बुधवार, 7 अगस्त 2013

Hoshiyaar Tamara

होशियार तमारा
लेखक: मिखाईल ज़ोशेन्का
अनु. : आ. चारुमति रामदास

हमारी बिल्डिंग में एक इंजीनियर रहता है. वो होते हैं न इंजीनियर मूँछों वाले, चश्मे वाले, बिल्कुल स्कॉलर टाईप. वैसा ही था. एक बार ये इंजीनियर कुछ बीमार हो गया और इलाज करवाने साउथ चला गया. ख़ुद तो चला गया साउथ, और अपने कमरे पर लगा दिया ताला. तीन दिन बीते और अचानक वहाँ रहने वालों ने इस इंजीनियर के कमरे से किसी बिल्ली की दर्दभरी म्याँऊ-म्याँऊ सुनी. एक औरत बोली :  “ कैसा बेशरम है ये इंजीनियर. ख़ुद तो साउथ चला गया, और अपनी बिल्ली को कमरे में छोड़ दिया. और अब ये बेचारा ग़रीब जानवर, शायद बगैर खाने के और पानी के मर जाएगा.”
अब तो सारे बिल्डिंग वाले इंजीनियर पर नाराज़ हो गए. उनमें से एक बोला:
 “इस इंजीनियर के सिर में सुराख़ हैं. आख़िर बिल्ली को पूरे महीने बगैर खाने के कैसे छोड़ा जा सकता है? बिल्लियाँ तो इससे मर जाती हैं.”
  दूसरा बोला, “चलो, दरवाज़ा तोड़ देते हैं.”
बिल्डिंग का केयर टेकर आया. उसने कहा:
 “इंजीनियर की इजाज़त के बिना दरवाज़ा नहीं तोड़ा जा सकता.”
एक छोटा बच्चा निकोल्का बोला:
 “तो फिर ऐसा करते हैं कि फ़ायर ब्रिगेड को बुलाते हैं. आग बुझाने वाले आएँगे, खिड़की से मस्त सीढ़ी लगाएँगे और बिल्ली को बचा लेंगे.”
मगर केयर टॆकर ने कहा:
 “जब आग नहीं लगी है तो फायर ब्रिगेड को नहीं बुलाना चाहिए. वर्ना हमें फ़ाईन देना पड़ेगा.”
एक छोटी लड़की तमारा ने कहा:
 “मालूम है, ऐसा करते हैं कि इस बिल्ली को दरवाज़े के नीचे से खिलाते हैं. मैं अभी दूध लाती हूँ और उसे दरवाज़े के नीचे से अन्दर डाल देती हूँ. बिल्ली इसे देखेगी और पीने लगेगी.”
सारे लोग हँसने लगे और बोले:
 “हुर्रे! शाबाश! इसने बड़ी बढ़िया बात सोची है.”
और सारे बिल्डिंग वालों ने इसी दिन से दरवाज़े के नीचे से बिल्ली को खिलाना-पिलाना शुरू कर दिया. कोई दरवाज़े के नीचे से सूप उँडॆल देता, कोई दूध, कोई पानी. छोटे निकोल्का ने दरवाज़े के नीचे से एक पूरी मछली ही कमरे में घुसा दी. और फिर उसे सीढ़ियों पर एक मरा हुआ चूहा मिला, उसने बड़ी होशियारी से उसे भी दरवाज़े के नीचे से कमरे में घुसा दिया.
बिल्ली तो खाने-पीने से बेहद ख़ुश थी, और वह दरवाज़े के नीचे से खुशी से म्याँऊ-म्याँऊ करती.
इस तरह पूरा महीना बीत गया, और आख़िरकार प्रोफेसर वापस आ गया.
 बिल्डिंग वाली एक बूढ़ी ने उससे कहा:
 “ इंजीनियर, तुम्हें तो छह महीने के लिए जेल में डाल देना चाहिए, क्योंकि जानवरों को इस तरह सताना गुनाह है. जानवरों के साथ और इन्सानों के साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिए. और तुम हो कि अपनी बिल्ली को बिना दाना-पानी के कमरे में छोड़ कर चले गए. वो मर भी सकती थी, अगर हमारे दिमाग में दरवाज़े के नीचे से उसके लिए दूध उँडेलने का ख़याल न आया होता. आह, जल्दी से दरवाज़े खोलिए, और देखिए कि आपकी बिल्ली किस हाल में है. हो सकता है, वो बीमार हो और आपके पलंग पर बुख़ार में पड़ी हो.”
इंजीनियर ने कहा:
 “आप किस बिल्ली की बात कर रही हैं? आपको तो मालूम है कि मेरे पास कोई बिल्ली-विल्ली नहीं है. मेरे पास कभी कोई बिल्ली थी ही नहीं, तो मैं अपने कमरे में भला किसे बन्द कर सकता था.”
बिल्डिंग वाले बोले:
 “हम कुछ नहीं जानते. बस, इतना जानते हैं कि आपके कमरे में पूरे एक महीने से बिल्ली रह रही है.”
इंजीनियर ने फ़ौरन दरवाज़ा खोला और वह अन्दर घुसा, सारे बिल्डिंग वाले भी उसके पीछे पीछे भीतर घुसे.
और क्या देखते हैं कि दीवान पर एक ख़ूबसूरत लाल बिल्ली लेटी है. देखने में एकदम तन्दुरुस्त और ख़ुश मिजाज़ और वह ज़रा भी दुबली नहीं हुई थी.
इंजीनियर ने कहा:
 “कुछ भी समझ नहीं आ रहा है. ये लाल बिल्ली मेरे दीवान पर कैसे आई? जब मैं जा रहा था, तब तो ये यहाँ नहीं थी.”
छोटू निकोल्का ने खिड़की की ओर देखते हुए कहा:
 “ वहां देखिए, वेण्टीलेटर खुला है. शायद बिल्ली कार्निस पर घूम रही थी, इस खुले वेण्टीलेटर पर उसकी नज़र गई और वह कमरे में कूद गई.”
इंजीनियर ने कहा:
 “तो फिर ये वापस क्यों नहीं गई?”
छोटी बच्ची तमारा ने कहा:
  “मगर हमने उसे बहुत बढ़िया खाना खिलाया, बस, इसीलिए उसने जाने का इरादा बदल दिया. उसे यहाँ बहुत अच्छा लगा. “
इंजीनियर ने कहा:
 “आह, कितना बढ़िया, होशियार बिल्ली है! तो, मैं इसे अपने यहाँ रख लेता हूँ.”
छोटी बच्ची तमारा बोली:
 “नहीं, इसे तो मैंने अपने पास रखने का फ़ैसला किया है.”
अब तो बिल्डिंग वाले हँस पड़े और बोले:
 “हाँ, ये बिल्ली तो तमारा की हुई, क्योंकि तमारा ने ही सोचा कि उसे कैसे खाना खिलाया जाए, और इस तरह उसने इसकी जान बचाई.”
इंजीनियर ने कहा:
 “ठीक है. और मैं, अपनी ओर से तमारा को, इसके अलावा दस संतरे भी देता हूँ, जो मैं साउथ से लाया हूँ.”
और उसने तमारा को दस संतरे इनाम में दिये.

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

Kissa Bevakoofee ka

किस्सा बेवकूफ़ी का
लेखक: मिखाईल ज़ोशेन्का
अनु. : आ. चारुमति रामदास

अब पेत्या कोई उतना छोटा बच्चा नहीं था. वह चार साल का था. मगर मम्मा उसे बिल्कुल नन्हा बच्चा ही समझती थी. वह उसे चम्मच से खिलाती, हाथ पकड़ कर घुमाने ले जाती और सुबह ख़ुद ही उसे कपड़े पहनाती. तो, उसने पेत्या को कपड़े पहनाए और उसे पलंग के पास खड़ा किया. मगर पेत्या अचानक गिर गया. मम्मा ने सोचा कि वो शरारत कर रहा है, और उसने दुबारा उसे खड़ा किया. मगर वह फिर से गिर गया. मम्मा को बड़ा अचरज हुआ और उसने तीसरी बार उसे पलंग के पास खड़ा किया. मगर बच्चा फिर से गिर गया.
मम्मा बहुत डर गई और उसने पापा को ऑफ़िस में फोन किया.
उसने पापा से कहा, “फ़ौरन घर आओ. हमारे नन्हे को कुछ हो गया है – वो पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा है.”
पापा आए और बोले, “ये सब बेवकूफ़ी है. हमारा बच्चा अच्छी तरह चलता है और दौड़ता है, और ये हो ही नहीं सकता कि वह गिर जाए.”
और उन्होंने फ़ौरन बच्चे को कार्पेट पर खड़ा कर दिया. बच्चा अपने खिलौनों के पास जाना चाहता है, मगर फिर, चौथी बार, गिर जाता है.
पापा बोले, “डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा. शायद हमारा बच्चा बीमार हो गया है. शायद उसने कल ज़्यादा चॉकलेट्स खा ली हैं.”
डॉक्टर को बुलाया गया.
डॉक्टर आते हैं, चश्मा पहने, स्टेथोस्कोप लगाए. डॉक्टर पेत्या से कहते हैं:
 “ ये क्या बात हुई! तू गिर क्यों रहा है?”
पेत्या ने कहा, “मालूम नहीं क्यों, मगर थोड़ा थोड़ा गिर जाता हूँ.”
डॉक्टर मम्मा से कहते हैं:
  “बच्चे के कपड़े उतारिए, मैं अभी इसे देख लेता हूँ.”
मम्मा ने पेत्या के कपड़े उतार दिए, और डॉक्टर स्टेथोस्कोप से उसके दिल की धड़कन सुनने लगे.
डॉक्टर ने अपनी ट्यूब से उसकी धड़कन सुनी और बोले:
 “बच्चा बिल्कुल तन्दुरुस्त है. अचरज की बात है कि ये गिर क्यों रहा है. इसे फिर से कपड़े पहनाइए और खड़ा कर दीजिए.
मम्मा ने जल्दी जल्दी उसे कपड़े पहनाए और फर्श पर खड़ा कर दिया. और डॉक्टर ने फ़ौरन चश्मा पहन लिया जिससे अच्छी तरह देख सके कि बच्चा कैसे गिरता है.
मगर जैसे ही बच्चे को खड़ा किया गया – वह फ़ौरन फिर से गिर पड़ा.
डॉक्टर को बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने कहा, “प्रोफेसर को बुलाइए. हो सकता है कि प्रोफेसर ही कुछ अन्दाज़ लगा सकें, कि ये बच्चा गिर क्यों रहा है.”
पापा प्रोफेसर को फोन करने गए, और तभी पेत्या के पास उसका दोस्त छोटू कोल्या आया.
कोल्या ने पेत्या को देखा,  वह हँसने लगा और बोला:
 “मुझे मालूम है कि आपका पेत्या बारबार क्यों गिर रहा है.”
डॉक्टर बोले:
 “देखिए, कैसा छोटा सा वैज्ञानिक मिला है – ये मुझ से बेहतर जानता है कि बच्चे क्यों गिरते हैं.”
कोल्या ने कहा:
 “ज़रा देखिए तो सही, पेत्या ने कपड़े कैसे पहने हैं. पतलून का एक पाँव झूल रहा है, और दूसरे में दोनों पैर घुसे हुए हैं. इसीलिए वह गिर रहा है.”
अब तो सभी ‘आह!, आह!! और ‘ओह, ओह!!’ करने लगे. पेत्या बोला:
 “ये मम्मा ने मुझे कपड़े पहनाए हैं.”
डॉक्टर ने कहा:
 “प्रोफेसर को बुलाने की ज़रूरत नहीं है. अब समझ में आ गया है कि बच्चा क्यों बार बार गिर रहा है.”
मम्मा ने कहा, “सुबह मैं बहुत जल्दी में थी, उसके लिए पॉरिज जो बनाना था; और इस समय मैं बेहद परेशान थी, और इसीलिए मैंने उसको पतलून गलत पहना दी.”
कोल्या ने कहा, “मैं हमेशा ख़ुद ही कपड़े पहनता हूँ, और मेरे पैरों के साथ ऐसी बेवकूफ़ी कभी नहीं होती. बड़े लोग हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ करते ही रहते हैं.”
पेत्या ने कहा, “अब से मैं भी ख़ुद ही अपनी ड्रेस पहना करूँगा.”
सब हँसने लगे. और डॉक्टर भी हँसने लगे. उन्होंने सबसे बिदा ली, और कोल्या से भी बिदा ली.. और वे अपने काम पर चले गए. पापा ऑफ़िस चले गए. मम्मा किचन में चली गई. और कमरे में कोल्या और पेत्या रह गए.  वे खिलौनों से खेलने लगे.
दूसरे दिन पेत्या ने ख़ुद ही पतलून पहनी, और इसके बाद उसके साथ कभी भी कोई बेवकूफ़ी नहीं हुई.


...    

सोमवार, 5 अगस्त 2013

...And what I don't like!

...और मुझे क्या अच्छा नहीं लगता !
लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

अगर कोई चीज़ मुझे अच्छी नहीं लगती तो वो है दाँतों का इलाज करवाना. जैसे ही दाँतों वाली कुर्सी देखता हूँ, दिल एकदम दुनिया के दूसरे छोर पर भाग जाना चाहता है. ये भी अच्छा नहीं लगता, कि जब मेहमान आते हैं और मुझे कुर्सी पर खड़े होकर कविताएँ सुनानी पड़ती हैं.
मुझे अच्छा नहीं लगता जब मम्मी और पापा थियेटर जाते हैं.
फेंटे हुए अंडे तो मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता, जब उन्हें गिलास में फेंटते हैं, उसमें ब्रेड के बारीक टुकड़े डालते हैं और ज़बर्दस्ती खिलाते हैं.
और ये भी अच्छा नहीं लगता कि मम्मा मेरे साथ घूमने निकलती है और उसे अचानक रोज़ा आंटी मिल जाती है!
तब वो सिर्फ एक दूसरे से ही बातें करती रहती हैं, और मैं समझ ही नहीं पाता कि अब करूँ तो क्या करूँ.
नई ड्रेस में घूमना अच्छा नहीं लगता – मैं उसमें काठ की तरह हो जाता हूँ.
जब हम लाल सैनिकों और श्वेत सैनिकों का खेल खेलते हैं, तो मैं श्वेत सैनिक बनना पसन्द नहीं करता. तब मैं बस खेल छोड़ कर भाग जाता हूँ! और जब मैं लाल सैनिक बनता हूँ, तो मैं कैदी बनना पसन्द नहीं करता. मैं कैसे भी भाग ही जाता हूँ.
जब मैं हारने लगता हूँ, तो मुझे अच्छा नहीं लगता.
जब जन्म दिन होता है, तब ‘राऊण्ड-लोफ़’ खेलना अच्छा नहीं लगता : मैं अब छोटा तो नहीं हूँ.
अच्छा नहीं लगता जब लड़के डींगे मारते हैं.
और मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता, जब मेरी उँगली कट जाती है, और ऊपर से मरहम लगाना पड़ता है.
 मुझे ये अच्छा नहीं लगता कि हमारा कॉरीडोर बहुत तंग है और बड़े लोग हर घड़ी इधर उधर दौड़ते रहते हैं, कोई बर्तन लिए होता है, या चाय की केतली, और चिल्लाते हैं:
 “बच्चों, पैरों के बीच में मत घुसो! होशियार, मेरे हाथ में गरम-गरम बर्तन है!”
और जब मैं सोने के लिए लेटता हूँ, तो मुझे अच्छा नहीं लगता कि पड़ोस के कमरे में समूह में गाते है:
   
लिली के फूल, लिली के फूल...


मुझे ये बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगती कि रेडियो पर लड़के और लड़कियाँ बड़े आदमियों जैसी आवाज़ों में बोलते हैं!...

रविवार, 4 अगस्त 2013

Sab se Khaas Baat

सबसे ख़ास बात
लेखक: मिखाईल ज़ोशेन्का
अनुवाद : आ. चारुमति रामदास

इस दुनिया में अन्द्र्यूशा रीझेन्की नाम का एक लड़का रहता था. वह बड़ा डरपोक था. वह हर चीज़ से डरता था. वह कुत्तों से डरता था, गायों से डरता था, बत्तखों से, चूहों से, मकड़ियों से और यहाँ तक कि मुर्गों से भी डरता था. मगर सबसे ज़्यादा वह दूसरे बच्चों से डरता था. और इस बच्चे की माँ बहुत बहुत दुखी रहती थी कि उसका बेटा इतना डरपोक है.
एक ख़ूबसूरत सुबह इस बच्चे की माँ ने उससे कहा, “आह, कितनी बुरी बात है कि तू हर चीज़ से डरता है! इस दुनिया में सिर्फ़ बहादुर लोग ही अच्छी तरह जीते हैं. सिर्फ़ वे ही दुश्मनों को हराते हैं, आग बुझाते हैं और साहस से हवाई जहाज़ों में उड़ते हैं. इसलिए बहादुर लोगों को सभी प्यार करते हैं. और सब उनकी इज़्ज़त करते हैं और उन्हें इनाम और मेडल्स देते हैं. मगर डरपोक लोगों को कोई प्यार नहीं करता. उन पर हँसते हैं और उनका मज़ाक उड़ाते हैं. इस वजह से उनकी ज़िन्दगी बहुत ख़राब हो जाती है, बोरिंग हो जाती है, और बिल्कुल दिलचस्प नहीं होती.
अन्द्र्यूशा ने अपनी माँ को जवाब दिया:

“मम्मा, अब से मैंने बहादुर आदमी बनने का फ़ैसला कर लिया है. और इतना कहकर अन्द्र्यूशा आँगन में घूमने चला गया. आँगन में बच्चे फुटबॉल खेल रहे थे. ये बच्चे, हमेशा की तरह, अन्द्र्यूशा को चिढ़ाने लगे. वह तो उनसे यूँ डरता था, जैसे वे आग हों. हमेशा उनसे दूर भागता था. मगर आज वह भागा नहीं. वह चिल्लाकर उनसे बोला, “ऐ तुम, लड़कों! आज मैं तुमसे नहीं डरूँगा! “ बच्चों को बड़ा अचरज हुआ, कि अन्द्र्यूशा इतने साहस से चिल्ला रहा है. वे कुछ डर भी गए. और उनमें से एक – सान्का पालोच्किन- कहने लगा,
 “आज अन्द्र्यूश्का रीझेन्की हमारे ख़िलाफ़ कुछ सोचकर आया है. चलो, बेहतर है कि यहाँ से चले जाएँ, वर्ना वह हमें मारेगा. मगर लड़के गए नहीं. उनमें से एक ने अन्द्र्यूशा की नाक पकड़ कर खींची. दूसरे ने उसके सिर से क़ैप खींच कर गिरा दी. तीसरे ने अन्द्र्यूशा को मुक्का मारा. मतलब – उन्होंने अन्द्र्यूशा को थोड़ा बहुत मारा, और वह रोते हुए घर पहुँचा. और घर में, आँसू पोंछते हुए, मम्मा से बोला, “मम्मा आज तो मैं बहादुर बना था, मगर इससे तो कुछ भी अच्छा नहीं हुआ.”
मम्मा ने कहा, “बेवकूफ़ लड़का! सिर्फ बहादुर होना ही काफ़ी नहीं है, साथ में ताक़तवर भी होना पड़ता है. अकेली बहादुरी से कुछ नहीं किया जा सकता.
तब अन्द्र्यूशा ने मम्मा की नज़र बचा कर दादी की छड़ी ली और इस छड़ी के साथ वह आँगन में गया. सोचने लगा, ‘अब मैं हमेशा से ज़्यादा ताक़तवर बनूंगा. अब अगर लड़के मुझ पर हमला करेंगे तो मैं उन्हें इधर उधर भगा दूँगा.’
अन्द्र्यूशा छड़ी के साथ आँगन में निकला. मगर आँगन में बच्चे थे ही नहीं.
वहाँ एक काला कुत्ता घूम रहा था, जिससे अन्द्र्यूशा हमेशा डरता था. छड़ी घुमाते हुए अन्द्र्यूशा ने कुत्ते से कहा, “ अब मुझ पर भौंक कर तो दिखा – ज़ोर की पड़ेगी. जब ये तेरे थोबड़े पर बरसेगी, तो पता चलेगा कि छड़ी क्या होती है.” कुत्ता भौंकने लगा और अन्द्र्यूशा पर झपटने लगा. छड़ी घुमाते हुए, अन्द्र्यूशा ने दो बार कुत्ते के सिर पर मारा, मगर उसने पीछे की ओर भागकर अन्द्र्यूशा की पतलून थोड़ी सी फाड़ दी.
अन्द्र्यूशा रोते हुए घर भागा. और घर में, आँसू पोंछते हुए मम्मा से कहने लगा,
“मम्मा, ऐसा कैसे हो गया? आज तो मैं बहादुर भी बना और ताक़तवर भी. मगर इससे तो कुछ भी अच्छा नहीं हुआ. कुत्ते ने मेरी पतलून फाड़ दी; वो तो मुझे काटने ही वाला था.”
मम्मा ने कहा, “आह तू, बेवकूफ़ लड़का! सिर्फ बहादुर और ताक़तवर होना ही काफ़ी नहीं है. थोड़ी अकल भी होनी चाहिए. सोचना चाहिए, और अन्दाज़ लगाना चाहिए. तूने तो बेवकूफ़ी कर दी. तूने छड़ी घुमाई और ऐसा करके कुत्ते को गुस्सा दिला दिया. इसीलिए उसने तेरी पतलून फाड़ दी. तू ख़ुद ही क़ुसूरवार है.
अन्द्र्यूशा ने अपनी मम्मा से कहा,
“ अब से हर बार जब कुछ होता है, तो मैं सोचा करूँगा,.”
अन्द्र्यूशा अब तीसरी बार घूमने निकला. मगर आँगन में अब कुत्ता ही नहीं था. लड़के भी नहीं थे. तब अन्द्र्यूशा रीझेन्की बाहर रास्ते पर निकला, ये देखने के लिए कि लड़के कहाँ हैं.
बच्चे तो नदी में नहा रहे थे. अन्द्र्यूशा देखने लगा कि वे कैसे नहा रहे हैं.
इसी समय एक लड़का, सान्का पालोच्किन, पानी में डुबकियाँ लगाने लगा और चिल्लाने लगा, “ओय, बचाओ, डूब रहा हूँ!”
और सारे लड़के डर गए कि वो डूब जायेगा, और वे बड़े लोगों को बुलाने के लिए भागे, जिससे कि वे सान्का को बचाएँ.
अन्द्र्यूशा रीझेन्की ने चिल्लाकर सान्का से कहा, “थोड़ा रुक जा! अभी मत डूब! मैं तुझे अभी बचाता हूँ.”
अन्द्र्यूशा पानी में छलांग लगाना चाहता था, मगर फिर उसने सोचा, “ओय, मैं कोई ख़ास तो नहीं तैरता, और मुझमें सान्का को बचाने लायक ताक़त भी नहीं है. मैं कुछ अकलमन्दी से काम करूँगा : मैं नाव में बैठूंगा और तैर कर सान्का के पास जाऊँगा.”
किनारे पर ही मछली पकड़ने वाली नाव थी. अन्द्र्यूशा ने नाव को किनारे से धकेला और उछल कर उसमें बैठ गया. नाव में चप्पू पड़े थे. अन्द्र्यूशा ने चप्पुओं से पानी पर मारना शुरू कर दिया. मगर कुछ भी न हुआ : उसे नाव खेना तो आता ही नहीं था. पानी का बहाव मछली पकड़ने वाली नाव को नदी के बीचोंबीच ले गया. अब तो अन्द्र्यूशा डर के मारे चिल्लाने लगा.
इसी समय नदी में एक और नाव तैर रही थी. इस नाव में लोग बैठे थे. इन लोगों ने सान्या पालोच्किन को बचा लिया. और, इसके अलावा, इन लोगों ने मछली पकड़ने वाली नाव को भी पकड़ लिया और उसे अपने पीछे बांध कर किनारे पर ले आए.
अन्द्र्यूशा घर गया और घर में, आँसू पोंछते हुए, मम्मा से कहने लगा, “ मम्मा, आज मैं बहादुरी दिखा रहा था, मैं एक लड़के को बचाना चाहता था. आज मैंने अकलमन्दी से भी काम लिया, क्योंकि मैं एकदम नदी में नहीं कूदा, बल्कि नाव मैं बैठकर गया. आज मैं ताक़तवर भी था, क्योंकि मैंने भारी नाव को धकेला और भारी भारी चप्पुओं से पानी में मारता रहा. मगर मुझ से कुछ भी न हो सका.”
मम्मा ने कहा, “ बेवकूफ़ बच्चा! मैं तो तुझे सबसे ख़ास बताना ही भूल गई. बहादुर होना, ताक़तवर होना और अकलमन्द होना ही काफ़ी नहीं है. ये सब भी कम ही है. आदमी को ज्ञान होना चाहिए. चप्पू चलाना आना चाहिए, तैरना आना चाहिए, घुड़सवारी करना आना चाहिए, हवाई जहाज़ उड़ाना आना चाहिए. बहुत कुछ जानना चाहिए. अंकगणित आना चाहिए, बीजगणित आना चाहिए, रसायन शास्त्र और ज्यॉमेट्री भी आना चाहिए. और यह सब जानने के लिए पढ़ना चाहिए. जो पढ़ाई करता है, वो अकलमन्द हो जाता है. और जो अकलमन्द होता है, वह बहादुर होगा ही होगा. अकलमन्द और बहादुर लोगों को सभी प्यार करते हैं, क्योंकि वे दुश्मनों को हराते हैं, आग बुझाते हैं, लोगों को बचाते हैं और हवाई जहाज़ उड़ाते हैं.”

 “अब से मैं हर चीज़ सीखूंगा.”

और मम्मा ने कहा, “ये हुई न अच्छी बात!”

शनिवार, 3 अगस्त 2013

Seryojha - 17

अध्याय 17
प्रस्थान का दिन


जाने का दिन आ गया.

एक उदास दिन. बगैर सूरज का, बगैर बर्फ़ का. बर्फ़ तो ज़मीन पर रात भर में पिघल गई, सिर्फ़ उसकी पतली सतह छतों पर पड़ी थी. भूरा आसमान. पानी के डबरे. कहाँ की स्लेज : आंगन में निकलना भी जान पर आ रहा है.
और ऐसे मौसम में किसी भी चीज़ की उम्मीद नहीं कर सकते. मुश्किल से ही कोई अच्छी चीज़ हो सकती है...
मगर फिर भी कोरोस्तेल्योव ने स्लेज को नई डोरी बांध दी थी – सिर्योझा ने ड्योढ़ी में झाँक कर देखा – डोरी बांध दी गई थी.
मगर ख़ुद कोरोस्तेल्योव जल्दी जल्दी कहीं भागा.
मम्मा बैठी थी और ल्योन्या को खिला रही थी. वह बस उसे खिलाती ही रहती है, खिलाती ही रहती है...मुस्कुराते हुए उसने सिर्योझा से कहा:
 “देख, कैसी मज़ेदार नाक है इसकी!”
सिर्योझा ने देखा : नाक जैसी तो नाक है. ‘उसे इसकी नाक इसलिए अच्छी लगती है,’ सिर्योझा ने सोचा, ‘क्योंकि वह इससे प्यार करती है. पहले वह मुझे प्यार करती थी, मगर अब इसे प्यार करती है.’
और वह पाशा बुआ के पास चला गया. चाहे वह कितनी ही अंधविश्वासी हो, मगर वह उसके साथ रहेगी और उसे प्यार करती रहेगी.
 “तुम क्या कर रही हो?” उसने उकताई हुई आवाज़ में पूछा.
 “क्या देख नहीं रहे हो,” पाशा बुआ ने तर्कपूर्ण उत्तर दिया, “कि मैं कटलेट्स बना रही हूँ?”
 “इतने सारे क्यों?”
 किचन की पूरी मेज़ पर कच्चे गीले कटलेट्स बिखरे पड़े थे, ब्रेड के चूरे में लिपटे हुए.
 “क्योंकि हम सब को खाने के लिए चाहिए और जाने वालों को रास्ते के लिए.”
 “वे जल्दी चले जाएँगे?” सिर्योझा ने पूछा.
 “इतनी जल्दी नहीं. शाम को.”
 “कितने घंटे बाद?”
 “अभी बहुत सारे घंटों के बाद. अंधेरा हो जाएगा, तब ही जाएँगे. और जब तक उजाला है – नहीं जाएँगे.”
वह कटलेट्स बनाती रही, और वह खड़ा था, माथा मेज़ की किनार पर टिकाए, सोच रहा था.
’लुक्यानिच भी मुझे प्यार करता है, और वह और भी प्यार करने लगेगा, खूब खूब प्यार करेगा....मैं लुक्यानिच के साथ नाव में जाऊँगा और डूब जाऊँगा. मुझे धरती में गाड़ देंगे, जैसे परदादी को किया था. कोरोस्तेल्योव को और मम्मा को पता चलेगा और वे रोएँगे, और कहेंगे: हम उसे अपने साथ क्यों नहीं लाए, वह कितना समझदार, कितना आज्ञाकारी लड़का था; रोता नहीं था, दिमाग़ नहीं चाटता था, ल्योन्या तो उसके सामने – छिः नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए कि मुझे धरती में गाड़ दें, ये बड़ा डरावना होगा : अकेले पड़े रहो वहाँ...हम तो यहीं अच्छे से रहेंगे, लुक्यानिच मेरे लिए सेब और चॉकलेट लाया करेगा; मैं बड़ा हो जाऊँगा और दूर के जहाज़ का कप्तान बनूँगा, और कोरोस्तेल्योव और मम्मा बड़ी बुरी तरह रहेंगे, और फिर एक ख़ूबसूरत दिन वे आएँगे और कहेंगे : प्लीज़, लकड़ी काटने की इजाज़त दीजिए. और मैं कहूँगा पाशा बुआ से : इन्हें कल का सूप दे दो...’

यहाँ सिर्योझा को इतना दुख हुआ, कोरोस्तेल्योव और मम्मा पर इतनी दया आई कि वह आँसुओं से नहा गया. मगर जैसे ही पाशा बुआ चहकी, ‘हे मेरे भगवान!’ उसे अपना वादा याद आ गया जो उसके कोरोस्तेल्योव से किया था:
 “मैं फिर नहीं रोऊँगा!”
नास्त्या दादी आई अपने काले थैले के साथ और उसने पूछा, “मीत्या घर पर है?”
 “गाड़ी का इंतज़ाम करने गया है,” पाशा बुआ ने जवाब दिया. “अवेर्किएव दे ही नहीं रहा है, ऐसा बदमाश है.”
 “वो क्यों बदमाश होने लगा,” नास्त्या दादी ने कहा. “उसे ख़ुद को अपने काम के लिए कार की ज़रूरत है, ये हुई पहली बात. और दूसरी बात यह कि वह लॉरी तो दे रहा है न. सामान के साथ – इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है.”
 “सामान – बेशक,” पाशा बुआ ने कहा, “मगर मार्याशा को बच्चे के साथ कार में ज़्यादा अच्छा रहता.”
 “सिर पर चढ़ गए हैं, बहुत ज़्यादा,” नास्त्या दादी ने कहा. “हम तो बच्चों को कभी किसी गाड़ी-वाड़ी में नहीं ले गए, न तो कारों में, न लॉरियों में, और ऐसे ही उन्हें बड़ा कर दिया. बच्चे को लेकर कैबिन में बैठ जाएगी, और बस.”
सिर्योझा धीरे धीरे आँखें मिचकाते हुए सुन रहा था. वह जुदाई के ख़ौफ़ में डूबा हुआ था, जो अटल थी. उसके भीतर की हर चीज़ इकट्ठा हो रही थी, तन गई थी, जिससे कि इस आने वाले दुख का सामना कर सके. चाहे कैसे भी जाएँ, मगर वे जल्दी ही चले जाएँगे, उसे छोड़कर, मगर वह उन्हें प्यार करता है.
 “ये मीत्या क्या कर रहा है,” नास्त्या दादी ने कहा, “ मैं बिदा लेना चाहती थी.”
 “आप उन्हें छोड़ने नहीं जाएँगी?” पाशा बुआ ने पूछा.
 “मुझे एक कॉन्फ्रेंस में जाना है,” नास्त्या दादी ने जवाब दिया और वह मम्मा के पास गई. और ख़ामोशी छा गई. और आँगन में सब कुछ धूसर हो गया, और हवा चलने लगी. हवा से खिड़की की काँच थरथराते हुए झंकार कर रही थी. पानी के डबरे बर्फ़ की पतली सफ़ॆद चादर में बदल रहे थे.. और फिर से बर्फ़ गिरने लगी, हवा में तेज़ी से गोल-गोल घूमते हुए.
 “और अब कितने बचे हैं घंटे?” सिर्योझा ने पूछा.
 “अब कुछ कम हैं,” पाशा बुआ ने जवाब दिया, “मगर फिर भी अभी काफ़ी हैं.”
...नास्त्या दादी और मम्मा डाईनिंग रूम में, फ़र्नीचर के ढेर के बीच खड़े होकर बातें कर रही थीं.
 “ओह, कहाँ है वो,” नास्त्या दादी ने कहा, “ कहीं बिना मिले ही तो नहीं चला जाएगा, क्योंकि मालूम नहीं है कि उसे फिर से देख सकूँगी या नहीं.”
 ‘वह भी डरती है,’ सिर्योझा ने सोचा, ‘कि वे हमेशा के लिए चले जाएँगे और कभी वापस नहीं लौटेंगे.’
और उसने ग़ौर किया कि बिल्कुल अंधेरा हो चुका है, जल्दी ही लैम्प जलाना पड़ेगा.
ल्योन्या रोने लगा. मम्मा उसके पास भागी, सिर्योझा से क़रीब क़रीब टकराते टकराते बची और प्यार से उससे बोली, “तुम किसी चीज़ से अपना दिल बहलाओ, सिर्योझेन्का.”
वह तो ख़ुद ही अपना दिल बहलाना चाहरहा था और ईमानदारी से उसने कोशिश की पहले बंदरिया से, फिर क्यूब्स से खेलने की, मगर कुछ नहीं हुआ : बिल्कुल दिल नहीं लग रहा था और सब कुछ बड़ा नीरस लग रहा था. किचन का दरवाज़ा धड़ाम् से खुला, पैरों की दन् दन् आवाज़ें सुनाई दीं और कोरोस्तेल्योव की ज़ोरदार आवाज़ सुनाई दी:
 “चलो, खाना खा लें. एक घंटे बाद गाड़ी आएगी.”
 “क्या ‘मस्क्विच’ कार मिली?” नास्त्या दादी ने पूछा.
कोरोस्तेल्योव ने जवाब दिया, “ओह, नहीं. नहीं दे रहे हैं. भाड़ में जाएँ. लॉरी में ही जाना पड़ेगा.”
सिर्योझा आदत के मुताबिक इस आवाज़ को सुनकर ख़ुश होने ही वाला था और उछलने वाला था, मगर तभी उसने सोचा : ‘जल्दी ही यह नहीं रहेगी’ और फिर से वह फ़र्श पर बेमतलब क्यूब्स घुमाता रहा. कोरोस्तेल्योव भीतर आया, बर्फ़ के कारण वह लाल हो गया था, ऊपर से उसने सिर्योझा की ओर देखा और अपराध की भावना से पूछा, “क्या हाल है, सिर्गेई?”
...जल्दी जल्दी खाना खाया. नास्त्या दादी चली गई. बिल्कुल अंधेरा हो गया. कोरोस्तेल्योव ने टेलिफोन किया और किसी से बिदा ली.
सिर्योझा उसके घुटनों से चिपक कर खड़ा था और बिल्कुल हिल डुल नहीं रहा था – और कोरोस्तेल्योव, बातें करते हुए अपनी लंबी लंबी उँगलियाँ उसके बालों में फेर रहा था...
ड्राईवर तिमोखिन आया और उसने पूछा,
 “तो, सब तैयार है? फ़ावड़ा दीजिए, बर्फ़ साफ़ करना होगा, वर्ना फाटक नहीं खुलेगा.”
लुक्यानिच उसके साथ फाटक खोलने गया. मम्मा ने ल्योन्या को पकड़ा और उसे कंबल में लपेटने लगी.
कोरोस्तेल्योव ने कहा,
 “जल्दी मत करो. उसे पसीना आ जाएगा. आराम से कर लेना.”
तिमोखिन और लुक्यानिच के साथ मिलकर वह बंधी हुई चीज़ें बाहर ले जाने लगा. दरवाज़े बार-बार खुल रहे थे, कमरों में ठंडक हो गई. सबके जूतों पर बर्फ़ थी, कोई भी पैर नहीं पोंछ रहा था, और पाशा बुआ भी कुछ कह नहीं रही थी – वह समझ रही थी कि अब पैर पोंछने से भी कोई फ़ायदा नहीं है! फ़र्श पर पानी के डबरे बन गए थे, वह गंदा और गीला हो गया था. बर्फ़ की, टाट की, तंबाकू की और तिमोखिन के भेड़ की खाल के कोट से कुत्ते की गंध आ रही थी. पाशा बुआ भाग भाग कर हिदायतें दे रही थी. मम्मा ल्योन्या को हाथों में लिए सिर्योझा के पास आई, एक हाथ में उसने सिर्योझा का सिर लिया और उसे अपने पास चिमटा लिया; वह दूर हो गया : वह उसे अपनी बाँहों में क्यों ले रही है, जबकि वह उससे दूर जाना चाहती है.
सारा सामान बाहर ले जाया गया : फ़र्नीचर, सूटकेस, खाने की थैलियाँ, और ल्योन्या के लंगोटों की बैग. कितना खाली खाली लग रहा है कमरों में! सिर्फ़ थोड़े बहुत कागज़ पड़े हैं. और दिखाई दे रहा है कि घर पुराना है, कि फ़र्श का रंग उड़ गया है और वह सिर्फ़ उसी जगह बचा है जहाँ अलमारी और छोटी मेज़ रखी थी.
 “पहन लो, बाहर आँगन में ठंड है,” लुक्यानिच ने पाशा बुआ को कोट देते हुए कहा. सिर्योझा एकदम चौंक गया और चीख़ते हुए उनकी ओर भागा, “मैं भी आँगन में जाऊँगा! मैं भी आँगन में जाऊँगा!”
 “अरे, ऐसे कैसे, ऐसे कैसे! तू भी चलेगा, तू भी!” पाशा बुआ ने उसे शांत करते हुए कहा और उसे गरम कपड़े पहनाए. तब तक मम्मा ने और कोरोस्तेल्योव ने भी कोट पहन लिए. कोरोस्तेल्योव ने सिर्योझा को एक हाथ से उठाया, कस कर उसे चूमा और फिर निर्णयातमक आवाज़ में कहा, “ फिर मिलेंगे, दोस्त. तंदुरुस्त रहना और याद रखना कि हमने किस बारे में फ़ैसला किया था.”
मम्मा सिर्योझा को चूमने लगी और रो पड़ी,
 “सिर्योझेन्का! मुझसे दस्विदानिया (फिर मिलेंगे) कहो!”
 “दस्विदानिया, दस्विदानिया!” उसने जल्दी जल्दी कहा, वह परेशानी से और इस जल्दबाज़ी से हाँफ रहा था, और उसने कोरोस्तेल्योव की ओर देखा. और उसे इनाम मिल गया – कोरोस्तेल्योव ने कहा, “तुम मेरे बहादुर बेटे हो, सिर्योझ्का!”
और लुक्यानिच और पाशा बुआ से मम्मा ने रोते हुए कहा, “आपका बहुत बहुत धन्यवाद, हर चीज़ के लिए.”
 “कोई बात नहीं,” दुखी होकर पाशा बुआ ने जवाब दिया.
 “सिर्योझ्का का ध्यान रखना.”
 “इस बारे में बिल्कुल बेफिक्र रहो,” पाशा बुआ ने जवाब दिया और और भी अधिक दुखी होकर अचानक चीखी:
 “हम कुछ देर बैठना भूल गए! बैठना ज़रूरी है!” (सफ़र पर जाने वाले और उन्हें बिदा करने वाले कुछ पल ख़ामोश बैठते हैं. यह सफ़र को सुखद बनाने की भावना से किया जाता है – अनु.)
 “मगर कहाँ?” लुक्यानिच ने आँखें पोंछते हुए पूछा.
” हे मेरे भगवान!” पाशा बुआ ने कहा. “चलो, हमारे कमरे में चलो!”
सब वहाँ गए, इधर उधर बैठे और न जाने क्यों, कुछ देर बैठे रहे – ख़ामोश, एक पल के लिए. पाशा बुआ सबसे पहले उठी और बोली,
 “भगवान आपकी रक्षा करे.”
वे बाहर ड्योढ़ी में आए. बर्फ गिर रही थी, सब कुछ सफ़ेद था. फाटक पूरा खुला था. शेड की दीवार पर मोमबत्ती वाली लालटेन लटक रही थी, वह रोशनी बिखेर रही थी., बर्फ़ के गुच्छे उसकी रोशनी में गिरते हुए दिखाई दे रहे थे. सामान से भरी लॉरी आंगन के बीचोंबीच खड़ी थी. तिमोखिन ने सामान पर तिरपाल डाल दिया, शूरिक उसकी मदद कर रहा था. चारों ओर लोग जमा हो गए थे : वास्का की माँ, लीदा और कुछ और भी लोग जो मम्मा और कोरोस्तेल्योव को बिदा करने आए थे. और वे सब – और अपने चारों ओर की हर चीज़ सिर्योझा को पराई लग रही थी, जैसे उसने उन्हें कभी देखा ही न हो. आवाज़ें भी अनजान लग रही थीं. पराया था यह आँगन...जैसे कि उसने इस शेड को कभी देखा ही नहीं था. जैसे इन बच्चों के साथ वह कभी खेला ही नहीं था. जैसे इस चाचा ने इस लॉरी में उसे कभी घुमाया ही नहीं था. जैसे कि उसका, जिसे फेंक दिया गया हो, अपना कुछ भी नहीं था और हो भी नहीं सकता था.           
 “जान पे आ रह है गाड़ी चलाना,” अनजान आवाज़ में तिमोखिन ने कहा. “बहुत फ़िसलन है.”
कोरोस्तेल्योव ने मम्मा और ल्योन्या को कैबिन में बिठाया और शॉल से लपेट दिया : वह उन्हें सबसे ज़्यादा प्यार करता था, वह इस बात की फ़िक्र करता था कि वे ठीक ठाक रहें ..और वह ख़ुद लॉरी में ऊपर चढ़ गया और वहाँ खड़ा रहा, बड़ा, जैसे कोई स्मारक हो.
 “तुम तिरपाल के नीचे जाओ मीत्या! तिरपाल के नीचे!” पाशा बुआ चीखी, “वर्ना बर्फ़ की मार लगेगी!”
उसने उसकी बात नहीं सुनी, और बोला,
 “सिर्गेई, एक ओर को सरक जाओ. कहीं गाड़ी तुम पर न चढ़ जाए.”
लॉरी घरघराने लगी. तिमोखिन कैबिन में चढ़ गया. लॉरी और ज़ोर से घरघराने लगी, अपनी जगह से हिलने की कोशिश करते हुए...ये सरकी : पीछे गई, फिर आगे और फिर पीछे. अब वो चली जाएगी, फाटक बन्द कर देंगे, लालटेन बुझा देंगे, और सब कुछ ख़त्म हो जाएगा.
सिर्योझा एक ओर को, बर्फ के नीचे खड़ा था. वह पूरी ताक़त से अपने वचन को याद कर रहा था और सिर्फ कभी कभी लंबी, आशाहीन सिसकियाँ ले रहा था. और एक – इकलौता आँसू उसकी बरौनियों पर फिसला और लालटेन की रोशनी में चमकने लगा – एक कठिन आँसू, बच्चे का नहीं, बल्कि लड़के का, कड़वा, तीखा और स्वाभिमानी आँसू...
और अधिक वहाँ रुकने में असमर्थ, वह मुड़ा और घर की ओर चल पड़ा, दुख से झुका हुआ.
 “रुको!” बदहवासी से कोरोस्तेल्योव चिल्लाया और तिमोखिन के ऊपर की छत पर ज़ोर ज़ोर से खटखटाने लगा. “सिर्गेई! जल्दी! फ़ौरन! सामान इकट्ठा कर! तू चलेगा!”
और वह ज़मीन पर कूदा.
 “जल्दी! क्या क्या है? कपड़े वगैरह. खिलौने. एक दम में इकट्ठा कर. जल्दी!”
 “मीत्या, तू क्या कर रहा है! मीत्या, सोचो! मीत्या, तुम पागल हो गए हो!” पाशा बुआ और कैबिन से बाहर देखते हुए मम्मा कह रही थीं. उसने उत्तेजना और गुस्से से जवाब दिया:
 “बस हो गया. ये क्या हो रहा है, समझ रहे हैं? ये बच्चे को दो भागों में चीरना हो रहा है. आप चाहे जो करें, मैं नहीं कर सकता. बस.”
 “हे भगवान! वह वहाँ मर जाएगा!” पाशा बुआ चीखी.
 “चुप,” कोरोस्तेल्योव ने कहा. “मैं हर चीज़ के लिए ज़िम्मेदार हूँ, समझ में आया? कुछ नहीं मरेगा वो. बेवकूफ़ी है आपकी. चल, चल, सिर्योझा!”
और वह घर के अन्दर भागा.
पहले तो सिर्योझा अपनी जगह पर जम गया : उसे विश्वास नहीं हो रहा था, वह डर गया था.....दिल इतनी ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था कि उसकी आवाज़ सिर तक पहुँच रही थी...फिर सिर्योझा घर में भागा, सारे कमरों में दौड़ लगा ली, हाँफ़ते हुए, भागते भागते बंदरिया को उठाया – और अचानक निराश हो गया, यह तय करके कि शायद कोरोस्तेल्योव ने अपना इरादा बदल दिया हो, मम्मा और पाशा बुआ ने उसका मन बदल दिया हो – और वह फिर से उनके पास भागा. मगर कोरोस्तेल्योव उसके सामने से भाग कर आते हुए कह रहा था, “ चल, जल्दी कर!” उन्होंने मिलकर सिर्योझा की चीज़ें इकट्ठा कीं. पाशा बुआ और लुक्यानिच मदद कर रहे थे. लुक्यानिच ने सिर्योझा का पलंग फोल्ड करते हुए कहा, “मीत्या – ये तुमने बिल्कुल सही किया! शाबाश!”

और सिर्योझा अपनी दौलत में से जो भी हाथ लगता, उत्तेजना से उठाकर डिब्बे में डाल लेता, जो उसे पाशा बुआ ने दिया था. जल्दी! जल्दी! वर्ना अचानक वे चले जाएँगे! वैसे भी यह सही सही जानना बड़ा मुश्किल है कि वे कब क्या करेंगे...दिल तो गले तक आकर धड़क रहा था, साँस लेने और सुनने में भी तकलीफ़ हो रही थी.
 “जल्दी! जल्दी!” वह चिल्लाया, जब पाशा बुआ उसे गरम कपड़ों में लपेट रही थी. और, उसके हाथों से छूटकर वह आँखों से कोरोस्तेल्योव को ढूँढ़ रहा था. मगर लॉरी अपनी जगह पर ही थी, और कोरोस्तेल्योव अभी बैठा भी नहीं था और सिर्योझा को सबसे बिदा लेने को कह रहा था.
और अब, उसने सिर्योझा को उठाया और कैबिन में ठूँस दिया, मम्मा के पास और ल्योन्या के पास, मम्मा की शॉल के नीचे. लॉरी चल पड़ी, और आख़िरकार अब सुकून से बैठा जा सकता था.
कैबिन में भीड़ हो गई थी : एक, दो, तीन – चार आदमी, ओहो! भेड़ के कोट की तेज़ बू आ रही है. तिमोखिन सिगरेट पी रहा है. सिर्योझा खाँस रहा है. वह तिमोखिन और मम्मा के बीच में दबा हुआ बैठा था, कैप उसकी एक आँख पर खिसक गई थी, स्कार्फ़ गला दबा रहा है, और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है, छोटी सी खिड़की को छोड़कर, जिसके बाहर बर्फ़ गिर रही है, हेडलाईट की रोशनी में चमकती बर्फ़. बहुत मुश्किल हो रही है, मगर हमें इसकी परवाह नहीं है : हम जा रहे हैं. सब एक साथ जा रहे हैं, हमारी गाड़ी में, हमारा तिमोखिन हमें ले जा रहा है, और बाहर से, हमारे ऊपर कोरोस्तेल्योव जा रहा है, वह हमें प्यार करता है, वह हमारे लिए ज़िम्मेदार है, उस पर बर्फ़ की मार पड़ रही है, मगर उसने हमें कैबिन में बिठाया है, वह हम सब को खल्मागोरी ले जा रहा है. हे भगवान! हम खल्मागोरी जा रहे हैं. कितनी ख़ुशी की बात है! वहाँ क्या है – यह तो पता नहीं, मगर, शायद बड़ा ख़ूबसूरत ही होगा, क्योंकि हम वहाँ जा रहे हैं! तिमोखिन के हॉर्न की ज़ोरदार आवाज़ आ रही है, और चमकती हुई बर्फ़ खिड़की से सीधे सिर्योझा की ओर आ रही है...
***


गुरुवार, 1 अगस्त 2013

Seryojha - 16

अध्याय 16
प्रस्थान से पूर्व की रात

 कुछ अनजान आदमी आए, डाईनिंग हॉल और मम्मा के कमरे का फ़र्नीचर हटाया और उसे टाट में बांध दिया. मम्मा ने परदे और लैम्प के कवर हटाए, और दीवारों से तस्वीरें निकालीं. और कमरे में सब कुछ बड़ा बिखरा बिखरा, बेतरतीब सा लग रहा था : फ़र्श पर रस्सियों के टुकड़े बिखरे पड़े थे, रंग उड़े हुए वॉल पेपर पर काली चौखटें – वहाँ, जहाँ तस्वीरें लटक रही थीं. इस बेतरतीबी के बीच पाशा बुआ का कमरा और किचन ही द्वीपों जैसे लग रहे थे. नंगे बिजली के बल्ब नंगी दीवारों, नंगी खिड़कियों और भूरे टाट पर चमक रहे थे. एक दूसरे पर रखी कुर्सियों का ढेर बन गया था, जो छत की ओर अपने खुरचे हुए पैर किए थीं.
कोई और समय होता तो वहाँ लुका-छिपी का खेल खेला जा सकता था. मगर अब, इस समय...
वे आदमी रात को देर से गए. सब लोग, थके हुए सोने लगे. और ल्योन्या भी सो गया, शाम को चीख़ा करता था उतना चीख कर. लुक्यानिच और पाशा बुआ बिस्तर में देर तक फुसफुसाते रहे और उनकी नाक सूँ-सूँ करती रही, आख़िर में वे भी ख़ामोश हो गए, और लुक्यानिच के खर्राटों की आवाज़ और पाशा बुआ की नाक से निकलती पतली सीटी सुनाई देने लगी.
कोरोस्तेल्योव अकेला ही टाट से बंधी कुर्सी पर मेज़ के पास नंगे लैम्प के नीचे बैठा था और लिख रहा था. अचानक उसे अपनी पीठ के नीचे गहरी साँस की आवाज़ आई. उसने मुड़ कर देखा – उसके पीछे सिर्योझा खड़ा था लंबी कमीज़ पहने, नंगे पैर और बंधे हुए गले से.
 “तू क्या कर रहा है यहाँ?” फुसफुसाहट से कोरोस्तेल्योव ने पूछा और उठ कर खड़ा हो गया.
 “कोरोस्तेल्योव,” सिर्योझा ने कहा, “मेरे प्यारे, मेरे दुलारे, मैं तुमसे विनती करता हूँ, ओह, प्लीज़, मुझे भी ले चलो!”
और वह दुख से सिसकियाँ लेने लगा, अपने आप को रोकने की कोशिश करते हुए, जिससे सोए हुए लोग उठ न जाएँ.
 “तू, मेरे दोस्त, क्या कर रहा है!” कोरोस्तेल्योव ने उसे हाथों में उठाते हुए कहा. “तुमसे कहा है न – नंगे पैर घूमना मना है, फ़र्श ठंडा है...तुम्हें तो मालूम है, है ना?...हम तो हर चीज़ के बारे में तय कर चुके हैं...”
 “मुझे खल्मागोरी जाना है,” सिर्योझा बिसूरने लगा.
 “देखो ज़रा, पैर तो पूरे जम गए हैं,” कोरोस्तेल्योव ने कहा. सिर्योझा की कमीज़ के किनारे से उसने उसके पैर ढाँक दिए; उसके दुबले-पतले शरीर को, जो सिसकियों के कारण थरथरा रहा था, अपने सीने से चिपटा लिया. “क्या कर सकते हो, समझ रहे हो, अगर ये ऐसे ही चलता रहा तो. अगर तुम हमेशा बीमार पड़ते रहे...”
 “मैं अब और बीमार नहीं पडूँगा!”
“और जैसे ही तुम अच्छे हो जाओगे – मैं फ़ौरन तुम्हें लेने के लिए आ जाऊँगा.”
 “तुम झूठ तो नहीं बोल रहे हो?” दुखी होकर सिर्योझा ने पूछा और उसकी गर्दन में बाँहें डाल दीं.
 “मैंने, दोस्त, आज तक तुमसे कभी झूठ नहीं बोला.”
 ‘सच है, झूठ नहीं बोला,’ सिर्योझा ने सोचा, ‘मगर कभी कभी वह भी झूठ बोलता है, वे सभी कभी कभी झूठ बोलते हैं...और, अगर, अचानक, वह मुझसे झूठ बोल रहा हो तो?’
वह इस मज़बूत मर्दाना गर्दन को पकड़े रहा, जो ठोढ़ी के नीचे चुभ रही थी, जैसे किसी आख़िरी सहारे को छोड़ना नहीं चाह रहा हो. इस आदमी पर उसकी सारी आशाएँ टिकी थीं, और वही उसका रक्षक था, उसका प्यार था. कोरोस्तेल्योव उसे लिए-लिए डाईनिंग रूम में घूम रहा था और फुसफुसा रहा था – रात की ये पूरी बातचीत फुसफुसाहट में ही हो रही थी:
 “...आऊँगा, फिर हम तुम रेल में जाएँगे...रेलगाड़ी तेज़ चलती है. डिब्बे लोगों से खचाखच भरे होते हैं...पता भी नहीं चलेगा कि कब मम्मा के पास पहुँच गए हैं...इंजिन सीटी बजाता है...
 ‘बस, सिर्फ़ उसके पास कभी समय ही नहीं होगा मेरे लिए आने का,’ सिर्योझा दुख से सोच रहा था. ‘और मम्मा के पास भी समय नहीं होगा. हर रोज़ उनके पास अलग अलग तरह के लोग आते रहेंगे और टेलिफ़ोन करते रहेंगे, और हमेशा वे या तो काम पर जाते रहेंगे, य परीक्षा देते रहेंगे, या ल्योन्या को संभालते रहेंगे, और मैं यहाँ इंतज़ार करता रहूँगा, इंतज़ार करता रहूँगा, और ये इंतज़ार कभी ख़त्म ही नहीं होगा...’
 “...वहाँ, जहाँ हम रहेंगे, सचमुच का जंगल है, अपने यहाँ की बगिया जैसा नहीं...कुकुरमुत्ते, बैरीज़, ...”
 “भेड़िए भी हैं?”
 “वो मैं अभी नहीं बता पाऊँगा. भेड़ियों के बारे में मैं ख़ास तौर से पता करूंगा और तुम्हें ख़त में लिखूँगा...और नदी है, हम तुम तैरने के लिए जाएँगे...मैं तुम्हें पेट के बल खिसकते हुए तैरना सिखाऊँगा...”
 ‘और कौन कह सकता है,’ आशा की एक नई उमंग से सिर्योझा ने सोचा, शक करते करते वह थक गया था. ‘हो सकता है, यह सब सचमुच में होगा.’
 “हम बन्सियाँ बनाएँगे, मछलियाँ पकडेंगे...देखो! बर्फ़ पड़ने लगी!”
वह सिर्योझा को खिड़की के पास ले गया. खिड़की के पार बड़े बड़े सफ़ेद फ़ाहे उड़ रहे थे, एक पल में चपटे होकर खिड़की की काँच से चिपक रहे थे. सिर्योझा उनकी ओर देखने लगा. वह पूरी तरह थक गया था, अपना गरम गीला गाल कोरोस्तेल्योव के चेहरे से चिपकाए वह शांत हो गया था.
 “आ गईं सर्दियाँ! फिर से ख़ूब घूमोगे, स्लेज पर फिसलोगे, समय तो बिना कुछ महसूस किए उड़ जाएगा...”
 “मालूम है,” सिर्योझा ने ग़मगीन परेशानी से कहा. “मेरी स्लेज की डोरी बहुत बुरी है, तुम नई डोरी बांध दो.”
 “ठीक है. ज़रूर बांध दूँगा. मगर तुम, दोस्त, मुझसे वादा करो : अब कभी नहीं रोओगे, ठीक है? तुम्हें भी नुक्सान होता है, और मम्मा भी परेशान हो जाती है, और वैसे भी ये मर्दों का काम नहीं है. मुझे ये अच्छा नहीं लगता...वादा करो कि कभी नहीं रोओगे.”
 “हूँ,” सिर्योझा ने कहा.
 “वादा करते हो? पक्का वादा?”
 “हूँ, हूँ...”

 “तो, ठीक है फिर. देखो, मुझे तुम्हारे, मर्द के, वादे पर पूरा भरोसा है.”

वह थके हुए, बोझिल हो चुके सिर्योझा को पाशा बुआ के कमरे में ले गया, उसे पलंग पर लिटाया और कंबल से ढाँक दिया. सिर्योझा ने एक लंबी, हाँफ़ती हुई साँस छोड़ी और फ़ौरन सो गया. कोरोस्तेल्योव कुछ देर खड़ा रहा, उसकी ओर देखता रहा. डाईनिंग रूम से आती हुई रोशनी में सिर्योझा का चेहरा छोटा सा, पीला नज़र आ रहा था – कोरोस्तेल्योव मुड़ा और पंजों के बल बाहर निकल गया.