3.
निकलाय गोगल
अनुवाद: चारुमति रामदास
तब बुरातिनो को समझ
में आया कि उसे बहुत भूख लगी है.
वह भट्टी की ओर भागा
और आग पर रखी केतली में अपनी नाक घुसा दी, मगर बुरातिनो की
लम्बी नाक केतली के आरपार हो गयी, क्योंकि, जैसा कि हम जानते हैं, भट्टी, और आग, और धुआँ, और केतली को गरीब कार्लो ने पुराने कैनवास के टुकड़े
पर चित्रित किया था.
बुरातिनो ने अपनी नाक
बाहर खींची और छेद से देखा, - कैनवास के पीछे दीवार पर एक छोटे से दरवाज़े
जैसी कोई चीज़ थी, मगर उसे मकड़ी के जाल ने इस तरह ढांक दिया था, कि कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.
बुरातिनो सभी कोनों
में ढूँढने के लिए भागा कि शायद कहीं कोई डबल रोटी की परत या बिल्ली द्वारा चबाई
गयी हड्डी का कोई टुकड़ा ही मिल जाए.
आह, बेचारे गरीब कार्लो के यहाँ खाने के लिए कुछ भी, कुछ भी तो नहीं था!
अचानक उसने लकड़ी की
छीलन वाली टोकरी में मुर्गी का अंडा देखा. उसे पकड़ा और खिड़की की सिल पर रख दिया और
नाक से – टुक्-टुक् – छिलके को तोड़ दिया.
अंडे के भीतर से
नन्ही सी आवाज़ चिरचिराई:
“धन्यवाद, लकड़ी के नन्हे इन्सान!”
टूटी हुई खोल से एक
मुर्गी का पिल्ला बाहर आया, जिसकी पूंछ वाली जगह पर फूले-फूले पंख थे, और
हंसती हुई आंखें थीं.
“अलबिदा! मम्मा
मुर्गी कब से आँगन में मेरी राह देख रही है.”
और मुर्गी का बच्चा खिड़की से बाहर कूद गया, - बस इतना ही देखा.
“ओय, ओय,” बुरातिनो चिल्लाया, “भूख लगी है!...”
आखिरकार दिन ख़तम होने
को आया. कमरे में अन्धेरा छाने लगा.
बुरातिनो आग के चित्र
के सामने बैठा था और भूख के मारे चुपचाप हिचकियाँ ले रहा था.
उसने देखा – सीढ़ियों
के नीचे से, फर्श के नीचे से एक मोटा सिर दिखाई दिया. वह
बाहर निकला, उसने कुछ सूंघा और छोटे वाले पंजों पर भूरा
प्राणी रेगते हुए बाहर निकला.
धीरे धीरे वह छीलन
वाली टोकरी की तरफ़ गया, उसमें घुसा, सूंघते हुए और
टटोलते हुए, - गुस्से से छीलन को खंगालने लगा. हो सकता है,
वह उस अंडे को ढूंढ रहा हो, जिसे बुरातिनो ने तोड़ दिया था.
फिर वह रेंगकर टोकरी
से बाहर आया और बुरातिनो के पास आया. दोनों तरफ़ लम्बे लम्बे काले बालों वाली अपनी काली
नाक को घुमाते हुए उसे सूंघा. बुरातिनो के जिस्म से खाने लायक खुशबू नहीं आ रही थी, - अपनी लम्बी, पतली पूंछ घसीटते हुए वह करीब से गुज़र गया.
मगर उसकी पूंछ पकड़े
बिना कैसे रह सकते हो! बुरातिनो ने फ़ौरन पूंछ पकड़ ली.
ये बूढा दुष्ट चूहा
शुशारा था.
डर के मारे, बुरातिनो
को खींचते हुए, वह परछाई की तरह, सीढ़ियों के नीचे भागने ही वाला था, मगर देखा कि ये तो सिर्फ लकड़ी का छोकरा है, वह मुड़ा और भयानक गुस्से से उस
पर लपका, ताकि उसका गला चबा जाए.
अब तो बुरातिनो घबरा
गया, उसने चूहे की ठंडी पूंछ छोड़ दी और उछल कर
कुर्सी पर चढ़ गया. चूहा – उसके पीछे भागा.
वह कुर्सी से खिड़की की
सिल पर कूद गया. चूहा – उसके पीछे.
कुर्सी की सिल से
पूरे कमरे में छलांग लगाकर वह उड़ते हुए मेज़ पर पहुंचा. चूहा – उसके पीछे...और वहां, मेज़ पर, उसने बुरातिनो का गला पकड़ लिया, उसे दांतों में दबाये
हुए गिरा दिया, फर्श पर कूदा और सीढ़ियों के नीचे घसीटा, ज़मीन
के नीचे.
“पापा कार्लो!”
बुरातिनो बस इतना ही चिरचिराया.
“मैं यहाँ हूँ!” ज़ोरदार
आवाज़ ने जवाब दिया.
दरवाज़ा खुल गया, पापा कार्लो भीतर आये. पैर से लकड़ी का जूता उतारा और उसे चूहे पर दे मारा.
शुशारा ने, लकड़ी के बच्चे को छोड़कर, दांत किटकिटाए और छुप गया.
‘ये होता है
लाड-प्यार का नतीजा!’ बुरातिनो को फर्श से उठाते हुए पापा कार्लो भुनभुनाए. देखा, की वह पूरी तरह सही सलामत है या नहीं. उसे अपने घुटनों पर बिठाया, जेब से प्याज़ निकाली, उसका छिलका उतारा - ले, खा ले!...”
बुरातिनो ने अपने
भूखे दांत प्याज़ में गड़ा दिए - करकर करते हुए और होंठ चाटते हुए. इसके बाद
पापा कार्लो की ब्रश जैसी दाढ़ी पर अपना मुंह घिसने लगा.
“मैं होशियार और
समझदार बनूंगा, पापा कार्लो...बोलने वाले झींगुर ने मुझसे
स्कूल जाने के लिए कहा है.”
“अच्छा सोचा है, बच्चे...”
“मगर, पापा कार्लो, मगर मैं तो – नंगा हूँ, लकड़ी का हूँ, - स्कूल
में बच्चे मुझ पर हँसेंगे.”
“एहे,” कार्लो ने कहा
और अपनी ब्रश जैसी ठोढी खुजाई. – “तू ठीक कह रहा है, बच्चे!”
उसने लैम्प जलाया, कैंची ली, गोंद लिया और रंगीन कागज़ के टुकड़े लिए. भूरे
रंग के कागज़ से जैकेट और चमकीले हरे रंग के कागज़ से पैंट बना दी. पुराने बूटलेग से
जूते बनाए और टोपी – फुंदे वाली – पुरानी जुराब से. ये सब उसने बुरातिनो को पहना
दिया:
“खुशी से पहन ले!”
“पापा कार्लो,” – बुरातिनो ने कहा, “मगर मैं किताब के बिना स्कूल कैसे जाऊंगा?”
“एहे, तू सही कह रहा है, बच्चे...”
पापा कार्लो ने अपना
सिर खुजाया. कंधों पर अपना इकलौता पुराना जैकेट डाला और बाहर चला गया.
वह जल्दी ही लौट आया, मगर बिना जैकेट के. उसके हाथ में बड़े-बड़े अक्षरों, और लुभावने चित्रों वाली
किताब थी.
“ये रही तुम्हारे लिए
वर्णमाला की किताब. दिल लगाकर पढो.”
“पापा कार्लो, तुम्हारी जैकेट कहाँ है?”
“जैकेट तो मैंने बेच
दी. कोई बात नहीं, ऐसे ही काम चला लूंगा...सिर्फ तुम खुशी से
रहो.”
बुरातिनो ने पापा
कार्लो के भले हाथों में अपनी नाक घुसा दी.
“पढ़-लिख लूंगा, बड़ा हो जाऊंगा, तुम्हारे लिए हज़ारों नए जैकेट खरीदूंगा...”
बुरातिनो पूरी शिद्दत
से अपनी ज़िंदगी की इस पहली शाम को बिना लाड़-प्यार के गुजारना चाहता था, जैसा उसे बोलने वाले झींगुर ने सिखाया था.
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