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अनुवाद: चारुमति रामदास
“तुमने
उसके साथ ऐसा क्यों किया, बिल्ले बजीलियो?” बुरातिनो ने अचरज से पूछा.
“आंखें
तो अंधी हैं,”
बिल्ले ने जवाब दिया, “ऐसा लगा – पेड़ पर कुत्ते का पिल्ला बैठा है...” वे तीनों धूल भरे रास्ते
पर चल पड़े. लोमड़ी ने कहा:
“स्मार्ट, समझदार बुरातिनो, क्या तुम चाहोगे कि तुम्हारे
पैसे दस गुना हो जाएँ?”
“बेशक, चाहता हूँ! मगर ये कैसे करते
हैं?”
“बेहद
आसान है. हमारे साथ चलो.”
“कहाँ?”
“मूर्खों
के देश में.”
बुरातिनो
ने थोड़ी देर सोचा.
“नहीं, माफ़ करना, मैं अभी घर ही जाऊंगा.”
“शौक
से,
हम तुझे रस्सी से बांधकर तो नहीं खींच रहे हैं,” लोमड़ी ने कहा, - “तुम्हारे ही लिए बुरा है.”
“तुम्हारे
ही लिए बुरा है,” बिल्ली गुरगुराई.
“अपने
दुश्मन तुम ख़ुद ही हो.” लोमड़ी ने कहा.
“तुम
ख़ुद ही अपने दुश्मन हो,” बिल्ली गुरगुराई.
“वर्ना
तेरे पांच सोने के सिक्के पैसों के ढेर में बदल जाते...”
बुरातिनो
रुक गया,
उसने मुंह खोला...
“झूठ
बोल रहे हो!”
लोमड़ी
अपनी पूंछ पर बैठ गई, उसने अपने होंठ चाटे:
“मैं
तुम्हें अभी समझाती हूँ.
“
मूर्खों के देश में एक जादुई खेत है, - उसका नाम है ‘चमत्कारों का खेत’... इस खेत
में एक गढ़ा खोदो,
तीन बार कहो: ‘क्रेक्स, फेक्स,
पेक्स’, गढ़े में सोने के सिक्के रखो, उस पर मिट्टी डाल दो, ऊपर से नमक छिड़को, अच्छी तरह पानी डालो और सोने के लिए चले जाओ. सुबह गढ़े से छोटा सा पेड़
निकलेगा,
उस पर पत्तों के बदले सोने के सिक्के लटकेंगे. समझ गए?”
बुरातिनो
उछल पडा:
“झूठ
बोल रही हो!”
“चल, जायेंगे, बज़ीलियो,” अपमान से नाक
घुमाकर लोमड़ी ने कहा, हम पर कोई यकीन ही नहीं करता – बस, कोई ज़रुरत नहीं है...”
“नहीं, नहीं,” बुरातिनो चीखा, “यकीन करता हूँ, यकीन करता हूँ!...चलो फ़ौरन
‘मूर्खों के देश’!
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