रविवार, 20 जून 2021

बदलाव के लिये

 

बदलाव के लिये

लेखिका: मरीना द्रुझीनिना

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

पहली कक्षा में पढ़ने वाला स्तासिक पढ़ने में बहुत अच्छा था. मतलब, उसकी डायरी में सिर्फ “पाँच” ही होते थे. (पाँच का मतलब है – सर्वोत्तम; चार – बहुत अच्छा; तीन–अच्छा; दो – बुरा, एक - अनुत्तीर्ण –अनुवादक .) ये बेशक, निहायत बढ़िया बात थी. मगर एक दिन स्तासिक अपनी डायरी के पन्ने पलट रहा था और पलटते-पलटते बोरहोने लगा:

“हर पृष्ठ पर बस एक ही बात! कोई परिवर्तन नहीं! गोश्का ज़ग्लूश्किन को देखो, कौनसा नंबर नहीं है उसकी डायरी में! और मेरे तो बस, पाँच ही पाँच!”

और उसने हरे फ्लोमास्टरसे खाली जगह पर कई सारे “3” बना दिये.

“3” , साफ़-साफ़ कहें तो, बहुत आकर्षक तो नहीं नज़र आ रहे थे – वैसे वे किसे पसंद आ सकते हैं! – मगर अपने पन्ने जैसे चमकदार रंग से उन्होंने पृष्ठ में, बेशक, जान डाल दी थी.

स्तासिक खूब खिलखिलाया और उसने दिल खोलकर वहाँ नीले “4”. नारंगी “2”, कत्थई और गुलाबी “1” बना दिये.

डायरी का पृष्ठ शोख़ी से चमक रहा था, मानो लॉन में खिला हुआ कोई फूल हो. कितना ख़ूबसूरत! स्तासिक को जैसे उससे प्यार हो गया. और अचानक उसे गुस्से भरी आवाज़ सुनाई दी:

“ये तूने अपनी डायरी का क्या कर डाला?” स्तासिक के सामने पापा खड़े थे.

“ये, बस यूँ ही बदलाव के लिये,” स्तासिक ने समझाया.

“मतलब, ‘2’ नंबर वाला बनना चाहता है? और क्या तुझे मालूम है, कि “2” नंबर वालों को सज़ा दी जाती है?” पापा ने स्तासिक को कोने में खड़ा कर दिया और कठोरता से कहा – “ आज कोई मल्टी-फ़िल्म देखने को नहीं मिलेगी! बदलाव के लिये.”

समय बबल-गमकी तरह लम्बा खिंचता जा रहा था. स्तासिक ने सोचते हुए कोने का वॉल-पेपर खुरचा और गहरी सांस ली : “शायद हर बदलाव – अच्छा नहीं होता”. बीस मिनट बाद, जो ख़ुद ‘2 नंबर वालाबन बैठे को बीस घंटों जैसे प्रतीत हुए, पापा ने गंभीरता से पूछा:

“तो कोने में कैसा लग रहा है? हो सकता है, कि अब शायद तू गुण्डा बनना चाहता है, जो पुलिस में भर्ती हो गया है?” पापा ने डरावना चेहरा बनाया,  

“नहीं” स्तासिक मुस्कुराया. “मैं फिर से “5” वाला बढ़िया छात्र और तुम्हारा प्यारा बेटा बनना चाहता हूँ. बिना किसी बदलाव के!” और वह पापा की बाँहों में समा गया.                    

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मंगलवार, 8 जून 2021

Shararati Chooze

 

शरारती चूज़े

लेखक – मरीना द्रुझीनिना

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

म्यूज़िक की क्लास में ग्लफ़ीरा पित्रोव्ना ने कठोरता से कहा:

“बच्चों! आज मैं तुम्हें नये गाने का डिक्टेशन देती हूँ. और आप अच्छी तरह उसे लिख लो, एक भी शब्द मत छोड़ना! तो, शुरू करें! “त्सिप, त्सिप, मेरे चूज़ों...”

इसी समय पेत्का रेद्किन ने व्लादिक गूसेव को गुदगुदी करने की ठान ली. व्लादिक चीखा और उछला. पेत्का खिलखिला रहा था.

“ये क्या कर रहे हो तुम लोग? बदतमीज़!” ग्लफ़ीरा पित्रोव्ना को गुस्सा आ गया. “अच्छी डाँट पिलाऊँगी!” और उसने डिक्टेशन जारी रखा. “त्सिप, त्सिप, मेरी व्हेलों, रूई के फ़ाहों...”

अब व्लादिक गूसेव ने रेद्किन से बदला लेने का फ़ैसला किया. और उसने भी गुदगुदी की. और अब पेत्का चीखा और उछला. ग्लफ़ीरा पित्रोव्ना को और ज़्यादा गुस्सा आया और वह चिल्लाई:

“बिल्कुल बेशरम हो गये हो! हाथ से निकल गये हो! अगर सुधरे नहीं, तो आपका कुछ भी अच्छा नहीं हो सकता! सिर्फ बदमाश और डाकू! अपने बर्ताव पर फ़ौरन ग़ौर करो!”

और वह चूज़ों के बारे में आगे लिखवाने लगी:

 और पेत्का रेद्किन अपने बर्ताव के बारे में सोचता रहा, सोचता रहा और उसने अपने आप को सुधारने का फ़ैसला किया. मतलब, उसने व्लादिक को गुदगुदी करना बंद कर दिया और सीधे उसकी नाक के नीचे से नोटबुक छीन ली. दोनों उस बेचारी नोटबुक को अपनी-अपनी तरफ़ खींचने लगे, और आख़िरकार वह फ़ट गई. और पेत्का और व्लादिक धडाम् से अपनी अपनी कुर्सियों से गिर गये.

अब तो ग्लफ़ीरा पित्रोव्ना के सब्र का बांध टूट गया.

“क्लास से बाहर जाओ!: वह भयानक आवाज़ में चिल्लाई. “और कल ही अपने माँ-बाप को लेकर आओ!”

पेत्का और व्लादिक आज्ञाकारिता से बाहर चले गये. ग्लफ़ीरा पित्रोव्ना को फिर किसी ने परेशान नहीं किया. मगर वह शांत नहीं हो पा रही थी और लगातार दुहरा रही थी:

“सज़ा दूँगी! सज़ा दूंगी शैतान बच्चों को! हमेशा याद रखेंगे!”

आख़िरकार हमने गाना लिख लिया, और ग्लफीरा पित्रोव्ना ने कहा;

“आज रूच्किन बहुत अच्छी तरह बर्ताव कर रहा है. और, शायद, उसने सारे शब्द लिख लिये हैं.”

उसने मेरी नोटबुक ली. और ज़ोर से पढ़ने लगी. और उसका चेहरा धीरे-धीरे लम्बा होने लगा, और आँखें गोल-गोल घूमने लगीं.

“त्सिप, त्सिप, मेरे चूज़ों. अच्छी डाँट पिलाऊँगी! त्सिप, त्सिप, मेरी व्हेलों! बेशरम, कैसा बर्ताव कर रहे हो? आप, रूई के फ़ाहों, बिल्कुल बेशरम हो गये हो! मेरी भावी मुर्गियों! तुम जैसे लोगों से निकलते हैं डाकू और बदमाश! पानी पीने आओ और अपने बर्ताव के बारे में सोचो! तुम्हें दाने दूँगी और पानी दूँगी, और कल ही अपने माँ-बाप को लेकर आना! ऊह, अच्छी सज़ा दूँगी इन शैतानों को! हमेशा याद रखेंगे!”

पूरी क्लास मुँह दबाये रही और फिर ठहाके फूट पड़े.  

मगर ग्लफ़ीरा पित्रोव्ना मुस्कुराई तक नहीं.

“तो..ओ..रूच्किन,” उसने खनखनाती आवाज़ में कहा: “और तू भी बिना माँ-बाप के स्कूल में मत आना. और आज की क्लास के लिये तुझे – दो नंबर. (दो नंबर का अर्थ है – अनुत्तीर्ण).

“...मगर दो नम्बर किसलिये? माँ-बाप को स्कूल में क्यों लाना? मैंने तो वही सब लिखा जो ग्लफ़ीरा पित्रोव्ना कह रही थी! एक भी शब्द नहीं छोडा था!”

 

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शनिवार, 5 जून 2021

Mera Dimaag Kya Sochataa hai

 

मेरा दिमाग़ किस बारे में सोचता है

लेखिका: इरीना पिववारवा

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास  

 

अगर आप सोचते हैं कि मैं पढ़ाई में अच्छी हूँ, तो आप गलत हैं. मैं ठीक-ठाक पढ़ती हूँ. क्यों कि सब समझते हैं कि मैं होशियार हूँ, मगर आलसी हूँ. मुझे पता नहीं कि मैं होशियार हूँ या नहीं हूँ. मगर यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम है कि मैं आलसी नहीं हूँ. मैं तीन घंटे तक होम-वर्क करती हूँ. जैसे, मिसाल के तौर पर, अभी मैं बैठी हूँ और अपनी पूरी सामर्थ्य से सवाल हल करना चाहती हूँ. मगर वह हो ही नहीं रहा है. मैं मम्मा से कहती हूँ:

“मम्मा, मुझसे ये सवाल हल नहीं हो रहा है.”

“आलसीपन मत कर,” मम्मा कहती है. “अच्छी तरह से सोच, और सब ठीक हो जायेगा. सिर्फ अच्छी तरह से सोचना!”

वह काम करने चली जाती है. और मैं अपना सिर दोनों हाथों में पकड़कर उससे कहती हूँ:

सोच, मेरे दिमाग़. अच्छी तरह सोच... “दो आदमी पॉइंट A से पॉइंट B की ओर पैदल चले...” मेरे दिमाग़, तू क्यों नहीं सोच रहा है? अरे, दिमाग़, अरे, सोच, प्लीज़! अरे, तेरा क्या जाता है!

खिड़की के बाहर छोटा सा बादल तैर रहा है. वह हल्का है, पंख की तरह. लो, वह रुक गया. नहीं, तैर रहा है आगे.

दिमाग़, तू क्या सोच रहा है? तुझे शरम नहीं आती!!!! “पॉइंट A से पॉइंट B की ओर दो आदमी पैदल चले” ल्यूस्का भी शायद बाहर आ गई है. वह घूम रही है. अगर वह पहले मेरे पास आती, तो मैं, बेशक, उसे माफ़ कर देती. मगर क्या वह मेरे पास आयेगी, इतनी चिपकू ?!

“पॉइंट A से पॉइंट B की ओर...” नहीं, वह नहीं आयेगी. बल्कि, जब मैं बाहर कम्पाऊण्ड में निकलूँगी, तो वह ल्येना का हाथ पकड़कर उसके साथ फुसफुसाने लगेगी. फिर वह कहेगी, “ल्येना, मेरे घर चल, मेरे पास कोई चीज़ है”. वे चली जायेंगी, फिर खिड़की की सिल पर बैठ जायेंगी और हँसती रहेंगी और बीज कुतरती रहेंगी.

“...पॉइंट A से पॉइंट B की ओर दो आदमी चले पैदल...” और, मैं क्या कर रही हूँ? और तब मैं कोल्या को, पेत्का को और पाव्लिक को बुलाऊँगी क्रिकेट खेलने के लिये. और वह क्या करेगी? आहा, वह रेकॉर्ड चलायेगी “तीन मोटे”. और इतनी ज़ोर से कि कोल्या, पेत्का और पाव्लिक सुनेंगे और भागकर उसके पास जायेंगे, कहेंगे कि वह उन्हें भी सुनने दे. सौ बार सुन चुके हैं फिर भी उनका दिल नहीं भरता! और तब ल्यूस्का खिड़की बंद कर लेगी, और वे सब वहाँ रेकॉर्ड सुनेंगे.

 “...पॉइंट A से पॉइंट...पॉइंट...” और तब मैं सीधे उसकी खिड़की पर कुछ मारूँगी. काँच – झन्! – और उड़ जायेगा. वो भी जान ले!

तो. मैं सोचते-सोचते थक गई हूँ. सोचो या न सोचो – सवाल तो होने वाला नहीं है. ओह, कितना ख़तरनाक सवाल है! चलो, थोड़ी देर घूम लेती हूँ और फिर सोचूँगी.

मैंने अपनी नोटबुक बंद की और खिड़की से बाहर देखा. कम्पाऊण्ड में अकेली ल्यूस्का घूम रही थी. वह लंगडीखेल रही थी. मैं कम्पाऊण्ड में आई और बेंच पर बैठ गई. ल्यूस्का ने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं.

“सिर्योझ्का! वीत्का!” अचानक ल्यूस्का चिल्लाई – चलो, क्रिकेट खेलेंगे!”

कर्मानव भाईयों ने खिड़की से झाँककर देखा.

“हमारा गला ख़राब है,” दोनों भाईयों ने भर्राये गले से कहा. “हमें बाहर निकलने की इजाज़त नहीं है.”

“ल्येना!” ल्यूस्का चिल्लाई. “ल्येना! बाहर आ!”

ल्येना के बदले उसकी दादी ने बाहर देखा और ल्यूस्का को ऊँगली से धमकाया.

“पाव्लिक!” ल्यूस्का चिल्लाई.

खिड़की में कोई भी नहीं आया.

“पे-ए-ए-त्का!” ल्यूस्का और ज़ोर से चीख़ी.

“बच्ची, अरे, तू क्यों इतना चिल्ला रही है?!” छोटी सी खिड़की से किसी का सिर झांका. “बीमार इन्सान को आराम भी नहीं करने देते! चैन नहीं है!” और सिर वापस खिड़की में छुप गया.

ल्यूस्या ने तिरछी नज़र से मेरी ओर देखा और केंकड़े की तरह लाल हो गई. उसने अपनी चोटी खींची. फिर अपनी आस्तीन से धागा निकाला. फिर पेड़ की तरफ़ देखा और बोली:

“ल्यूसा, चल लंगड़ी खेलते हैं”.

“चल!” मैंने कहा.

हम कुछ देर लंगड़ी खेले और मैं घर चली आई अपना सवाल हल करने. जैसे ही मैं मेज़ पर बैटःई, मम्मा आ गई.

“तो, सवाल हल हो गया?”

“नहीं हो रहा है.”

“तू दो घंटे से उस पर अटकी बैठी है! ये सब क्या है! ख़तरनाक! बच्चों को इतने मुश्किल सवाल दे देते हैं! अच्छा, चल, दिखा अपना सवाल! शायद, मैं कर दूँ? मैंने भी इन्स्टीट्यूट ख़त्म की है... तो... “...पॉइंट A से पॉइंट B की ओर दो आदमी चले पैदल...” रुक, रुक, ये सवाल तो मेरी पहचान का है! सुन! तूने ही तो पिछली बार पापा के साथ मिलकर उसे हल किया था! मुझे अच्छी तरह याद है!”

“क्या?” मुझे अचरज हुआ – सच में?...ओय, सही में, ये पैंतालीसवाँ सवाल है, और हमें छियालीसवाँ दिया है.”

अब मम्मा को बेहद गुस्सा आ गया.

“ये बेहद बुरी बात है!” मम्मा ने कहा. – “अनसुनी बात है! ये बदतमीज़ी है! तेरा दिमाग़ कहाँ है?! वह किस बारे में सोचता है?!”

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शुक्रवार, 7 मई 2021

Zindagi Bhar yaad rakhna!

 

ज़िन्दगी भर याद रखना!

लेखक: बरीस अल्माज़व

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

तीसरी कक्षा तक हम अलग अलग स्कूलों में पढ़ते थे : लड़के हमारे – बॉय्ज़ स्कूल में, और लड़कियाँ रास्ते के दूसरी तरफ़ वाले स्कूल में. मगर फ़िर ज़ोरदार अफ़वाहें फैलीं कि ये अलग-अलग शिक्षा बन्द कर दी गई है और अगले शिशिर से लड़के और लड़कियाँ एक साथ ही पढ़ेंगे.

इस बात से सिर्योगा बेहद परेशान हो गया.

“तू समझ रहा है, अगर हमें लड़कियों के स्कूल में भेज देंगे, तो क्या होगा?” उसने मुझसे कहा.

“हमें क्यों भेजेंगे?”

“क्या कह रहा है! पन्द्रह लड़कों को उस स्कूल में, और पन्द्रह लड़कियों को यहाँ. अगर हमें भेजेंगे, तो ये बड़े शर्म की बात होगी!”

मुझे तो इसमें शर्म की कोई बात नहीं दिखाई दी. क्या हमें फ्रॉक पहनायेंगे और रिबन्स बाँधने पर मजबूर करेंगे?! मगर अपने स्कूल से जाने को मेरा मन नहीं था : दो सालों में मुझे उसकी आदत हो गई थी. अगर ब्रेकके दौरान बड़े बच्चे कम तंग करते तो बहुत अच्छा होता. वर्ना तो चौथी या छठी क्लास का पहलवान भागते हुए आता और – ठो!!!!- तुम्हारे माथे पर घूसा जमा देता! कितना अच्छा होता!

“और सोच, अगर हम दोनों में से किसी एक को वहाँ भेजते हैं, और दूसरे को यहाँ रख लेते हैं, तो? मतलब, दोस्ती ख़त्म?!”

ये सुनकर मैं भी परेशान हो गया. मैं और सिर्योगा काफ़ी पुराने दोस्त हैं – किंडर गार्टन से. हम दोनों एक ही बिल्डिंग में रहते हैं, और एक ही मंज़िल पर – एक दूसरे की बगल में ही रहते हैं. और मैं सोच भी नहीं सकता कि हम अलग-अलग स्कूलों में जाएँगे!

“कुछ तो करना होगा!” सिर्योग ने कहा. “टीचर्स के सामने अपने आपको इस तरह से पेश करना होगा, कि वे किसी भी तरह हमसे अलग न होना चाहें!”

और पूरी गर्मियाँ, फुटबॉल खेलने के बदले या नदी पर जाने के बदले हम स्कूल में ही डोलते रहे. खिड़कियों की सिलें रंगने में मदद की...और भी कुछ....सब कुछ तो याद नहीं है...तो खिड़कियों की सिलें रंगीं...पहले हमने कपड़े से उनकी धूल साफ़ की, और बड़ी क्लास वाले बच्चों ने रंग लगाया...हमने भी रंग लगाया...एक बार...मैंने अकेले ने एक पूरी सिल रंग डाली! चौथी क्लास के एक लड़के ने मेरी तारीफ़ भी की. “अरे,” बोला, “तूने तो पेन्टिंग बना दी! ऐवाज़व्स्की!” क्रांति से पूर्व इस नाम का एक आर्टिस्ट था.

सभी ने हमारी तारीफ़ की. इवान लुकिच ने तो, जो श्रमके टीचर थे, साफ़-साफ़ कह दिया:

“आपका बहुत-बहुत धन्यवाद. अब आराम कीजिए. ऐसे कार्यकर्ताओं की हिफ़ाज़त करनी चाहिए!” – और चौथी कक्षा के सारे लड़के, जो खिड़कियों की सिलें रंग रहे थे, उनसे सहमत थे.

और हमने बॉयलॉजी टीचर मारिया सान्ना के लिए एक पूरा डिब्बा भरके मेंढ़कों के अंडे इकट्ठा किए, प्रयोगों के लिए. वह कहती थी:

“काश, तुम मेरे लिए मेंढ़कों के अंडे लाते – माइक्रोस्कोप में देखने के लिए.”

हमें क्या? हमें कोई परेशानी नहीं थी. हमने उसे पूरा डिब्बा भरके अंडे पेश कर दिए.

मतलब, मदद करते रहे.

तो, हमें करीब-करीब पूरा यकीन था, कि हमें लड़कियों के स्कूल में नहीं भेजेंगे. हमारी यहाँ ज़रूरत है!

हम ग़लत नहीं थे! हमें नहीं भेजा गया और वैसे किसी को भी नहीं भेजा गया. सिर्फ हमारी दूसरी क्लास से 3- और 3-बीबना दिए गए. मगर मैं और सिर्योगा 3-में ही रहे. एक साथ. हमारी बैठने की जगहें भी नहीं बदली गईं!

और 1 सितम्बर को वो आईं! मतलब, लड़कियों के स्कूल से – लड़कियाँ. नखरे वाली! रिबन्स वाली! देखने से ही घिन आती थी. और एक – इरीना को तो उसकी दादी क्लास तक लाई. मैंने फ़ौरन उसका नाम रख दिया माल्विना. जैसे “गोल्डन की” में थी, क्योंकि वैसी ही लगती है. वह हमारी बिल्डिंग में रहती है – अभी हाल ही में कहीं से आई है.

उसकी दादी बिल्कुल मुर्गी जैसी परेशान होती रहती है:

“कितनी दूर है तुम्हारा स्कूल! ट्राम के पूरे तीन स्टॉप!”

मगर दूर कहाँ है? स्टॉप तो पास-पास हैं : टिकट-चेकर आता है, आधे कम्पार्टमेन्ट के टिकट भी चेकनहीं कर पाता, कि तुम बाहर निकल जाते हो! वैसे “कमानी” पर भी जा सकते हो. मगर फिर भी दादी हर रोज़ हाथ पकड़कर स्कूल लाती है और स्कूल से वापस भी ले जाती है! देखने से ही अजीब लगता है! ये, तीसरी क्लास में?! अगर दादी उसका हाथ पकड़ कर लाती है, तो वो “पायनियर्स क्लब” में कैसे जाएगी? मैं इस इरीना-माल्विना की ओर ज़रा भी ध्यान नहीं देता था, मगर सिर्योगा तो उसके पीछे पागल था. क्योंकि उसे प्यार हो गया था.

वैसे तो वह मानता नहीं था, मैंने उससे सीधे-सीधे पूछ लिया:

“तू, बेवकूफ़, क्या प्यार करने लगा है?”

मगर वह फ़ौरन चिल्लाने लगा : “कौन? मैं?! मैं क्या, लाल बालों वाला हूँ क्या?”

मतलब, वह प्यार नहीं करता था.

मगर वैसे वाकई में लाल बालों वाला ही था. पहले इतना साफ़-साफ़ पता नहीं चलता था, मगर अब उसने अपनी ज़ुल्फ़ें बढ़ा ली हैं, जिससे इरीना-माल्विना को पसन्द आ जाए. तो फ़ौरन पता चल गया कि वह लाल बालों वाला है.

मुझे तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसके बालों का रंग कैसा है – दोस्त है, और बस, मगर सिर्योगा को अफ़सोस होता था कि उसके बाल – लाल हैं. वह अपने साथ आईना रखने लगा – जिससे धूप के ख़रगोश पकड़ सके (ऐसा उसने मुझसे कहा), मगर पूरे समय इस नन्हे से आईने में देखता रहता. भँवें घुमाता, अपनी सुअर जैसी पलकें फड़फड़ाता और आहें भरता : “तेरा तो सब अच्छा है. तू – सफ़ेद बालों वाला है. मगर मैं ज़िन्दगी भर बदनसीब ही रहूँगा”.  

मगर उसने अपनी लाल लट काटी नहीं.

एक बार हम क्लास में सवालों के जवाब दे रहे थे : आप क्या बनना चाहते हैं और क्यों? हमने “मातृ भाषा” में सभी व्यवसायों के बारे में पढ़ा था. सिर्योगा को बुलाया गया, मगर उसने ना “आ” कहा, ना “ऊ”, कोई आवाज़ भी नहीं निकाली...सोच ही नहीं पाया. मुझसे पूछा गया – मैंने कहा:

“मैं नाविक बनना चाहता हूँ, - दूर-दूर के देशों की सैर करूँगा और अपनी मातृभूमि की समुद्री सीमाओं की रक्षा करूँगा.”   

मुझे “ए” ग्रेड दिया गया.

वैसे तो मैं “जोकर” बनना चाहता हूँ. वो, सर्कस वाला. और जब घर में कोई नहीं होता, तो मैं चुपके-चुपके आईने के सामने प्रैक्टिस करता हूँ, मगर क्लास में तो इस बारे में नहीं बताया जा सकता – सब हँसेंगे. ये भी कहेंगे, “क्या व्यवसाय ढूँढ़ा है! इसलिए मैंने कह दिया “नाविक” और सभी लड़कों ने भी ऐसा ही कहा. कुछ-कुछ बच्चों ने कहा कि वे “पायलेट” बनना चाहते हैं, च्कालव जैसा. मगर साफ़ पता चल रहा था कि वे झूठ बोल रहे हैं. पहली बात, वो क्या बेवकूफ़ हैं?! अगर सब के सब पायलेट बन जाएँगे, या नाविक बन जाएँगे, तो हवाई जहाज़ों और पानी के जहाज़ों की कमी पड़ जाएगी. और दूसरी बात, अचानक, कोई कैसे कह देगा कि उसका क्या सपना है?!

“सपना,” जैसा कि हमारे पड़ोसी, तोल्या अंकल कहते हैं, “ये हरेक का निजी मामला होता है! और, किसी के दिल में झाँकने की कोई ज़रूरत नहीं है!”                  

मगर इरीना-माल्विना उठी, कुछ घबराई और बोली:

“मेरा सबसे प्यारा सपना है – डॉक्टर बनना और लोगों की ज़िन्दगी बचाना!”

साफ़ दिखाई दे रहा था, कि वह झूठ नहीं बोल रही है. सब एकदम ख़ामोश हो गए.

मैं और सिर्योगा हमेशा पैदल ही घर जाते थे. ना सिर्फ इसलिए, कि दो बार पैदल जाओ, और, पेस्ट्री या किसी उपयोगी चीज़ के लिए पैसे बच जाते थे! बात ये नहीं थी! हम कंजूस नहीं थे, बस हमें मज़ा आता था धीरे-धीरे घर जाने में, और रास्ते में हर तरह की बातें करने में. तो, उस दिन सिर्योगा ने माल्विना के बारे में बातें कर-करके मेरे कान पका दिए. इससे पता चल रहा था, कि उसे – प्यार हो गया है.

मुझे, बेशक इस बात पर विश्वास है कि वह डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही है, मगर मुझे शक है कि ऐसा हो पायेगा. क्योंकि डॉक्टर को किसी भी चीज़ से नहीं डरना चाहिये – मृत व्यक्तियों से भी, मगर उसे तो दादी भी स्कूल से लेने आती है. मैंने तो साफ़-साफ़ कह दिया. वह बेहद गुस्सा हो गया, मगर वह बहस नहीं कर सका.

और, दूसरे दिन मेरे पास आया – उसका चेहरा लटका हुआ था.

“पता है,” बोला, “जल्दी ही उसका जन्म दिन आने वाला है.”

“तो, फ़िर क्या?” मैंने कहा.

“क्या, क्या? कुछ गिफ्ट तो देना चाहिये! मगर क्या?”

“दो,” मैंने कहा, “फूल या आइस्क्रीम केक.”

“नहीं”, उसने जवाब दिया, “फूल मुरझा जायेंगे, और केक खा जायेंगे और भूल जायेंगे कि यह गिफ़्ट था. कोई ऐसी चीज़ देनी चाहिये जो ज़िंदगी भर याद रहे.”

“गमले में फूल लगा कर दे दे! पूरी ज़िंदगी बढ़ते रहेंगे. गमले में लगे फूल की ओर देखेगी और फ़ौरन उसे तेरी याद आयेगी.”

“हाँ?” सिर्योगा ने गुस्से से आँखें सिकोड़ लीं. “बड़ा अकलमन्द आया है. चड्डी वाला जीनियस! और तुझे पता है, ऐसे फूल की कीमत क्या होगी? मैं क्या, नोट बनाता हूँ?”

“तू ख़ुद,” मैंने कहा, “जीनियस! चल, बायलॉजी में मारिया सान्ना से पूछते हैं. वहाँ खूब सारे फूल हैं! वह मना नहीं करेंगी! आख़िर हमने उनके लिये कित्ते सारे मेंढकों के अण्डे इकट्ठे किये थे!”

“ये अच्छा ख़याल है!” सिर्योगा ने कहा. चल, भागें बायलॉजी लैब में.”

बायलॉजी लैब में वार्षिक सांफ़-सफ़ाई हो रही थी : भूसा भरे टूटे-फूटे जानवरों और मोम के मुड़े-तुड़े सेबों का ढेर पड़ा था, टूटे हुए फूलों के गमले फ़र्श पर पड़े थे. और इस सारे कबाड़ के ऊपर, बिखरने को तैयार एक कंकाल खड़ा था. सिर्योगा ने जैसे ही उसे देखा, वह डर से पीला पड़ गया.

“मारिया सान्ना!” वह फुसफुसाया. “ये मुझे दे दीजिये! मैं आपसे विनती करता हूँ, मेहेरबानी कीजिये! मेरी पहचान की एक लड़की डॉक्टर बनना चाहती है. और उसे आदत होनी चाहिये! ये इतने काम की चीज़ है!”

“ले ले...” बॉयलोजी की टीचर ने अनमनेपन से कह दिया. “सिर्फ, बेहतर होगा, कि तुम लोग इसे अख़बार में लपेट लो, वर्ना तुम्हें ट्राम में घुसने नहीं देंगे.”

कहाँ की ट्राम! सिर्योगा ने कंकाल को टाट में लपेट लिया और हमारी बिल्डिंग की तरफ़ चल पड़ा. कंकाल पुराना था. सारे तार जिनसे उसे बांधा गया था, ज़ंग खा चुके थे, और हड्डियाँ बिखर रही थीं. हम बड़ी देर तक उसे अंधेरे गलियारे में समेटते रहे.

“तू इसे, ऐसे कैसे, अचानक, गिफ्ट में दे रहा है,” मुझे शक हुआ. “उसने अभी तक अपने जन्म दिन के बारे में कुछ भी नहीं कहा है. हमें अभी तक किसी ने बुलाया भी नहीं है!”

“गिफ्ट देंगे – फ़ौरन बुलायेगी! बुलाना ही पड़ेगा.”

इससे मुझे कुछ तसल्ली हुई. मुझे लोगों के घर जाना अच्छा लगता है. मगर फ़िर भी मुझे कोई चीज़ परेशान कर रही थी.

“और अब – इस समय, हम क्या कहेंगे?”

“कुछ भी नहीं कहेंगे!” सिर्योगा बड़बड़ाया, जैसे उसे बुखार हो. “ये - सरप्राईज़ है! तुम कुछ उम्मीद भी नहीं करते, और अचानक – ब्बा-ब्बाख़! इसकी गर्दन में “जन्मदिन मुबारक!” का कार्ड लटकायेंगे और दरवाज़े के पास रख देंगे.”

हमने ऐसा ही किया...

“चल, दरवाज़े के पास रख दे! घण्टी बजा! बजा!” सिर्योगा फुसफुसाया. “और छुप जा! जल्दी! छुप जा!”

दरवाज़े की सिटकनी बजी, ताला खुला...और वहाँ कब्रिस्तान जैसी ख़ामोशी छा गई.

“ई-ई-ईख़!” क्वार्टर में किसी ने कहा और धम् से गिर पड़ा. कंकाल हिल रहा था, जैसे कुछ सोच रहा हो, कि क्या करना चाहिये, और वह ख़ुद भी कॉरीडोर में बिखर गया.

और तब दिल दहलाने वाली चीख़ गूँजी.

जब हम अपनी छुपने की जगह से उछल कर बाहर आये, तो डरावना दृश्य देखा. कॉरीडोर में ईरा की दादी पड़ी थी. उसकी बगल में छोटी-छोटी हड्डियों में बिखरा हुआ कंकाल चमक रहा था, और खोपड़ी बड़ी शान से दूर अंधेरे कॉरीडॉर में धीरे-धीरे लुढ़क रही थी.

कॉरीडोर के अंत में इरीना-माल्विना खड़ी थी और ऐसे चिल्ला रही थी जैसे उसके गले में “एम्बुलेन्स” का साइरन हो.

आगे क्या हुआ, ये बताना भी बड़ा डरावना है. मगर एक चीज़ हमने हासिल कर ली : इस गिफ्ट को ईरा ज़िंदगी भर याद रखेगी.

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शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

Do the Stars fall?


क्या सितारे गिरते हैं?
लेखक : नतालिया अब्राम्त्सेवा
अनुवाद : आ. चारुमति रामदास
कुत्ते का पिल्ला त्याव्का सितारे पकड़ रहा था. त्याव्का बेहद छोटा था, और इसलिए सोचता था कि किसी नन्हे सितारे को पकड़ना उतना मुश्किल नहीं है. त्याव्का समर कॉटेज में रहता था. समर कॉटेज की फेन्सिंग उसे बहुत परेशान करती. जब आसमान से कोई सितारा गिरता होता, त्याव्का रात की नम घास पर लपकता, क्यारियों को पार करता, फूलों पर भागते हुए, कँटीली बागड़ फाँद जाता, जहाँ, उसके हिसाब से गिरे हुए सितारे को होना चाहिए था, और अचानक – फेन्सिंग. “लगता है, सितारा फेन्सिंग के उस ओर गिरा है”, त्याव्का को गुस्सा आ जाता.
त्याव्का फेन्सिंग को टालता. एक बार फेन्सिंग से कई बार नाक टकराने के बाद, त्याव्का ने थोड़ी देर आराम करने का विचार किया और वहीं पर लेट गया. अचानक हँसने की आवाज़ सुनाई दी. त्याव्का ने सिर उठाया तो पड़ोस के बिल्ले को फेन्सिंग पर देखा. बिल्ला पेट पकड़ कर हँस रहा था.
“बेवकूफ़ पिल्ले! एकदम बुद्धू है! ये तू कर क्या रहा है?”
“मैं? मैं सितारे पकड़ रहा हूँ,” त्याव्का ने जवाब दिया, “ वाकई में, कम-से-कम एक तो पकड़ना चाहता हूँ. मगर वे सब वहाँ नहीं गिरते जहाँ गिरना चाहिए. फेन्सिंग के पीछे गिरते हैं.”
बिल्ला फ़िर से हँसने लगा:
“बेवकूफ़ पिल्ला! बिल्कुल बेवकूफ़!”
“क्यों? क्यों बेवकूफ़ हूँ मैं? मैं सिर्फ फेन्सिंग नहीं फान्द सकता. बिल्ला फेन्सिंग पर बैठा और खिलखिलाने लगा:
तू इसलिए बेवकूफ़ है, क्योंकि तू वो पकड़ रहा है, जिसे पकड़ा नहीं जा सकता!”
“पकड़ा नहीं जा सकता?”
“बेशक, नहीं पकड़ा जा सकता,” बिल्ले ने शान से कहा, “तू मेरी बात पर यकीन कर. मैं काफ़ी समय लाइब्रेरी में रह चुका हूँ और खूब सारी वैज्ञानिक किताबें पढ़ चुका हूँ.”
“तो क्या?” त्याव्का ने विरोध किया. “यहाँ किताबों का क्या काम है? उनमें सितारों के बारे में क्या लिखा है?”
“सितारों के बारे में कम से कम इतना तो लिखा ही है कि वे गिरते नहीं हैं.”
“बिल्कुल नहीं! कैसे गिरते हैं! आज ही चार सितारे गिर चुके हैं!”
“वो सितारे नहीं हैं!” बिल्ले को गुस्सा आने लगा था.
“सितारे कैसे नहीं हैं? सितारे हैं – वे सितारे ही हैं,” त्याव्का बहस करने लगा. बेहद अक्लमन्द बिल्ले ने थककर कहा:
“अब तुझे कैसे समझाऊँ? ये सितारे नहीं हैं. ये बड़े-बड़े पत्त्थर होते हैं, जो काफ़ी ऊँचाई पर उड़ते रहते हैं. चाँद से भी ज़्यादा ऊँचाई पर. और जब वे ज़मीन पर गिरते हैं, तो हवा से घर्षण करते हैं और जल जाते हैं. समझा?”
“समझ गया. समझ गया, कि ये सब ब-क-वा-स है. पत्थर उड़ते हैं, जल जाते हैं – बकवास! आपने कोई गलत-सलत किताबें पढ़ ली हैं, आदरणीय बिल्ले जी. मैं चला सितारे पकड़ने. टाSSटा!”
और त्याव्का भाग गया. बिल्ला उसे देखता रहा और उसने सिर हिला दिया.
“अभी छोटा है. बड़ा होगा – समझ जाएगा”.
और त्याव्का को बिल्ले पर अफ़सोस हो रहा था. “बेचारा बिल्ला,” – उसने सोचा, अपनी होशियारी पे बहुत अकड़ रहा है. सितारे और पत्थर में फ़र्क नहीं महसूस कर सकता”.

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