सोमवार, 19 अगस्त 2013

Kabhee Jhooth mat bolo

झूठ मत बोलो

लेखक: मिखाईल जोशेन्का
अनु: आ. चारुमति रामदास

बहुत पहले की बात है जब मैं पढ़ता था. उस समय जिम्नेशियम्स हुआ करते थे. और टीचर्स हमारी डायरी में हर पाठ पर ग्रेड दिया करते थे. वे कोई एक अंक लिख दिया करते – पाँच से लेकर एक तक. और मैं तो तब बहुत ही छोटा था, जब मुझे जिम्नेशियम में डाला गया था.  और मुझे कुछ भी मालूम नहीं था कि जिम्नेशियम में होता क्या है. पहले तीन महीने तो मैं मानो धुंध में ही रहा. और एक दिन टीचर ने हमें ये कविता याद करने के लिए कहा:
गाँव के ऊपर चान्द चमकता ख़ुशी-ख़ुशी,
चमक रही है बर्फ़ सफ़ेद नीली लपटों में...  

मगर मैंने ये कविता याद ही नहीं की. मैंने सुना ही नहीं था कि टीचर ने क्या कहा था. मैंने इसलिए नहीं सुना, क्योंकि लड़के जो मेरे पीछे बैठते थे, कभी किताब मेरे सिर पर मार रहे थे, कभी मेरे कान पर स्याही पोत रहे थे, तो कभी मेरे बाल खींच रहे थे, और जब मैं इस अचानक हमले के कारण उछलता -  तो वे मेरे नीचे पेंसिल या कोई और चीज़ रख देते. इसलिए मैं क्लास में सहमा सहमा बैठा रहता, बल्कि बिल्कुल बेवकूफ़ जैसा बैठा रहता और पूरे समय सुनने की कोशिश करता रहता कि पीछे वाले लड़के अब मेरे ख़िलाफ़ क्या प्लान बना रहे हैं.
और दूसरे दिन टीचर ने जैसे जानबूझ कर मुझे पुकारा और वह कविता सुनाने के लिए कहा.
मुझे न तो सिर्फ वह कविता याद नहीं थी, बल्कि इस बात का भी पता नहीं था कि ऐसी कोई कविता भी  दुनिया में है. मगर सकुचाहट के मारे मैं टीचर से कह नहीं पाया कि मुझे ये कविता याद नहीं है. पूरी तरह बौखलाया हुआ, मैं अपनी डेस्क के पीछे खड़ा था, एक भी शब्द बोले बिना!
मगर लड़कों ने फुसफुसाते हुए मुझे कविता प्रॉम्प्ट करना शुरू कर दिया. इसकी बदौलत मैं वो बड़बडाने लगा जो वे फुसफुसा रहे थे.
और उन दिनों मुझे हमेशा ज़ुकाम रहता था, और मुझे एक कान से कुछ कम भी सुनाई देता था. मैं बड़ी मुश्किल से सुन पा रहा था कि वे क्या फुसफुसा रहे हैं. पहली पंक्तियाँ तो मैंने किसी तरह सुना दीं, मगर जब हम “बादलों के नीचे सलीब जल रही है मोमबत्ती जैसी ”, तो मैंने कहा, “पागलों के नीचे कमीज़ दुख रही है मोमबत्ती जैसी”.          
अब तो बच्चे ठहाका मारकर हंस पड़े. और टीचर भी हँसने लगे. उन्होंने कहा, “अच्छी बात है, अपनी डायरी लाओ! मैं उसमें ‘एक’ लिख देता हूँ.”
मैं रोने लगा, क्योंकि ये मेरा पहला ‘एक’ था और अभी मुझे मालूम नहीं था कि इसके बाद क्या होता है.
क्लासेस ख़तम होने के बाद मेरी बहन लेल्या मुझे लेने के लिए आई, जिससे हम साथ साथ घर जा सकें.
रास्ते में मैंने स्कूल बैग से डायरी निकाली, उसे खोलकर लेल्या को वह पेज दिखाया जिस पर ‘एक’ लिखा था, और उससे कहा, “लेल्या, देख, ये क्या है? ये मुझे टीचर ने गाँव के ऊपर चान्द चमकता ख़ुशी-ख़ुशी,  के लिए दिया है. लेल्या ने देखा और हँसने लगी. उसने कहा, “मीन्का, ये तो बुरी बात है! ये टीचर ने रूसी भाषा के लिए तुझे ‘एक’ दिया है. ये इतनी बुरी बात है कि मुझे तो शक है कि पापा तुझे तेरे जनम-दिन पर, जो दो हफ़्ते बाद है, कैमेरा देंगे.
मैंने कहा, “तो फिर क्या किया जाए?”
लेल्या ने कहा, “हमारी क्लास की एक स्टुडेंट ने अपनी डायरी के दो पन्ने, जहाँ उसे ‘एक’ मिला था,  गोंद से चिपका दिए. उसके पापा ने उँगलियों में थूक लगाकर पन्ने अलग कराना चाहा, मगर वे अलग नहीं हुए और वह देख ही नहीं पाए कि वहाँ कौन सी ग्रेड लिखी है.”
मैंने कहा, “ये ठीक नहीं है – मम्मा-पापा को  धोखा देना!”
लेल्या हँसने लगी और घर चली गई और मैं बहुत उदास मूड में पार्क में घुस गया, वहाँ बेंच पर बैठा और, डायरी खोलकर बड़े ख़ौफ़ से ‘एक’ की ओर देखने लगा. मैं काफ़ी देर तक पार्क में बैठा रहा. फिर घर गया. मगर जब मैं घर की ओर जा रह था तो अचानक मुझे याद आया कि अपनी डायरी तो मैं पार्क में बेंच पर ही छोड़ आया. मैं वापस भागा. मगर पार्क में डायरी थी ही नहीं. पहले तो मुझे डर लगा, मगर बाद में मैं ख़ुश हो गया कि अब मेरे पास इस डरावने ‘एक’ वाली डायरी ही नहीं है. घर आकर मैंने पापा को बताया कि मेरी डायरी खो गई है. जब लेल्या ने यह सुना तो हँस पड़ी और उसने मुझे आँख मारी. दूसरे दिन, जब टीचर को पता चला कि मेरी डायरी गुम हो गई है तो उन्होंने मुझे नई डायरी दी. मैंने नई डायरी इस उम्मीद के साथ खोली कि अब उसमें कुछ भी बुरा नहीं है, मगर वहाँ ‘रूसी भाषा’ के सामने फिर से ‘एक’ खड़ा था, पहले वाले से और भी मोटा.
और तब मुझे इतना अफ़सोस हुआ और इतना गुस्सा आया कि मैंने डायरी को क्लास में रखी किताबों वाली अलमारी के पीछे फेंक दिया.
दो दिन बाद, यह जानकर कि मेरी ये डायरी भी खो गई है, टीचर ने मुझे नई डायरी बनाकर दी. और उसमें ‘रूसी भाषा’ के लिए ‘एक’ के अलावा क्लास में मेरे आचरण के लिए ‘दो’ भी लिख दिया. और उन्होंने कहा कि मेरे पापा को मेरी डायरी ज़रूर देखनी चाहिए.
जब क्लास के बाद मैं लेल्या से मिला, तो उसने मुझसे कहा, “अगर हम कुछ दिनों के लिए पन्नों को चिपका दें तो इसे झूठ नहीं कहा जाएगा. और एक हफ़्ते बाद जब तुझे कैमेरा मिल जाएगा तो हम पन्ने वापस खोलकर दिखा देंगे कि उनमें क्या लिखा था.”
मैं तो कैमेरा पाने के लिए बेताब हो रहा था, और मैंने लेल्या के साथ मिलकर डायरी के उस डरावने पन्ने के कोने चिपका दिए.
शाम को पापा ने कहा, “चल अपनी डायरी दिखा. ज़रा देखूँ , तो सही, कहीं तुझे ‘एक’ तो नहीं मिला है?”
पापा डायरी देखने लगे, मगर उन्हें उसमें कोई बुरी बात नज़र नहीं आई, क्योंकि पन्ना तो चिपकाया गया था.
और जब पापा मेरी डायरी देख रहे थे तो सीढ़ियों पर किसी ने घंटी बजाई. कोई औरत आई और बोली, “कुछ दिन पहले मैं पार्क में घूम रही थे और वहाँ बेंच पर ये डायरी मिली. नाम देखकर मैंने पता मालूम किया और इसे आपके पास ले आई. कहीं ये आपके बेटे की डायरी तो नहीं है.”
पापा ने डायरी देखी और वहाँ ‘एक’ देखकर, सब समझ गए. वो मुझ पर चिल्लाए नहीं बल्कि बड़ी शांति से बोले, “वे लोग जो झूठ बोलते हैं और धोखा देते हैं, हँसी के पात्र बन जाते हिं, क्योंकि देर-सबेर उनका झूठ खुल ही जाता है. ऐसा कभी भी नहीं हुआ है कि झूठ छुपा हुआ रह जाए.”
मैं, केंकडे की तरह लाल होकर पापा के सामने खड़ा था, और मुझे उनके शांति से कहे गए शब्दों को सुनकर शर्म आ रही थी.
मैंने कहा,  “मैं ये बताना चाहता हूँ कि मेरी एक तीसरी डायरी, जिसमें ‘एक’ था, मैंने स्कूल में किताबों वाली अलमारी के पीछे फेंक दी है.”
मुझ पर और ज़्यादा गुस्सा होने के बदले पापा मुस्कुराए और उनका चेहरा खिल गया. उन्होंने मेरे हाथ पकड़े और मेरी पप्पी लेने लगे.
उन्होंने कहा, “मुझे बहुत ख़ुशी हुई है कि तूने अपनी गलती मान ली है. तूने वो बात मान ली है जो, हो सकता है, कि काफ़ी समय तक किसी को पता नहीं चलती. इससे मुझे उम्मीद बंधी है कि आगे से तू झूठ नहीं बोलेगा. इसके लिए मैं तुझे कैमेरा दूंगा.”
जब लेल्या ने ये बात सुनी तो वह सोचने लगी कि हो सकता है पापा का दिमाग ख़राब हो गया है जो अब सबको ‘पांच’ के लिए नहीं, बल्कि ‘एक’ के लिए ‘गिफ्ट’ देने लगे हैं.
और तब  लेल्या पापा के पास गई और बोली, “पापा, आज मुझे भी भौतिक शास्त्र में ‘दो’ मिला है क्योंकि मैंने पाठ याद नहीं किया था.”
मगर लेल्या की उम्मीद सही नहीं निकली. पापा उस पर गुस्सा हो गए, उसे कमरे से बाहर निकाल दिया और  पढ़ाई के लिए बैठने को कहा.

और शाम को जब हम सोने चले गए तो अचानक घंटी बजी. पापा के पास मेरे टीचर आए थे.. उन्होंने कहा, “आज हमारे क्लास-रूम में सफ़ाई हो रही थी, और किताबों की अलमारी के पीछे हमें आपके बेटे की डायरी मिली. आपको ये छोटा-सा झूठा और धोखेबाज़ बच्चा कैसा लगता है, जिसने अपनी डायरी इसलिए फेंक दी ताकि आप उसे देख न सकें?”

पापा ने कहा, “इस डायरी के बारे में वह ख़ुद मुझे बता चुका है. उसने इस बात को ख़ुद ही क़ुबूल कर लिया है. इसलिए ये सोचने की कोई वजह नहीं है कि मेरा बेटा इतना झूठा और धोखेबाज़ है कि उसे सुधारा नहीं जा सकता.”
टीचर ने पापा से कहा, “आह, ऐसी बात है. आपको इस बारे में पहले ही मालूम है. तो, मतलब, - यहाँ ग़लतफ़हमी हो गई है. माफ़ कीजिए. गुड नाईट.”
और मैंने अपने बिस्तर में लेटे हुए ये बातें सुनीं और फूट-फूटकर रो पड़ा. मैंने निश्चय कर लिया कि हमेशा सच ही बोला करूंगा.
और वाक़ई में, मैं आज भी हमेशा ऐसा ही करता हूँ. आह, ये कभी कभी बड़ा मुश्किल हो जाता है, मगर मेरे दिल में हमेशा शांति और प्रसन्नता बनी रहती है.
....

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

Dadi ne syahi kaise kharidee

 बूढ़ी दादी ने स्याही कैसे खरीदी
लेखक: डैनियल चार्म्स
अनु: आ. चारुमति रामदास

कोसोबोका स्ट्रीट की बिल्डिंग नं. 17 में एक बूढ़ी दादी रहती थी. कभी वह अपने पति के साथ रहती थी, और उसका एक बेटा भी था. मगर बेटा बड़ा हो गया और बाहर चला गया, और पति का हो गया और दादी अकेली रह गई.
वह ख़ामोशी से और शांति से रहती थी, चाय पीती, बेटे को ख़त लिखती, इसके अलावा कुछ और नहीं करती थी.
दादी के बारे में लोग ये कहते थे कि वो चांद से टपकी है.
एक बार दादी गर्मियों में बाहर आँगन में निकली, चारों ओर देखने लगी और बोली:
 “आह, लोगों, ये बर्फ कहाँ चली गई?”
और पड़ोसी हँसकर उससे बोले:
 “अरे, क्या कभी ऐसा देखा है कि गर्मियों में बर्फ ज़मीन पर पड़ी हो? तुम क्या अम्मा, क्या चांद से टपकी हो?”
या फिर दादी केरोसिन की दुकान में जाती और पूछती:
 “ आपके पास फ्रेंच रोल कितने का है?”
सेल्समेन हंसते हैं:
 “क्या कह रही हैं, नागरिक, हमारे पास फ्रेंच रोल कहाँ से आए? चांद से टपकी हैं क्या?”
तो ऐसी थी बूढ़ी दादी!
एक बार मौसम बड़ा अच्छा था, धूप निकली थी, आसमान में एक भी बादल नहीं था. कोसोबोका स्ट्रीट पर धूल उड़ रही थी. केयरटेकर्स निकले तांबे की टोंटियों वाले टार्पोलिन के पाइप से सड़क पर पानी सींचने. वे सीधे उड़ती हुई धूल पर पानी डाल रहे थे. धूल पानी के साथ साथ ज़मीन पर उड़ रही थी. घोड़े पानी के डबरों पर दौड़ रहे थे और हवा धूल रहित हो गई.
17नं. बिल्डिंग के गेट से दादी निकली. उसके हाथ में चमचमाती मूठ वाली छतरी थी, और सिर पर थी हैट, काले सितारों वाली.
 “ज़रा बताओ तो,” उसने केयर टेकर से पूछा, “ स्याही कहाँ मिलती है?”
 “क्या?” केयरटेकर चीखा.
दादी उसके नज़दीक गई:
 “स्याही!” वह चिल्लाई.
 “बाज़ू हट!” पानी की धार छोड़ते हुए केयर टेकर चिल्लाया.
 दादी बाएँ हटी, धार भी बाएँ.
दादी फ़ौरन दाएँ हटी, और धार भी उसके पीछे पीछे.
 “तू क्या,” केयर टेकर चिल्लाया, “चांद से टपकी है, देख रही है न कि मैं रास्ते पर पानी डाल रहा हूँ!”
दादी ने बस छतरी घुमाई और आगे बढ़ गई.
दादी बाज़ार पहुँची, देखती है कि एक नौजवान खड़ा है और पाईक मछली बेच रहा है – बड़ी-बड़ी, रसदार, करीब हाथ भर लम्बी, पैर जितनी मोटी. उसने मछली हाथ पर रखी, फिर एक हाथ से उसकी नाक पकड़ी, उसे घुमाया घुमाया और छोड़ दिया, मगर गिरने नहीं दिया, बल्कि फुर्ती से दूसरे हाथ से पूँछ से पकड़ लिया, और दादी के सामने लाया.
 “ले,” वह बोला, “एक रूबल में दूँगा.”
 “नहीं,” दादी बोली, “मुझे स्याही चाहिए...”
नौजवान ने उसे पूरा बोलने ही नहीं दिया.
 “ले लीजिए,” बोला, “महंगा नहीं दे रहा हूँ.”
  “नहीं,” दादी बोली, “मुझे स्याही...”
और वह फिर से:
 “ले लीजिए,” कहने लगा, “मछली साढ़े पांच पाउंड वज़न की है,” और जैसे थककर उसने मछली दूसरे हाथ में ले ली.
 “नहीं,” दादी ने कहा, “मुझे स्याही चाहिए.”
आख़िरकार नौजवान ने सुन ही लिया कि दादी उससे क्या कह रही है.
 “स्याही?” उसने सवाल किया.
 “हाँ, स्याही.”
 “स्याही?”
 “स्याही.”
 “और मछली नहीं चाहिए?”
 “नहीं.”
 “मतलब, स्याही?”
 “हाँ.”
 “आप, क्या चांद से उतरी हैं!” नौजवान ने कहा.
 “मतलब, आपके पास स्याही नहीं है,” दादी ने कहा और आगे बढ़ गई.

“ ताज़ा माँस लीजिए,” हट्टे-कट्टे कसाई ने चिल्लाकर दादी से कहा, और ख़ुद चाकू से लिवर काटता रहा.
 “आपके पास स्याही तो नहीं है?”
 “स्याही?” सुअर के धड़ को पैर से घसीटते हुए कसाई दहाड़ा. दादी फ़ौरन कासाई से दूर हट गई, कितना मोटा और गुसैल था वो! और एक सामान बेचने वाली चिल्लाकर उससे बोली:
 “यहाँ आइए! यहाँ आइए!!”
दादी उसके स्टाल की तरफ़ आई और चश्मा पहन लिया, ये सोचते हुए कि अब स्याही देखना होगी. और दुकानदारिन ने मुस्कुराकर उसकी ओर काली बेरीज़ का डिब्बा बढ़ा दिया.
 “लीजिए,” बोली, “ऐसी चीज़ आपको कहीं न मिलेगी.”
दादी ने एक बेरीज़ का डिब्बा लिया, उस हाथ में लेकर घुमाया और वापस रख दिया.
 “मुझे स्याही चाहिए, बेरीज़ नहीं,” वह बोली.
 “कैसी स्याही – काली या लाल?” दुकानदारिन ने पूछा.
 “काली,” दादी ने कहा.
 “काली नहीं है,” दुकानदारिन ने जवाब दिया.
 “तो फिर लाल ही सही,” दादी ने कहा.
 “और लाल भी नहीं है,” दुकानदारिन ने कहा और अपने होठों पर पट्टी रख ली.
 “अलबिदा,” दादी ने कहा और आगे चली.
अब तो बाज़ार भी ख़तम होने को आया., मगर स्याही कहीं नहीं दिखी.
दादी बाज़ार से बाहर निकल गई और किसी एक सड़क पर चलने लगी.
अचानक देखती क्या है – एक के पीछे एक पन्द्रह गधे धीमी चाल से जा रहे हैं. सबसे आगे वाले गधे पर एक आदमी बैठा है और हाथों में एक बड़ा झंडा पकड़े है. दूसरे गधों पर भी लोग बैठे हैं और हाथों में कोई पोस्टर्स पकड़े हैं.       
 “ये क्या बात हुई?” दादी सोचने लगी. “हो सकता है कि आजकल ट्रामगाड़ियों की तरह, गधों पर चलते हैं.”      
  “ऐ!” उसने सामने वाले गधे पर बैठे आदमी से चिल्लाकर कहा. “थोड़ा रुक. बता तो सही, स्याही कहाँ मिलती है?”
मगर, ज़ाहिर था कि गधे पर सवार आदमी ने सुना ही नहीं कि दादी ने उससे क्या कहा, और उसने कोई एक भोंपू उठा लिया, एक तरफ़ से संकरा, और दूसरी तरफ़ से – खुले मुँह का, चौड़ा. संकरा सिरा मुँह से लगाया, और दादी के ठीक मुँह पर उसमें इतनी ज़ोर से चिल्लाने लगा, कि सात मील तक सुनाई दे     रहा था:
“आइए, आइए, आपके शहर में दूरोव से मिलिए!
सर्कस में! सर्कस में!
समुद्री सिंह – पब्लिक के प्यारे!
आख़िरी सप्ताह!
टिकट प्रवेश द्वार पर!”
  डर के मारे दादी के हाथ से छतरी भी छूट गई. उसने छतरी उठाई, मगर डर के मारे हाथ इतनी बुरी तरह काँप रहे थे कि वह फिर से छूट गई.
दादी ने छतरी उठाई, उसे कस कर पकड़ा और जल्दी जल्दी सड़क पर चलने लगी, फुटपाथ पर वह एक सड़क से दूसरी में मुड़ गई और तीसरी सड़क पर निकली जो काफ़ी चौड़ी और शोरगुल वाली थी.
चारों ओर लोग जल्दी जल्दी भाग रहे हैं, और रास्ते पर बसें जा रही हैं और ट्रामगाड़ियाँ गरज रही थीं.
दादी बस सड़क पार करके दूसरी ओर जाना चाहती थी, अचानक:
 “कर् र् र् –र् र् –आर् र् र् – र् र् र्  - बस चिल्लाई.
दादी ने उसे जाने दिया, मगर जैसे ही उसने रास्ते पर पाँव रखा, उस पर :
 “ऐ, संभल के!” गाड़ीवान चिल्लाया.         
दादी ने उसे जाने दिया और फ़ौरन दूसरी ओर भागी. रास्ते के बीचोंबीच पहुँची ही थी कि :
 “झिन-झिन! डिन-डिन-डिन!” - ट्रामगाड़ी गुज़रती है.
दादी वापस पीछे को, और पीछे से:
 “पिर-पिर-पिर-पिर!!!” मोटरसाइकल वाला चिरकता है.
बिल्कुल ही डर गई दादी, मगर ये तो अच्छा हुआ कि एक भला आदमी मिल गया, उसने दादी का हाथ पकड़ा और कहने लगा:
 “आप क्या,” कहता है, “जैसे चांद से टपकी हैं! आप को कुचल भी सकते हैं.”
और वह घसीटते हुए दूसरी ओर को ले गया.
कुछ सांस लेकर दादी ने सोचा कि इस भले आदमी से ही स्याही के बारे में पूछा जाए, मगर जैसे ही उसने चारों ओर नज़र डाली तो पाया कि उसका नामो-निशान तक खो गया था.
आगे चल पड़ी दादी, छतरी का सहारा लेते हुए, दोनों ओर देखते हुए, कि स्याही का पता कैसे चले.

 सामने से आ रहा था एक छोटा-सा बूढ़ा हाथ में छड़ी पकड़े. खूब बूढ़ा था, बाल एकदम सफ़ेद थे.
दादी उसके पास गई और कहने लगी:
 “आप, ज़ाहिर है, पुराने ज़माने के आदमी हैं, क्या आपको मालूम है कि स्याही कहाँ मिलती है?”
बूढ़ा रुक गया, उसने सिर उठाया, चेहरे की झुर्रियों को ऊपर नीचे हिलाया और सोचने लगा. इस तरह से कुछ देर खड़े रहने के बाद, उसने अपनी जेब में हाथ डाला, तंबाकू का पाऊच निकाला, सिगरेट बनाने वाला कागज़ निकाला और सिगरेट-होल्डर भी निकाला. इसके बाद धीरे धीरे सिगरेट बनाई और उसे सिगरेट-होल्डर में रखकर, तम्बाकू का पाऊच और सिगरेट बनाने वाला कागज़ वापस जेब में रख दिया, और माचिस निकाली. फिर सिगरेट के कश लगाए और, माचिस छिपाकर, अपने पोपले मुँह से बोला:
 “शाशी दुशाश में मिशती है.” 
दादी को कुछ भी समझ में नहीं आया, और बूढ़ा आगे चला गया.
सोचने लगी दादी.
ऐसा क्यों है कि कोई भी स्याही के बारे में कुछ भी नहीं बता पा रहा है.
क्या उन्होंने स्याही के बारे में कभी कुछ सुना ही नहीं है?
और दादी ने फ़ैसला कर लिया कि वह दुकान में जाकर स्याही के बारे में पूछेगी.. वहाँ तो लोगों को मालूम ही होगा.
और दुकान भी बगल में ही थी. खिड़कियाँ बड़ी-बड़ी, पूरी दीवार में. और खिड़कियों में पड़ी हैं किताबें.
“ ये है,” दादी ने सोचा, “यहाँ जाती हूँ. यहाँ शायद स्याही होगी, क्योंकि किताबें पड़ी हैं. किताबें तो स्याही से ही लिखते हैं ना.”
वह दरवाज़े के पास गई, दरवाज़ें काँच के हैं और कुछ अजीब से हैं.
दादी ने दरवाज़े को धक्का दिया, मगर उसे ही किसी चीज़ ने पीछे की ओर धकेला.
चारों ओर नज़र दौड़ाई, देखा कि एक दूसरा काँच का दरवाज़ा उसके ऊपर आ रहा है. दादी आगे आगे और दरवाज़ा पीछे पीछे. चारों ओर हर चीज़ काँच की है और हर चीज़ घूम रही है. दादी का सिर चकराने लगा, वह चल तो रही है, मगर ख़ुद ही नहीं समझ रही थी कि कहाँ जा रही है.
और चारों ओर बस दरवाज़े ही दरवाज़े, और वे सब घूम रहे हैं और दादी को आगे धकेल रहे हैं. दादी किसी चीज़ के चारों ओर घूमती रही, घूमती रही, बड़ी मुश्किल से बाहर निकली, ये तो अच्छा हुआ कि उसकी जान बच गई.
दादी देखती है कि  - एक बहुत बड़ी घड़ी रखी है और एक सीढ़ी ऊपर की ओर जा रही है. घड़ी के पास एक आदमी खड़ा है. दादी उसके पास गई और बोली:
 “मुझे स्याही के बारे में कहाँ पता चलेगा?”
उसने तो उसकी तरफ़ मुँह भी नहीं फेरा, बस उँगली से किसी छोटे से, जाली वाले दरवाज़े की ओर इशारा कर दिया. दादी ने दरवाज़ा थोड़ा सा खोला, उसके भीतर गई और देखा कि ये तो एक बिल्कुल छोटा सा कमरा है, किसी अलमारी जितना. और कमरे में खड़ा है एक आदमी. दादी उससे स्याही के बारे में पूछने ही वाली थी...
अचानक: ‘”ज़िन! ज़्ज़िझ्झ्झ्झिन!” – और फर्श ऊपर उठने लगा.
दादी खड़ी रही, हिलने की हिम्मत नहीं हो रही थी, और उसके सीने पर मानो कोई पत्थर रखा हो, जो बड़ा बड़ा होने लगा. खड़ी है दादी और साँस भी नहीं ले पा रही है. दरवाज़े से किसी के हाथ, पैर और सिर झाँकते हैं, और अचानक सिलाई मशीन जैसी घर-घर होने लगी. फिर घर-घर बन्द हो गई और साँस लेना आसान हो गया. किसी ने दरवाज़ा खोला और कहा:
 “प्लीज़, आ गए हैं, छठी मंज़िल, ऊपर और कुछ नहीं है.”

दादी मानो सपना देख रही हो, वह बाहर निकल कर उस ओर मुड़ी जिस तरफ़ इशारा किया गया था, और उसके पीछे दरवाज़ा बन्द हुआ और वह शैतान कमरा फिर से नीचे चला गया.
खड़ी है दादी, हाथों में छतरी पकड़े, और ठीक से साँस भी नहीं ले पा रही है. वह सीढ़ी पर खड़ी है, चारों ओर लोग चल रहे हैं, दरवाज़े धडाम् धडाम् बन्द कर रहे हैं, और दादी खड़ी है – छतरी पकड़े.
दादी कुछ देर खड़ी रही, चारों ओर का जायज़ा लिया, और किसी दरवाज़े की ओर बढ़ी.
दादी एक बड़े, रोशनीदार कमरे में आई. देखती है कि कमरे में छोटी छोटी मेज़ें रखी हैं और मेज़ों के पीछे लोग बैठे हैं. कुछ लोग कागज़ में नाक गड़ाए कुछ कुछ लिख रहे हैं, और दूसरे टाइप राइटर्स पर खट-खट कर रहे हैं. शोर इतना, मानो किसी वर्कशॉप में हों, छोटे से वर्कशॉप में.
सीधे हाथ की ओर दीवार के पास एक दिवान रखा है, दिवान पर एक मोटा आदमी बैठा है और एक दुबला भी. मोटा दुबले से कुछ कह रहा है और हाथ मल रहा है, और दुबला पूरा सामने झुक गया है, चमकीले फ्रेम वाले चश्मे की ओट से मोटे की ओर देख रहा है, और अपने जूतों की लेस बांध रहा है.
 “हाँ,” मोटे ने कहा, “एक छोटे बच्चे के बारे में कहानी लिखी है, जिसने मेंढकी को निगल लिया था. बड़ी मज़ेदार कहानी है.”
 “और मैं कुछ सोच ही नहीं पा रहा हूँ, कि किस बारे में लिखूं,” छेद में लेस डालते हुए दुबले आदमी ने कहा.
 “मेरी कहानी बड़ी मज़ेदार है,” मोटे आदमी ने कहा, “ये बच्चा घर आया, पापा ने उससे पूछा कि वह कहाँ था, और पेट में जवाब दे रही है मेंढकी “क्वा-क्वा!”. या स्कूल में : टीचर बच्चे से पूछते हैं,  “जर्मन में ‘गुड मॉर्निंग’ को क्या कहते हैं, और मेंढकी जवाब देती है, “क्वा-क्वा!” टीचर को गुस्सा आता है, और मेंढकी : “क्वा-क्वा-क्वा!” ऐसी मज़ाकिया कहानी है,” मोटे ने कहा और हाथ मले.
 “क्या आपने भी कुछ लिखा है?” उसने दादी से पूछा.
 “नहीं,” दादी ने कहा, “मेरी स्याही ख़तम हो गई है. मेरे पास पूरी दवात थी, बेटा छोड़कर गया था, वो अब ख़तम हो गई.”
 “ओह, क्या आपका बेटा भी लेखक है?” मोटे ने पूछा.
 “नहीं,” दादी ने कहा, “वह  जंगलों का वार्डन है. बस, वो यहाँ नहीं रहता है. पहले मैं अपने पति से स्याही मांग लेती थी, मगर अब पति नहीं है, और मैं अकेली रह गई हूँ. क्या यहाँ मैं स्याही खरीद सकती हूँ?” दादी ने अचानक पूछा.
दुबले आदमी ने अपना जूता बांध लिया और चश्मे की ओट से दादी की ओर देखने लगा.
 “कैसी स्याही?” उसे अचरज हुआ.
 “स्याही, जिससे लिखते हैं,” दादी ने समझाया.
 “मगर यहाँ तो स्याही नहीं मिलती,” मोटे आदमी ने कहा और हाथ मलना बंद कर दिया.
 “आप यहाँ आईं कैसे?” दुबले वाले ने दिवान से उठते हुए पूछा.
 “अलमारी में आई,” दादी ने कहा.
 “कौन सी अलमारी में?” मोटे और दुबले ने एक सुर में पूछा.
 “उसमें जो आपके यहाँ सीढ़ी पर ऊपर नीचे घूमती है,” दादी ने कहा.
 “आह, लिफ्ट में!” दुबला आदमी हँस पड़ा, फिर से दिवान पर बैठते हुए, क्योंकि अब उसका दूसरा जूता खुल गया था.
  “और आप यहाँ किसलिए आईं?” मोटे ने दादी से पूछा.
 “क्योंकि मुझे कहीं भी स्याही नहीं मिली,” दादी ने कहा, “सबसे पूछा, कोई भी नहीं जानता था. और यहाँ, देखा कि किताबें पड़ी हैं, बस इसलिए यहाँ घुस गई. किताबें तो आख़िर स्याही से ही लिखते हैं ना!”
 “हा, हा, हा!” मोटा ठहाका मार कर हँस पड़ा. “ओह, आप तो सीधे चांद से ज़मीन पर टपकी हैं!”
 “ऐ, सुनिए!” अचानक दुबला आदमी दिवान से उछला, जूते बांधे बगैर, लेस फर्श पर झूलती रही. 
 “सुनिए,” उसने मोटे से कहा, “मैं बस स्याही खरीदने वाली दादी के बारे में लिखूंगा.”
 “ठीक है,” मोटे ने कहा और हाथ मले.
दुबले आदमी ने अपना चश्मा उतारा,  उन पर फूँक मारी, रूमाल से पोंछा, दुबारा पहन लिया और दादी से बोला:
 “आप हमें बताइए कि आपने स्याही कैसे खरीदी, और हम आपके बारे में किताब लिखेंगे और आपको स्याही भी देंगे.”
दादी ने कुछ देर सोचा और वह राज़ी हो गई.
और दुबले आदमी ने किताब लिखी:
बूढ़ी दादी ने स्याही कैसे खरीदी.

  .....

सोमवार, 12 अगस्त 2013

Ek Dilchasp Kahani

एक दिलचस्प कहानी
लेखक: मिखाईल जोशेन्का
अनु.: आ. चारुमति रामदास

जब द्वितीय महायुद्ध शुरू हुआ, तो कोल्या सोकोलोव दस तक गिन सकता था. बेशक, दस तक गिनना तो बहुत कम होता है, मगर ऐसे भी बच्चे होते हैं, जिन्हें दस तक गिनती भी नहीं आती है.
मिसाल के तौर पर, मैं एक छोटी बच्ची ल्याल्या को जानता था, जो सिर्फ पाँच तक गिन सकती थी. और वो भी कैसे गिनती थी? वह कहती: “एक, दो, चार, पाँच.” और “तीन” छोड़ देती थी. ये कोई गिनती हुई? ये तो बड़ी बेवकूफ़ी की बात है. नहीं, मुश्किल से ही ऐसी बच्ची कोई वैज्ञानिक या गणित की प्रोफेसर बनेगी. बल्कि, ऐसा लगता है कि वह कोई घरेलू नौकरानी या झाडू लगने वाली बनेगी. क्योंकि वह अंकों के बारे में कुछ भी नहीं सीख सकती है. मगर हमारा कोल्या, मैं कहता हूँ, दस तक गिन सकता था. और इसकी बदौलत वह अपने घर के दरवाज़े से दस कदम गिन सकता था. और इतने कदम गिन कर, वो फ़ावड़े से एक गड्ढा खोदने लगा.
लीजिए, उसने गड्ढा खोद लिया है. इस गड्ढे में लकड़ी का एक बक्सा रख दिया, जिसमें उसकी कई चीज़ें थीं – स्केट्स, छोटी सी कुल्हाड़ी, छोटी सी आरी, जेब में रखने वाला फोल्डिंग-चाकू, चीनी मिट्टी का छोटा सा हिरन, और दूसरी छोटी-छोटी चीज़ें.
उसने यह बक्सा गड्ढे में रखा. उस पर मिट्टी डाल दी. पैरों से उसे अच्छी तरह दबाया. और ऊपर से पीली रेत भी उस पर डाल दी, जिससे कि यह पता न चल सके कि वहाँ कोई गड्ढा है और उसमें कुछ रखा है.
अब मैं आपको बताऊँगा कि कोल्या ने अपनी चीज़ें, जिनकी उसे हमेशा ज़रूरत पड़ती थी, ज़मीन के अन्दर क्यों गाड़ दीं.
वह अपनी मम्मा और दादी के साथ कज़ान शहर जा रहा था. क्योंकि उस समय फ़ासिस्टों ने हमला कर दिया था. वे उनके गाँव के बिल्कुल नज़दीक आ गए थे. और सारे गाँव वाले फ़ौरन गाँव छोडकर जाने लगे थे. और, मतलब, कोल्या ने भी अपनी मम्मा और दादी के साथ जाने का फ़ैसला कर लिया.
ज़ाहिर है, सारी चीज़ें तो अपने साथ नहीं ना ले जा  सकते. इसलिए मम्मा ने कुछ चीज़ें सन्दूक में रखीं और उन्हें ज़मीन में गाड़ दिया,जिससे कि वे फ़ासिस्टों के हाथ न पड़ें. मम्मा ने दरवाज़े से तीस कदम गिने. और वहाँ सन्दूक गाड़ दिया. उसने तीस कदम इसलिए गिने, जिससे कि वह जगह याद रख सके, जहाँ सन्दूक गाड़ा है. बाद में सन्दूक ढूँढ़ने के लिए पूरे आँगन को नहीं खोदना पड़ेगा. जब फ़ासिस्टों को गाँव से बाहर खदेड़ दिया जाएगा तो बस, बगीचे की दिशा में तीस कदम गिनना पड़ेगा, और सन्दूक फ़ौरन मिल जाएगा. इसलिए मम्मा ने दरवाज़े से तीस कदम की दूरी पर सन्दूक को ज़मीन में गाड़ दिया. और कोल्या ने, जिसे सिर्फ दस तक गिनना आता था, दस कदम गिने. और वहाँ अपना बक्सा गाड़ दिया. और उसी दिन मम्मा, कोल्या और दादी कज़ान चले गए. और इस शहर में वे क़रीब-क़रीब चार साल  रहे. कोल्या यहीं बड़ा हुआ, वह स्कूल जाने लगा. और सौ से ज़्यादा तक की गिनती सीख गया.
आख़िरकार ये पता चला कि फ़ासिस्टों को उस गाँव से खदेड़ दिया गया है जहाँ पहले कोल्या रहता था. और न सिर्फ उस गाँव से, बल्कि हमारे देश से ही खदेड़ दिया गया है. और तब कोल्या अपनी मम्मा और दादी के साथ अपने गाँव लौट आया.
आह, अपने गाँव की ओर लौटते हुए वे परेशान थे! सोच रहे थे, ‘ हमारा घर सही-सलामत तो है? कहीं फ़ासिस्टों ने उसे जला तो नहीं दिया? और ज़मीन में गड़ी हुई हमारी चीज़ें तो सही-सलामत हैं? या, हो सकता है कि फ़ासिस्टों ने इन गड्ढों को खोदा हो और उनमें रखी चीज़ें ले ली हों? आह, ये तो बहुत बुरा होगा, अगर उन्होंने स्केट्स, आरी और कुल्हाड़ी ले ली हो.’
तो, आख़िरकार, कोल्या अपने घर आ गया. घर तो सही-सलामत है, मगर थोडी बहुत तोड़-फ़ोड़ हुई है. और सारी चीज़ें जो घर में रह गई थीं, ग़ायब हो गई थीं. फ़ासिस्टों ने उन्हें चुरा लिया था. मगर मम्मा ने कहा, “कोई बात नहीं. हमारे पास और भी कई चीज़ें बची हैं, जिन्हें हमने ज़मीन में गाड़ा था.”
 इतना कहकर मम्मा ने तीस कदम गिने और फ़ावड़े से ज़मीन खोदने लगी. और जल्दी ही उसे इत्मीनान हो गया कि सन्दूक वहीं था. तब कोल्या ने मम्मा से कहा: “ये होती है अंकगणित. अगर हमने सन्दूक को यूँ ही गाड़ दिया होता, तीस कदम गिने बगैर, तो अब पता भी नहीं चलता कि कहाँ खोदा जाए. आख़िरकार मम्मा ने सन्दूक खोला. वहाँ सब कुछ साबुत और ठीक-ठाक था. और चीज़ों में सीलन भी नहीं लगी थी, क्योंकि सन्दूक के ऊपर ऑइल-क्लॉथ डला हुआ था. चीज़ों के सुरक्षित होने से मम्मा और दादी तो इतनी ख़ुश थीं कि वो गाना भी गाने लगीं: “चमके चाँद, ख़ूब चमके”.
और तब कोल्या ने भी फ़ावड़ा उठाया, दस कदम गिने और पड़ोस के बच्चों से, जो उसके चारों ओर इकट्ठे हो गए थे, बोला, “ अगर मैं अपनी चीज़ें कहीं भी गाड़ देता, अगर मैंने दस कदम न गिने होते, तो अब मुझे पता भी नहीं चलता कि वे कहाँ पड़ी हैं. मगर गिनती से लोगों को कई फ़ायदे होते हैं. अंकगणित की बदौलत मैं ये जानता हूँ कि मुझे कहाँ खोदना चाहिए.”
इतना कह कर कोल्या ज़मीन खोदने लगा. खोदता है, खोदता है, मगर अपना बक्सा उसे नहीं मिल रहा है. काफ़ी गहरा गढ़ा खोद लिया. बक्सा नहीं मिलता. थोड़ा बाएँ खोदा, थोड़ा दाएँ भी खोदा. कहीं भी नहीं है.
बच्चे निकोलाय पर हँसने लगे. “ओय, ओय, तेरी अंकगणित ने तो तेरी कोई मदद ही नहीं की. हो सकता है कि फासिस्टों ने तेरी चीज़ें खोद कर निकाल ली हों?”
कोल्या ने कहा:
 “नहीं, अगर वे हमारा भारी-भरकम सन्दूक नहीं ढूँढ पाए, तो मेरी चीज़ें भी उन्हें नहीं मिली होंगी. यहाँ बात ये नहीं है.”
कोल्या ने फ़ावड़ा फेंक दिया. वह ड्योढ़ी की सीढ़ियों पर बैठ गया. और दुखी और उकताया हुआ बैठा रहा. सोच रहा है. माथे पर हाथ फेर रहा है. और, अचानक, हँसते हुए वह बोला, “ स्टॉप, बच्चों! मुझे मालूम है कि मेरी चीज़ें कहाँ रखी हैं.”
इतना कहकर कोल्या ने सिर्फ पाँच कदम गिने और कहा, “ये यहाँ पर पड़ी हैं मेरी चीज़ें.” और, फ़ावड़ा लेकर वह खोदने लगा. और वाक़ई में उसका बक्सा दिखाई देने लगा.
तब सारे बच्चे बोले, “अजीब बात है. तूने तो अपना बक्सा दरवाज़े से दस कदम की दूरी पर गाड़ा था, मगर अब वह पाँच कदम की दूरी पर कैसे मिला? कहीं युद्ध के दौरान तेरी चीज़ें अपने आप तो तेरे घर के पास नहीं खिसक गईं?”
 “नहीं,” कोल्या ने कहा, “बक्से अपने आप नहीं चल सकते. यहाँ बात ऐसी हुई है : जब मैंने अपना सन्दूक गाड़ा था, तब मैं बिल्कुल छोटा बच्चा था. मैं बस पाँच साल का ही तो था. और तब मेरे कदम भी बिल्कुल छोटे-छोटे थे. और अब मैं नौ साल का हूँ, दसवाँ चल रहा है. और देखो, मेरे कदम कैसे बड़े-बड़े हो गए हैं. इसीलिए, मैंने दस के बदले पाँच ही कदम गिने. अंकगणित उन लोगों के लिए फ़ायदेमन्द है, जो ये समझ सकते हैं कि ज़िन्दगी में क्या हो रहा है. और होता ये है कि समय आगे भागता है. लोग बड़े होते हैं. उनके कदम बदलते हैं. ज़िन्दगी में कोई भी चीज़ बिना बदले नहीं रह सकती.”
अब कोल्या ने अपना बक्सा खोला. सब चीज़ें जहाँ की तहाँ थीं. यहाँ तक की लोहे की चीज़ों को भी ज़ंग नहीं लगा था, क्योंकि कोल्या ने उन पर तेल मल दिया था. और ऐसी चीज़ों पर ज़ंग लग ही नहीं सकता.
जल्दी ही कोल्या के पापा भी आ गए. वे सार्जेंट थे, उन्हें बहादुरी के लिए मेडल मिला था. और कोल्या ने उन्हें सारी बात सुनाई. और पापा ने कोल्या की खूब तारीफ़ की उसकी अकलमन्दी और योग्यता के लिए.
और वे सब बड़े ख़ुश और सुखी थे. गा रहे थे, ख़ुशियाँ मना रहे थे और डान्स भी कर रहे थे.
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शनिवार, 10 अगस्त 2013

Bhediye ka Pilla

भेड़िए का पिल्ला

लेखक: येव्गेनी चारुशिन
अनु.: आ. चारुमति रामदास

भेड़िए का पिल्ला जंगल में अपनी माँ के साथ रहता था.
एक बार माँ शिकार पर गई.
और पिल्ले को एक आदमी ने पकड़ लिया, उसे एक थैले में डाला और शहर ले आया. कमरे के बीचोंबीच थैला रखा.
थैले में बड़ी देर तक कोई हलचल नहीं हुई. फिर उसमें बैठा भेड़िए का पिल्ला हाथ-पैर मारने लगा और बाहर आ गया. एक ओर को देखा – डर गया : एक आदमी बैठा है और उसकी ओर देख रहा है.
दूसरी ओर देखा – काली बिल्ली गुरगुरा रही है, अकड़ दिखा रही है, उससे भी दुगनी मोटी है वो, मुश्किल से खड़ी हो पा रही है. और बगल में है कुत्ता- दाँत निकाल रहा है.
भेड़िए का पिल्ला बेचारा एकदम डर गया. थैले में वापस जाने लगा, मगर जा ही नहीं पाया – खाली थैला फर्श पर पड़ा है, चीथड़े जैसा.
और बिल्ली तो अकड़ दिखाए जा रही थी, दिखाए जा रही थी! ओह, कैसे अकड रही थी!. वह मेज़ पर कूदी, प्लेट गिरा दी. चूर चूर हो गई प्लेट.
कुत्ता भौंकने लगा.
आदमी ज़ोर से चीखा : “हा! हा! हा! हा!”
भेड़िए का पिल्ला कुर्सी के नीचे दुबक गया और वहीं ठहर गया – थरथराने लगा.
कुर्सी रखी है कमरे के बीच में.
कुर्सी की पीठ से बिल्ली नीचे की ओर देख रही है.
कुत्ता कुर्सी के चारों ओर दौड़ रहा है.  
कुर्सी पर बैठा आदमी – धुँआ छोड़ रहा है.
और भेड़िए का पिल्ला कुर्सी के नीचे अधमरा हो रहा है.
रात में आदमी सो गया, और कुत्ता भी सो गया, और बिल्ली ने आँखें बन्द कर लीं.
बिल्लियाँ – वो सोती नहीं हैं, सिर्फ ऊँघती रहती हैं.
बाहर निकला भेड़िए का पिल्ला चारों ओर का जायज़ा लेने के लिए.
चला, थोड़ा चला, सूँघा, फिर बैठ गया और चिल्लाया.
कुत्ता भौंकने लगा.
बिल्ली मेज़ पर कूदी.
आदमी पलंग पर बैठ गया. उसने हाथ झटके, चिल्लाया. और पिल्ला फिर से कुर्सी के नीचे खिसक गया.. हौले से वहीं ठहर गया.
सुबह आदमी बाहर चला गया. तश्तरी में दूध डालकर गया. कुत्ता और बिल्ली दूध चाटने लगे.
भेड़िए का पिल्ला कुर्सी के नीचे से बाहर रेंगा, दरवाज़े की ओर आया, और...दरवाज़ा तो खुला है!!!!
दरवाज़े से सीढ़ियों पर, सीढ़ियों से सड़क पर, सड़क से पुल पर, पुल से शहर में, शहर से खेत में.
और खेत के पार है जंगल!
और जंगल में है उसकी माँ.
उन्होंने एक दूसरे को सूंघा, ख़ुश हो गए और अपने जंगल में भाग गए.
और अब वो भेड़िए का बच्चा कैसा हट्टा कट्टा भेड़िया बन गया है!

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शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

Ye Kaun sa Janvar Hai?

ये कौन सा जानवर है?

लेखक: येव्गेनी चारुशिन
अनु: चारुमति रामदास

पहली-पहली बर्फ पड़ी थी, और चारों ओर सब कुछ सफ़ेद-सफ़ेद था. पेड़ सफ़ेद, ज़मीन सफ़ेद, और ड्योढ़ी, और ड्योढ़ी की सीढ़ियाँ– सब कुछ बर्फ से ढँक गया था. 
नन्ही कात्या का मन बर्फ पर घूमने को कर रहा था. वो ड्योढ़ी में आई, सीढ़ियों से उतरकर बाग में जाना चाहती है और अचानक देखती क्या है : ड्योढ़ी पर बर्फ में कुछ गड्ढे गड्ढे बने हैं. कोई जानवर बर्फ पर चला था. सीढ़ियों पर निशान हैं, ड्योढ़ी में निशान हैं और बाग में भी निशान हैं.
 ‘मज़ेदार बात है!’ नन्ही कात्या ने सोचा. ‘यहाँ कौन सा जानवर आया था? पता करना चाहिए.’
कात्या एक कटलेट लाई, उसे ड्योढ़ी में रखा और भाग गई.
दिन बीत गया, रात बीत गई. सुबह भी आ गई. कात्या उठी और फ़ौरन ड्योढ़ी में भागी – ये देखने के लिए कि जानवर ने उसका कटलेट खाया या नहीं. देखती क्या है – कटलेट तो पूरा का पूरा वहीं पड़ा है! जहाँ उसे रखा था, वह वहीं पर है. मगर पैरों के निशान और भी ज़्यादा हैं. मतलब, जानवर फिर से आया था.
तब कात्या ने कटलेट हटा ली और उसकी जगह सूप से हड्डी निकाल कर रख दी.
सुबह कात्या फिर ड्योढ़ी में भागी. देखा – हड्डी को भी जानवर ने नहीं छुआ था. तो, फिर कैसा है ये जानवर? हड्डी भी नहीं खाता.
तब कात्या ने हड्डी के बदले वहाँ लाल गाजर रखी. सुबह क्या देखती है – गाजर वहाँ नहीं है. जानवर आया और पूरी गाजर खा गया!
तब कात्या के पापा ने एक ट्रैप बनाया. उन्होंने ड्योढ़ी में एक छोटा सा बक्सा उलट कर रख दिया, मतलब उसकी तली ऊपर की ओर करके, उसे लकड़ी की एक छिपटी का सहारा दिया, और इस छिपटी पर धागे से एक गजर बांध दी. अगर गाजर को खींचा जाए, तो छिपटी उछलेगी, बक्सा गिरेगा और छोटे से जानवर को ढाँक लेगा.
दूसरे दिन पापा भी निकले, मम्मा भी, और दादी भी निकली ड्योढ़ी में, ये देखने के लिए कि जानवर ट्रैप में फंसा है या नहीं. कात्या सबसे आगे थी.
 हाँ, है! जाल में जानवर है!  बक्सा अपनी जगह से गिर गया था और उसने किसी को बंद कर लिया था! कात्या ने झिरी से देखा, देखती क्या है : वहँ जानवर बैठा है, सफ़ेद-सफ़ेद, नरम-नरम रोँएदार, आँखें गुलाबी, कान लंबे-लंबे, कोने में दुबका था, गाजर चबा रहा था.
ये तो ख़रगोश है! उसे घर के अन्दर ले आए, किचन में. और फिर एक बड़ा पिंजरा तैयार किया. और वह उसमें रहने लगा.
और कात्या उसे गाजर खिलाती, सूखी घास खिलाती, ब्रेड का चूरा खिलाती और ओट्स खिलाती.  
    

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