गुरुवार, 22 जनवरी 2026

बुरातिनो - 12

                                                                                    12


उल्लू बुरातिनो के सीने पर कान लगाता है

अनुवाद: चारुमति रामदास


“मरीज़ करीब करीब मर ही गया है,” वह फुसफुसाया और उसने सिर एक सौ अस्सी डिग्री मोड़ लिया.

मेंढक बड़ी देर तक गीले पंजे से बुरातिनो के बदन को दबाता रहा. सोचते हुए, अपनी बाहर निकली आंखें चारों और घुमाता रहा. बड़े मुंह से बुदबुदाया:

“मरीज़ ज़िंदा है, बनिस्बत मरने के...”

लोगों के डॉक्टर बगामोल ने अपने सूखे, घास के पत्तों जैसे हाथों से बुरातिनो को छूना शुरू किया.

“दो बातों में से एक” – वह सरसराया, “या तो मरीज़ ज़िंदा है, या वह मर गया है. अगर वह ज़िंदा है – तो वह ज़िंदा रहेगा या ज़िंदा नहीं रहेगा. अगर वह मर चुका है – तो उसे पुनर्जीवित किया जा सकता है, या पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता.”

“नीम हकीम,” उल्लू ने कहा, अपने मुलायम पंख फड़फड़ाए और अंधेरी अटारी में उड़ गया.

गुस्से के मारे मेंढक की सभी नसें फूल गईं.

“कैसी घिनौनी असभ्यता है!”- वह टर्राया और अपना पेट फडफडाते हुए नम तहखाने में कूद गया. 

डॉक्टर बगामोल ने, मौके ने अनुसार, सूखी टहनी होने का नाटक किया और खिड़की से बाहर गिर गया.  

बच्ची ने अपने सुन्दर हाथ नचाए:

“तो, मैं उसे कैसे ठीक करूं, नागरिकों?

“कैस्टर ऑइल से,” मेंढक गोदाम से टर्राया.

“कैस्टर ऑइल से?” उल्लू अटारी में तिरस्कार से हंसा.

“या तो कैस्टर ऑइल से, या बिना कैस्टर ऑइल के,” खिड़की के पीछे बगामोल दांत किटकिटाते हुए बोला.

तब, खरोचों वाला, नील पड़ा हुआ, अभागा बुरातिनो कराहा:

“कैस्टर ऑइल की ज़रुरत नहीं है, मुझे काफ़ी अच्छा महसूस हो रहा है!”

नीले बालों वाली बच्ची फ़िक्र से उसके ऊपर झुकी:

“बुरातिनो, मैं विनती करती हूँ, - आंखें बंद करो, नाक पकड़ो और पी जाओ.”

“नहीं चाहिए, नहीं चाहिए, नहीं चाहिए!...”

“मैं तुम्हें शकर का टुकड़ा दूंगी...”

तभी फ़ौरन कंबल पर सफ़ेद चूहा चढ़ गया, वह शकर का टुकड़ा पकड़े हुए था.

“अगर तुम मेरी बात मानोगे, तो ये टुकड़ा तुम्हें मिलेगा,” बच्ची ने कहा.

“सिर्फ़ शकर दो...”

“अरे, ज़रा समझो, - अगर दवाईयाँ नहीं पियोगे, तो तुम मर सकते हो...”

“कैस्टर ऑइल पीने से बेहतर है मर जाना...”

तब बच्ची ने कठोरता से, बड़े आदमियों जैसे अंदाज़ में कहा:

“नाक बंद कर और छत की तरफ़ देख...एक, दो, तीन.”

उसने बुरातिनो के मुंह में कैस्टर ऑइल डाला, फ़ौरन शकर का टुकड़ा भी घुसा दिया और उसे चूम लिया.

“बस, हो गया...”

भले आर्तेमोन ने, जिसे हर भरी पूरी चीज़ अच्छी लगती थी, दांतों में अपनी पूंछ पकड़ ली, खिड़की के नीचे गोल गोल घूमने लगा, जैसे हज़ारों पंजों, हज़ारों कानों, हज़ारों चमकती आंखों का बवंडर हो.

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