शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

Gend Wali Ladki


 
गेंद वाली लड़की

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

एक बार मैं अपनी पूरी क्लास के साथ सर्कस गया. सर्कस जाते हुए मैं बहुत ख़ुश था, क्योंकि जल्दी ही मैं आठ साल का होने वाला हूँ, मगर सर्कस मैं सिर्फ एक बार गया हूँ, और वो भी काफ़ी पहले. ख़ास बात, अल्योन्का सिर्फ छह साल की है, मगर वह पूरे तीन बार सर्कस जा चुकी है. इससे मुझे बहुत इन्सल्ट लगती है. और अब, हमारी पूरी क्लास सर्कस के लिए निकली, और मैं सोच रहा था, कि मैं बड़ा हो गया हूँ और अब, इस समय सब कुछ अच्छी तरह देखूँगा. पिछली बार मैं छोटा था, मुझे समझ में ही नहीं आता था, कि सर्कस क्या होती है. उस समय, जब सर्कस के अरेना में कलाबाज़ निकले और एक के सिर पे दूसरा चढ़ गया, तो मैं ठहाके मारते हुए हँस रहा था, क्योंकि मैंने सोचा कि ये सब वो लोग जानबूझकर कर रहे हैं, हँसाने के लिए, क्योंकि घर में तो मैंने बड़े अंकल्स को एक दूसरे के ऊपर चढ़ते हुए कभी नहीं देखा था. रास्ते पर भी ऐसा कभी नहीं हुआ था. इसलिए मैं ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगा रहा था. तब तक मुझे नहीं मालूम था कि ये आर्टिस्ट्स अपना हुनर दिखा रहे हैं. उस बार मैं ज़्यादातर ऑर्केस्ट्रा की तरफ़ ही देख रहा था, कि वे कैसे बजाते हैं – कोई ड्रम बजा रहा था, कोई पाईप – डाइरेक्टर डंडी हिलाता है, मगर उसकी तरफ़ कोई नहीं देखता, बल्कि सब अपनी मर्ज़ी से बजा रहे हैं. ये मुझे बहुत अच्छा लगा था, मगर जब मैं इन संगीतकारों की तरफ़ देख रहा था, तो अरेना के बीच में आर्टिस्ट्स अपना कमाल दिखा रहे थे. मैंने उनकी ओर नहीं देखा और सबसे मज़ेदार चीज़ छोड़ दी. बेशक, उस समय मैं बिल्कुल बेवकूफ़ ही तो था.
तो, हमारी पूरी क्लास सर्कस पहँची. मुझे एकदम पसन्द आ गया कि यहाँ कोई ख़ास तरह की ख़ुशबू है, दीवारों पर चमकदार तस्वीरें लगी हैं, छत खूब ऊँची है, और वहाँ अलग-अलग तरह के चमचमाते झूले टंगे हैं. इसी समय म्यूज़िक शुरू हो गया और सब लोग अपनी अपनी कुर्सी पर बैठने के लिए लपके, फिर ‘एस्किमो’ ख़रीदी और खाने लगे. अचानक लाल परदे के पीछे से लोगों की एक पूरी क़तार निकली, उन्होंने बेहद ख़ूबसूरत कपड़े पहने थे – पीली धारियों वाली लाल ड्रेस. वे परदे के किनारों पर खड़े हो गए, और उनके बीच से काले सूट में उनका डाइरेक्टर निकला. उसने ज़ोर से कुछ कहा, जो मुझे समझ में नहीं आया, और म्यूज़िक तेज़-तेज़ और ज़ोर से बजने लगा, और अरेना में आया कलाकार-बाज़ीगर, और मनोरंजन शुरू हो गया. वह गेंदें उछाल रहा था, दस या सौ एक साथ ऊपर की ओर, और उन्हें वापस पकड़ रहा था. फिर उसने धारियों वाली गेंद पकड़ी और उससे खेलने लगा...वह सिर से भी उसे मार रहा था, मुँह से भी, माथे से भी, और पीठ पर भी घुमा रहा था, और एड़ी से दबा रहा था, गेंद उसके पूरे जिस्म पर इस तरह घूम रही थी जैसे उसमे चुम्बक चिपका हो. ये बहुत बढ़िया था. और फिर अचानक बाज़ीगर ने गेंद पब्लिक की ओर उछाल दी, और वहाँ सचमुच की गड़बड़ होने लगी, क्योंकि उस गेंद को मैंने पकड़कर वालेर्का की ओर फेंक दिया, और वालेर्का ने मीश्का की ओर, और मीश्का ने बगैर किसी बात के, अचानक निशाना साध कर म्यूज़िक-डाइरेक्टर की ओर उसे फेंका, गेंद उसे नहीं लगी, बल्कि ड्रम पर जा गिरी! बाम्! ड्रम बजाने वाले को गुस्सा आ गया और उसने गेंद को वापस बाज़ीगर की तरफ़ उछाल दिया, मगर गेंद वहाँ तक नहीं पहुँची, वो एक ख़ूबसूरत आण्टी के जूड़े पे बैठ गई, और पता चला कि उसने विग लगाया था, जो गिर गया. हम सब इतनी ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाने लगे कि बस दम ही निकलते-निकलते बचा.
और, जब बाज़ीगर परदे के पीछे भाग गया, तो हम बड़ी देर तक शांत न हो सके. मगर फिर अरेना में एक बड़ी-भारी नीली गेंद लाई गई, और अनाऊन्सर अंकल बीचोंबीच आकर कुछ चिल्लाया. कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, और ऑर्केस्ट्रा ने भी फिर से बढ़िया धुन बजाना शुरू कर दिया, बस इस बार वो इतनी जल्दी-जल्दी नहीं बज रहा था, जितना पहले बज रहा था.
अचानक एक छोटी सी लड़की भागते हुए अरेना में आई. मैंने इतनी छोटी और इतनी सुन्दर लड़कियों को पहले कभी नहीं देखा था. उसकी आँखें नीली-नीली थीं, और उनके चारों ओर लम्बी पलकें थीं. उसने चांदी जैसी चमचमाती ड्रेस और एक हवाई ‘केप’ पहना था, उसके हाथ लम्बे थे; उसने पंछी की तरह हाथ हिलाए, और उछल कर इस ख़ूब बड़ी गेंद पर चढ़ गई, जिसे उसीके लिए लाए थे. वह गेंद पर खड़ी हो गई. और फिर अचानक उस पर दौड़ने लगी, जैसे गेंद से कूदना चाहती हो, मगर गेंद उसके पैरों के नीचे घूम रही थी, और वह उसके ऊपर ऐसे कर रही थी, मानो दौड़ रही हो, मगर असल में अरेना का गोल-गोल चक्कर लगा रही थी. मैंने ऐसी लड़कियों को पहले कभी नहीं देखा था. वे सब साधारण थीं, मगर, ये कोई ख़ास तरह की लड़की थी. वह अपने नन्हे-नन्हे पैरों से गेंदपर इस तरह दौड़ रही थी, जैसे समतल ग्राऊण्ड पे दौड़ रही हो, और नीली गेंद उसे अपने ऊपर उठाए-उठाए ले जा रही थी : वह उस पर सीधे, आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ, जहाँ चाहे वहाँ जा सकती थी! जब इस तरह से दौड़ रही थी, मानो तैर रही हो, तो वह प्रसन्नता से मुस्कुरा रही थी, और मैंने सोचा कि, शायद, ये ही थम्बेलिना है, इत्ती छोटी, प्यारी और असाधारण थी वो. इस समय वह रुक गई और किसी ने उसे घुंघरुओं वाले ब्रेसलेट्स दिए, उसने अपने जूतों पर, और हाथों में उन्हें पहन लिया और फिर से धीरे-धीरे गेंद पर घूमने लगी, जैसे डान्स कर रही हो. ऑर्केस्ट्रा शांत किस्म का म्यूज़िक बजाने लगा, और लड़की के लम्बे हाथों के सुनहरे घुंघरू कितनी महीन आवाज़ कर रहे थे. ये सब किसी परी-कथा के समान था. अब लाइट भी बन्द कर दी गई, और ऐसा लगा कि लड़की अंधेरे में प्रकाशित होना भी जानती है, और वो हौले-हौले गोल चक्कर लगा रही थी, चमक रही थी, और घुंघरुओं की नाज़ुक आवाज़ कर रही थी, और ये सब आश्चर्यजनक था, - मैंने अपनी ज़िन्दगी में इस तरह की कोई चीज़ नहीं देखी थी.
और जब लाइट जलाई गई, तो सब लोग तालियाँ बजाने लगे, और ‘शाबाश’ चिल्लाने लगे, मैं भी ‘शाबाश’ चिल्लाया. लड़की अपनी गेंद से नीचे उछली और सामने की ओर भागने लगी, हमारी तरफ़, और भागते-भागते बिजली की तरह सिर के बल कुलाँटे लेने लगी, और बार-बार कुलाँटे लेते हुए सामने आने लगी. मुझे ऐसा लगा कि अभ्भी वह रेलिंग से टकरा जाएगी, और मैं डर गया, उछल कर खड़ा हो गया और उसकी तरफ़ भागने को तैयार हो गया, जिससे उसे पकड़ कर बचा सकूँ, मगर लड़की अचानक रुक गई, जैसे ज़मीन में गड़ गई हो, उसने अपने दोनों हाथ फ़ैलाए, ऑर्केस्ट्रा ख़ामोश हो गया, और वह खड़ी होकर मुस्कुराने लगी. सब लोग पूरी ताक़त से तालियाँ बजाने लगे और पैरों से भी खटखटाने लगे. इसी पल लड़की ने मेरी तरफ़ देखा, और मैंने देखा, कि उसने देख लिया है कि मैं उसे देख रहा हूँ और मैं ये भी देख रहा हूँ, कि वो मुझे देख रही है, और उसने मेरी ओर देखते हुए हाथ हिलाया और मुस्कुरा दी. उसने अकेले मेरी तरफ़ ही देखकर हाथ हिलाया था और मुस्कुराई थी. मेरा दिल फिर से भाग कर उसके पास जाने को करने लगा, और मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ा दिए. उसने अचानक सबको एक फ्लाइंग किस दिया और लाल परदे के पीछे भाग गई, जहाँ सारे आर्टिस्ट्स भाग कर चले गए थे. फिर अरेना में आया एक जोकर अपने मुर्गे को लेकर और छींकने लगा, गिरने लगा, मगर मुझे उससे कोई मतलब नहीं था. मैं बस, पूरे समय गेंद वाली लड़की के बारे में ही सोचता रहा, कि वो कितनी वन्डरफुल है, कैसे उसने मेरी तरफ़ देखकर हाथ हिलाया था और मुस्कुराई थी, मैं कुछ और नहीं देखना चाहता था. बल्कि, मैंने अपनी आँखें कस के बन्द कर लीं, जिससे लाल नाक वाले इस बेवकूफ़ जोकर को न देखना पड़े,  क्योंकि उसने मेरी वाली लड़की का मज़ा किरकिरा कर दिया था: मेरे ख़यालों में अभी तक नीली गेंद पे खड़ी हुई वही लड़की थी.
इसके बाद इंटरवल हुआ, और सब लड़के सिट्रो पीने के लिए बुफ़े की ओर भागे, मगर मैं हौले से नीचे उतरा और परदे की तरफ़ गया, जहाँ से सारे आर्टिस्ट्स बाहर निकलते थे.
मैं और एक बार उस लड़की को देखना चाहता था, और इसलिए परदे के पास खड़े होकर देखता रहा – क्या पता अचानक वो बाहर आ जाए? मगर वो नहीं आई.
इंटरवल के बाद शेरों वाला प्रोग्राम हुआ, मुझे अच्छा नहीं लग रहा था कि रिंग-मास्टर उनकी पूँछें पकड़कर उन्हें घसीट रहा था, जैसे वो शेर नहीं, बल्कि मरी हुई बिल्लियाँ हों. वह उन्हें एक जगह से दूसरी जगह पे बैठने के लिए मजबूर कर रहा था, या उन्हें फ़र्श पर लिटा कर उनके ऊपर से चल रहा था, जैसे कालीन पर चल रहा हो, शेरों को देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे उन्हें इस बात की शिकायत हो कि उन्हें चैन से लेटने भी नहीं देते हैं. ये बिल्कुल मज़ेदार नहीं था, क्योंकि शेर को तो असीमित जंगलों में शिकार करना चाहिए, जंगली भैंसों का पीछा करना चाहिए, अपनी भयंकर दहाड़ से आस-पास के इलाके को बहरा करना चाहिए, जो लोगों को काँपने पर मजबूर कर दे. और, ये तो शेर नहीं, बल्कि पता नहीं कौन लग रहा था.
जब ‘शो’ ख़तम हुआ और हम घर जाने लगे, मैं पूरे समय गेंद वाली लड़की के बारे में ही सोच रहा था.
शाम को पापा ने पूछा:
 “तो? अच्छी लगी सर्कस?”
मैंने कहा:
 “पापा! सर्कस में एक छोटी लड़की है. वो नीली गेंद पर डान्स करती है. इतनी प्यारी, सबसे बढ़िया! उसने मेरी तरफ़ देखकर हाथ हिलाया और मुस्कुराई! क़सम से, सिर्फ मेरी तरफ़! समझ रहे हो, पापा? अगले इतवार को सर्कस जाएँगे! मैं तुमको दिखाऊँगा!”
पापा ने कहा:
 “ज़रूर जाएँगे. मुझे सर्कस बहुत अच्छी लगती है!”
मम्मा ने हम दोनों की ओर ऐसे देखा, जैसे पहली बार देख रही हो.
...और, एक लम्बा हफ़्ता शुरू हुआ, मैं खा रहा था, पढ़ाई कर रहा था, उठ रहा था, सो रहा था, खेल रहा था, और झगड़ा भी कर रहा था, मगर फिर भी हर रोज़ सोच रहा था कि न जाने इतवार कब आएगा, और मैं पापा के साथ कब सर्कस जाऊँगा, और फिर से गेंद वाली लड़की को देखूँगा, और पापा को दिखाऊँगा, और, हो सकता है, पापा उसे हमारे घर बुला लें, तब मैं उसे अपनी ब्राऊनिंग-पिस्तौल दूँग़ा और पालों वाले जहाज़ की तस्वीर बनाऊँगा.
मगर इतवार को पापा नहीं जा सके. उनके पास दोस्त लोग आ गए, वे कुछ चार्ट्स देख रहे थे, और चिल्ला रहे थे, और सिगरेट पी रहे थे, और चाय पी रहे थे और काफ़ी देर तक बैठे रहे, और उनके जाने के बाद मम्मा का सिर दर्द करने लगा, और पापा ने मुझसे कहा:
 “अगले इतवार को...प्रॉमिस करता हूँ, पक्का प्रॉमिस.”
मैं फिर से अगले इतवार का इंतज़ार करने लगा, ये भी याद नहीं है कि वह हफ़्ता मैने कैसे गुज़ारा. पापा ने अपना वादा पूरा किया: वे मेरे साथ सर्कस आए और दूसरी कतार की टिकट्स ख़रीदीं, मैं ख़ुश हो गया कि हम इतने क़रीब बैठे हैं, शो शुरू हुआ, और मैं इंतज़ार करने लगा कि कब गेंद वाली लड़की आती है. मगर अनाऊन्समेंट करने वाला आदमी, अलग-अलग आर्टिस्टों के नाम लेता रहा, वे बाहर आते और हर तरह के खेल दिखाते, मगर लड़की आ ही नहीं रही थी. मैं बेचैनी के मारे थरथराने लगा, मेरा दिल बेहद चाह रहा था कि पापा उसे देखें, कि अपनी चमचमाती ड्रेस और हवाई ‘केप’ में वह कैसी असाधारण लगती है और कितनी सफ़ाई से वो नीली गेंद पर दौड़ती है. हर बार जब कोई आर्टिस्ट बाहर निकलता, मैं पापा से फ़ुसफुसा कर कहता:
 “अब उसके बारे में अनाऊन्समेंट होगा!”
मगर, वह, जैसे जानबूझकर किसी और ही का नाम लेता, और मेरे मन में उसके प्रति नफ़रत जागने लगी, मैं पूरे समय पापा से कहता रहा:
 “ये भी क्या! ये तो बकवास है! ये वो नहीं है!”
 पापा मेरी तरफ़ देखे बिना कहते:
“डिस्टर्ब न कर, प्लीज़! ये बहुत मज़ेदार है! सबसे मज़ेदार!”  
मैंने सोचा कि अगर पापा को ये बहुत मज़ेदार लग रहा है, तो इसका मतलब ये हुआ कि उन्हें सर्कस अच्छी तरह से समझ में नहीं आता है. देखते हैं, कि जब वो गेंद वाली लड़की को देखेंग़े, तो क्या कहेंगे. शायद अपनी सीट पे ही दो मीटर ऊँचे उछल पड़ेंगे...
मगर तभी अनाऊन्सर निकला और उसने अपनी गूँगी-बहरी आवाज़ में घोषणा की:
 “इं-ट-र-वल!”
मुझे अपने कानों पर यक़ीन ही नहीं हुआ! इंटरवल? क्यों? दूसरे सेक्शन में तो सिर्फ शेर ही होंगे! और, मेरी गेंद वाली लड़की कहाँ है? कहाँ है वो? वो क्यों नहीं आ रही है? हो सकता है, कि बीमार हो? हो सकता है, कि वह गिर गई हो और उसके दिमाग़ पे चोट लगी हो?
मैंने कहा:
 “पापा, जल्दी से जाकर पता लगाते हैं कि गेंद वाली लड़की कहाँ है!”
पापा ने जवाब दिया:
 “हाँ, हाँ! हाँ, वो तेरी बैलेन्सर कहाँ है? दिखाई नहीं दी! चल, जाकर प्रोग्राम-शीट ख़रीदते हैं!...”
पापा ख़ुश और संतुष्ट थे. उन्होंने चारों ओर नज़र दौड़ाई, मुस्कुराए और बोले:
 “ आह, कितनी अच्छी लगती है सर्कस! ये ख़ुशबू...दिमाग़ चकराने लगता है...”
हम कॉरीडोर में आए. वहाँ लोगों की बेहद भीड़ थी, और चॉकलेट्स, वेफ़र्स बेचे जा रहे थे, दीवारों पर कई तरह के शेरों के थोबड़े लटक रहे थे, हम कुछ देर घूमे और आख़िर में प्रोग्राम-शीट्स बेचने वाली कंट्रोलर हमें मिल ही गई. पापा ने उससे एक प्रोग्राम-शीट ख़रीदी और देखने लगे. मुझसे रहा न गया और मैंने कंट्रोलर से पूछा:
 “प्लीज़, बताइए कि गेंद वाली लड़की का प्रोग्राम कब है?”
 “कौन सी लड़की का ?”
पापा ने कहा:
”प्रोग्राम में गेंद पर दिखाई गई है बैलेन्सर टी. वोरोन्त्सोवा. वो कहाँ है?”
मैं चुपचाप खड़ा था. कंट्रोलर ने कहा:
 “आह, आप तानेच्का वोरोन्त्सोवा के बारे में पूछ रहे हैं? वो चली गई. चली गई. आपने बड़ी देर कर दी?”
मैं चुपचाप खड़ा था.
पापा ने कहा:
 “हमें दो हफ़्तों से चैन नहीं है. बैलेन्सर तानेच्का वोरोन्त्सोवा को देखना चाहते हैं, और वो नहीं है.” 
 कंट्रोलर बोली:
हाँ, वो चली गई...अपने माँ-बाप के साथ...उसके माँ-बाप हैं “कॉपरमैन – दि टू-एवर्स” (एवर्स इन कलाकारों का उपनाम है. दि टू एवर्स से तात्पर्य है एवर्स अण्ड एवर्स. ये लोग बदन पर तांबे के रंग का पेंट पोत लिया करते थे, इस कारण उन्हें ‘कॉपरमैन’ कहा जाता था – अनु.)
 . शायद आपने सुना हो? बेहद अफ़सोस हुआ. कल ही गए हैं.”
मैंने कहा:
 “देखो, पापा...”
 “मुझे नहीं मालूम था, कि वो चली जाएगी. कितने अफ़सोस की बात है...ओह, तू, माय गॉड!...फिर,     क्या...कुछ नहीं कर सकते...”
मैंने कंट्रोलर से पूछा:
 “मतलब, पक्का, चली गई?
उसने कहा:
 “पक्का.”
 “पता है, कि कहाँ गई?”
उसने कहा:
“व्लादीवोस्तोक.”
ओह, कित्ती दूर. व्लादीवोस्तोक. मुझे मालूम है कि व्लादीवोस्तोक नक्शे के बिल्कुल आख़िरी छोर पे है, मॉस्को से दाईं ओर.
मैंने कहा:
 “कित्ती दूर!”
कंट्रोलर अचानक जल्दी करने लगी:
 “जाइए, जाइए, अपनी जगह पे जाइए, लाइट बुझा रहे हैं! पापा ने कहा:
 “चल, डेनिस्का! अब आएँगे शेर! झबरे, दहाडेंगे – भयानक! चल, भागें!”
मैंने कहा:
 “पापा घर जाएँगे.”
उन्होंने कहा:
 “एक बार...”
कंट्रोलर मुस्कुराने लगी. मगर हम क्लोक-रूम की ओर चल पड़े, मैंने नंबर निकाला, और हमने अपने कोट पहने और सर्कस से निकल गए. हम ‘बुलवार’ पे चल रहे थे और बड़ी देर तक चलते रहे, फिर मैंने कहा:
 “व्लादीवोस्तोक – नक्शे के बिल्कुल आख़िर में है. अगर रेल से जाओ, तो वहाँ पहुँचने में पूरा महीना लग जाएगा...”
पापा चुप रहे. उन्हें, ज़ाहिर है, मुझसे कोई मतलब नहीं था. हम कुछ देर और चले, और मुझे अचानक हवाई जहाज़ों की याद आई और मैंने कहा:
 “मगर TU-104 से तीन घंटे में पहुँच जाएँगे!”
मगर पापा ने अभी भी कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने मेरा हाथ कसके पकड़ा था. जब हम गोर्की स्ट्रीट पर आए तो उन्होंने कहा:
 “कॅफ़े-आईस्क्रीम में जाएँगे. दो स्कूप्स खाएँगे, हाँ?”
मैंने कहा:
 “न जाने क्यों, दिल नहीं चाह रहा, पापा.”
 “वहाँ पानी भी मिलता है, उसे कहते हैं “काख़ेतिन्स्काया”. दुनिया भर में इससे अच्छा पानी नहीं पिया.”
 मैंने कहा:
 “दिल नहीं चाहता, पापा.”
उन्होंने मुझे मनाया नहीं. उन्होंने रफ़्तार तेज़ कर दी और मेरा हाथ कसके पकड़ लिया. मेरा हाथ दर्द भी करने लगा. वो बेहद तेज़ चल रहे थे, और मैं मुश्किल से उनके साथ चल पा रहा था. वो इतनी तेज़ क्यों चल रहे थे? वो मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे थे? मैं उनका चेहरा देखना चाहता था. मैंने सिर उठाया. उनका चेहरा बहुत गंभीर और दुखी था.


    

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बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

Bees Saal Palang ke Neeche

बीस साल पलंग के नीचे

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


 वो सर्दियों की शाम मैं कभी नहीं भूलूँगा. कम्पाऊण्ड में ठण्ड थी, तेज़ हवा चल रही थी, वो गालों को, जैसे चाकू से चीर रही थी, बर्फ खूब तेज़ी से गोल गोल घूम रहा थी. बहुत उदास और ‘बोरिंग’ लग रहा था, बिसूरने को जी कर रहा था, और ऊपर से पापा और मम्मा पिक्चर देखने चले गए थे. तो, जब मीश्का ने फ़ोन करके मुझे अपने घर बुलाया, तो मैं फ़ौरन कपड़े पहनकर उसके घर चला गया. वहाँ ख़ूब उजाला था और गर्माहट थी और काफ़ी सारे लोग आए थे.

अल्योन्का आई, उसके पीछे पीछे कोस्तिक और अन्द्र्यूशा आए. हम सभी तरह के खेल खेल रहे थे, और ख़ूब शोर हो रहा, ख़ुशी हो रही थी. और अंत में अल्योन्का ने अचानक कहा:
 “और अब, छुपन-छुपैया खेलते हैं! चलो, छुपन-छुपैया खेलें!”

हम छुपन-छुपैया खेलने लगे. ये बहुत बढ़िया था, क्योंकि मैं और मीश्का पूरे समय इस तरह से ट्रिक चलते रहे, कि ढूँढ़ने का काम छोटे बच्चों पर पड़े : कोस्तिक पे या अल्योन्का पे, और हम ख़ुद छुपते रहे और छुटकों की नाक में दम करते रहे. मगर हमारे सारे खेल सिर्फ मीश्का के कमरे में ही हो रहे थे, और जल्दी ही हम इससे ‘बोर’ हो गए, क्योंकि कमरा बहुत छोटा था, तंग था और हमें या तो परदे के पीछे, या अलमारी के पीछे या सन्दूक के पीछे ही छुपना पड़ रहा था, और अंत में हम चुपके से मीश्का के कमरे से छिटक कर बड़े, लम्बे कॉरीडोर में खेलने लगे.

कॉरीडोर में खेलने में ज़्यादा मज़ा आ रहा था, क्योंकि हर दरवाज़े के पास हैंगर-स्टैण्ड थे, जिनमें ओवरकोट और फ़र-कोट लटक रहे थे. ये हमारे लिए काफ़ी अच्छा था, क्योंकि, जैसे, अगर कोई हमें ढूँढ़ने आ रहा है, तो वह फ़ौरन तो अंदाज़ नहीं लगा पायेगा कि मैं मारिया सिम्योनोव्ना के ओवरकोट के पीछे छुपा हूँ और फ़र-कोट के नीचे रखे लम्बे बूट्स में घुस गया हूँ.           

जब कोस्तिक पे ढूँढ़ने की बारी आई, तो वह दीवार की तरफ़ मुँह करके खड़ा हो गया और ज़ोर से चिल्लाने लगा:
 “एक! दो! तीन! चार! पाँच! पहुँचा मैं तुम्हारे पास!”
अब सब बच्चे छुपने के लिए अलग-अलग दिशाओं में भागे, कोई कहीं, तो कहीं. कोस्तिक ने कुछ देर इंतज़ार किया और फिर से चिल्लाया:
 “एक! दो! तीन! चार! पाँच! पहुँचा मैं तुम्हारे पास! दूसरी बार!”
ये दूसरा सिग्नल समझा जाता था. मीश्का फ़ौरन खिड़की की सिल पे चढ़ गया, अल्योन्का – अलमारी के पीछे, और मैं और अन्द्र्यूश्का कॉरीडोर में भागे. अन्द्र्यूश्का ज़्यादा कुछ सोचे बगैर मारिया सिम्योनोव्ना के फ़र-कोट के अन्दर घुस गया, जहाँ मैं हमेशा छुपता था, और पता चला कि अब मेरे पास छुपने के लिए कोई जगह ही नहीं बची! मैं अन्द्र्यूश्का को एक चांटा मारने ही वाला था, कि मेरी जगह छोड़ दे, मगर तभी कोस्तिक ने तीसरा सिग्नल भी दे दिया:
 “छुपे, ना छुपे, चला मैं आँगन से!”
मैं डर गया, कि वो मुझे अभ्भी देख लेगा, क्योंकि मैं छुपा ही नहीं था, और मैं घायल ख़रगोश की तरह कॉरीडोर में इधर उधर भागने लगा. तभी मैंने एक खुला हुआ दरवाज़ा देखा और मैं फ़ौरन उछल कर उसके भीतर चला गया.
ये कोई एक कमरा था, और उसमें सामने ही, दीवार के पास, एक पलंग रखा था, ऊँचा और चौड़ा, तो, मैं फ़ौरन इस पलंग के नीचे घुस गया. वहाँ थोड़ा अंधेरा था और कई सारी चीज़ें पड़ी थीं, मैं ग़ौर से उन्हें देखने लगा. पहली बात, इस पलंग के नीचे अलग-अलग फ़ैशन के कई सारे औरतों के जूते थे, मगर वे सब काफ़ी पुराने थे, लकड़ी की एक चिकनी सूटकेस भी थी, और सूटकेस के ऊपर एल्युमिनियम का एक बेसिन उल्टा रखा था, मैं बड़े आराम से एडजस्ट हो गया: सिर को एल्युमिनियम के बर्तन पे, कमर के नीचे सूटकेस – बहुत हलका और आरामदेह था. मैं अलग-अलग तरह के स्लीपर्स और चप्पलें देख रहा था, और सोच रहा था, कि मैं कितनी अच्छी तरह से छुपा था और कितना मज़ा आयेगा, जब कोस्तिक मुझे यहाँ ढूँढ़ेगा.            
मैंने कंबल का किनारा ज़रा सा हटाया, जो पलंग के चारों ओर से फ़र्श तक लटक रहा था, और जिसने पूरे कमरे को मुझसे छुपा रखा था: मैं दरवाज़े की ओर देखना चाह रहा था, जिससे ये देख सकूँ कि कैसे कोस्तिक भीतर आकर मुझे ढूँढ़ता है. मगर कमरे में कोई कोस्तिक-वोस्तिक नहीं, बल्कि एफ़्रोसीन्या पेत्रोव्ना आई, ये थी तो प्यारी सी बूढ़ी औरत, मगर कुछ-कुछ बाबा इगा (रूसी लोक कथाओं की जादूगरनी) जैसी थी.
वह तौलिए से हाथ पोंछती हुई आई.
मैं पूरे समय ख़ामोशी से उसकी तरफ़ देख रहा था, सोच रहा था, कि जब कोस्तिक मुझे पलंग के नीचे से खींचकर निकालेगा, तो वह कितनी ख़ुश हो जाएगी. मैं भी हँसाने के लिए उसका कोई जूता दाँतों में पकड़ लूँगा, तब तो वह हँसते हँसते गिर ही पड़ेगी. मुझे यक़ीन था कि बस एक-दो सेकण्ड बाद ही कोस्तिक मुझे ज़रूर ढूँढ़ लेगा. इसलिए मैं अपने आप ही हँस रहा था, बिना आवाज़ किए.
मेरा मूड बेहद अच्छा था. मैं पूरे समय एफ़्रोसीन्या पेत्रोव्ना को देखे जा रहा था. इस बीच वो बड़े आराम से दरवाज़े की ओर गई और यूँ ही उसे ज़ोर से बन्द कर दिया. इसके बाद, देखता क्या हूँ, कि चाभी घुमा दी – और बस, काम तमाम! अन्दर बन्द हो गई. उसने सारी दुनिया से अपने आप को बन्द कर लिया! मेरे समेत और एल्यूमिनियम के बर्तन समेत. चाभी दो बार घुमा दी.
कमरे में अचानक अजीब सी ख़ामोशी और वहशत सी छा गई. मगर मैंने सोचा कि उसने कुछ ही देर के लिए दरवाज़ा बन्द किया है, एक मिनट को, और अभी खोल देगी और सब ठीक हो जाएगा, और फिर से होगी हँसी और ख़ुशी, और कोस्तिक अपने आप को बड़ा ख़ुशनसीब समझेगा कि ऐसी मुश्किल जगह पे भी उसने मुझे ढूँढ़ लिया! इसलिए, मैं हालाँकि थोड़ा सा नर्वस ज़रूर हुआ था, मगर मैं एफ्रोसीन्या पेत्रोव्ना को देखता रहा, कि आगे वह क्या करती है.
वो पलंग पे बैठ गई, और मेरे ऊपर स्प्रिंग्स चरमरा उठे, और गाना गाने लगे, मुझे उसके पैर नज़र आ रहे थे. उसने एक के बाद दूसरा जूता उतार दिया और सिर्फ मोज़ों में दरवाज़े तक गई, मेरा दिल ख़ुशी से उछलने लगा.
मुझे यक़ीन था कि अब वो ताला खोलेगी, मगर ये बात नहीं थी. सोचिए, उसने – खट्! – और लाइट बन्द कर दिया. मैंने फिर से स्प्रिंग्स को अपने सिर के ऊपर बिसूरते हुए सुना, चारों ओर घुप अंधेरा था, और एफ्रोसीन्या पेत्रोव्ना अपने पलंग पे लेटी है, और उसे ये नहीं मालूम है, कि मैं भी यहाँ हूँ, पलंग के नीचे. मैं समझ गया, कि बुरी तरह फँस गया हूँ, मैं अब क़ैद में हूँ, जाल में फँस गया हूँ.
मैं कितनी देर यहाँ पड़ा रहूँगा? अगर एक या दो घण्टे भी पड़ा रहूँ तो ख़ुशी की बात होगी! मगर, यदि सुबह तक रहना पड़ा तो? और, सुबह भी बाहर कैसे निकलूँ? और, अगर मैं घर नहीं पहुँचा, तो पापा और मम्मा ज़रूर मिलिशिया में शिकायत कर देंगे. मिलिशियामैन आएगा खोजी-कुत्ते के साथ. उसका नाम मुख़्तार है.
और, अगर हमारे मिलिशिया में कुत्ते ही न हुए तो? और, अगर मिलिशिया मुझे न ढूँढ़ पाई तो? और, अगर एफ्रोसीन्या पेत्रोव्ना सुबह तक सोती रही तो, और सुबह अपने फ़ेवरेट स्क्वेयर पे बैठने के लिए गई और जाते जाते मुझे बन्द कर गई तो? तब कैसे? मैं, बेशक, उसकी अलमारी से कुछ निकाल कर खा लूँगा, और, जब वो वापस आएगी, तो मुझे फिर पलंग के नीचे जाना पड़ेगा, क्योंकि मैं उसकी चीज़ें खा चुका होऊँगा, और वह मुझे क़ानून के हवाले कर देगी! और, इसलिए, शर्मिन्दगी से बचने के लिए क्या मैं हमेशा उसके पलंग के नीचे पड़ा रहूँगा? ये सबसे बड़ी मुसीबत होगी! बेशक, इसमें कुछ अच्छी बात भी है, कि मैं स्कूल का पूरा जीवन पलंग के नीचे बिता दूँगा, मगर सर्टिफ़िकेट कैसे मिलेगा, ये प्रॉब्लेम है. सर्टिफ़िकेट – बड़े हो जाने का! पलंग के नीचे बीस साल बिताकर मैं बड़ा तो नहीं हो जाऊँगा, मैं बूढ़ा ही हो जाऊँगा.     
 अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ और मैं गुस्से में उस बेसिन पर घूँसे बरसाने लगा, जिस पर मेरा सिर था! भयानक आवाज़ हुई! इस डरावनी ख़ामोशी में, घुप अंधेरे में और मेरी परेशान हालत में मुझे ये आवाज़ बीस गुना डरावनी प्रतीत हुई. उस आवाज़ से मैं जैसे बहरा हो गया.
डर के मारे मेरा दिल जम गया. और मेरे ऊपर, इस भयानक आवाज़ से, एफ़्रोसीन्या पेत्रोव्ना जाग गई. शायद वह काफ़ी देर से गहरी नींद में थी, और अचानक ये – पलंग के नीचे से – ताख़-ताख़...! वह कुछ देर पड़ी रही, फिर गहरी साँस लेकर कमज़ोर और डरी हुई आवाज़ में अंधेरे से पूछने लगी:
 “चौ-की-दा-र?!”        
मैं उससे कहना चाहता था: “क्या आप भी, एफ़्रोसीन्या पेत्रोव्ना, यहाँ कहाँ से आया ‘चौकीदार’ ? सो जाइए, ये मैं हूँ, डेनिस्का!” मैं उससे ये सब कहना चाहता था, मगर इसके बदले पूरी ताक़त से छींक पड़ा:
 “आप्छी! छी:! छी:! छी:!...”
शायद, इस सब करामात से पलंग के नीचे धूल ऊपर उठी होगी, मगर मेरी छींक से एफ्रोसीन्या पेत्रोव्ना को यक़ीन हो गया कि पलंग के नीचे कोई भयानक बात हो रही है, वह बेहद डर गई और ज़ोर से चिल्लाई:
 “चौकीदार!”
और, मैं न जाने क्यों, फिर से पूरी ताक़त से छींका:
 “आप्छी-ऊ ऊ!”
जैसे ही एफ़्रोसीन्या पेत्रोव्ना ने ये बिसूरने की आवाज़ सुनी, वो और भी धीमी और कमज़ोर आवाज़ में चिल्लाई:
 “चोरी कर रहे हैं!...”
ज़ाहिर है, कि फिर उसने ही सोचा कि अगर चोरी कर रहे हैं, तो ये सिर्फ ग़लत बात है, डरावनी बात नहीं है. और अगर...तो, अब वो ज़ोर से चिल्लाई:
 “मार डालेंगे!”
कितना झूठ बोलती है! कौन उसे मार डालेगा? और किसलिए? और किससे? क्या रात को झूठमूठ चिल्लाना चाहिए? इसलिए मैंने फ़ैसला कर लिया, कि ये सब ख़त्म करने का समय आ गया है, और जब वो सो ही नहीं रही है, मुझे बाहर आ जाना चाहिए.
मेरे नीचे की हर चीज़ गरज रही थी, ख़ासकर बर्तन, क्योंकि अँधेरे में तो मुझे दिखाई नहीं दे रहा था ना. शैतान जैसा शोर हो रहा था, और एफ्रोसीन्या पेत्रोव्ना अजीब तरह से चिल्ला रही थी:
 “चोरीकार! चौकी कर रहे हैं!”
मैं उछल कर बाहर आया, और दीवार टटोलने लगा, कि स्विच कहाँ है, मगर स्विच के बदले मेरा हाथ चाभी पर पड़ा, मैं ख़ुश हो गया कि ये दरवाज़ा है. मैंने चाभी घुमा दी, मगर पता चला कि मैंने अलमारी का दरवाज़ा खोल दिया है, मैं इस दरवाज़े की चौख़ट से गिर गया, और खड़ा होकर चारों ओर भागने की कोशिश करने लगा, सिर्फ सुन रहा था कि कैसे मेरे सिर पे सामान गिर रहा है.
एफ्रोसीन्या पेत्रोव्ना चिंघाड़ रही थी, और मैं डर के मारे गूँगा हो गया, तभी सचमुच के दरवाज़े पर कोई ज़ोर ज़ोर से मारने लगा! “ऐ, डेनिस्का! फ़ौरन बाहर आ जा! एफ्रोसीन्या पेत्रोव्ना! डेनिस्का को वापस दे दो, उसके लिए उसके पापा आए हैं!”
और पापा की आवाज़:
 “प्लीज़, बताइए, क्या मेरा बेटा आपके यहाँ है?”
तभी भक् से लाइट जल उठी. दरवाज़ा खुला. और हमारी पूरी टोली कमरे में घुस गई. वे कमरे में दौड़ने लगे, मुझे ढूँढ़ने लगे, और जब मैं अलमारी से बाहर आया, तो मुझ पर पड़ी थीं दो टोपियाँ और तीन ओवरकोट.
पापा ने कहा:
 “तेरे साथ क्या हुआ था? तू कहाँ खो गया था?”
कोस्तिक और मीश्का ने भी कहा:
 “तू कहाँ था, तेरे साथ क्या एडवेन्चर हुआ? बता!”
मगर मैं ख़ामोश रहा. मुझे ऐसा लग रहा था, कि मैं वाक़ई में बीस साल पलंग के नीचे बैठकर आया हूँ.

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रविवार, 7 फ़रवरी 2016

Khushaboo aasman ki aur tamakoo ki


ख़ुशबू आसमान की और तमाकू की

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

अगर अब इस बारे में सोचूँ, तो लगता है कि कितना डरावना था: मैं अभी तक एक भी बार हवाई जहाज़ में नहीं उड़ा था. ये सच है, कि एक बार मैं बस हवाई जहाज़ का सफ़र करते-करते रह गया, बात बनी नहीं. प्लान गड़बड़ हो गया. ट्रेजेडी. और ये अभी हाल ही में हुआ था. मैं, अब छोटा तो नहीं हूँ, हाँलाकि ये भी नहीं कह सकते कि बड़ा हूँ. उस समय मम्मा को छुट्टियाँ थीं, और हम एक बड़े ‘सामूहिक फ़ार्म’ में उसके रिश्तेदारों के यहाँ गए थे. वहाँ बहुत सारे ट्रैक्टर्स और घास काटने वाली मशीनें थीं. मगर ख़ास बात ये थी, कि वहाँ जानवर भी थे: घोड़े, चूज़े और कुत्ते. और काफ़ी सारे लड़कों की हँसती-खेलती टोली थी. सब सफ़ेद बालों वाले और बेहद मिलनसार.

रात को जब मैं छोटे से कैबिन में सोता, तो दूर से हार्मोनियम की आवाज़ आती, ऐसा लगता कि कोई दुखभरी धुन बजा रहे हों, और इस आवाज़ को सुनते हुए मैं फ़ौरन सो जाता.

इस सामूहिक फ़ार्म में मैं सबसे प्यार करने लगा, और ख़ास तौर पे लड़कों से, और मैंने फ़ैसला कर लिया कि पहले मैं चालीस साल का होने तक यहाँ रहूँगा, और बाद में सोचा जाएगा. मगर, अचानक स्टॉप, कार! नमस्ते! मम्मा ने कहा कि छुट्टियाँ तो जैसे एक पल में ख़तम हो गईं और हमें फ़ौरन घर जाना चाहिए. उसने दादा वाल्या से पूछा:

 “शाम की ट्रेन कितने बजे जाती है?”
उसने कहा:
 “तू ट्रेन में क्यों परेशान होती है? हवाई जहाज़ से चली जा! एअरपोर्ट तो सिर्फ तीन मील दूर है. बस, एक मिनट में डेनिस के साथ मॉस्को पहुँच जाएगी!”

हूँ, तो दादा वाल्या – गोल्डन मैन है! बेहद भला. एक बार उन्होंने मुझे आसमानी-गाय प्रेज़ेंट दी थी. इसके लिए मैं उन्हें कभी नहीं भूलूँग़ा. और इस समय भी. जब उन्होंने देखा कि मैं कितनी बेताबी से हवाई जहाज़ में उड़ना चाहता हूँ, तो उन्होंने दो मिनट में मम्मा को मना लिया, और वो भी, न चाहते हुए भी, तैयार हो गई.

दादा वाल्या ने ये सोचकर कि बेकार में ही ट्रक को क्यों दौड़ाया जाए, घोड़े को गाड़ी में जोता, हमारी भारी सूटकेस घास पे रखी, और हम गाड़ी में बैठकर चल पड़े. पता नहीं, कैसे बताऊँ, कि कितना बढ़िया लग रहा था गाड़ी में जाना, उसकी चरमराहट को सुनना, और चारों ओर से आ रही खेतों की, डामर की और तमाकू की ख़ुशबू महसूस करना. मैं ख़ुश था कि कुछ ही देर में उड़ने वाला हूँ, क्योंकि एक बार मीश्का कम्पाऊण्ड में बता रहा था, कि कैसे वो पपा के साथ त्बिलिसी गया था, हवाई जहाज़ में, कि उनका हवाई जहाज़ कित्ता बड़ा था, तीन कमरों वाला, और कैसे उन्हें जितनी चाहो, उतनी चॉकलेट्स दी गई थीं, और ब्रेकफ़ास्ट में पॉलिथीन की छोटी सी बैग में पैक सॉसेज दिए गए थे और ट्रे वाली छोटी सी मेज़ पर चाय दी गई थी.

ख़यालों में मैं इतना खो गया कि पता ही नहीं चला, कब अचानक हमारी घोड़ा-गाड़ी क्रिसमस-ट्री की टहनियों से सजाए गए लकड़ी के ऊँचे गेट में घुसी. टहनियाँ पुरानी थीं, वे पीली होने लगी थीं. इस गेट के पीछे भी खेत थे, सिर्फ घास हरी-हरी नहीं, बल्कि सूखी, बदरंग थी. कुछ दूर, हमारे बिल्कुल सामने एक छोटी सी बिल्डिंग थी. दादा-वाल्या उसके पास गया. मैंने कहा:
 “हम यहाँ क्यों आए हैं? हिचकोले खा-खा के मैं ‘बोर’ हो गया हूँ. जल्दी से एअरपोर्ट जाएँगे.”
दादा वाल्या ने कहा:
 “तो फ़िर ये क्या है? ये ही तो एअरपोर्ट है...क्या तुझे दिखाई नहीं दे रहा है?”
मेरा दिल डूब गया. ये सूखा-सट् खेत – एअरपोर्ट है? क्या बेवकूफ़ी है! ख़ूबसूरती कहाँ है? ज़रा भी ख़ूबसूरती नहीं है! मैंने कहा:
 “और हवाई जहाज़?”
 “इस टर्मिनल में जाएँगे,” उन्होंने हाथ से बिल्डिंग की ओर इशारा किया, “इसे पार करके दूसरे गेट से बाहर निकलेंगे, वहीं हवाई जहाज़ होंगे...क्या चारा खिलाऊँ?...”   
और उन्होंने हमारे घोड़े के सिर पे जई के दानों वाली थैली बांध दी, और वो खाने लगा.

हम इस बिल्डिंग में गए. वहाँ बहुत घुटन थी और कैबेज-सूप की गंध आ रही थी. पहले कमरे में लोग बैठे थे. एक दद्दू थे हाथ में व्हील वाली छड़ी लिए, एक बोरे वाली दादी थी. उसके बोरे में कोई साँस ले रहा था – शायद सुअर का पिल्ला हो. एक औरत थी गुलाबी कमीज़ वाले दो छोटे बच्चों और एक दूध पीते नन्हे के साथ. उसने नन्हे को तौलियों में इतना कस के लपेटा था, और वो बिल्कुल केटरपिलर (इल्ली) जैसा लग रहा था, क्योंकि पूरे समय कुलबुला रहा था.

वहीं पर अख़बार का स्टाल था. दादा वाल्या ने हमारी भारी सूटकेस मम्मा के पास रख दी और स्टाल की ओर चल पड़ा. मैं भी उसके पीछे-पीछे गया.

मगर स्टाल काम नहीं कर रहा था.
काँच पे एक कागज़ लगा था, और उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
 “20 मिनट बाद आऊँगा.”
मैंने इसे ज़ोर से पढ़ा. व्हील वाले दद्दू ने कहा:
 “देखिए – ये पढ़ रहा है!”
और सब लोग मेरी ओर देखने लगे. और मैंने कहा:
 “और सिर्फ छह साल का है.”
सब लोग हँसने लगे. दादा वाल्या, जब हँसते थे तो अपने सारे दाँत दिखाते थे. उनके दाँत बड़े मज़ेदार थे: एक ऊपर – दाईं ओर, और दूसरा – नीचे बाईं ओर. दादा बड़ी देर तक हँसते रहे. इसी समय एक मोटे नौजवान ने कमरे में झाँका. उसने कहा:
 “मॉस्को कौन जा रहा है?”
 “हम”, सभी एक सुर में चिल्लाए और जल्दबाज़ी मचाने लगे. “मॉस्को – हम!”
 “मेरे पीछे आइए,” नौजवान ने कहा और चल पड़ा.

सब उसके पीछे हो लिए. हम लम्बे कॉरीडोर को पार करके बिल्डिंग की दूसरी तरफ़ आए. वहाँ एक खुला हुआ दरवाज़ा था. उससे नीला आसमान दिखाई दे रहा था. दरवाज़े के सामने दो पहलवान खड़े थे – हट्टेकट्टे अंकल, जैसे सर्कस वाले फ़ाईटर्स हों. एक की दाढ़ी काली थी, और दूसरे की – लाल. उनके पास थी वज़न नापने की मशीन. जब हमारी बारी आई, तो दादा वाल्या ने “ऊँ..” करते हुए भारी सूटकेस काऊंटर पे रख दी. सूटकेस का वज़न किया गया, मम्मा ने पूछा:
 “हवाई जहाज़ कितनी दूर है?”
 “क़रीब चार सौ मीटर्स,” लाल पहलवान ने कहा.
 “पाँच सौ भी हो सकता है,” काले ने कहा.
 “सूटकेस ले जाने में मदद कीजिए, प्लीज़,” मम्मा ने कहा.
 “हमारे यहाँ ‘सेल्फ-सर्विस’ है,” लाल वाले ने कहा.

दादा वाल्या ने मम्मा की ओर देखकर आँख मिचकाई, वो खाँसा, सूटकेस उठाई, और हम खुले दरवाज़े से बाहर निकले. दूर कोई एक नन्हा सा जहाज़ खड़ा था, ड्रैगनफ्लाइ जैसा, बस वो सारस जैसी टाँगों पर खड़ा था. हमारे आगे-आगे सारे परिचित चल रहे थे: व्हील, सुअर के पिल्ले वाला बोरा, गुलाबी कमीज़ें, केटरपिलर. जल्दी ही हम हवाई जहाज़ तक पहुँच गए. नज़दीक से तो वह और भी छोटा नज़र आ रहा था. सब उसमें घुसने लगे, और मम्मा ने कहा:
 “वाह, वाह! ये क्या रूसी हवाई जहाज़ों का दादा है?”
 “ले-देकर ये प्रदेश में जाने-आने वाला आंतरिक जहाज़ है,” हमारे दादा वाल्या ने कहा. “बेशक, TU-104 नहीं है! क्या कर सकते हैं. आख़िर उड़ता तो है! एअरोफ्लोत है.”
 “अच्छा?” मम्मा ने पूछा. “क्या ये उड़ता है? बड़ी प्यारी बात है! ये उड़ता भी है? ओह, बेकार ही में हम ट्रेन से नहीं गए! मुझे तो इस उड़ने वाली चिड़िया पर भरोसा ही नहीं है. जैसे कोई मध्ययुगीन चीज़ हो...”
 “एअरलाइनर नहीं है, बेशक!” दादा वाल्या ने कहा. “झूठ नहीं बोलूँगा. लाइनर नहीं है, गॉड सेव! क्या करें!” 

और, वो मम्मा से बिदा लेने लगे, और फिर मुझसे. उन्होंने हौले से मेरे गाल को अपनी नीली दाढ़ी से छुआ, और मुझे अच्छा लगा, कि उसमें से तमाकू की ख़ुशबू आ रही है, फिर मैं और मम्मा हवाई जहाज़ में चढ़ गए. हवाई जहाज़ के अन्दर, दीवारों से सटी हुईं दो लम्बी बेंचें थीं. पायलेट भी दिखाई दे रहा था, उसके लिए कोई कैबिन नहीं था, सिर्फ एक हल्का सा दरवाज़ा था, वो खुला था. जब मैं हवाई जहाज़ के भीतर आया तो उसने मुझे देखकर हाथ हिलाया.

इससे मेरा मूड एकदम अच्छा हो गया, और मैं आराम से बैठ गया – पैर सूटकेस पे रखके.

मुसाफ़िर एक दूसरे के सामने बैठे थे. मेरे सामने गुलाबी कमीज़ें बैठी थीं. पायलेट कभी इंजिन चालू करता, कभी बन्द करता.

सारी बातों की ओर देखते हुए ऐसा लग रहा था, कि बस, अभ्भी उड़ने वाले हैं. मैंने बेंच को पकड़ना भी शुरू कर दिया, मगर तभी हवाई जहाज़ की तरफ़ एक लॉरी आई, जिसमें ठसाठस लोहे का सामान भरा था. लॉरी से दो आदमी उछल कर बाहर आए. उन्होंने पायलेट से चिल्लाकर कुछ कहा. अपनी गाड़ी का बोर्ड निकाला, हमारे लाइनर के ठीक दरवाज़े पे आए और सीधे हवाई जहाज़ में अपनी लोहे की भारी भरकम चीज़ें चढ़ाने लगे.

जब लॉरी वाले ने अपना पहला सामान हवाई जहाज़ की पूँछ में फेंका, तो पायलेट ने देखा और कहा: “वहाँ धीरे से फ़ेंको. क्या फर्श तोड़ने का इरादा है?”
मगर लॉरी वाले ने कहा:
”घबराओ नहीं!”
तभी उसका साथी अगला डला लाया और फिर:
 “ब्र्याक!”
पहले वाला एक और लाया:
 “श्वार्क!”
एक और:
 “बूत्स!”
फिर और:
 “ज़िन!”
पायलेट कहता है:
 “ऐ, लोगों! सब कुछ पूँछ में मत फेंको. वर्ना तो मैं हवा में कुँलाटें लगाने लगूँगा.
पूँछ के बल कुँलाटें – और, शाबाश.”
लॉरी वाला बोला:
 “डरो नहीं!”
और फिर से:
”बाम्स!”
”ग्ल्यान्त्स!”
पायलेट बोला:
 “क्या अभी बहुत है?”
 “क़रीब डेढ़ टन,” लॉरी वाले ने जवाब दिया.

अब हमारे पायलेट को गुस्सा आ गया और उसने दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया.
 “तुम क्या कर रहे हो?” वो चिल्लाया. पागल हो गए हो क्या! आप समझ रहे हैं, कि मैं टेक-ऑफ़ नहीं कर पाऊँगा? आँ?!”
मगर लॉरी वाले ने फिर कहा:
 “डरो नहीं!”
और फिर से:
“ब्रूम्स!”
“ब्राम्स!”
इस सबसे हमारे हवाई जहाज़ में बेचैन सी ख़ामोशी छा गई.
मम्मा का चेहरा फ़क् हो गया, और मेरे पेट में गुड़गुड़ होने लगी.
और तभी:
 “ब्राम्स!”
पायलेट ने अपनी टोपी उतार दी और चीख़ा:
 “मैं तुमसे आख़िरी बार कह रहा हूँ – अब और लादना बन्द करो! मेरी इंजिन टूट जाएगा! लो, सुनो!”
और उसने इंजिन चालू किया. पहले हमने एक सी आवाज़ सुनी: त्रर् र् र् र् र् .......फिर न जाने कहाँ से: चाव-चाव-चाव-चाव...
और फिर एकदम: ख्लूप-ख्लूप-ख्लूप...
फिर अचानक: स्युप-स्युप-स्युप.....पीइ- पीइ-! पीइ...
पायलेट बोला:
 “तो, ऐसे इंजिन के होते हुए क्या ज़्यादा वज़न लादा जा सकता है?”
लॉरी वाले ने जवाब दिया:
 “डरो नहीं! ये हम सेर्गाचेव के हुक्म से लाद रहे हैं. सेर्गाचेव ने हुक्म दिया, और हम लाद रहे हैं.”
हमारे पायलेट ने बुरा मुँह बनाया और चुप हो गया. मम्मा पीली पड़ गई, और बूढ़ी औरत का सुअर का पिल्ला अचानक चिंघाड़ने लगा, मानो समझ गया हो कि मामला बुरा है. मगर लॉरी वाले लगातार अपना ही काम किए जा रहे थे:
 “त्रूख!”
 “त्रूख!”
मगर पायलेट ने विद्रोह कर दिया:
 “आप मुझसे फ़ोर्स्ड-लैण्डिंग करवाएँगे! पिछली गर्मियों में भी दस किलोमीटर्स दूर कोश्किनो तक भी खींच नहीं पाया था. मुझे खेत में लैण्ड करना पड़ा था! ये ख़ूब है, आपके ख़याल से क्या पैसेंजर्स को दस मील पैदल दौड़ाऊँ?”
 “डर का माहौल मत पैदा करो!” लॉरी वाले ने कहा. “चला जायेगा!”
”आपसे ज़्यादा अच्छी तरह मैं अपने जहाज़ को जानता हूँ, कि जा सकता है या नहीं!” पायलेट चिल्लाया. “क्या, मैं पूरे जहाज़ को बरबाद कर दूँ? सेर्गाचेव को इसके लिए सज़ा नहीं होगी, नहीं. मगर मुझे तो जेल हो ही जाएगी!”
 “नहीं होगी,” लॉरी वाले ने कहा. “और अगर बिठा दिया, तो दूसरा ले आऊँगा.”
और, जैसे कुछ हुआ ही न हो:
 “बर्रीन्ज़!”

अब मम्मा खड़ी हो गई और बोली:
 “कॉम्रेड पायलेट! क्या फ़्लाइट शुरू होने तक मेरे पास पाँच मिनट का समय है?”
 “जाइए,” पायलेट ने कहा,” मगर फ़ुर्ती से...और सूटकेस क्यों ले जा रही हैं?”
 “मैं कपड़े बदलना चाहती हूँ,” मम्मा ने बेझिझक कहा, “मुझे बेहद गर्मी लग रही है. गर्मी से मेरा दम निकल जाएगा.”
 “जल्दी ...” पायलेट ने कहा.

मम्मा ने मुझे बगल में पकड़ा और दरवाज़े की ओर लाई. वहाँ लॉरी वाले ने मुझे पकड़ लिया और ज़मीन पर रख दिया. मम्मा मेरे पीछे कूद गई. लॉरी वाले ने उसे सूटकेस थमा दी. और, हालाँकि हमारी मम्मा हमेशा से कमज़ोर है, मगर इस समय उसने हमारी भारी-भरकम सूटकेस को कंधे पर रख लिया और हवाई जहाज़ से दूर जाने लगी. वो टर्मिनल की तरफ़ जाने लगी. मैं उसके पीछे भाग रहा था. पोर्च में दादा वाल्या खड़े थे. जब उन्होंने हमें देखा तो सिर्फ हाथ हिला दिए. शायद, वो फ़ौरन सब कुछ समझ गए, क्योंकि उन्होंने मम्मा से कुछ भी नहीं पूछा. हम सबने जैसे एक राय बना ली थी, चुपचाप इस बेढंगी बिल्डिंग से से दूसरी ओर चलते रहे, हमारी घोड़ा गाड़ी की ओर. हम गाड़ी में बैठ गए और चलने ही वाले थे, कि मैंने मुड़ कर देखा कि एअरपोर्ट से धूल भरे रास्ते पर, सूखी पगडंडी पे हमारी तरफ़ गिरते पड़ते और हाथ फ़ैलाए भागी चली आ रही हैं दोनों गुलाबी कमीज़ें. उनके पीछे अपने कसकर लिपटे कैटरपिलर को सीने से चिपटाए उनकी मम्मा भाग रही थी.  

हमने उन सबको गाड़ी में बिठा लिया. दादा वाल्या ने लगाम खींची, घोड़ा चल पड़ा और मैं पीठ टिकाकर बैठ गया. चारों ओर नीला आसमान था, गाड़ी चरमरा रही थी, और आह, कितनी बढ़िया ख़ुशबू थी खेत की, डामर की और तमाकू की.


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