रविवार, 7 जुलाई 2013

Seryojha - 03


अध्याय 3
घर में परिवर्तन
“ सिर्योझेंका,” मम्मा ने कहा, “जानते हो, ...मैं चाहती हूँ कि हमारे पास पापा होते.”
सिर्योझा ने आँखें उठाकर उसकी ओर देखा. उसने इस बारे में सोचा ही नहीं था. कुछ बच्चों के पापा होते हैं, कुछ के नहीं. सिर्योझा के भी नहीं हैं : उसके पापा लड़ाई में मारे गए हैं;  उसने उन्हें सिर्फ फ़ोटो में देखा है. कभी कभी मम्मा फ़ोटो को चूमती थी और सिर्योझा को भी चूमने के लिए देती थी. वह फ़ौरन मम्मा की साँसों से धुँधला गए काँच पर अपने होंठ रख देता था, मगर प्यार का एहसास उसे नहीं होता था : वह उस आदमी से प्यार नहीं कर सकता था जिसे उसने सिर्फ फ़ोटो में देखा हो.
वह मम्मा के घुटनों के बीच में खड़ा था और सवालिया नज़र से उसके चेहरे की ओर देख रहा था. वह धीरे-धीरे गुलाबी होता गया : पहले गाल गुलाबी हो गए, उनसे नाज़ुक सी लाली माथे और कानों पर फैल गई....मम्मा ने सिर्योझा को घुटनों के बीच दबा लिया, उसे बाँहों में भर लिया और अपना गर्म गाल उसके सिर पर रख दिया. अब उसे सिर्फ उसका हाथ ही दिखाई दे रहा था, सफ़ेद-सफ़ेद गोलों वाली नीली आस्तीन में. फुसफुसाते हुए मम्मा ने पूछा:
 “बगैर पापा के अच्छा नहीं लगता, है ना? ठीक है ना?”
 “हाँ–आ,” उसने भी न जाने क्यों फुसफुसाहट से जवाब दिया.
असल में इस बात का उसे यक़ीन नहीं था. उसने “हाँ” इसलिए कह दिया, क्योंकि वह चाहती थी कि वो “हाँ” कहे. तभी उसने सोचा : “क्या अच्छा है – पापा के साथ या बगैर पापा के? जैसे कि, जब तिमोखिन उन्हें लॉरी में घुमाने ले जाता है, तो सारे बच्चे ऊपर बैठते हैं, मगर शूरिक हमेशा कैबिन में बैठता है, और सभी उससे जलते हैं, मगर कोई भी बहस नहीं करता, क्योंकि तिमोखिन – शूरिक के पापा हैं.    मगर, जब शूरिक सुनता नहीं है तो तिमोखिन उसे बेल्ट से मारता भी है, और शूरिक गालों पर आँसुओं के निशान लिए उदास घूमता है; और सिर्योझा को बहुत दुख होता है, वह अपने सारे खिलौने आँगन में ले आता है जिससे शूरिक को अच्छा लगे...मगर, हो सकता है, फिर भी पापा के साथ ज़्यादा अच्छा होता है : अभी हाल ही में वास्का ने लीदा को सताया था तो वह चीख़ी थी, “मेरे पास तो पापा हैं, तेरे तो पापा ही नहीं हैं...आ हा हा!”
 “ये क्या धड्-धड् कर रहा है?” सिर्योझा ने मम्मा के सीने में धड्-धड् की आवाज़ सुनकर दिलचस्पी लेते हुए ज़ोर से पूछा.
मम्मा मुस्कुराई, उसने सिर्योझा को चूमा और कस कर सीने से लगा लिया.
 “ये दिल है, मेरा दिल.”
 “और मेरे पास?” उसने सिर झुकाते हुए पूछा जिससे सुन सके.
 “तेरे पास भी है.”
 “नहीं, मेरा दिल तो धड्-धड् नहीं कर रहा है.”
 “करता है. सिर्फ तुझे सुनाई नहीं देता. वह तो धड़कता ही है. अगर धड़केगा नहीं तो आदमी ज़िन्दा नहीं रह सकता.”
 “हमेशा धड़कता है?”
 :हमेशा.”
 “और, जब मैं सोता हूँ?”
 “जब तुम सोते हो तब भी.”
 “तो क्या तुम्हें सुनाई दे रहा है?”
 “हाँ. सुनाई दे रहा है. तुम भी हाथ से महसूस कर सकते हो,” उसने उसका हाथ पकड़ा और पसलियों के पास रखा.
 “महसूस हो रहा है?”
 “हो रहा है. ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा है. क्या वह बड़ा है?”
 “अपनी मुट्ठी बन्द करो. ऐसे. वो क़रीब-क़रीब इतना ही बड़ा होता है.”
 “छोड़ो,” उसने मम्मा के हाथों से छूटते हुए ख़यालों में डूबे-डूबे कहा.
  “अभी आया, “ उसने कहा और बाईं ओर हाथ कस कर दबाए बाहर सड़क पर भागा. सड़क पर वास्का और झेन्का थे. वह भागकर उनके पास गया और बोला, “देखो, देखो, कोशिश करो, चाहते हो? यहाँ मेरा दिल है. मैं हाथ से उसे महसूस कर रहा हूँ. देखना है तो देखो, देखोगे?”
 “इसमें क्या ख़ास बात है!” वास्का ने कहा, “सभी के पास दिल होता है.”
मगर झेन्का ने कहा, “चल, देखते हैं.”
और उसने सिर्योझा के सीने पर एक किनारे हाथ रख दिया.
 “महसूस हो रहा है?” सिर्योझा ने पूछा.
 “हाँ, हाँ,” झेन्का ने कहा.
वो क़रीब-क़रीब उतना बड़ा है जितनी मेरी ये मुट्ठी है,” सिर्योझा ने कहा.
 “तुझे कैसे मालूम?” वास्का ने पूछा.
 “मुझे मम्मा ने बताया,” सिर्योझा ने जवाब दिया, और याद करके आगे बोला, “और मेरे पास तो पापा आने वाले हैं!”
मगर वास्का और झेन्का ने कुछ सुना नहीं, वे अपने काम में मगन थे : वे औषधी वनस्पतियाँ ले जा रहे थे, गोदाम में देने के लिए. फेन्सिंग पर फ़ेहरिस्त लगी हुई थी उन वनस्पतियों की जो वहाँ ली जाती थीं; और बच्चे पैसे कमाना चाहते थे. दो दिन घूम-घूमकर उन्होंने घास-फूस इकट्ठा किया. वास्का ने अपना घास-फूस माँ को दिया और उससे कहा कि वह उन्हें अलग-अलग छाँट कर साफ़ कपड़े में बांध दे; और अब वह बड़ी, बढ़िया गठरी में उन्हें गोदाम ले जा रहा था. मगर झेन्का की तो माँ ही नहीं है, मौसी और बहन काम पर गई हैं; वह ख़ुद तो यह सब कर नहीं सकता; झेन्का इन औषधी वनस्पतियों को आलुओं के फटे थैले में बेतरतीबी से ठूँस कर गोदाम ले जा रहा था, जड़ समेत, मिट्टी समेत. मगर उसने ख़ूब सारी वनस्पतियाँ इकट्ठी कर ली थीं; वास्का से भी ज़्यादा; उसने थैले को पीठ पर डाला – और वह बोझ से दुहरा हो गया.
 “मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा,” सिर्योझा उनके पीछे-पीछे चलते हुए बोला.
 “नहीं,” वास्का ने कहा, “घर वापस जाओ, हम काम से जा रहे हैं.”
 “मैं, बस यूँ ही,” सिर्योझा ने कहा, “बस साथ चलूँगा.”
 “कह दिया ना – वापस जा!” वास्का ने हुकुम दिया. “ये कोई खेल नहीं है. छोटे बच्चों का वहाँ कोई काम नहीं है!”
सिर्योझा पीछे ठहर गया. उसका होंठ थरथरा रहा था, मगर उसने अपने आप पर काबू पा लिया: लीदा आ रही थी, उसके सामने रोना नहीं चाहिए, वर्ना वह चिढ़ाएगी: ‘रोतला! रोतला!’
 “तुझे नहीं ले गए? उसने पूछा. “कैसा है रे तू!”
 “अगर मैं चाहूँ,” सिर्योझा ने कह, “तो ये इत्ती बहुत सी अलग-अलग तरह की घास इकट्ठा कर लूँ! आसमान से भी ऊँचा ढेर!”
 “आसमान से भी ऊँचा – झूठ बोल रहा है,” लीदा ने कहा. “आसमान से ऊँचा ढेर तो कोई भी नहीं बना सकता.”
 “अच्छा, तो मेरे पापा आने वाले हैं ना, वे बनाएँगे,” सिर्योझा ने कहा.
 “तू बस, झूठ ही बोलता रहता है,” लीदा ने कहा. “कोई पापा-वापा नहीं आएँगे तेरे पास. और अगर आ भी गए तो कुछ इकट्ठा नहीं करेंगे. कोई भी इकट्ठा नहीं करेगा.”
सिर्योझा ने सिर पीछे करके आसमान की ओर देखा और सोच में पड़ गया : ’क्या आसमान से ऊँचा घास का ढेर इकट्ठा किया जा सकता है या नहीं?’ जब तक वह सोचता रहा लीदा भागकर अपने घर गई और एक रंगबिरंगा स्कार्फ उठा लाई – उसकी माँ यह स्कार्फ पहनती थी, कभी गर्दन में, तो कभी सिर पर. स्कार्फ लेकर लीदा नाचने लगी – स्कार्फ हवा में नचाती, हाथ-पैर इधर-उधर फेंकती और कुछ गुनगुनाती. सिर्योझा खड़े-खड़े देख रहा था. एक मिनट के लिए रुककर लीदा ने कहा:
 “नाद्या झूठ बोलती है कि उसे बैले-स्कूल भेज रहे हैं.”
कुछ देर और नाचने के बाद फिर बोली, “बैलेरीना की पढ़ाई मॉस्को में भी होती है और लेनिनग्राद में भी.”
और सिर्योझा की आँखों में अचरज के भाव देखकर उसने बड़े दिल से कहा:
 “ तू क्या कर रहा है? सीख मेरे साथ, हूँ, मेरी तरफ देख और जैसा मैं कर रही हूँ, वैसा ही कर.”
वह करने लगा, मगर बिना स्कार्फ के बात बनी नहीं. उसने उसे गाने के लिए कहा, इसका भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ. उसने मिन्नत की, “ मुझे स्कार्फ दे!”
मगर उसने कहा:
 “ऐह, कैसा है रे तू! तुझे हर चीज़ चाहिए!”
और उसने स्कार्फ नहीं दिया. इसी समय ‘गाज़िक’ कार वहाँ आई और सिर्योझा के गेट के पास रुक गई. कार से ड्राईवर-महिला उतरी, और फ़ाटक से पाशा बुआ बाहर आई. महिला-ड्राईवर ने कहा, “ये लीजिए, दिमित्री कोर्नेयेविच ने भेजा है.”
कार में सूटकेस थी और रस्सियों से बँधे किताबों के गट्ठे थे. और कोई एक मोटी, भूरी चीज़ थी, गोल-गोल बंधी हुई – वह खुल गई, और पता चला कि वह एक ग्रेट-कोट था. पाशा बुआ और ड्राईवर यह सब घर के अन्दर ले जाने लगीं. मम्मा ने खिड़की से बाहर झाँका और वह छिप गई. महिला-ड्राईवर बोली, “माफ़ कीजिए.’ यही सब कुछ है.”
पाशा बुआ ने दुखी आवाज़ में कहा:
 “कम से कम ओवरकोट ही ख़रीद लेता.”
 “ख़रीदेगा,” ड्राईवर ने वादा किया. “थोड़ा इंतज़ार कीजिए. और, ये ख़त दे दीजिए.”
उसने ख़त दिया और वह चली गई. सिर्योझा चिल्लाते हुए घर के भीतर भागा:
 “”मम्मा! मम्मा! कोरोस्तेल्योव ने हमें अपना ग्रेट कोट भेजा है!”
(दिमित्री कोर्नेयेविच कोरोस्तेल्योव उनके यहाँ अक्सर आया करता था. वह सिर्योझा को खिलौने दिया करता और एक बार सर्दियों में उसे स्लेज पर सैर भी कराई थी. उसके ग्रेट कोट पर शोल्डर स्ट्रैप्स नहीं थे, वह लड़ाई के समय से पड़ा था. ‘दिमित्री कोर्नेयेविच’ कहना मुश्किल लगता है, इसलिए सिर्योझा उसे कोरोस्तेल्योव कहता था.)
ग्रेट कोट हैंगर पर टंग गया, और मम्मा ख़त पढ़ रही थी. उसने फ़ौरन जवाब नहीं दिया, बल्कि ख़त को पूरा पढ़ने के बाद बोली:
 “मुझे मालूम है, सिर्योझेन्का, कोरोस्तेल्योव अब हमारे साथ रहेंगे. वही तुम्हारे पापा होंगे.”
और वह फिर से उसी ख़त को पढ़ने लगी – शायद एक बार पढ़ने से याद नहीं रहा होगा कि उसमें क्या लिखा है.
’पापा’ शब्द सुनकर सिर्योझा ने किसी अनजान, अनदेखी चीज़ की कल्पना की थी. मगर कोरोस्त्येलोव तो उनकी अच्छी जान-पहचान का है, पाशा बुआ और लुक्यानिच उसे ‘मीत्या’ कहकर बुलाते हैं – ये मम्मा को क्या सूझी? सिर्योझा ने पूछा, “मगर क्यों?”
 “सुनो,” मम्मा ने कहा, “तुम मुझे ख़त पढ़ने दोगे या नहीं?”
उसने उसकी बात का जवाब नहीं दिया. उसे बहुत सारे काम करने थे. उसने किताबें खोलीं और उन्हें शेल्फ पर रख दिया. हर किताब को कपड़े से पोंछ दिया. फिर उसने दूसरी चीज़ें आईने की सामने वाली दराज़ में रख दीं. फिर वह आँगन में गई और फूल तोड़ लाई और उन्हें फ्लॉवर-पॉट में सजा दिया. फिर न जाने क्यों उसने फर्श धो दिया, हालाँकि वह साफ़ ही था. इसके बाद वह ‘पिरोग’ बनाने लगी. पाशा बुआ उसे सिखा रही थी कि आटा कैसे मलना है. सिर्योझा को भी थोड़ी सी लोई और सेमिया दी गईं, और उसने भी पिरोग बनाया, छोटा सा.
जब कोरोस्तेल्योव आया तो सिर्योझा अपने सभी संदेहों के बारे में भूल चुका था और उसने उससे कहा, “कोरोस्तेल्योव! देखो, मैंने ‘पिरोग’ बनाया!”
कोरोस्तेल्योव ने नीचे झुककर उसे कई बार चूमा, सिर्योझा सोचने लगा, “ये मुझे इसलिए इतनी देर चूम रहा है क्योंकि अब ये मेरा पापा है.”
कोरोस्तेल्योव ने अपना सूटकेस खोला, उसमें से मम्मा की फ्रेम-जड़ी तस्वीर निकाली, किचन से हथौड़ा और कील ली और उसे सिर्योझा के कमरे में टांग दिया.
 “ये किसलिय?” मम्मा ने पूछा, “जब मैं हमेशा जीती-जागती तुम्हारे साथ रहने वाली हूँ?”
कोरोस्तेल्योव ने उसका हाथ पकड़ा, वे एक दूसरे के नज़दीक आए, मगर उनकी नज़र सिर्योझा पर पड़ी और उन्होंने हाथ छोड़ दिए. मम्मा बाहर निकल गई. कोरोस्तेल्योव कुर्सी पर बैठ गया और ख़यालों में डूबकर कहने लगा, “तो, ये बात है, भाई सिर्गेई. मैं, मतलब, तुम्हारे यहाँ आ गया हूँ, तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं है ना?”
 “क्या तुम हमेशा के लिए आ गए हो?” सिर्योझा ने पूछा.
 “हाँ,” कोरोस्तेल्योव ने कहा, हमेशा के लिए.”
 “और, क्या तुम मुझे बेल्ट से मारा करोगे?” सिर्योझा ने पूछा.
कोरोस्तेल्योव को बड़ा अचरज हुआ.
 “मैं तुम्हें बेल्ट से क्यों मारूँगा?”
 “जब मैं तुम्हारी बात नहीं सुनूँगा,” सिर्योझा ने समझाया.
 “नहीं,” कोरोस्तेल्योव ने कहा, “मेरे ख़याल से ये बेवकूफ़ी है – बेल्ट से मारना- है ना?”
 “बेवकूफ़ी है,” सिर्योझा ने पुष्टि की. “और बच्चे रोते हैं.”
 “हम-तुम आपस में सलाह-मशविरा कर सकते हैं, जैसे एक मर्द दूसरे मर्द से करता है, बगैर किसी बेल्ट-वेल्ट के.”
 “और तुम कौन से कमरे में सोया करोगे?” सिर्योझा ने पूछा.
 “लगता है कि इसी कमरे में,” कोरोस्तेल्योव ने जवाब दिया. “ऐसा लगता तो है, भाई. और इतवार को हम और तुम जाएँगे – मालूम है हम दोनों कहाँ जाएँगे? दुकान में, जहाँ खिलौने मिलते हैं. जो पसन्द हो, तुम ख़ुद चुनोगे. पक्का?”
 “पक्का!” सिर्योझा ने कहा. “मुझे बैसिकल चाहिए. और क्या इतवार जल्दी आने वाला है?”
 “जल्दी.”
 “कितने के बाद?”
 “कल है शुक्रवार, फिर शनिवार और फिर इतवार.”
 “मतलब, कोई ख़ास जल्दी नहीं आयेगा !” सिर्योझा ने कहा.
तीनों ने साथ बैठकर चाय पी : सिर्योझा, माँ और कोरोस्तेल्योव ने. (पाशा बुआ और लुक्यानिच कहीं बाहर गए थे.) सिर्योझा को नींद आ रही थी. भूरी तितलियाँ लैम्प के चारों ओर घूम रही थीं, वे लैम्प से टकरातीं और कालीन पर गिर जातीं, अपने पंख फ़ड़फड़ाते हुए – इसकी वजह से और भी ज़्यादा नींद आ रही थी. अचानक उसने देखा कि कोरोस्तेयोव उसका पलंग कहीं ले जा रहा है.
 “तुमने मेरा पलंग क्यों लिया?” सिर्योझा ने पूछा.
मम्मा ने कहा, “तुम बिल्कुल सो रहे हो, चलो, पैर धोएँगे.”
सुबह सिर्योझा उठा तो एकदम से समझ ही नहीं पाया कि वह कहाँ है. दो खिड़कियों के बदले तीन खिड़कियाँ क्यों हैं, और वे भी उस ओर नहीं, और परदे भी वो नहीं हैं. फिर उसे समझ में आया कि यह पाशा बुआ का कमरा है. वो बहुत ख़ूबसूरत है : खिड़कियों की देहलीज़ पर फूल रखे हैं, और शीशे के पीछे मोर का पंख फंसा है. पाशा बुआ और लुक्यानिच कब के उठकर चले गए थे, उनका बिस्तर ढँका हुआ था, तकिए सलीके से गड्डी बनाकर रखे थे. खुली हुई खिड़कियों के पीछे झाड़ियों में सुबह का सूरज खेल रहा था. सिर्योझा रेंगते हुए पलंग से बाहर आया, उसने लम्बी कमीज़ उतार दी, शॉर्ट्स पहन लिए और डाइनिंग रूम में आया. उसके कमरे का दरवाज़ा बन्द था. उसने हैंडिल को घुमाया – दरवाज़ा नहीं खुला. और उसे तो वहाँ ज़रूर जाना था : आख़िर उसके सारे खिलौने वहीं तो थे. नया छोटा सा फ़ावड़ा भी, जिससे अचानक मिट्टी खोदने का उसका मूड़ हुआ.
 “मम्मा,” सिर्योझा ने पुकारा.
 “मम्मा!” उसने दुबारा आवाज़ दी.
दरवाज़ा नहीं खुला, ख़ामोशी थी.
 “मम्मा!” सिर्योझा पूरी ताक़त से चीख़ा.
पाशा बुआ भाग कर आई, उसका हाथ पकड़ा और किचन में ले गई.
 “क्या करते हो, क्या करते हो!” वह फुसफुसाई. “कोई ऐसे चिल्लाता है भला! चिल्लाते नहीं हैं! भगवान की दया से, तुम छोटे नहीं हो! मम्मा सो रही है, और उसे आराम से सोने दो, क्यों उठाना है?”
 “मुझे अपना फ़ावड़ा चाहिए,” उसने उत्तेजना से कहा.
 “ले लेना, फ़ावड़ा कहीं भागा नहीं जा रहा है. मम्मा उठेगी – तब ले लेना,” पाशा बुआ ने कहा.  “देखो तो, यह रही तुम्हारी गुलेल. अभी तुम गुलेल से खेल लो. चाहो, तो तुम्हें गाजर छीलने के लिए दूँगी. मगर सबसे पहले अच्छे आदमी मुँह-हाथ धोते हैं.”
तर्कसंगत और प्यारी बातों से सिर्योझा का मन शांत हो जाता है. उसने अपने हाथ-मुँह धुलवा लिए और दूध का गिलास भी पी लिया. फिर गुलेल लेकर बाहर निकल पड़ा. सामने फेंसिंग पर चिड़िया बैठी थी. सिर्योझा ने बिना निशाना साधे गुलेल से उस पर कंकर चलाया और, ज़ाहिर है, चूक गया. उसने जान बूझ कर निशाना नहीं साधा था, क्योंकि वह चाहे कितना ही निशाना क्यों न साधे, वह लगता ही नहीं, न जाने क्यों; मगर तब लीदा चिढ़ाती; मगर अब तो उसे चिढ़ाने का कोई हक ही नहीं है : ज़ाहिर था कि इन्सान ने निशाना नहीं साधा है, उसे तो बस गुलेल चलानी थी, सो चला दी, बगैर यह देखे कि कंकर कहाँ लगता है.
शूरिक अपने गेट से चिल्लाया:
 “सेर्गेई, बगिया में चलें?”
 “नहीं, दिल नहीं चाहता!” सिर्योझा ने कह.
वह बेंच पर बैठ गया और पैर हिलाने लगा. उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. आँगन से गुज़रते हुए उसने देखा कि खिड़कियों के पल्ले भी बन्द हैं. उसने फ़ौरन तो इसका कोई मतलब नहीं निकाला, मगर अब वह समझ गया : गर्मियों में तो वे कभी भी बन्द नहीं होते, बन्द होते हैं सिर्फ सर्दियों में, जब तेज़ बर्फ गिरती है; मतलब ये कि खिलौने चारों तरफ़ से बन्द हैं, और उसे तो उनकी इतनी ज़रूरत थी कि वह ज़मीन पर पसर कर बिसूरने को भी तैयार था. बेशक, वह ज़मीन पर पसर कर चीखने वाला तो नहीं है, वह कोई छोटा थोड़े है, मगर इससे उसे हल्का महसूस नहीं हुआ. मम्मा और कोरोस्तेल्योव ने सब कुछ बन्द कर लिया है, और उन्हें इस बात की ज़रा भी फ़िकर नहीं है कि उसे इसी समय फ़ावड़ा चाहिए.
 ‘जैसे ही वे उठेंगे,’ सिर्योझा ने सोचा, ‘ मैं फ़ौरन सब-सब पाशा बुआ के कमरे में ले जाऊँगा. क्यूब नहीं भूलना है : वह एक बार अलमारी के पीछे गिर गया था और अभी तक वहीं पड़ा है.’
वास्का और झेन्का सिर्योझा के सामने आकर खड़े हो गए. और लीदा भी नन्हे विक्टर को हाथों में उठाए हुए वहाँ आ पहुँची. वे सब खड़े होकर सिर्योझा की ओर देख रहे थे. वह अपना पैर हिलाए जा रहा था और कुछ भी नहीं कह रहा था. झेन्का ने पूछा:
 “आज तुझे क्या हुआ है?”
वास्का ने कहा:
 “उसकी मम्मा ने शादी कर ली.”
कुछ देर सब चुप रहे.
 “किससे शादी की?” झेन्का ने पूछा.
 “कोरोस्तेल्योव से,” ‘यास्नी बेरेग’ के डाइरेक्टर से,” वास्का ने कहा. “ओह, तो इसकी हजामत भी बना दी!”
 “किसलिए बनाई हजामत?” झेन्का ने पूछा.
 “यूँ ही – मतलब किसी अच्छे कारनामे के लिए,” वास्का ने कहा और जेब से सिगरेट का मुड़ा-तुड़ा पैकेट निकाला.
 “मुझे भी पीने दे,” झेन्का ने कहा.
 “मेरे पास भी, शायद, ये आख़री है,” वास्का ने कहा, मगर फिर भी उसने सिगरेट दी और, कश लगाकर, झेन्का की ओर जलती हुई दियासलाई बढ़ा दी. तीली की नोक पर लौ सूरज की रोशनी में पारदर्शी नज़र आ रही थी, दिखाई नहीं दे रही थी; दिखाई नहीं दे रहा था कि तीली काली होकर मुड़ क्यों गई और सिगरेट कैसे धुआँ छोड़ने लगी. सूरज सड़क के उस ओर था, जहाँ बच्चे इकट्ठा हुए थे; और दूसरी ओर अभी भी छाँव थी, और बिच्छू-बूटी के पत्ते, बागड़ के किनारे-किनारे, ओस में नहाए, काले और गीले लग रहे थे. सड़क के बीचोंबीच धूल : उस तरफ़ ठण्डी और इस तरफ़ गरम थी. और दो कतारें दाँतेदार पहियों के निशानों की: कोई ट्रैक्टर इधर से गुज़रा था.
 “सिर्योझा दुखी है, लीदा ने शूरिक से कहा, “उसके नए पापा आ गए हैं.”
 “दुखी मत हो,” वास्का ने कहा, “वो चचा अच्छा ही है, चेहरे से पता चलता है. जैसे रहता है, वैसे ही तू रहेगा, तुझे क्या करना है.”
 “वो मुझे बैसिकल ख़रीद के देने वाला है,” सिर्योझा ने अपनी कल की बातचीत को याद करके कहा.
 “उसने वादा किया है,” वास्का ने पूछा, “या तू सिर्फ उम्मीद लगाए बैठा है?”
 “वादा किया है. हम साथ-साथ जाएँगे दुकान में. इतवार को. कल होगा शुक्रवार, फिर शनिवार, और फिर इतवार.”

 “दो पहिए वाली?” झेन्का ने पूछा.

 “तीन पहियों वाली मत लेना,” वास्का ने सलाह दी. “उसका तुझे कोई फ़ायदा नहीं है. तू जल्दी से बड़ा हो जाएगा, तुझे दो पहियों वाली चाहिए.”

 “झूठ बोल रहा है,” लीदा ने कहा. “कोई सैकल-वैकल उसके लिए नहीं खरीदेंगे.”

शूरिक ने मुँह फुलाया और कहा:

 “मेरे पापा भी मेरे लिए बैसिकल खरीदेंगे. जैसे ही तनखा मिलेगी, फ़ौरन खरीदेंगे.”

शनिवार, 6 जुलाई 2013

Tomka and swimming

तोम्का ने तैरना कैसे सीखा
लेखक: येव्गेनी चारुशिन
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

हम घूमने निकले और तोम्का को भी साथ लिया.
उसे बैग में बैठाया जिससे वह गिर न पड़े.
तालाब के किनारे आए, किनारे पर बैठे और पानी में कंकड़ फेंकने लगे – शर्त लगा रहे थे कि किसका कंकड़ ज़्यादा दूर गिरता है. और तोम्का वाली बैग घास पर रख दी. वो रेंगते हुए बैग से बाहर आया, देखा कि कैसे कंकड़ पानी में डूबा, और भागने लगा.
तोम्का रेत पर भाग रहा है, छोटे-छोटे पंजे, डगमगाते पैर, रेत में धँस रहे हैं...पानी तक पहुँचा, पानी में पंजे डाले और हमारी ओर देखा.
 “ जा, तोम्का, जा – डरना मत, डूबेगा नहीं!”
तोम्का पानी में घुस गया. पहले पेट तक गया, फिर गर्दन तक, और फिर पूरा अन्दर घुस गया  
सिर्फ पूँछ का थोड़ा सा हिस्सा ऊपर निकला था. चल रहा है, चल रहा है, और अचानक उछल कर बाहर आया – और लगा खाँसने, छींकने, सूँ-सूँ करने. ज़ाहिर है, उसने पानी के भीतर साँस ले ली थी – पानी उसके मुँह में और नाक में घुस गया. कंकड़ उसे मिला ही नहीं.
अब हमने छोटी-सी गेंद लेकर पानी में फेंकी.
तोम्का को गेंद से खेलना पसन्द था – यह उसका बड़ा पसन्दीदा खिलौना था. गेंद पानी से टकराई, गोल गोल गोते खाने लगी और रुक गई. पानी पर ऐसे पड़ी है जैसे चिकने फर्श पर पड़ी हो.
तोम्का ने अपने प्यारे खिलौने को पहचाना और बर्दाश्त नहीं कर सका – वह पानी में भागा. भाग रहा है, भाग रहा है, कूँ-कूँ कर रहा है, मगर अब अपनी नाक पानी में नहीं घुसा रहा है.
चलता गया, चलता गया, और वैसे ही तैरने लगा. गेंद तक तैरते हुए गया, उसे अपने दाँतों में दबा लिया – और वापस हमारे पास आ गया.

बस, और वो तैरना सीख गया.    

How did Jhenya learn to pronounce 'R'

छोटू झेन्या ने ‘र्’ शब्द का उच्चारण कैसे सीखा
लेखक: येव्गेनी चारुशिन
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

छोटे झेन्या को ‘र्’ कहना नहीं आता था.
उससे कहते:
 “ तो, झेन्या, बोल: ‘तरबूज़’.
और वह कहता: ‘तलबूज़’.
 “बोल : ‘कोकरोच’.
और झेन्या कहता : कोकलोच’.
 “बोल : ‘रीना’.
 और  वह कहता : ‘लीना’.
कम्पाउण्ड के सारे बच्चे उस पर हँसा करते.
एक बार झेन्या बच्चों के साथ खेल रहा था, उसने कुछ गलत भी बोल दिया. और बच्चे उसे चिढ़ाने लगे.
तब झेन्या गुस्सा हो गया और छत पर चढ़ गया.
आँगन में एक छोटा सा कमरा था, एक नीचा गुसलखाना. झेन्या उस गुसलखाने की छत पर लेटा और धीरे-धीरे रोने लगा.
अचानक बागड़ पर एक कौआ उड़कर आया और ज़ोर-ज़ोर से काँव-काँव करने लगा:
 “ ”क् र् र् र् आ आ आ!”...   
झेन्या ने भी काँव-काँव किया – बस उसके मुँह से निकला : “ क् ल्र् ल् ल् आ आ आ!”...
और कौवे ने उसकी तरफ़ देखा, गर्दन टेढ़ी की, अपनी चोंच हिलाई, और अलग-अलग सुर में लगा बार-बार बतियाने:
 “क् र् र् र् , क् र् आ आ, क् र् र् र्, र् र् र् आ, र् र् र् आ.”
झेन्या के मुँह से निकल रहा था: “क्लाव्ला, क् ल् ल् ल् , क् ल् क् ल् क् ल् “.
झेन्या आधे घण्टे तक कौए की तरह चिल्लाता रहा, अपनी जीभ को मुँह में अलग अलग जगह पर रखता और पूरी ताकत से फूँक मारता.
उसकी जीभ थक गई, और होंठ सूज गए. और अचानक वह एकदम सही-सही चिल्लाया:
 “क् र् र् र् र् र् र् आ आ आ आ !”
इतनी अच्छी तरह से “र् र् र्” निकल रहा था, जैसे कंकड़ों का ढेर विभिन्न दिशाओं में फिसल रहा हो: “र् र् र् र् र्” .
झेन्या ख़ुश हो गया और छत से उतरने लगा.
वह जल्दी में है, उतर रहा है और पूरे समय कौए जैसी काँव-काँव कर रहा है जिससे कि “र्” कहना भूल न जाए.
उतरा, उतरा और छत से गिर पड़ा, मगर छत तो गुसलखाने की है, गुसलखाना तो काफ़ी नीचा है, और गिरा वह अंगूर की बेल पर – चोट नहीं आई.
झेन्या उठा, बच्चों की ओर भागा, हँसते हुए, ख़ुश होते हुए और चिल्लाया:
 “मैंने “र् र् ई” बोलना सीख लिया!”
 “ अच्छा, ठीक है,” बच्चे बोले, “ख़ुद ही कुछ बोल.”
झेन्या ने सोचा, सोचा और बोला, “ पावेर् र् र् र् र् र्”
असल में झेन्या कहना चाहता था “पावेल”, मगर कुछ कन्फ्यूज़ हो गया.
और कितना ख़ुश हो गया!

********

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

Seryojha - 02

सिर्योझा - अध्याय 2

ज़िन्दगी की मुश्किलें

ये उसने अच्छा किया जो पूछ लिया. वर्ना क्या हर चीज़ पे ध्यान दे सकते हो? सिर्योझा को अच्छा ही लगता, मगर ध्यान ही तो बस नहीं होता ना. चारों ओर इतनी सारी चीज़ें हैं. दुनिया ठसाठस भरी है चीज़ों से. दीजिए हर चीज़ पर ध्यान!
क़रीब-क़रीब सारी चीज़ें बहुत बड़ी हैं: दरवाज़े, ऊफ़, कितने ऊँचे-ऊँचे, लोग (बच्चों को छोड़कर) लगभग उतने ही ऊँचे हैं, जितने दरवाज़े. लॉरी की तो बात ही मत करो; कम्बाईन की भी; इंजिन की भी, जो ऐसी सीटी बजाता है कि बस उसकी सीटी को छोड़कर कुछ और सुनाई ही नहीं देता.
आम तौर से – ये सब इतना ख़तरनाक नहीं है: लोग सिर्योझा से अच्छी तरह पेश आते हैं, अगर ज़रूरत पड़े तो उसके लिए झुक जाते हैं, और कभी भी अपने भारी-भरकम पैरों से उसके पैर नहीं कुचलते. लॉरी और कम्बाईन भी ख़तरनाक नहीं हैं, अगर उनका रास्ता न काटो तो. इंजिन तो दूर है, स्टेशन पर, जहाँ सिर्योझा दो बार तिमोखिन के साथ गया था. मगर आँगन में एक जंगली जानवर घूमता रहता है. उसकी गोल-गोल, शक भरी, निशाना साधती आँख, तेज़-तेज़ साँस लेता थैली जैसा भारी-भरकम गला, पहिए जैसा सीना और फ़ौलादी चोंच है. वह जानवर रुक जाता है और अपने कँटीले पैर से ज़मीन कुरेदता है. जब वह गर्दन तान लेता है तो सिर्योझा जितना ऊँचा हो जाता है. और वह सिर्योझा को भी उसी तरह चोंच मार सकता है, जैसे पड़ोस के जवान मुर्गे को मारी थी, जो बेवकूफ़ी से उड़कर आँगन में आ गया  था. सिर्योझा इस खून के प्यासे जानवर की बगल से निकल जाता है, ऐसा दिखाते हुए कि उसे देख ही नहीं रहा है – मगर जानवर, अपनी लाल कलगी को तिरछा करते हुए गले से कुछ धमकी भरी बात कहता है, उसकी सतर्क, दुष्ट नज़र सिर्योझा का पीछा करती है...
मुर्गे चोंच मारते हैं, बिल्लियाँ खरोंचती हैं, बिच्छू-बूटी से खुजली और जलन होती है; लड़के लड़ते हैं, जब गिरते हो तो ज़मीन घुटने की खाल खींच लेती है – और सिर्योझा का बदन ढँक जाता है खँरोचों से, चोटों से, ज़ख़्मों से. हर रोज़ कहीं न कहीं से खून निकलता ही है. हमेशा कुछ न कुछ होता ही रहता है. वास्का फ़ेंसिंग पर चढ़ गया, मगर जब सिर्योझा चढ़ने लगा तो उसका हाथ छूट गया और चोट लग गई. लीदा के गार्डन में गड्ढा खोदा था, सारे बच्चे कूद-कूद कर गड्ढा फाँदने लगे, और किसी को भी कुछ भी नहीं हुआ, मगर जब सिर्योझा कूदने लगा तो गड्ढे में गिर गया. पैर फूल गया और दर्द करने लगा, सिर्योझा को पलंग पर लेटना पड़ा. मुश्किल से वह उठने के क़ाबिल हुआ ही था कि गेंद खेलने के लिए आँगन में पहुँचा, मग्र गेंद ही उड़कर छत पर चली गई और वहाँ पाईप के पीछे तब तक पड़ी रही जब तक वास्का ने आकर उसे ढूँढ नहीं निकाला. एक बार तो सिर्योझा डूब ही गया था. लुक्यानिच अपनी नाव में उन्हें नदी पर घुमाने ले गया था – सिर्योझा को, वास्का को, फ़ीमा को और एक जान-पहचान वाली लड़की नाद्या को. लुक्यानिच की नाव बकवास ही निकली : जैसे ही बच्चे ज़रा-सा हिले डुले, वह गोता खा गई और वे सब के सब, लुक्यानिच को छोड़कर, पानी में गिर पड़े. पानी भयानक ठण्डा था. वह फ़ौरन सिर्योझा की नाक में, मुँह में, कानों में घुस गया – वह चिल्ला भी नहीं सका; पेट में भी घुस गया. सिर्योझा पूरा गीला हो गया, भारी हो गया , जैसे कोई उसे कोई नीचे नीचे पानी में खींच रहा हो. उसे इतना डर लगा जितना पहले कभी नहीं लगा था. और अंधेरा था, और ये काफ़ी देर तक चलता रहा. अचानक उसे ऊपर खींच लिया गया. उसने आँखें खोलीं – चेहरे के बिल्कुल पास नदी बह रही थी, किनारा दिखाई दे रहा था, और धूप में सब कुछ चमक रहा था. सिर्योझा के भीतर जो पानी भरा था वह बाहर निकल रहा था, वह हवा भीतर खींच रहा था, किनारा नज़दीक आता गया, और सिर्योझा हाथों-पैरों पर सख़्त बालू में ख़ड़ा था, ठण्ड और डर से कँपकँपाते हुए. ये वास्या के दिमाग में आया कि उसे बालों से पकड़कर खींच ले. और अगर सिर्योझा के बाल लम्बे न होते तो क्या होता?
फ़ीमा ख़ुद तैर कर बाहर आ गई, उसे तैरना आता है. नाद्या भी क़रीब-क़रीब डूब ही गई थी, उसे लुक्यानिच ने बचाया. और जब लुक्यानिच नाद्या को बचाने में लगा था, तब तक नाव बह गई. सोवियत-फ़ार्म की औरतों ने नाव पकड़ी और लुक्यानिच को ऑफ़िस में फोन पर बताय कि वह उसे ले जाए. मगर अब लुक्यानिच कभी भी बच्चों को नाव पर नहीं ले जाता. वह कहता है, “मुझ पर लानत लगे जो मैं फिर कभी तुम लोगों के साथ जाऊँ.”
दिन भर में जो कुछ भी देखना पड़ता है, बर्दाश्त करना पड़ता है, उससे सिर्योझा बेहद थक जाता है. शाम होते-होते वह पस्त हो जाता है : उसकी ज़ुबान मुश्किल से घूमती है, आँखें घूमने लगती हैं , पंछियों की आँखों के समान. उसके हाथ-पैर धुलाए जाते हैं, कमीज़ बदली जाती है – वह ख़ुद कुछ भी नहीं करता; उसकी चाभी ख़त्म हो चुकी है, जैसे घड़ी की चाभी ख़त्म होती है.

वह सो जाता है, भूरे बालों वाला सिर आराम से तकिये में डाले, दुबले-पतले हाथ फैलाए; एक पैर लम्बा खींचे, दूसरा घुटने पर मोड़े, जैसे किसी गोल सीढ़ी पर चढ़ रहा हो. हल्के, पतले बाल, दो लहरों में बंटे दोनों भँवों की कमानों के ऊपर उभरे उसके माथे को खोल रहे हैं. बड़ी-बड़ी पलकें, घनी बरौनियों की झालर डाले, कस कर बन्द हैं. मुँह बीच में कुछ खुला हुआ, किनारों पर नींद के कारण चिपका हुआ. और वह हौले-हौले साँस लेता है, बे आवाज़, फूल की तरह.

वह सो रहा है – और चाहे ढोल भी बजाओ, तोप के गोले भी दागो – सिर्योझा नहीं उठेगा, वह ताक़त बटोर रहा है, आगे जीने के लिए.

Seryojha - 01

सिर्योझा-1
लेखिका: वेरा पानोवा
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

अध्याय 1
कौन है ये सिर्योझा और वह कहाँ रहता है?
कहते हैं कि वह लड़की जैसा है. ये तो सरासर मज़ाक हुआ! लड़कियाँ तो फ्रॉक पहनती हैं, मगर सिर्योझा ने तो कब का फ्रॉक पहनना छोड़ दिया है. क्या लड़कियों के पास गुलेल होती है? मगर सिर्योझा के पास तो गुलेल है, उससे पत्थर मार सकते हैं. गुलेल उसे शूरिक ने बनाकर दी थी. इसके बदले में सिर्योझा ने शूरिक को अपनी सारी डोरों की रीलें दे दी थीं जिन्हें वह अपनी पूरी ज़िन्दगी इकट्ठा करता रहा था.
मगर, इसमें उसका क्या कुसूर कि उसके बाल ही ऐसे हैं; कितनी ही बार मशीन से काटे; सिर्योझा बेचारा चुपचाप बैठा रहता है, तौलिए से ढँका हुआ, और आख़िर तक बर्दाश्त करता रहता है; मगर वे हैं कि फिर से बढ़ जाते हैं.
मगर है वह होशियार, सभी ऐसा कहते हैं. ढेर सारी किताबें उसे ज़ुबानी याद हैं. दो-तीन बार किताब पढ़कर सुना दो, और बस, उसे याद हो जाती है. उसे अक्षर भी मालूम हैं - मगर ख़ुद पढ़ने में बहुत देर लगती है. किताबें रंगबिरंगी पेंसिलों से पूरी रंग गईं हैं, क्योंकि सिर्योझा को तस्वीरों में रंग भरना अच्छा लगता है. तस्वीरें चाहे रंगीन ही क्यों न हों, वह अपनी पसन्द से उनमें दुबारा रंग भरता है. किताबें ज़्यादा देर तक नई नहीं रहतीं, उनके टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं. पाशा बुआ उन्हें करीने से लगाती है, सीती है और किनारों से फट गए पन्नों को चिपकाती है.
कभी कोई पन्ना गुम हो जाता है – सिर्योझा उसे ढूँढ़ने लगता है और तभी चैन लेता है जब उसे खोज लेता है: अपनी किताबों से वह बहुत प्यार करता है, हालाँकि उनमें लिखी बातों पर दिल से भरोसा नहीं करता. कहीं जानवर भी बातें करते हैं; और कालीन-हवाई जहाज़ उड़ नहीं सकता क्योंकि उसमें इंजिन ही नहीं होता, ये तो हर बेवकूफ़ जानता है.
और कोई उन बातों पर भरोसा करे भी तो कैसे, जब चुडैल के बारे में पढ़कर सुनाते हैं और फ़ौरन ये भी कह देते हैं कि , ‘मगर, सिर्योझेन्का, चुडैलें होती ही नहीं हैं.’
मगर, फिर भी, उससे बर्दाश्त नहीं होता जब वो लकड़हारा और उसकी बीबी धोखे से अपने बच्चों को जंगल में ले जाते हैं, जिससे वे रास्ता भूल जाएँ और कभी भी लौटकर घर न आ सकें. हालाँकि डंडे वाले लड़के ने उन सबको बचा लिया , मगर ऐसी बातों के बारे में सुनना मुश्किल है. सिर्योझा इस किताब को पढ़कर सुनाने की इजाज़त नहीं देता.
सिर्योझा अपनी माँ, पाशा बुआ और लुक्यानिच के साथ रहता है. उनके घर में तीन कमरे हैं. एक में सिर्योझा माँ के साथ सोता है, दूसरे में पाशा बुआ और लुक्यानिच और तीसरा कमरा है – डाइनिंग रूम. जब मेहमान आते हैं तो डाइनिंग रूम में खाना खाते हैं, और जब मेहमान नहीं होते तो किचन में. इसके अलावा टेरेस है, और आँगन भी. आँगन में मुर्गियाँ हैं. दो लम्बी-लम्बी क्यारियों में प्याज़ और मूली लगी हैं. मुर्गियाँ क्यारियाँ न खोद दें, इसलिए उनके चारों ओर कंटीली सूखी टहनियाँ लगी हैं; और जब भी सिर्योझा को मूली तोड़नी पड़ती है, ये काँटे ज़रूर उसके पैरों को खुरच देते हैं.
कहते हैं कि उनका शहर छोटा-सा है. सिर्योझा और उसके दोस्तों का मानना है कि ये गलत है. बड़ा ही है शहर. उसमें दुकानें हैं, वाटर-टॉवर है, स्मारक हैं, सिनेमाघर भी है. कभी-कभी माँ सिर्योझा को अपने साथ सिनेमा ले जाती है. “मम्मा”, जब हॉल में अँधेरा हो जाता है तो सिर्योझा कहता है, “अगर कोई समझने वाली बात हो तो मुझे बताना.”
सड़कों पर कारें दौड़ती हैं. ड्राईवर तिमोखिन बच्चों को अपनी लॉरी में घुमाने ले जाता है. मगर, ऐसा कभी-कभी ही होता है. ये तभी होता है जब तिमोखिन ने वोद्का नहीं पी हो. तब उसकी नाक-भौंह चढ़ी रहती हैं, वो बात नहीं करता है, सिगरेट पीता रहता है, थूकता रहता है, और सबको घुमा देता है. मगर जब वह ख़ुशी में गुज़रता है – तो उससे पूछना भी बेकार है, कोई फ़ायदा नहीं होगा : हाथ हिलाएगा खिड़की से और चिल्लाएगा: “नमस्ते, बच्चों! आज मुझे नैतिक अधिकार नहीं है! मैंने पी रखी है!”

जिस सड़क पर सिर्योझा रहता है, उसका नाम है दाल्न्याया (दाल्न्याया- दूरस्थ-अनु.) . सिर्फ नाम ही है दाल्न्याया: वैसे तो सभी कुछ उसके पास ही है. चौक तक – क़रीब दो किलोमीटर, वास्का कहता है. और सव्खोज़ (सव्खोज़ – सोवियत फ़ार्म – अनु.) ‘यास्नी बेरेग’ तो और भी पास है, वास्का कहता है. ’यास्नी बेरेग’ सव्खोज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण और कुछ भी नहीं है. वहाँ लुक्यानिच काम करता है. पाशा बुआ वहाँ हैरिंग मछली और कपड़े ख़रीदने जाती है. माँ का स्कूल भी सव्खोज़ में है. त्यौहारों पर सिर्योझा माँ के साथ सुबह के प्रोग्राम में जाता है. वहाँ उसकी पहचान लाल बालों वाली फ़ीमा से हुई. वह बड़ी है, आठ साल की. उसकी चोटियाँ कानों पर 8 के अंक की तरह होती हैं, और चोटियों में रिबन लिपटॆ रहते हैं, फूल की तरह : या तो काले रिबन, या नीले, या सफ़ेद, या भूरे; फ़ीमा के पास कई सारे रिबन हैं. सिर्योझा का तो ध्यान ही नहीं जाता, मगर फ़ीमा ने ख़ुद ही उससे पूछा, “तूने ध्यान दिया, मेरे पास कितने सारे रिबन हैं”

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

Dimka and Anton

दीम्का और अन्तोन
लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

पिछली गर्मियों में मैं अपने वोलोद्या चाचा के फार्म-हाऊस गया था. उनका घर बेहद ख़ूबसूरत है, रेल्वे स्टेशन जैसा, मगर उससे थोड़ा छोटा.
मैं वहाँ पूरे हफ़्ते रहा, और जंगल में घूमा, अलाव जलाए, और तैराकी भी की.
मगर ख़ास बात ये है कि वहाँ मेरी कुत्तों से दोस्ती हुई. वहाँ ख़ूब सारे कुत्ते थे, और सब उन्हें नाम और उपनाम से पुकारते थे. जैसे, झूच्का ब्रेद्नेव, या तूज़िक मुराशोव्स्की, या बार्बोस ईसाएन्को.
इस तरह ये जानना आसान हो जाता है कि किसे किस कुत्ते ने काटा है.
हमारे घर में रहता था कुत्ता दीम्का. उसकी पूँछ मुड़ी हुई और झबरीली थी, और पैरों में ऊनी पतलून थी.
जब मैं दीम्का की ओर देखता तो मुझे बड़ा आश्चर्य होता कि उसकी कितनी ख़ूबसूरत आँखें हैं. पीली-पीली और बेहद समझदार. मैं दीम्का को शक्कर देता, और वह हमेशा मेरी ओर देखकर पूँछ हिलाता. और, बस दो ही घर छोड़कर रहता था कुत्ता अन्तोन. वह वान्का का था. वान्का का उपनाम था दीखोव, तो अंतोन को सब लोग अन्तोन दीखोव कहते थे. इस अन्तोन के बस तीन ही टाँगें थीं, शायद चौथी टाँग को पंजा नहीं था. उसने उसे कहीं खो दिया था. मगर फिर भी वह खूब तेज़ भागता था और हर जगह पहुँच जाता था. वह घुमक्कड़ था, कभी-कभी तीन-तीन दिनों तक गायब हो जाता, मगर हमेशा वान्का के पास लौटकर आ जाता था. अन्तोन को जो भी सामने आ जाए, वो चुराना अच्छा लगता था, मगर वह चालाक नहीं था. एक बार का किस्सा सुनाता हूँ.
मेरी मम्मी ने दीम्का को एक बड़ी हड्डी दी. दीम्का ने उसे ले लिया, अपने सामने रखा, पंजों में पकड़ लिया, आँखें सिकोड़ीं और उसे कुतरने ही वाला था कि अचानक उसे हमारी बिल्ली मूर्ज़िक दिखाई दी. वह किसी को छेड़ नहीं रही थी, चुपचाप घर जा रही थी, मगर दीम्का उछला और उसके पीछे पड़ गया! मूर्ज़िक – दौड़ने लगी और दीम्का बड़ी देर तक उसे खदेड़ता रहा, जब तक कि उसे सराय के पीछे न भगा दिया.
मगर ख़ास बात ये थी कि अन्तोन कबसे हमारे आँगन में था, और जैसे ही दीम्का मूर्ज़िक के पीछे भागा, अन्तोन ने बड़े आराम से उसकी हड्डी उठाई और उसे लेकर भाग गया! हड्डी उसने कहाँ छुपाई, मालूम नहीं, मगर एक ही सेकण्ड बाद वापस आकर बैठ गया, इधर उधर देखने लगा, जैसे कह रहा हो, “लड़कों, मुझे कुछ भी मालूम नहीं है.”
अब दीम्का वापस आया तो देखता क्या है कि हड्डी नहीं है, और बस अन्तोन बैठा है. उसने उसकी ओर देखा, मानो पूछ रहा हो, “तूने ली है?” मगर जवाब में ये बदमाश उसे देखकर हँसने लगा! फिर उकतायेपन से मुड़ गया. तब दीम्का भागकर उसके आगे गया और सीधे उसकी आँखों में देखने लगा. मगर अन्तोन ने पलक तक नहीं झपकाई. दीम्का काफ़ी देर तक उसे देखता रह मगर फिर समझ गया कि उसका कोई ईमान नहीं है, और वहाँ से हट गया.
अन्तोन जैसे उसके साथ खेलना चाह रहा था, मगर दीम्का ने उससे बात करना बन्द कर दिया.
मैंने कहा, “ अन्तोन! आ-आ-आ!”
वह मेरे पास आया, और मैंने उससे कहा, “मैंने सब देखा है. अगर तुम फ़ौरन हड्डी नहीं लाए तो मैं सबसे कह दूँगा.     
वह बुरी तरह लाल हो गया. मतलब, बेशक, वो, हो सकता है, लाल हुआ भी न हो, मगर उसकी शक्ल बता रही थी कि वह बहुत शर्मिन्दा है, और वह सही में लाल हो गया.
ओह, कितना होशियार! अपनी तीन टाँगों से उछलता हुआ वह कहीं गया, और वापस आया तो उसने दाँतों में हड्डी दबाई हुई थी. और हौले से, शराफ़त से, उसे दीम्का की सामने रख दिया. मगर दीम्का उसे खा ही नहीं रहा था. उसने अपनी पीली आँखों से कनखियों से देखा और मुस्कुराया – मतलब, माफ़ कर दिया!
और वे खेलने लगे, भाग-दौड़ करने लगे, और फिर, जब थक गए तो नदी की ओर भागे एक दूसरे से बिल्कुल सटे-सटे.
मानो हाथ में हाथ लिए चल रहे हों.

********

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

17 Horses

17 घोड़े
लेखक: डैनियल चार्म्स
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास.

हमारे गाँव में एक आदमी मर गया. अपने बेटों के नाम उसने ऐसी वसीयत छोड़ी:
बड़े बेटे के लिए अपनी जायदाद का 1/2 भाग छोड़ता हूँ,
मँझले बेटे के लिए अपनी जायदाद का 1/3 भाग छोड़ता हूँ, और
छोटे बेटे के लिए अपनी जायदाद का 1/9 भाग छोड़ता हूँ.
जब यह आदमी मरा तो उसकी जायदाद में बचे थे सिर्फ 17 घोड़े, और उनके अलावा कुछ भी नहीं. अब बेटे 17 घोड़ों को आपस में बाँटने लगे.
 “मैं,” बड़े वाले ने कहा, “  सारे घोड़ों का 1/2 हिस्सा लूँगा. मतलब, 17/2 होगा 8 1/2 “.
“तुम 8 1/2  घोड़े कैसे ले सकते हो?” मँझले बेटे ने पूछा. “कहीं तुम घोड़े के टुकड़े तो नहीं करने वाले हो?”
 “ठीक कहा,” बड़े भाई ने उससे सहमत होते हुए कहा, “ बस, तुम भी अपना हिस्सा नहीं ले पाओगे. क्योंकि 17 को न तो 2 हिस्सों में, न 3 में और न ही 9 में बाँटा जा सकता है!”
 “तो फिर क्या किया जाए?”
 “देखो,” छोटे भाई ने कहा, “ मैं एक बड़े विद्वान आदमी को जानता हूँ, उसका नाम है इवान पेत्रोविच रास्सूदिलोव, वो हमारी मदद कर सकता है.”
 “ठीक है, तो उसे बुला ला,” बाकी दोनों भाई बोले.
छोटा भाई चला गया और जल्दी ही एक आदमी के साथ लौटा, जो घोड़े  पर सवार था और एक छोटे से पाईप से कश लगा रहा था.
“लो,”  छोटे भाई ने कहा, “ ये ही हैं इवान पेत्रोविच रास्सूदिलोव.”
भाइयों ने रास्सूदिलोव को अपना दुखड़ा कह सुनाया. उसने बड़े ध्यान से उनकी बात सुनी और कहा:
” तुम मेरा घोड़ा ले लो, तब तुम्हारे पास 18 घोड़े हो जाएँगे, फिर तुम उन्हें आराम से बाँट लेना.”
भाईयों ने 18 घोड़े बाँटना शुरू किया.
बड़े ने लिए 1/2  --- 9 घोड़े,
मँझले ने लिए 1/3 --- 6 घोड़े, और
छोटे ने लिए 1/9 ---- 2 घोड़े .
अब भाईयों ने अपने घोड़े इकट्ठा किए. 9+6+2, कुल मिलाकर हुए 17 घोड़े. और इवान पेत्रोविच अपने अठारहवें घोड़े पर बैठकर कश लगाने लगा.
 “तो, खुश हो ना?” उसने भौंचक्के भाइयों की ओर देखा और चला गया.

*******