली और चली गई.

रात हो गयी. उल्लू कोठरी में ठहाके लगाने लगा. मेंढक अपनी छिपने की जगह से निकला, जिससे मैदानों में चाँद के प्रतिबिंब को पेट से मार सके.

बच्ची लेस वाले पलंग पर सोने के लिए लेट गयी और बड़ी देर तक अफ़सोस से सिसकियाँ लेती रही.

आर्तेमोन, पूंछ के नीचे नाक घुसाकर, उसके शयनकक्ष के दरवाज़े पर सो रहा था.

घर में घंटे वाली घड़ी ने आधी रात के घंटे बजाये.

चमगादड़ छत से नीचे गिरा.     

“समय हो गया है, बुरातिनो, भाग!” वह उसके के ऊपर चीखा. “कोठरी के कोने में ज़मीन के नीचे, चूहों का छेद है...मैं लॉन में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ.”

वह छत वाली खिड़की की ओर उड गया. बुरातिनो कोठरी के कोने की ओर लपका, मकड़ियों के जाल में उलझते हुए. उसके पीछे मकड़ियाँ गुस्से से फुफकारने लगीं.

वह ज़मीन के नीचे चूहे की तरह रेंगने लगा. रास्ता अधिकाधिक संकरा होता गया. बुरातिनो अब मुश्किल से ज़मीन के नीचे खुद को खींच पा रहा था...और अचानक सिर के बल उड़ते हुए ज़मीन के नीचे उड गया.

वहां वह चूहेदानी में फंसते फंसते बचा, एक सांप की पूंछ पर पैर रख दिया, जिसने अभी अभी डाइनिंग रूम में सुराही से दूध पिया था, और बिल्ली वाले छेद से लॉन में कूद गया.

नीले फूलों के ऊपर एक चूहा ख़ामोशी से उड़कर गया.

“मेरे पीछे आ, बुरातिनो, मूर्खों के देस में!”

चमगादड़ की पूंछ नहीं होती, इसलिए वह पंछी की तरह सीधे नहीं उड़ सकते, बल्कि अपने झिल्लीदार पंखों पर ऊपर और नीचे उड़ते हैं – किसी शैतान की तरह; उनका मुंह हमेशा खुला हुआ रहता है, ताकि बिना समय गंवाए, रास्ते में मच्छर और रात की तितलियों को पकड़ सकें, चबा सकें, निगल सकें.

बुरातिनो उसके पीछे गर्दन तक ऊंची घास में भाग रहा था; गीला पॉरिज उसके गालों पर थप्पड़ मार रहा था.

अचानक चमगादड़ गोल चाँद की ओर ऊंचे उड़ा और वहां उसने चिल्लाकर किसी से कहा:

“ले आया!”

बुरातिनो फ़ौरन कुलांटी मारकर खड़ी चट्टान से नीचे की ओर भागा. वह लुढ़क रहा था, लुढ़क रहा था और कपासी की झाड़ियों पर गिरा.

खरोंचों से भरा बदन, रेत से पूरा भरा हुआ मुंह, आंखें फाड़े बैठ गया.

“बाप रे!”

 उसके सामने बिल्ली बज़ीलियो और लोमड़ी अलीसा खड़े थे. 

“बहादुर, साहसी बुरातिनो, शायद चाँद से टपका है,” लोमड़ी ने कहा.

“ताज्जुब की बात है, ये ज़िंदा कैसे रह गया,” बिल्ले ने उदासी से कहा.

बुरातिनो को पुराने परिचितों से मिलकर खुशी हुई, हांलाकि उसे इस बात से संदेह हो रहा था, कि बिल्ले का दायाँ पंजा कपड़े से बांधा गया है, और लोमड़ी की पूरी पूंछ दलदल की कीचड़ से सनी हुई है.

“बिना अच्छाई के बुराई हो ही नहीं सकती,” लोमड़ी ने कहा, “मगर तुम मूर्खों के देस पहुँच गए हो...”

और उसने पंजे से सूखी नदी के ऊपर बने टूटे हुए पुल की ओर इशारा किया. नदी के उस पार कचरे के ढेर के बीच जीर्ण शीर्ण घर दिखाई दे रहे थे, टूटी हुई टहनियों वाले कटे हुए पेड़ थे और विभिन्न दिशाओं में झुके हुए घंटाघर थे....

“इस शहर में खरगोश की खाल के मशहूर जैकेट बिकते है, पापा कार्लो के लिए,” अपने होंठ चाटते हुए, लोमड़ी गा रही थी, - “वर्णमाला रंगीन तस्वीरों वाली, ..आह, कैसे मीठे केक और डंडियों पर मुर्गे की शक्ल के लॉलीपॉप! तूने अभी तक अपने पैसे गुमा तो नहीं दिए, प्यारे बुरातिनो?

लोमड़ी अलीसा ने उसके पंजे पर चुटकी काट कर, उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद की, उसका जैकेट साफ़ किया और टूटे हुए पुल से ले गयी. बिल्ला बजीलियो पीछे पीछे लंगडाते हुए चल रहा था.

आधी रात हो गई थी, मगर मूर्खों के शहर में कोई भी नहीं सो रहा था.

आड़ी-टेढ़ी, गंदी सड़क पर फुंसियों वाले कमज़ोर कुत्ते भटक रहे थे, भूख से उबासी ले रहे थे:

“ए-हे-हे...”

किनारों पर नोचे गए ‘फ़र’ वाली बकरियां फुटपाथ के पास धूल भरी घास चर रही थीं, पूंछ के किनारे को हिला रही थीं.

“बे-ए-ए-ए-ए-दा...”

सिर लटकाए, एक गाय खड़ी थी, उसकी हड्डियां चमड़ी से बाहर निकल रही थीं.

“ततककलीफ...” सोच में पड़ी वह दुहरा रही थी.

गन्दगी के ढेर पर नुचे हुए परों वाली चिड़िया थीं, - वे उड़ी नहीं थीं – चाहे आप उन्हें पैरों से क्यों न कुचल दो...

नुची हुई पूँछों वाले मुर्गे भूख से लड़खड़ा रहे थे...

मगर चौराहों पर पुलिस के डरावने बुलडॉग अटेन्शन में खड़े थे – तिकोनी टोपियों और कंटीली कॉलर में.

वे गंदे और भूखे निवासियों पर चिल्ला रहे थे:

“च च चलो! दायें रहो! रा-स्ता म-त रो-को!...

लोमड़ी बुरातिनो को रास्ते पर आगे खींचती हुई ले चली. उन्होंने चाँद की रोशनी में घूमती हुईसोने के चश्मों में, अच्छी तरह खिलाई गई बिल्लियों को देखा, जो टोपी पहनी बिल्लियों के हाथों में हाथ डाले घूम रही थीं.

मोटा लीस – इस शहर की गवर्नर घूम रही थी, घमंड से नाक ऊपर उठाए, और उसके साथ थी – घमंडी लोमड़ी, जो हथेली में बैंगनी रात रानी का फूल पकड़े हुए थी.

लोमड़ी लीसा ने फुसफुसाकर कहा:

“ये, वो लोग घूम रहे हैं, जिन्होंने चमत्कारों के खेत में पैसे बोये हैं...आज आख़िरी रात है, जब यहाँ धन बोया जा सकता है. सुबह होते होते पैसों का ढेर इकट्ठा कर लोगे और हर चीज़ खरीद लोगे...चलो, जल्दी.”

लोमड़ी और बिल्ला बुरातिनो को एक बंजर भूमि पर ले आये, जहां टूटे हुए घड़े, फटे हुए जूते, छेदों वाले गलोश और चीथड़े बिखरे थे...एक दूसरे को काटते हुए वे बकबक कर रहे थे:

“गड्ढा खोदो.”

“सोने के सिक्के रखो.”

“उन पर नमक छिड़को.”

“उसे पोखर से बाहर निकालो, अच्छी तरह पानी डालो.”

“ये कहना न भूलो ‘क्रेक्स, फेक्स, पेक्स....”

बुरासिनो ने अपनी नाक खुजाई, जिस पर स्याही के धब्बे पड़े थे.

“आप, वैसे, कुछ दूर चले जाईये...”

“माय गॉड, हम तो देखना भी नहीं चाहते कि तुम पैसे कहाँ गाड़ने जा रहे हो!” लोमड़ी ने कहा. 

“ख़ुदा सलामत रखे!” बिल्ले ने कहा.

वे थोड़ा दूर हटे और कचरे के ढेर के पीछे छुप गए.

बुरातिनो ने गढ़ा खोदा. तीन बार फुसफुसाकर कहा: ‘क्रेक्स, फेक्स, पेक्स’,  गढ़े में सोने के चार सिक्के रख दिएउन पर मिट्टी डाल दी, जेब से चुटकी भर नमक निकाला, ऊपर से छिड़क दिया. डबरे से चुल्लू भर पानी लिया, गढ़े पर डाल दिया.

और बैठकर इंतज़ार करने लगा कि पेड़ कब बड़ा होगा...

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